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JEEVAK AYURVEDIC MEDICAL COLLEGE

& HOSPITAL RESEARCH CENTRE

Kamlapur, Akauni Chandauli, UP

Topic:- Shukra & Artava

Guided By:-

Dr. Amit Kumar Singh (H.O.D)

Associate Professor

Dr. Varsha Gupta

Assistant Professor

Department of Rachana Sharira

Presented By:-

Supriya Jaiswal

Roll No. 40

B.A.M.S 1ST Prof.

Batch:-2023-24

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INDEX

  • शुक्र
  • आर्तव
  • पर्याय
  • उत्पत्ति
  • स्वरूप
  • स्थान
  • शुद्ध शुक्र के लक्षण
  • दोष
  • कारण
  • कार्य
  • नैदानिक महत्त्व
  • सामान्य चिकित्सा
  • पर्याय
  • उत्पत्ति / स्वरूप
  • शुद्ध आर्तव के लक्षण
  • प्रकार
  • दोष
  • क्षय/वृद्धि
  • महत्त्व
  • नैदानिक महत्त्व
  • Research Articles

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शुक्र का वर्णन (Concept of Shukra)

शुक्र के पर्यायी नाम (Synonyms of shukra )

शुक्रं तेजोरेतसी च बीजवीर्येन्द्रियाणि च। (अमरकोश)

वीर्य, रेतस्, पुंबीज, बीज, पुंशुक्र, स्त्रीशुक्र, तेज आदि।

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शुक्र की उत्पत्ति (Formation of shukra)

रसाद्रक्तं ततो मांस मांसान्मेदस्ततोऽस्थि च।

अस्थ्नो मज्जा ततः शुक्रं शुक्राद्रर्भः प्रसादजः।।

(च.चि. 15/16)

रसाद्रक्तं ततो मांसं मांसान्मेदः प्रजायते।

मेदसोऽस्थि ततो मज्जा मज्जः शुक्रं तु जायते ॥

(सु.सू. 14/10)

आचार्य चरक एवं सुश्रुत के अनुसार मज्जा से शुक्र की उत्पत्ति होती है। मज्जा के प्रसादांश पर शुक्रवह स्त्रोतसों में शुक्राग्नि की क्रिया से प्रसाद रूप शुक्र धातु की उत्पत्ति होती है। अथवा आहार रस में उपस्थित शुक्र समान अंश पर शुक्रवह स्स्रोतस में शुक्राग्नि की क्रिया से प्रसाद भाग ही बनता है, जिससे शुक्रधातु का पोषण होता है।

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शुक्र स्वरूप (Nature of shukra )

सौम्यं शुक्रम् । (सु.शा. 3/3)।

  • इसमें जल महाभूत की प्रधानता होती है, इसीलिये शुक्र सौम्य (शीतल और स्निग्ध) होता है।

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शुक्र का स्थान (Place of shukra)

रस इक्षौ यथा दध्नि सर्पिस्तैलं तिले यथा।

सर्वत्रानुगतं देहे शुक्रं संस्पर्शने तथा ।।(च.चि. 2/4/46)

जैसे गन्ने में रस, दूध में घृत, तिल में तैल अव्यक्त रूप में व्याप्त रहता है, उसी प्रकार शुक्र भी पुरुषों में व्याप्त रहता है।

सप्तमी शुक्रधरा नाम; या सर्वप्राणिनां सर्वशरीरव्यापिनी।(सु.शा. 4/20)

सातर्वी शुक्रधरा कला है, जो सभी प्राणियों के सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहती है।

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शु‌द्ध शुक्र के लक्षण (Qualities of semen)

स्फटिकाभं द्रवं स्निग्धं मधुरं मधुगधि च।

शुक्रमिच्छन्ति केचित्तु तैलक्षीदनिभं तथा।। (सु.शा. 2/11)

  • वर्ण(colour) स्फटिक के समान श्वेत(crystal like)
  • स्पर्श(touch) द्रव, स्निग्ध(liquid & viscid)
  • रस(taste) मधुर रस(sweet in taste)
  • गन्ध(odour) मधु के समान(odour of honey)

