मीरा के पद
कक्षा :-11
जीवन परिचय
मीराबाई का जन्म सन 1498 ई. में मेड़ता (कुड़की) में रतन सिंह के घर हुआ। ये बचपन से ही कृष्णभक्ति में रुचि लेने लगी थीं। मीरा का विवाह मेवाड़ के सिसोदिया राज परिवार में हुआ। उदयपुर के महाराजा भोजराज इनके पति थे जो मेवाड़ के महाराणा सांगा के पुत्र थे। विवाह के कुछ समय बाद ही उनके पति का देहान्त हो गया। पति की मृत्यु के बाद उन्हें पति के साथ सती करने का प्रयास किया गया, किन्तु मीरा इसके लिए तैयार नहीं हुईं।
पति की मृत्यु पर भी मीरा ने अपना श्रुंगार नही उतारा, क्योंकि वह गिरधर को अपना पति मानती थी। वे विरक्त हो गई और साधु-संतों की संगति में हरिकीर्तन कर अपना समय व्यतीत करने लगी। पति के परलोकवास के बाद इनकी भक्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ती गई। ये मंदिरों में जाकर वहाँ मौजूद कृष्णभक्तों के सामने कृष्णजी की मूर्ति के आगे नाचती रहती थी। मीराबाई का कृष्णभक्ति में नाचना और गाना राज परिवार को अच्छा नहीं लगा। उन्होंने कई बार मीराबाई को विष देकर मारने की कोशिश की। घर वालों के इस प्रकार के व्यवहार से परेशान होकर वह द्वारका और वृन्दावन गई। वह जहाँ जाती थी, वहाँ लोगों का सम्मान मिलता था। इस सभी परिस्तिथियों के बीच मीरा का रहस्यवाद और भक्ति की निर्गुण मिश्रित सगुण पद्धत्ति सवर्मान्य बनी। मीरा की मृत्यु 1546 में द्वारका में हुई .
साहित्यिक परिचय
मीरा की कविता में प्रेम की गंभीर अभिव्यंजना है. उसमें विरह की वेदना है और मिलन का उल्लास भी. मीरा की कविता का प्रधान गुण सादगी और सरलता है. कला का अभाव ही उसकी सबसे बड़ी कला है. उन्होंने मुक्तक गेय पदों की रचना की. लोक संगीत और शास्त्रीय संगीत दोनों क्षेत्रों में उनके पद आज भी लोकप्रिय हैं. उनकी भाषा मूलतः राजस्थानी है तथा कहीं-कहीं ब्रजभाषा का प्रभाव है. कृष्ण के प्रेम की दीवानी मीरा में सूफियों के प्रभाव को भी देखा जा सकता है. मीरा की कविता के मूल में दर्द है. वह बार-बार कहती हैं कि मेरे दर्द को कोई पहचानता नहीं. न शत्रु न मित्र. उनकी प्रमुख रचनाएँ है – मीरा पदावली, नरसीजी-रो-माहेरो.
पद – १
मीरा कहती है कि उसके जीवन में कृष्ण ही उसके सर्वस्व है. उसने लोक-लाज छोड़कर और कुल मर्यादा का बंधन तोड़ कर संतों का साथ कर लिया है. उसने अपने आंसुओं से सींच-सींच कर प्रेम की बेल को बढ़ा लिया है. उसे कृष्ण का प्रेम ही माखन जैसा मूल्यवान प्रतीत होता है और शेष सांसारिकता छाछ जैसी व्यर्थ प्रतीत होती है. वह भक्तों को देखकर प्रसन्न होती है और जगत को देख कर रोती है.
कविता का सार
पद – २
इस पद में मीरा कृष्ण के प्रति अपनी दीवानगी प्रकट कराती है. वे अपने नारायण के प्रति पूरी तरह से समर्पित हो चुकी है. लोग उसे ‘दीवानी’ कहते है. कुनबा ‘कुलनाशी’ कहता है. राणा जी ने उसे विष का प्याला भेजा है, जिसे मीरा ने हँसते-हँसते पी लिया है. मीरा का कहना है कि ‘ईश्वर’ भक्ति से सहज ही प्राप्त हो सकते है.
प्रसंग : प्रस्तुत पद्यांश कृष्ण की दीवानी मीराबाई द्वारा रचित है. इसमें मीरा की अनन्य भक्ति भावना प्रकट हुई है. मीरा कृष्ण के प्रति इस तरह समर्पित है कि उसने भक्ति की राह में आने वाले भाई-बंधुओं, पति, सास आदि को भी त्याग दिया है.
व्याख्या: कृष्ण की दीवानी मीरा सारी दुनिया के सामने अपने प्रेम को बेबाक व्यक्त करती हुई कहती है- मेरा तो इस संसार में केवल गिरिधर कृष्ण ही है. अन्य कोई मेरा अपना नहीं है. मेरा पति तो केवल वही है जिसने सिर पर मोर मुकुट धारण किया हुआ है. उसे छोड़कर पिता, माता, भाई, रिश्तेदार कोई भी मेरा अपना नहीं है. मैंने सब को त्याग दिया है. वहीं मोर मुकुट धारी कृष्ण मेरा एकमात्र सहारा है. मैंने कुल की प्रतिष्ठा का विचार ही त्याग दिया है. मेरा कोई क्या कर लेगा ? मेरे तो रक्षक स्वयं भगवान हैं. मैंने माया से विरक्त संतो के साथ बैठ-बैठ कर रही सही लोक-लाज भी खो दी है.
