BLESSINGS
ॐ ह्रीं अर्हम् नमः
श्रीसद्गुरुभ्यो नमः
ॐ ऐं नमः
SHREE MATI GYANAY NAMAH
SHREE SHRUT GYANAY NAMAH
SHREE AVADHI GYANAY NAMAH
SHREE MANAH - PARYAV GYANAY NAMAH
SHREE KEVAL GYANAY NAMAH
5 GYAN
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 6
Iriya Vahiyam Sootra
Inspired by:
Yugpradhan Acharyatulya P.P. Panyas Shree Chandrashekar Vijayji M.S.
P.P. Panyas Shree Yashobhushan Vijayji M.S.
P.P. Panyas Shree Manobhushan Vijayji M.S.
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 6
इरियावही सूत्र
इरियावही सूत्र भाग - १
0भूमिका : मार्ग में आते जाते जो कुछ भी विराधना हुई हो याने जो कोई भी जीव हिंसा हुई हो, वो सभी पापो को मिच्छामी दुक्कडम देने का सुत्र है।
हिंसा किस तरह होती है, कौन से कौन से जीवो की हिंसा होती है, यह सूत्र में बताया है। साथ ही दूसरे अनेक जीवो की हिंसा भी दर्शायी है।
हमे यह सभी हिंसाओ को जानकर उससे बचना है, और क्वचित् जीव हिंसा हो गई हो तो, सच्चे हृदय से मिच्छामि दुक्कडम देना है।
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इरियावही सूत्र
पाणक्कमणे से संताना तक
पाणक्कमणे
( १) पाणक्कमणे : हमारे पाँव के नीचे चींटी, मकोडा आदि जीव जंतु दबकर मर जाय तो मिच्छामि दुक्कडम् ।
इस लिए हर वक्त नीचे देखकर चलना चाहिए। हो सके तो बिना जुते चंपल चलना चाहिए।
ताकि जीव हिंसा से बच सके।
दहेरासर, उपाश्रय, पाठशाला जाना हो, तथा गुरू म.सा. के सामैया में, रथयात्रा के वरघोडे में जाना हो तो अवश्य बिना जुत्ते जाना चाहिए, और चलते ही जाना जाहिए, सायकल, स्कूटर, गाडी में जाने से अधिक जीवो की हिंसा होती है।
इसलिए हमे ३ नियम करने चाहिए। (१) चलके जाना (२) नंगे पेर जाना (३) नीचे देखकर चलना ।
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इरियावही सूत्र
पाणक्कमणे से संताना तक
बीयक्कमणे
(२) बीयक्कमणे : पाँव के नीचे घेउ, जवार, बाजरी आदि के दाने आने पर या कुचलने पर मिच्छामि दुक्कडम्।
यह सभी दानो में वनस्पतिकाय के जीव होते है, जहाँ कबूतर के लिए जवार डाली हो, वहा चलना नहीं चाहिए, दाने कुचल जाते है और कबूतर भी डर के कारण उड जाते है।
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इरियावही सूत्र
पाणक्कमणे से संताना तक
हरीयक्कमणे
(३) हरीयक्कमणे : हरी वनस्पति को पैर के नीचे दबाना, कुचलना, जिस मेदान में घास हो उस पर, खेलना या चलना नहीं चाहिए।
शादी या पार्टी के प्रसंग में, बगीचे में धुमने जाने पर घास पर चलना, बैठना या खेलना नही चाहिए। एक-एक घास के तिनके में जीव होता है। इसलिए उनकी रक्षा करनी चाहिए।
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इरियावही सूत्र
पाणक्कमणे से संताना तक
ओसा
(४) ओसा : ओस ठंडी के दिनो में मार्ग पर गाडी, स्कूटर पर छोटे छोटे पानी के बूंद आ जाते है, वह सभी बूंदो में जीव होते है, यह जीव हिंसा न हो उसकी हमे परवा करनी चाहिए।
सूर्य उदय के थोडे समय बाद ओस नही आती (गरमी की वजह से)
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इरियावही सूत्र
पाणक्कमणे से संताना तक
उत्तिंग
