JEEVAK AYURVEDIC MEDICAL COLLEGE
AND RESEARCH CENTRE
Kamlapur, Akauni Chandauli, UP
Guided By:-
Dr. Amit Kumar Singh (H.O.D)
Associate Professor
Dr. Varsha Gupta
Assistant Professor
Presented By:-
Ritika Kumari
Roll No.
B.A.M.S 1ST Prof.
Batch:-2023-24
Topic:- मासानुमासिकी वृद्धि क्रम
Department of Rachana Sharira
index
गर्भ परिभाषा
2nd slide
पंचम मासः
षष्ठ मास :
नवम एवं दशम मासः
11th slide
द्वितीय मासः-
प्रथम मासः-
8th slide
9th slide
तृतीय मासः
चतुर्थ मासः
13th slide
सप्त मासः-
16th slide
18th slide
19th slide
21th slide
अष्टम मासः
23rd slide
गर्भ का मासानुमासिक वृद्धि क्रम
गर्भ परिभाषा
आचार्य चरक के अनुसार
शुक्रशोणितजीवसंयोगे तु खलु कुक्षिगते गर्भसंज्ञा भवति ।।
च.शा. 4/5)
* शुक्र, शोणित एवं जीव के कुक्षिगत (गर्भाशय) संयोग को गर्भ की संज्ञा दी जाती है
आचार्य सुश्रुत के अनुसार
(सु.शा. 5/3)
शुक्रशोणितं गर्भाशयस्थमात्मप्रकृतिविकारसंमूच्छितं 'गर्भ' इत्युच्यते। तं चेतनावस्थितं वायुर्विभजति, तेज एनं पचति, आपः क्लेदयन्ति, पृथिवी संहन्ति, आकाशं विवर्धयति, एवं विवर्धितः, स यदा हस्त-पाद-जिह्वा-घ्राण-कर्ण-नितम्बादिभिरङ्गैरुपेतस्तदा "शरीर" इति संज्ञा लभते।
गर्भाशय में स्थित आत्मा, प्रकृति (अष्ट प्रकृति, जिसमें प्रकृति, महत्, अहंकार और पञ्चतन्मात्रा हैं) और विकारों (पञ्चमहाभूत एवं एकादश इन्द्रियाँ ये षोडश विकार) से युक्त शुक्र और शोणित गर्भ कहलाता है। इस चेतना युक्त गर्भ में वायु द्वारा विभाजन, तेज द्वारा पाचन, अप या जल के द्वारा क्लेदन या आर्द्रता, पृथ्वी के द्वारा संहनन या कठिनता तथा आकाश महाभूत के द्वारा विवर्धन या आकार में बड़ा होना, होता है। इस प्रकार परिवर्धित या वृद्धि को प्राप्त हो गर्भ जब हस्त, पाद, जिह्वा, कर्ण, नितम्ब, आदि अंगों से युक्त होता है, तब शरीर संज्ञा को प्राप्त होता है।
उपनिषद् एवं आयुर्वेद विद्वानों ने एक माह तक गर्भ में चार परिवर्तन बताये हैं। आधुनिक विद्वानों ने भी उसी के अनुरूप मोरुला आदि रूप में गर्भ का विकास बताया है।
शुक्र शोणित संयोग के समय से लेकर एक माह तक के गर्भ में क्या परिवर्तन होता है, इसे दिव्यदृष्टि के आधार पर ही व्यक्त किया गया ऐसा उल्लेख आया है। अतः प्राचीन एवं आधुनिक विवरण को मासानुमासिक विकास के आधार पर व्यक्त किया जा रहा है। वर्तमान में टेस्ट ट्यूब बेबी निर्माण में इन अवस्थाओं का स्पष्टीकरण हुआ है।
प्रथम मासः-
"तत्र प्रथमे मासि कललं जायते"
यह गर्भ शुक्रशोणित संयोग के पश्चात् प्रथम माह में कलल के रूप को धारण करता है। आधुनिक एवं दार्शनिक दृष्टि से इसका पूर्ण विवरण पीछे कर आये
(सु.शा. ३/१५)
द्वितीय मासः-
"द्वितीये शीतोष्मानिलैरभिप्रपच्यमानानां महाभूतानां संघातो घनः संजायते।"
द्वितीय मास में यह गर्भ शीत एवं उष्मा अर्थात् वातादि दोषों से परिपक्व होकर पंचमहाभूतयुक्त घनरूप हो जाता है। यह गर्भघन यदि पिण्ड के आकार का हो तो पुरुष, पेशी के आकार का हो तो स्त्री एवं अर्बुद के आकार का हो तो नपुंसक समझना चाहिए।
(सु.शा. ३/१५)
तृतीय मासः
तृतीय मासः