"षट्पदपिपीलिकानामिष्टम् ।" (सु.सू. 14/21)

शुक्र के भूमि पर गिरने या किसी कपड़े पर लगने से चीटियाँ उसकी तरफ आकर्षित होती है।

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स्निग्धं घनं पिच्छिलं च मधुरं चाविदाहि च ।

रेतः शुद्धं विजानीयात् श्वेतं स्फटिकसन्निभम् ।।(च.चि. 30/145-146)

शुद्ध शुक्र स्निग्ध(oleaginous) , गाढा(thick) , चिपचिपा(sticky) , मधुर, अविदाही (पाक न होने वाला) एवं स्फटिक के समान श्वेत(whitish) रहता है। कुछ आचार्यों के अनुसार तैल-समान या मधु के समान दिखने वाला शुक्र शुद्ध शुक्र समझना चाहिए।

बहलं मधुरं स्निग्धर्मविप्रं गुरु पिच्छिलम्।

शुक्लं बहु च यच्छुक्रं फलवत्तर्दसंशयम् ॥ (चरक चि० 2/4/50)

सन्तानोत्पादक शुक्र बहल, रस में मधुर, गुण में स्निग्ध, दुर्गन्धरहित, गुरु पिच्छिल, वर्ण में शुक्ल और स्राव के समय जो अधिक मात्रा में निकले वह फलयुक्त होता है अर्थात् फल देने वाला है

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फेनिलं तनु रूक्षं च विवर्णं पूति पिच्छिलम्।

अन्यधातूपसंसृष्टमवसादि तथाष्टमम् ।। (च.चि. 30/139-140)

  1. फेनिल – फेनयुक्त(frothy) शुक्र

2. तनु - कम प्रमाण वाला शुक्र/पतला(dilute)

  1. रूक्ष – रूक्षता(dryness)- युक्त शुक्र
  2. विवर्ण - विकृत वर्ण(discolour)वाला शुक्र
  3. पूति - सड़ी गंध(bad odour)वाला/दुर्गंधयुक्त
  4. पिच्छिल – चिपचिपा(sticky)
  5. अन्यधातूपसंसृष्ट - अन्य धातु के साथ मिश्रित शुक्र
  6. अवसादि – अवसाद(precipitant) या रिक्ततायुक्त शुक्र ।

शुक्र के दोष(Defects of shukra)

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वात-पित्त-श्लेष्म-शोणित-कुणपगन्धि-ग्रन्थि पूति-पूय क्षीण-मूत्र-पुरीष-रेतसः प्रजोत्पादने न समर्था भवन्ति। (सु.शा. 2/3)

  1. वात - दूषित वातयुक्त(contaminated with Vata)
  2. पित्त - दूषित पित्तयुक्त शुक्र(contaminated with Pitta)
  3. श्लेष्म - दूषित कफयुक्त शुक्र(contaminated with Kapha)

4. शोणित - दूषित रक्तयुक्त शुक्र(blood mixed)

  1. कुणपगन्धि - मुर्दों की गन्ध वाला(cadaveric smell)
  2. ग्रन्थि – गाँठयुक्त(clotted)
  3. पूति - सड़ी गंध वाला दुर्गंधयुक्त(dirty/foul odour)
  4. पूय- पूय(smell of pus) युक्त
  5. क्षीण - प्रमाण में कम(oligospermia)
  6. मूत्र मूत्र के समान दुर्गंध वाला(contaminated with urine)
  7. पुरीष के समान दुर्गंध वाला(contaminated with faeces)

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शुक्र में दोष आने के कारण (Causes of shukra dosha)

जरया चिन्तया शुक्रं व्याधिभिः कर्मकर्षणात् क्षयं गच्छत्यनशनात्न स्त्रीणां चातिनिषेवणात्। (च.चि. 2/4/43)