(५) उत्तिंग : (कीडीयारु) चींटी का दर उसमें सेंकडो चींटींया होती है, उस पर कभी भी पैर नही रखना चाहिए, उस में कभी पानी भी नही डालना चाहिए। यदि घर में भी चींटी का दर हो तो उसे बंध नही करना चाहिए।
लक्ष्मण रेखा जैसी हिंसक दवा का उपयोग नहीं करना और घर में चींटी हो तो उसे दर की ओर भेज देना चाहिए।
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इरियावही सूत्र
पाणक्कमणे से संताना तक
पणग
(६) पणग : नील, शेवाल, सामान्य रूप से हरे रंग की होती है। उसके १ कण में अनंता जीव होते है। बारिश में दिवाल, पाणी की टंकी की दिवाल आदि के उपर होती है।
सोसायटी के कंपाउन्ड में पेवर ब्लोक के उपर भी होती है, कई संघ में सोसायटी में सफेद रंग का अथवा डामर का पट्टा किया जाता है।
हमे उस पर चलना चाहिए, जिसे हिंसा न हो।
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इरियावही सूत्र
पाणक्कमणे से संताना तक
दग
(७) दग: पानी बारिश का पानी, स्वीमींग पुल, बाथटब, शावर आदि से बहुत ज्यादा पानी का व्यय होता है, उपरांत वह पानी अनछाना होता है, जिस कारण अधिक पाप लगता है, हम पानी बीना नही जी सकते, इसलिए हम पानी का उपयोग करते है। परंतु हमे जरूर हो उतना ही करना चाहिए।
बीन जरूरी पानी इस्तमाल नहीं करना चाहिए। समुद्र के तट, तालाब, वोटर पार्क, रेईन डान्स, धूलेटी-होली में पानी व्यय नहीं करना चाहिए। इससे अधिक पाप लगता है, हमे बीन जरूरी पाप का त्याग करना चाहिए।
पानी में अप्काय जीव होते है।
१ बूंद में असंख्य जीव होते है।
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इरियावही सूत्र
पाणक्कमणे से संताना तक
मट्टी
(८) मट्टी : माटी - खुदाई की हुई माटी पर नहीं चलना चाहिए। उसमें पृथ्वी काय के जीव होते है।
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इरियावही सूत्र
पाणक्कमणे से संताना तक
मक्कडा संताणा
(९) मक्कडा संताणा : मकड़ी के जाले, घर में कई जगह होते है, उसे मकड़ी का घर कहते है, इसमें मकडी अंडे रखती है इस लिए हमे वह जाले तोडने नहि चाहिए।
घर में हरदिन साफ सफाई करने से जाले, हरि सेवाल आदि नहीं होते ।
यह सभी जीव को जानकर उनकी हिंसा से बचने का प्रयत्न करना चाहिए।
हमारे गुरु म.सा. कोई भी जीव-हिंसा न हो पैसे प्रयत्न करते है।
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इरियावही सूत्र
इरियावही सूत्र भाग - २
अभिहया से ववरोवीया तक
कोई भी क्रिया करने से पहेले इरियावही करते है।
आते-जाते अन्य कोई क्रिया करते वक्त, किसी को परेशान करने से -किसी को त्रास पीडा देने से जीव हिंसा होने पर, मिच्छामि दुक्कडम इस सूत्र में मांगते है।
कौन कौन से प्रकार से हिंसा हो सकती है। यह बात सूत्र में बताई गई है।
१० प्रकार से हिंसा हो सकती है।
वह सभी हिंसा की माफी इस सूत्र द्वारा मांगते है।
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इरियावही सूत्र
अभिहया से ववरोवीया तक
अभिहया
( १) अभिहयाः कोई भी जीव को हाथ-पैर या अन्य साधन से मारना।
दूसरे जीव को इस तरह नहि मारना चाहिए कि वह धायल होकर बहुत पीडा अनुभवे।
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अभिहया से ववरोवीया तक
वत्तिया
