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नवोदय विद्यालय समिति ��नवोदय नेतृत्व संस्थान,��उदयपुर

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  • कक्षा –आठवी
  • विषय-हिंदी
  • पाठ्यपुस्तक- वसंत भाग-2
  • पाठ– क्या निराश हुआ जाए

डी.एस.पाटील

टी.जी.टी.हिंदी

जवाहर नवोदय विद्यालय

धुले

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लेखक परिचय

  • आचार्य हजारिप्रसाद द्विवेदी

आचार्य हजारिप्रसाद द्विवेदी जी का जन्म २० अगस्त १९०७ को उत्तरप्रदेश के बलिया जिले के ‘दुबे का छपरा’ गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री अनमोल दुबे और माता का नाम श्रीमति ज्योतिकली था। इनका परिवार ज्योतिष विद्या के लिए प्रसिद्ध था। आचार्य द्विवेदी जी की प्रारम्भिक शिक्षा गाँव में ही हुई। इसके बाद वे १९२३ मे विद्याध्ययन के लिए काशी आए। १९२७ मे उन्होने हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की और इसी वर्ष भगवती देवी से विवाह सम्पन्न हुआ। १९३० मे ज्योतिष विषय मे आचार्य की उपाधि प्राप्त की। ८ नवंबर १९३० से शांति निकेतन मे द्विवेदी जी ने हिन्दी अध्यापन का कार्य प्रारम्भ किया।१९५७ मे भारत सरकार ने ‘पद्मभूषण’ की उपाधि से विभूषित किया।

१९७३ मे ‘आलोक पर्व’ निबंध संग्रह के लिए उन्हे ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। १९ मई १९७९ को दिल्ली मे इनका देहावसान हो गया।

प्रमुख रचनाए- बाणभट्ट की आत्मकथा (उपन्यास ),अशोक के फूल {निबंध संग्रह}, सूरदास और उनका काव्य आदि उनकी प्रमुख रचनाए हैं ।

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गद्यांश-१

  • मेरा मन कभी-कभी बैठ जाता हैं । समाचार पत्रों में ठगी,डकैती,चोरी,तस्करी और भ्रष्टाचार के समाचार पत्र भरे रहते हैं । आरोप-प्रत्यारोप का कुछ ऐसा वातावरण बन गया हैं की लगता हैं, देश में कोई ईमानदार आदमी ही नहीं रह गया हैं। हर व्यक्ति संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा हैं। जो जीतने ही ऊँचे पद पर हैं उनमे उतने ही दोष दिखाये जाते हैं।
  • एक बहुत बड़े आदमी ने मुझसे एक बार कहा था की इस समय सुखी वही हैं जो कुछ नहीं करता। जो कुछ भी करेगा उसमे लोग दोष खोजने लगेंगे। उसके सारे गुण भुला दिए जाएंगे और दोषों को चढ़ा-बढ़ाकर दिखाया जाने लगेगा। दोष किसमे नहीं होते? यही कारण हैं की हर आदमी दोषी अधिक दिख रहा है, गुणी कम या बिलकुल ही नहीं। स्थिति अगर ऐसी है तो निश्चय ही चिंता का विषय है।

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पाठ का सार

  • आज के समय में लेखक फैलें हुये ठगी,डकैती,चोरी,तस्करी और भ्रष्टाचार से बहुत दुखी हैं। आजकल के समाचार पत्रों मे ऐसी खबरे पढ़कर ऐसा लगता है कि आदमी एक दूसरे पर विश्वास करने से रोकता हैं। ऐसा लगता हैं कि चारो तरफ बुराइयाँ हैं अच्छाई का नाम ही नहीं हैं। एक दूसरे के ऊपर आरोप-प्रत्यारोप करते रहते हैं। ऐसा वातावरण बन गया हैं कि लगता है देश मे कोई ईमानदार आदमी ही नहीं रह गया हैं, मात्र बुराई ही बची है।
  • जो व्यक्ति जितने ऊँचे पद पर है उसपर हम विश्वास नहीं कर सकते। लोग उसपर विश्वास नहीं करते, बल्कि हमेशा उनमे दोष ही देखते हैं। जब उनकी किसी के साथ मुलाक़ात हुई थी,उन्होने अपने विचार प्रस्तुत किए थे कि इस समय सुखी वही है जो कुछ नहीं करता अर्थात, किसी भी बात पर अपना पक्ष नहीं रखता, या किसी से कोई व्यवहार नहीं रखता वही इस दुनिया में सुखी हैं। लोगों को आदत हो गयी कि हर आदमी मे बुराई खोजने कि, उसके द्वारा किए गए अच्छे काम को ध्यान में न रखकर उसमे अवगुणो को ही चढ़ा-बढ़ाकर दिखाया जाने लगा है। हम उन अच्छाइओंकों उजागर नहीं कर रहे हैं,सिर्फ बुरायोंकों ही बढ़ा-चढाकर कह रहे हैं। अगर स्थिति ऐसी है तो ये निश्चय ही चिंता का विषय हैं।

