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आत्मपरिचय

- हरिवंशराय बच्चन

कक्षा-12 वीं

आरोह भाग-2

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मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ,�फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ;�कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकर�मैं साँसों के दो तार लिए फिरता हुँ !

  • कवि के जीवन में बहुत सारी चिंताएँ हैं और उनके साथ-साथ बहुत सारे दायित्व भी हैं लेकिन इस दुनियादारी के बावजूद वह अपने प्रेम को जीवंत बनाए हुए है। वह अपने प्रेम की झंकार में हमेशा डूबा रहता है और अपने जीवन में प्रेम की ललक लिए घूमता है। उसके प्रिय ने उसके जीवन को झंकृत करके उसको एक नया जीवन दिया है।

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मैं स्नेह-सुरा का पान किया करता हूँ,�मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हुँ,�जग पूछ रहा उनको, जो जग की गाते,�मैं अपने मन का गान किया करता हूँ !

  • कवि हरिवंशराय बच्चन जी कहते हैं कि मैं प्रेम रूपी शराब का सेवन करता हूँ। जिस प्रकार शराब पीकर आदमी मदहोश हो जाता है और अपना सारा दुख भूल जाता है उसी प्रकार वह संसार में प्रेम बाँटना चाहता है और मस्ती के जीवन का संदेश देता है। संसार में लोग उसके बारे में क्या कहते हैं वह उसकी परवाह नहीं करता और अपने जीवन में मस्ती के साथ आगे बढ़ता है।

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मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ,�मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ;�है यह अपूर्ण संसार न मुझको भाता�मैं स्वप्नों का संसार लिए फिरता हूँ।

  • कवि कहता है कि मैं अपने दिल क भाव को लिए घूमता हूँ और यह जो भावना हैं मेरे लिए किसी कीमती उपहार से कम नहीं है। कवि को यह आधा अधूरा संसार बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता क्योंकि उस आधे अधूरे संसार में प्रेम का अभाव है और उस अपूर्णता को पूर्ण करने के लिए कवि हर रोज सपनों का संसार बनाता है ।

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मैं जला हृदय में अग्नि, दहा करता हूँ,�सुख-दुख दोनों में मग्न रहा करता हूँ;�जग भव-सागर तरने को नाव बनाए�मैं भव-मौजों पर मस्त बहा करता हूँ।

  • कवि कहता है कि मैं अपने हृदय में प्रेम की अग्नि जलाकर, उसी में जलता रहता हूँजीवन में सुख-दुख दोनों का साथ आना मनुष्य को बहुत कुछ सिखाता है उसमें मैं लीन रहता हूँ, सुख और दुख में विचलित नहीं होता लेकिन लोग संसार रूपी समुद्र को पार करने के लिए साधन ढूंढते हैंमैं संसार रूपी समुद्र की लहरों पर प्रेम रूपी नाव का ही सहारा लेकर, उस का आनंद लेना चाहता हूँ

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मैं यौवन का उन्माद लिए फिरता हूँ,�उन्मादों में अवसाद लिए फिरता हुँ;�जो मुझको बाहर हँसा, रुलाती भीतर,�मैं, हाय, किसी की याद लिए फिरता हुँ!

  • कवि कहता है कि मेरे जीवन में जवानी का पागलपन सवार है मैं अपनी प्रेमिका से मिलने के लिए हमेशा बेचैन रहता हूँ मैं दीवानों की तरह जीता हूँ मेरी दीवानगी मुझे कदम-कदम पर निराशा से भर देती है मेरे मन में अपनी प्रिय की याद समाई हुई है जिसकी वजह से मैं हमेशा रोता रहता हूँ, लेकिन दुनिया के सामने अपने गम को प्रकट नहीं करता

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कर यत्न मिटे सब, सत्य किसी ने जाना?�नादान वहीं हैं, हाय, जहाँ पर दाना!�फिर मूढ़ न क्या जग, जो इस पर भी सीखे?�मैं सीख रहा हुँ, सीखा ज्ञान भुलाना !

  • इस संसार में सत्य को जानने के लिए सभी ने प्रयास किया लेकिन कोई भी उस सत्यता को नहीं जान पाया इस संसार में नादान अर्थात नासमझ और बुद्धिमान दोनों ही प्रकार के व्यक्ति रहते हैं तो क्या यह संसार मुर्ख नहीं है जो भौतिक सुख-सुविधाओं के पीछे भागता है कवि कहता है कि मैंने जो ज्ञान संसार से ग्रहण किया है, मैं उसी ज्ञान को भुलाना चाहता हूँ

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मैं और, और जग और, कहाँ का नाता,मैं बना-बना कितने जग रोज मिटाता;जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव,मैं प्रति पग से उस पृथ्वी को ठुकराता!

  • कवि हरिवंशराय बच्चन जी कहते हैं कि मैं और ही प्रकार का हूँ और यह संसार और ही प्रकार का है इसके और मेरे विचार नहीं मिलते, हम दोनों में कोई संबंध नहीं है मैं हर रोज न जाने कितने काल्पनिक संसार बनाकर उसे पुनः मिटा देता हूँ यह संसार भौतिक सुख-सुविधा और वैभव के पीछे पड़ा हुआ है लेकिन धन दौलत मेरे जीवन में कोई महत्व नहीं रखता है

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मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ;हों जिस पर भूपों के प्रासाद निछावर,मैं वह खंडहर का भाग लिए फिरता हूँ।

  • कवि कहता है कि मेरे रुदन में भी प्रेम झलकता है, मेरी वाणी कोमल और शीतल है जिसमें ऊर्जा और उत्साह का संचार करने का भाव है मेरा जीवन निराशा के कारण खंडहर के समान हो गया है लेकिन यह खंडहर मेरे लिए बेशकीमती है जिस पर राजाओं के सुंदर और आकर्षक महल भी न्योछावर किए जा सकते है

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मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,मैं फूट पडा, तुम कहते, छंद बनाना;क्यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना।

  • कवि कहता है कि मैं जब रोया, मेरे दर्द के भाव प्रेम की निराशा के कारण प्रकट हुए तो समाज ने उसे गाने का नाम दे दिया उसे छंद बनाना कह दिया, वह तो मेरा क्रंदन है, अंदर का दर्द है मैं समाज से यह पूछना चाहता हूँ कि वह मुझे कवि के रूप में क्यों अपनाता है, मैं तो एक प्रेम दीवाना हूँ जो प्रेम की मस्ती में झूमता हूँ

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मैं दीवानों का वेश लिए फिरता हूँ,मैं मादकता निःशेष लिए फिरता हूँ;जिसको सुनकर ज़ग झूम, झुके, लहराए,मैं मरती का संदेश लिए फिरता हूँ।

  • कवि हरिवंश राय बच्चन जी कहते हैं कि मैं संसार में प्रेम के दीवानों की तरह घूमता रहता हूँ जहां भी जाता हूँ पूरे वातावरण को प्रेम की मस्ती से मस्त बना देता हूँ और पूरा वातावरण मस्ती से युक्त हो जाता है मैं प्रेम और मस्ती के गीत गाता हूँ जिन्हे सुनकर लोग आनंद से झूमने लगते हैं

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-धन्यवाद-

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