मैंने अपने विरह अश्रुओं के जल से सींच-सींच कर अपने प्रेम की बेल को परिश्रम से बोया है. अब तो यह प्रेम की बेल पूरी तरह फैल गई है और उसमें आनंद रूपी फल भी लगने लगे हैं. अर्थात मैंने रो-रोकर कृष्ण का प्रेम प्राप्त किया है और इस प्रेम को मन में अच्छी तरह बसा लिया है. अब तो इस भगवद् प्रेम में आनंद भी आने लगा है.
मैंने दूध में मथानी डालकर बड़े प्रेम से उसे बिलोया है. उसमें से मैंने मक्खन तो निकाल लिया है, अब छाछ बची है. उसे जो चाहे पिए. आशय यह है कि मैंने संसार का चिंतन-मंथन करके यह पाया है कि भगवद्-भक्ति ही संसार का सार है. उसी को मैंने अपना लिया है. सांसारिकता तो नि:सार छाछ के समान है. उसे जो चाहे अपनाए. मुझे इससे लेना देना नहीं है. मैं भक्तों को देखकर प्रसन्न होती हूं और जगत को सांसारिकता के जाल में फंसा हुआ देखकर रोती हूं. दासी मीरा अपने प्रभु से प्रार्थना करती है - हे गिरिधारी कृष्ण! में आपकी सेविका हूं. कृपया आप मेरा उद्धार करो. और प्रतीक्षा न कराओ.
विशेष :
अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर :
१- मीरा यह क्यों कहती है – ‘दूसरो न कोई’ ?
२- मीरा किसके प्रति समर्पित है और क्यों ?
३- मीरा किन्हें देखकर रोती है और क्यों ?
प्रसंग :
प्रस्तुत पद कृष्ण की दीवानी मीरा द्वारा रचित है.इसमें उनकी अनन्य भक्ति प्रकट हुई है. उन्होंने कृष्ण के अनुराग में लोक-लाज और घर-परिवार की मर्यादा तोड़ दी है. वह अपने प्रभु के प्रति प्रेम प्रकट करती हुई कहती है-
व्याख्या :
हे प्रभु! तुम्हारी यह दासी अपने पैरों में घुंघरू बांधकर आपके प्रेम में नाच उठी है. अब सारी दुनिया इस प्रेम के खुले दृश्य को देख और सुन ले. यह सच है कि मैं अपने प्रभु की स्वयं ही दासी बन गई हूं. अर्थात अपनी इच्छा से कृष्ण की दीवानी हो गई हूं. लोग मुझे पागल हो गई बताते हैं. मेरे इस खुले कृष्ण-प्रेम पर मेरी सास मुझे कुल कलंकिनी कहती है. वह कहती है कि मैंने यह कर्म करके अपने कुल की छवि को मिट्टी में मिला दिया है. राणा जी ने मुझे मार डालने के लिए विष का प्याला भर कर भेजा. मैं उस प्याले को भी सहर्ष पी गई. मीरा कहती है - मेरे प्रभु तो गिरिधर कृष्ण है. मुझे सहज ही उस अविनाशी प्रभु के दर्शन सुलभ हो गए हैं.
विशेष :
के सामने सजीव हो उठता है.
पुकारती है जैसे- नारायण, गिरिधर नागर, अविनासी.
अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर :
१- लोग मीरा को बावरी क्यों कहते है ?
२- मीरा किसके प्रेम में अनुरक्त थी और क्यों ?
३- मीरा के कुल-बंधुओं ने उसके साथ कैसा व्यवहार किया ?
पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न - अभ्यास :
१- मीरा कृष्ण की उपासना किस रूप में कराती है ? वह रूप कैसा है ?
२- भाव व शिल्प सौंदर्य स्पष्ट कीजिए –
(क) अंसुवन जल सींची-सींची, प्रेम-बेलि बोयी
अब त बेलि फैलि गई, आणंद- फल होयी
(ख) दूध की मथनियाँ बड़े प्रेम से विलोयी
दधि मथि घृत काढि लियो, डारि दयी छोयी
३- लोग मीरा को बावरी क्यों कहते है ?
४- विस का प्याला राणा भेज्या, पीवत मीरा हाँसी – इसमें क्या व्यंग्य छिपा है ?
५- मीरा जगत को देखकर रोती क्यों है ?
पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न - अभ्यास :
६- लोक लाज खोने का क्या अभिप्राय है ?
७- मीरा ने ‘सहज मिले अविनासी’ क्यों कहा है ?
८- लोग कहै, मीरां भई बावरी, न्यात कहै कुल-नासी – मीरा के बारे में लोग (समाज) और न्यात (कुटुंब) की ऐसी धारणाएँ क्यों है ?
प्रस्तुति
काडू राम मीना
स्नात्तकोत्तर शिक्षक (हिंदी)
ज.न.वि.,खैरथल अलवर (राज)
धन्यवाद !