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गद्यांश-2

  • क्या यही भारतवर्ष हैं जिसका सपना तिलक और गांधी ने देखा था? रवीन्द्रनाथ ठाकुर और मदनमोहन मालवीय ऐसे महान संस्कृति-सभ्य भारतवर्ष किस अतीत के â में डूब गया? आर्य और द्रविड़, हिन्दू और मुसलमान,यूरोपीय और भारतीय आदर्शों कि मिलन-भूमि मानव महा-समुद्र क्या सुख ही गया ? मेरा मन कहता हैं ऐसा हो नहीं सकता । हमारे महान मनीषियों के सपनों का भारत है और रहेगा।
  • यह सही है कि इन दिनों कुछ ऐसा माहौल बना है कि ईमानदारी से मेहनत करके जीविका चलनेवाले निरीह और भोले-भाले श्रमजीवी पीस रहे हैं और झूठ तथा फ़रेब का रोज़गार करनेवाले फल-फूल रहे हैं। ईमानदारी को मूर्खता का पर्याय समझा जाने लगा है, सच्चाई केवल भीरु और बेबस लोगों के हिस्से पड़ी है। ऐसी स्थिति में जीवन के महान मूल्यों के बारे में लोगों कि आस्था ही हिलने लगी है।

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पाठ का सार

  • क्या इसी भारतवर्ष कि कल्पना हमारे महान नेताओने कि थी,जिसका सपना लो.तिलक और म.गांधी ने देखा था? लेखक ने आजकल भारत कि स्थिति के बारे में सवाल उठाया हा कि यह म.गांधी का भारत है,क्या यह तिलक का भारत है। ऐसा लगा है कि पुराने समय में जो इंसानियत और मानवता बची थी,वो अब कही नहीं दिखाई देती। हमारा जो पुरातन भारत था- आर्य समाज,द्रविड़ समाज,हिन्दू और मुसलमान,यूरोपीय और भारतीय परम्पराओंकि उनके आदर्शों कि मिलन-भूमि भारत थी। लेखक को यह बात का विश्वास नहीं हो रहा हैं कि क्या यही वही म.गांधी का भारत है, जिसकी लोग मिसाल देते थे। लेखक ने कहा है कि मेरा मन कहता है कि ऐसा नहीं हो सकता। हमारे महान मनीषियों ने जो सपना देखा था भारत का वो वैसा है और रहेगा।
  • समाज में आस-पास के ईमानदार व्यक्ति पिस रहे हैं अर्थात् ऐसा लगता है कि वह इस समाज में पिसे जा रहे है, शोषण  का शिकार हो रहे है और धोखे  का रोजगार करनेवाले फल-फूल रहे हैं। ईमानदारी को मूर्खता का पर्याय समझा जाने लगा है, सच्चाई केवल भीरु और बेबस लोगों के हिस्से पड़ी है। ऐसी स्थिति में जीवन के महान मूल्यों के बारे में लोगों की आस्था ही हिलने लगी है।

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गद्यांश-3

  • भारतवर्ष ने कभी भी भौतिक वस्तुओं के संग्रह को बहुत अधिक महत्व नहीं दिया है, उसकी दृष्टि से मनुष्य के भीतर जो महान आंतरिक गुण स्थिर भाव से बैठा हुआ है, वही चरम और परम हैं। लोभ-मोह, कम क्रोध आदि विचार मनुष्य में स्वाभाविक रूप से विद्यमान रहते हैं, पर उन्हें प्रधान शक्ति मान लेना और अपने मन तथा बुद्धि को उन्हीं के इशारे पर छोड़ देना बहुत बुरा आचरण है। भारतवर्ष ने कभी भी उन्हें सदा संयम के बंधन से बाँधकर रखने का प्रयत्न किया है। परंतु भूख की उपेक्षा नहीं की जा सकती, बीमार के लिए दवा की उपेक्षा नहीं की जा सकती, गुमराह को ठीक रास्ते पर ले जाने के उपायों की उपेक्षा नहीं की जा सकती ।