  • जर- वृद्धावस्था (old age)
  • चिन्त- चिन्ता (worry)
  • व्याधि- अनेक प्रकार की व्याधियाँ (illness)
  • कर्मकर्षणा- शक्ति से अधिक कार्य करना (emaciation due to over work)
  • अनशन-अधिक उपवास करना (not eating)
  • अतिस्त्री निषेवण- स्त्रियों के साथ अधिक सहवास करना (frequentindulgence with female)
  • अत्यन्त मैथुन, मादक पदार्थों का अत्यधिक सेवन करना, जननेन्द्रिय सम्बन्धी रोग (S.T.D.) जैसे- उपदंश (Syphilis), पूयमेह (Gonorrhoea) आदि।
  • आयुर्वेद की दृष्टि से शारीरिक धातुओं को दूषित करने में प्रमुख कारण त्रिदोष है।

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शुक्रदोषों की साध्यासाध्यता (Prognosis of Shukra dosha)

  • एकदोषज, रक्तज - साध्य (curable) ।
  • द्विदोषज - कष्टसाध्य (difficult to treat) 1
  • सन्निपातज, मूत्रगंधी, पुरीषगंधी असाध्य (Incurable) ।

शुक्र के कार्य (Function of shukra)

शुक्रं धैर्यं, च्यवनं, प्रीतिं, देहबलं, हर्षं, बीजार्थं च ।(सु.सू. 15/5 (1)7)

शरीर में धीरता (patience), वीर्यच्युति (power), प्रीति या प्रसन्नता (happiness), देहबल (body strength), प्रहर्ष (Exitement), बीजार्थ या गर्भोत्पत्ति में भाग लेना (Fertilisation) - ये शुक्र के कार्य हैं।

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शुक्र की महत्ता (Importance of Shukra)

आहारस्य परं धाम शुक्रं तद् रक्ष्यमात्मनः ।

क्षयो ह्यास्य बहून् रोगान् मरणं वा नियच्छति ।। (च.नि. 6/09)

अर्थात् आचार्य चरक के अनुसार आहार के परिपाक (digesion) के उपरान्त अंतिम धातु शुक्र है, अतः उसकी विशेष रूप से रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि इसके क्षीण होने पर अनेक रोगों की प्राप्ति अथवा मृत्यु निश्चित है। शुक्र के क्षय से मृत्यु हो जाती है तथा शुक्र को धारण करने से ही जीवन रहता है। इसलिए यहाँ पर आचार्य चरक ने शुक्र की महत्ता का वर्णन करके उसकी रक्षा (protect) करने का निर्देश किया है।

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शुक्र का नैदानिक महत्त्व (Clinical importance of shukra)

  • क्लैब्य रोग (Impotency) - शुक्र धातु के दूषित (defective) होने से क्लैब्य रोग उत्पन्न होता है।
  • शुक्र प्रदोषज रोग- वीर्य के दूषित हो जाने से, 1. नपुंसकता 2. कामोत्तेजना का अभाव, 3. रोगी नपुंसक या अल्पायु या कुरूप सन्तान की उत्पत्ति करना है, 4. गर्भधारण न होना और 5. गर्भस्राव (miscarrage) या गर्भपात (abortion) होना ये विकार होते हैं। दूषित वीर्य स्वयं को, स्त्री को और सन्तान को बाधा पहुँचाता है।

शुक्र क्षय के लक्षण

शुक्र का क्षय होने पर शुक्र का देर से निकलना, शुक्र के साथ रक्त का निकलना, वृषण में वेदना तथा शिश्न सेधुआँ का निकलना ऐसे प्रतीत होना-ये सभी शुक्र क्षय के लक्षण हैं।

शुक्र वृद्धि के लक्षण-

मैथुन की अधिक इच्छा उत्पन्न करता है और उसका वेग धारण करने पर वह शुक्राश्मरी को उत्पन्न करता है।

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शुक्र का सामान्य चिकित्सा (Treatment

of shukra dosha)