"तृतीये हस्तपादशिरसां पञ्च पिण्डका निर्वर्तन्ते।"
तीसरे मास में दो हाथ, दो पैर एवं सिर इनके पांच उभार दिखाई देने लगते हैं। तीसरे मास में गर्भ की लम्बाई तीन इंच हो जाती है। अन्य अंग स्पष्ट रूप से प्रकट होते हैं। इसी माह में जननेन्द्रियों का भी विकास हो जाता है। अतः लिंग भेद आसानी से किया जा सकता है।
(सु.शा. ३/१५)
चतुर्थ मासः
चतुर्थ मासः
"चतुर्थे सर्वांगप्रत्यंगविभागः प्रव्यक्ततरो भवति।"
चतुर्थ मास में अंग-प्रत्यंगों का विभाग स्पष्ट हो जाता है। इसी माह में माता को दोहृदनी या दोहृदया कहते हैं, क्योंकि दोहृद की उत्पत्ति हो जाती है। इस मास में गर्भ का हृदय अपना कार्य प्रारम्भ कर देता है अतः सगर्भा माता को दोहृदया कहते हैं।
(सु.शा. ३/१५)
इस माह में अधो-शाखा को मिलाकर गर्भ की लम्बाई 15 से०मी० तक हो जाती है। इस माह में माता की इच्छाओं की पूर्ति करना आवश्यक होता है। क्योंकि वह गर्भ के लिए आहार की इच्छा करती है। अतः इच्छा पूर्ण नहीं करने से गर्भ में विकृति आ जाती है। वैसे भी इस माह के पश्चात् गर्भ का विकास तेजी से होने लगता है अतः पौष्टिक आहार देना आवश्यक है, जिससे सन्तान में विकृति न आ सके एवं स्वस्थ सन्तान उत्पन्न हो सके।
पंचम मासः
पंचम मासः
"पञ्चमे मनः प्रतिबुद्धतरं भवति
पांचवें मास में मन अति प्रबुद्ध हो जाता है। यही कारण है कि गर्भ की गतिशीलता का अनुभव माता करने लगती है। गर्भ के सिर पर रोम व केश प्रकट होने लगते हैं। इसी माह में गर्भ की रचना पर एक चिकना पदार्थ बनने लगता है। इस समय तक गर्भ की लम्बाई 23 से०मी० हो जाती है।
(सु.शा. ३/२८)
षष्ठ मास :
"षष्ठे बुद्धि"
छठे महीने में बुद्धि का विकास होता है। गर्भ की लम्बाई लगभग एक फुट हो जाती है। त्वचा में झुर्रियां एवं उसके नीचे वसा का संचय हो जाता है। इसी माह में नेत्र, पक्ष्म एवं भौं की उत्पत्ति होने लगती है।
(सु.शा. ३/२८)
सप्त मासः-
सप्त मासः-
सप्तमे सर्वांगप्रत्यंगविभागः प्रव्यक्ततरः।
सातवें मास में सम्पूर्णअंग एवं प्रत्यंगों का विभाग और भी अधिक स्पष्ट हो जाता है। नेत्र खुल जाते हैं। त्वचा का लाल वर्ण होकर ऊपर से सिलवटें पड़ जाती है। गर्भ मानव रूप में आ जाता है। इस माह में 35 से०मी० लम्बाई एंव वजन 1.5 किलोग्राम हो जाता है। यह जीव जीवित रहने की क्षमता रखता है। इसी कारण सप्तम मास में उत्पन्न बालक जीवित रहते देखे गए हैं।
(सु.शा. ३/२८)
अष्टम मासः
अष्टम मासः
"अष्टमेऽस्थिरीभवत्योजः"
आठवें माह में ओज अस्थिर होता है।इसी कारण इस माह में जन्म लेने पर शिशु जीवित नहीं रहता। इसी माह में सम्पूर्ण त्वचा एक चिकने पदार्थ से ढकी रहती है। इस मास में गर्भ की लम्बाई 50 से०मी० हो जाती है। प्राचीनों के अनुसार इस माह में ओज माता के गर्भ में चला जाता है अतः शिशु जीवित नहीं रहता।
(सु.शा. ३/२८)
नवम एवं दशम मासः
"नवमदशमैकादशद्वादशानामन्यतमस्मिन् जायते।"
अर्थात् नौवें, दसवें, ग्यारहवें एवं बारहवें मास में से किसी भी महिने में प्रसव हो जाता है. क्योंकि इस समय तक सम्पूर्ण निर्माण प्रक्रिया समाप्त हो जाती है एवं गर्भ बाहर आने के लिए तैयार होता है।
(सु.शा. ३/२८)