(२) वत्तियाः दूसरे जीवो को उल्टा करना।
खेल खेल में भी जीवो को उल्टा नहीं करना चाहिए।
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अभिहया से ववरोवीया तक
लेसीया
(३) लेसीयाः भूमि के साथ घीसा हो, चलते वक्त नीचे देखकर चलना चाहिए।
चींटी, मंकोडा आदि जीव, पैर के नीचे कुचल न जाय उसकी परवा करनी है।
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इरियावही सूत्र
अभिहया से ववरोवीया तक
संधाइया
(४) संधाइया: जीवो को जमा करना, छोटे छोटे जीवो को जमा करने से, उन्हे डर लगता है।
शरीर को पीडा होती है।
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इरियावही सूत्र
अभिहया से ववरोवीया तक
संघट्टिया
( ५) संघट्टियाः हाथ से छूना।
जीवो को त्रास हो, डर जाये इस प्रकार स्पर्श नहिं करना चाहिए।
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इरियावही सूत्र
अभिहया से ववरोवीया तक
परियाविया
(६) परियावियाः परिताप यानि पीडा पहुँचाना। उसके हाथ पैर पँख आदि तूट जाये, वह डर जाये, पैसा नहीं करना चाहिए, खेलते - खेलते या हसते हसते बांधे हुए कर्म भी, हमे भुगतने पडते है।
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इरियावही सूत्र
अभिहया से ववरोवीया तक
कीलामीया
(७) कीलामीयाः दूसरे जीवो को गर्मी लगाना, या शेकना शहद के पुडे में से शहद के लिए अग्नि से दझाना।
उस अग्नि में मधुमखी के बच्चे जो उड नही शकते, वह सब जल जाते है।
उनके अंडे भी अग्नि में जल जाते है। बहुत पाप लगता है।
इसलिए शहद कभी भी नहि खाना चाहिए। शहद महाविगई है।
असंख्य दोईन्द्रिय जीवो उत्पन्न होते है और मर जाते है।
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इरियावही सूत्र
अभिहया से ववरोवीया तक
उद्दविया
(८) उद्दवियाः यदि उद्वेग किया हो, दुःखी किया हो पोल्ट्री फार्म में मुर्गी के पास, ज्यादा अंडे पाने के लिए उसे शोक देते है, उसे पीडा पहुँचाते है, उससे पीडा सहन न होने पर मुर्गी जल्द अंडे दे देती है, उसका मालिक उस अंडे को बेचकर पैसै कमाता है। बहुत पाप लगता है इसलिए कभी भी अंडे खाने नहि चाहिए।
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अभिहया से ववरोवीया तक
ठाणाओ ठाणं संकामिया
(९) ठाणाओ ठाणं संकामियाः चूहा, चींटी, मंकोडा आदि को उनके घर परिवार से अलग करना, दूर स्थान पर रखने से पाप लगता है।
वे अपना घर ढूंढते रहेंगे, पर घर नही मीलता, परिवार नहीं मिलता।
वे दुःखी होते है।
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इरियावही सूत्र
अभिहया से ववरोवीया तक
जीवीयाओ ववरोवीया
(१०) जीवीयाओ ववरोवीयाः जान से मार डालना। सदा के लिए वह जीव मृत हो जाता है।
हमे दूसरे को थोडी सी भी पीडा नहीं देनी चाहिए, तो फिर हिंसा किस तरह कर सकते है? इस तरह दूसरे जीवों को त्रास देना, दुःखी करना, हाथ-पैर तोड कर जीव हिंसा करने से हमे अशाता वेदनीय कर्म का बंध होता है।
वह कर्म उदय में आने से हमे भी उससे अधिक गुनी पीडा का अनुभव करना पडता है।
बताये.... यदि कोई हमारे हाथ पैर तोड दे, हमे डराये, अग्नि दाह दे, तो हमे अच्छा लगेगा ? नहि, तो हमे भी दूसरो के साथ इस प्रकार का वर्तन करना नहीं चाहिए।