• निदान परिवर्जन ।

• संशोधन चिकित्सा के बाद उत्तर बस्ति का प्रयोग।

• रक्तपित्त शामक चिकित्सा।

• योनिव्यापद् के अन्तर्गत वर्णित दोषानुसार चिकित्सा।

• वाजीकरण द्रव्यों का प्रयोग।

• जीवनीय द्रव्यों से साधित घृत का प्रयोग।

• च्यवनप्राशावलेह का प्रयोग।

• शुद्ध शिलाजीत का प्रयोग।

• बस्ति कर्म का विशेष रूप से प्रयोग।

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आर्तव का वर्णन (Concept of Artava)

आर्तव के पर्याय (Synonyms of Artava)

रज, शोणित, रसज, स्त्रीशुक्र ।

रज – रक्त वर्ण का और रस से निर्मित।

शोणित - रक्त वर्ण का या रक्त का मलभाग।

रसज - रस धातु का उपधातु ।

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आर्तव की उत्पत्ति (Formation of Artava)

रसात् स्तन्यं आर्तवम्। (च. चि. 15/17)

महर्षि चरक के अनुसार रस से ही स्तन्य एवं आर्तव का निर्माण होता है।शाङ्गधर के अनुसार आर्तव रक्त का उपधातु है।

आर्तव स्वरूप (Nature of Artava)

आर्तवं आग्नेयं च । (सु. शा. 3/03)

आर्तव आग्नेय होता है अर्थात् आर्तव अग्नि महाभूत-प्रधान होता है।

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शुद्ध आर्तव के लक्षण (Qualities of normal menstrual fluid)

शशासृक्प्रतिमं यत्तु यद्वा लाक्षारसोपमम् ।

तदार्तवं प्रशंसन्ति यद्वासो न विरञ्जयेत् ।। (सु.शा. 2/17)

  • शशासृक्प्रतिमम् :- खरगोश के रक्त के समान वर्ण वाला (resem-bles the blood of hare)
  • लाक्षारसोपमम्ः- लाक्षापुष्प के रस-समान (resembles the liquid shellac)
  • तदार्त्तवं प्रशंसन्तिः- वही आर्तव प्रशंसनीय (commendable) शुद्ध (pure) प्राकृत होता है।
  • यद्वासो न विरञ्जयेत्:- कपड़े को धोने पर आर्तव का धब्बा नहीं रहता (does not stains the cloth)।

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गुंजाफलसवर्णं च पद्मालक्तकसन्निभम्।

इन्द्रगोपकसंकाशमार्तवं शुद्धमादिशेत् ।।(च. चि. 30/226)

  1. गुंजाफलसवर्णं :- गुंजाफल के वर्ण-समान वर्ण वाला
  2. पद्मालक्तकसन्निभं :- कमल के समान दिखने वाला
  3. इन्द्रगोपकसंकाशं : कीड़े (Ladybug insect) के समान दिखने वाला।

आर्तवं पुनः शशरुधिरलाक्षारसोपमं धौतं च विरज्यमानं शुद्धमाहुः। (अ.सं.शा. 1/20)

अष्टांग संग्रहकार के अनुसार शुद्ध आर्तव के लक्षण-खरगोश के रक्त के समान अथवा लाक्षा के रस के समान लाल होता है और श्वेत वस्त्र पर लगा हुआ आर्तव धोने पर साफ हो जाता है वह आर्तव शुद्ध माना जाता है।

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आर्तव के प्रकार (Classification of Artava)

  1. अन्तःपुष्प (Ovum):- जो प्रत्यक्ष गर्भात्पत्ति में भाग ले।
  2. बहिःपुष्प (Menstrual blood ):- जो गर्भाशय और योनि कीसफाई (clean) करे।
  • स्त्री के आर्तव के दो भाग होते हैं।
  • एक भाग वह है, जो गर्भाशय (Uterus) और योनि (Vagina ) की सफाई करके मैथुन के लिए उपयुक्त बनाता है।
  • Uterus और Vagina को शुक्राणुओं के प्रवेश के लिए मार्ग को बाधारहित करता है, और Uterus को गर्भ के स्थित होने योग्य बनाता है।
  • दूसरा भाग वह है, जो प्रत्यक्ष में गभर्वोत्पत्ति में भाग लेता है।
  • इस प्रकार प्रथम भाग को आर्त्तवशोणित या बहिः पुष्प (Menstrual blood) कहते हैं।
  • और दूसरे भाग को शोणित या अन्तःपुष्प (Ovum) कहा जाता है।

