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BLESSINGS

ॐ ह्रीं अर्हम् नमः

श्रीसद्गुरुभ्यो नमः

ॐ ऐं नमः

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SHREE MATI GYANAY NAMAH

SHREE SHRUT GYANAY NAMAH

SHREE AVADHI GYANAY NAMAH

SHREE MANAH-PARYAV GYANAY NAMAH

SHREE KEVAL GYANAY NAMAH

5 GYAN

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Inspired by:

Yugpradhan Acharyatulya P.P. Panyas Shree Chandrashekhar Vijayji M.S.

P.P. Panyas Shree Yashobhushan Vijayji M.S.

P.P. Panyas Shree Manobhushan Vijayji M.S.

AADINATH BAGWAN PART - 8

LEARN & TURN PART – 2 STORY NO 36

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  1. भरत चक्रवर्ती ने अष्टापद पर्वत पर उस स्थान पर एक मंदिर बनवाया, जहां प्रभु ऋषभदेव का निर्वाण (मोक्ष) हुआ था।

मंदिर में चारो ओर अनुक्रम से ४+८+१०+२= २४ तीर्थंकर की मूर्तियाँ हैं

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२) सगर चक्रवर्ती ने अपने ६०,००० पुत्रों के साथ तीर्थ की रक्षा के लिए उसके चारों ओर एक गहरी घाटी बनाई।

दरार को पानी से भरने के लिए, उन्होंने गंगा नदी के साथ जोड़ा।

पाताल लोक में देवो के उपर पानी गिरने से, कुछ देवों ने क्रोधित होकर ६०,००० राजकुमारो को जिंदा जला दिया।

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३) राजा रावण अपनी पत्नी मंदोदरी के साथ अष्टापद तीर्थ पर भगवान की भक्ति कर रहे हैं।

रावण वीणा बजा रहा है, जबकि मंदोदरी नृत्य कर रही है।

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४) अचानक वीणा का तार टूट गया और रावण ने उस तार को अपनी नस से जोड दिया।

उन्होंने सुनिश्चित किया कि भक्ति में कोई रूकावट न हो, संगीत और नृत्य बिना रूकावट जारी रहे।

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५) वीरमती राजकुमारी ने अष्टापद तीर्थ की २४ मूर्तियों के ललाट को हीरों के तिलक से सजाया।

उस पुन्य के फलस्वरूप अगले जन्म में दमयंती के रूप में जन्म से ही उनके ललाट पर तिलक लगा था।

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६) वाली मुनि ने बहुत साल पहले तीर्थ की रक्षा की थी,

फिर उसने वहाँ पर अनशन किया और केवलज्ञान प्राप्त किया।

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७) अष्टापद तीर्थ के ८ पगथिये (कदम) थे, १ पगथिया १ योजन यानी कि १३ कि.मी. ऊंचा था।

१,५०० हिंदू तापसोने ने अष्टापद तीर्थ पर चढ़ने की बहुत कोशिश की, लेकिन ऐसा नहीं कर सके।

गौतमस्वामी ने अपनी लब्धि यानी की आत्मा की शक्ति से सूर्य के किरण पकड़कर अष्टापद की यात्रा की, उस समय "जगचिंतामणि सूत्र" की रचना की।

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८) दीक्षा की याचना करने पर गौतमस्वामी ने उन १,५०० तापसो को दीक्षा दी।

फिर उन्होंने १,५०० तापसो को पारणा करवाने के लिए खीर भी वपराइ।

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९) गौतमस्वामी ने वहां पर कई देवों को उपदेश दिया,

उनमें से एक देव दूसरे जन्म में वज्रस्वामी बने।

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१०) आचार्य श्री वीरसूरीश्वरजी महाराज साहब ने यक्ष की सहायता से अष्टापद तीर्थ की यात्रा की।

यक्ष ने एक बैल का रूप धारण किया और आचार्य को यात्रा पूरी करने में सहाय की।

यात्रा की स्मृति के रूप में, आचार्य श्री क्रिस्टल से बने चावल का एक दाना वापस लाए।

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