आत्मपरिचय�
- हरिवंशराय बच्चन
कक्षा-12 वीं
आरोह भाग-2
मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ,�फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ;�कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकर�मैं साँसों के दो तार लिए फिरता हुँ !
2
मैं स्नेह-सुरा का पान किया करता हूँ,�मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हुँ,�जग पूछ रहा उनको, जो जग की गाते,�मैं अपने मन का गान किया करता हूँ !
3
मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ,�मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ;�है यह अपूर्ण संसार न मुझको भाता�मैं स्वप्नों का संसार लिए फिरता हूँ।
4
मैं जला हृदय में अग्नि, दहा करता हूँ,�सुख-दुख दोनों में मग्न रहा करता हूँ;�जग भव-सागर तरने को नाव बनाए�मैं भव-मौजों पर मस्त बहा करता हूँ।
5
मैं यौवन का उन्माद लिए फिरता हूँ,�उन्मादों में अवसाद लिए फिरता हुँ;�जो मुझको बाहर हँसा, रुलाती भीतर,�मैं, हाय, किसी की याद लिए फिरता हुँ!
6
कर यत्न मिटे सब, सत्य किसी ने जाना?�नादान वहीं हैं, हाय, जहाँ पर दाना!�फिर मूढ़ न क्या जग, जो इस पर भी सीखे?�मैं सीख रहा हुँ, सीखा ज्ञान भुलाना !
7
मैं और, और जग और, कहाँ का नाता,�मैं बना-बना कितने जग रोज मिटाता;�जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव,�मैं प्रति पग से उस पृथ्वी को ठुकराता!
8
मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,�शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ;�हों जिस पर भूपों के प्रासाद निछावर,�मैं वह खंडहर का भाग लिए फिरता हूँ।
9
मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,�मैं फूट पडा, तुम कहते, छंद बनाना;�क्यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,�मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना।
10
मैं दीवानों का वेश लिए फिरता हूँ,�मैं मादकता निःशेष लिए फिरता हूँ;�जिसको सुनकर ज़ग झूम, झुके, लहराए,�मैं मरती का संदेश लिए फिरता हूँ।
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-धन्यवाद-
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