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आर्तव दोष

आर्तव एवं शुक्र में समानता होने से शुक्र के समान आर्तव में भी दोष होते हैं। इसमें शुक्र की तरह साध्यासाध्यता होती है। इस विषय में सुश्रुत लिखते हैं कि:-

आर्तवमपि त्रिभिर्दोषै.... कुणपग्रन्थिपूतिपूयक्षीणमूत्रपुरीषप्रकाशमसाध्यं साध्यमन्यच्चेति । (सु०शा० 2/5)

अर्थात् आर्तव भी तीनों दोषों से तीनों प्रकार का. चौथा रक्त दोष से दो, दो दोषों के संयोग से द्वन्द्वात्मक तथा त्रिदोष से दुषित प्रजोत्पादन में अयोग्य होता है। इनकी परीक्षा दोषों के वर्ण से तथा वेदनाओं से की जाती है। इन आर्तव दोषों में से कुणपगन्धि, पूति, पूय, क्षीण तथा मूत्र और मल को गन्धों से युक्त असाध्य होता. है। इनके अतिरिक्त अन्य दोषों वाला साध्य होता है।

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आर्तवक्षय के लक्षण (Symptoms of deficient Artava)

  1. यथोचित काल अदर्शन- प्राकृत समय पर मासिक स्त्राव का न होना।
  2. अल्पता- कम प्रमाण में रजः स्राव होना।
  3. योनिवेदना - योनि में वेदना होना।यह सभी आर्तवक्षय के लक्षण हैं।

आर्तववृद्धि के लक्षण (Symptom of Intense Artava)

  1. अङ्गमर्द - अंग दुःखी (body ache)
  2. अतिप्रवृत्ति - अधिक प्रमाण में आर्तव का स्राव होना (excessive bleeding)
  3. दौर्गन्ध्य – आर्तव का दुर्गन्ध-युक्त होना

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आर्तव का महत्त्व (Importance of Artava)

रक्तलक्षणमार्तवं गर्भकृच्च, गर्भो गर्भलक्षणम् ।

स्तन्यं स्तनयोरापीनत्वजननं जीवनं चेति ।। (सु. सू. 15/5)

शुद्ध आर्तव को रक्त के समान लक्षणों वाला समझना चाहिए।

शुद्ध आर्तव गभर्भाशय की शुद्धि करता हैं, गर्भधारणा के लिए बीजनिर्माण (ovum formation) करता हैं, गर्भीणी के शरीरमें अपरा निर्माण (placenta formation) एवं अपरा वृद्धि और स्तन वृद्धि एवं स्तन्य जनन (lactogenesis) करता है।

माता का दूध यह शिशु के विकास के लिए जीवनदायी (life giving) रहते हैं।

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आर्तववह स्रोतों का नैदानिक महत्त्व

(Clinical importance as per ayurved)

  • बन्ध्यता (Sterility) - गर्भोत्पादन में असामर्थ्य (incapable) को वन्ध्यत्व कहते हैं।
  • रक्तज गुल्म - गर्भाशय में आर्तव के रुक जाने (obstruction) से ही यह उत्पन्न होता है।

सुश्रुताचार्य के अनुसार आर्तववह स्रोतस पर वेध होने या उनमें विकार उत्पन्न होने पर नपुंसकता (impotency), वन्ध्यापन (sterility), मैथुन सहन करने की शक्ति न होना (dyspareunia), आर्तवनाश (Amenorrhea) आदि होता है।सामान्य चिकित्सा सूत्रः आर्तववह स्रोतों के विकृत होने पर प्रदर कीचिकित्सा करनी चाहिए।

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