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पाठ का सार

  • प्राचीन भारत में लोग भौतिक सुख-सुविधाओं की वस्तुओं को एकात्रित करने में ज्यादा महत्व नहीं देते थे, वे व्यक्ति के गुणों को महत्व देते थे, उसकी अच्छाई को महत्व देते थे, उसकी दृष्टि से मनुष्य के भीतर जो महान आंतरिक गुण स्थित भाव से बैठा है, अर्थात् सच्चाई, अच्छाई और ईमानदारियों की भावना उसके अन्त तक जानी है और यही बात प्रिय लगती है। हम यही देखते है कि व्यक्ति के जाने के बाद उसकी अच्छाईयों को याद किया जाता है उसके कर्म ही उसकी पहचान होती है।व्यक्ति के संस्कार- लालच की भावना, काम-क्रोध की भावना उसके व्यवहार में जो झलकती है वह स्वाभाविक रूप से ही मनुष्य के अंदर आते है, पर उन्हें मुख्य शक्ति मान लेना और अपने मन तथा बुद्धि को उन्हीं के इशारे पर छोड़ देना बहुत बुरा व्यवहार है। भारतवर्ष में हमेशा सच्चाई, ईमानदारी जैसे अच्छाईयों को ही महत्व दिया जाता रहा है । जिस तरह से भूखे को नजर अदांज नहीं किया जा सकता। बीमार के लिए जितनी दवा जरूरी है उस चीज को हम नजर-अंदाज नहीं कर सकते है। गुमराह पर चल निकले हैं, उन्हें ठीक रास्ते पर ले जाने के उपायों को महत्व देना चाहिए। उनकी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। लेखक यही कहना चाह रहे की हमें अच्छाई और सच्चाई के रास्ते पर चलना चाहिए। किसी की बुराईयों को उजागर नहीं करना चाहिए।

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गद्यांश-४

  • हुआ यह हैं की इस देश के कोटी-कोटी दरिद्रजनों की हीन अवस्था की दूर करने के लिए ऐसे अनेक कड़े-कानून बनाए गए हैं जो कृषि,उद्योग,वाणिज्य,शिक्षा और स्वास्थ की स्थिति की अधिक उन्नत और सुचारु बनाने के लक्ष्य से प्रेरित हैं, परंतु जिन लोगों को इन कार्यों में मन सब समय पवित्र नहीं होता । प्राय वे लक्ष्य की भूल जाते हैं और अपनी ही सुख-सुविधा की और ओर ज़्यादा ध्यान देने लगते हैं ।

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पाठ का सार

  • हमारे देश में जो हजारों गरीब लोग है उनकी हीन अवस्था  को  दूर करने के लिए अनेक प्रयास किये गए और कानून बनाए गए हैं चाहे वो कोई भी  स्थिति है। कृषि, उद्योग, वाणिज्य, शिक्षा, स्वास्थ्य हर स्थिति को उन्नत बनाने का, बेहतर बनाने की और सुचारू रूप से लक्ष्य तक पहुँचने के लिए प्रेरित किया है। इन कार्यों में जो भी लोग लगे हुए है यह जरूरी नहीं कि उनका मन सब समय पवित्र हो, अच्छाई और सचाई के रास्ते पर चले, उनमें भी कहीं न कहीं बेईमानी धोखेबाजी विद्यमान है। वे अपने लोभ-लालच और काम-क्रोध की भावना से ग्रस्त है।ऐसे लोग अपने जीवन के लक्ष्य को भूल जाते हैं और अपनी सुख-सुविधा पर ज़्यादा ध्यान देने लगते हैं।

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गद्यांश-5

  • भारतवर्ष सदा कानून को धर्म के रूप में देखता आ रह है। आज एकाएक कानून और धर्म में अंतर कर दिया गया है। धर्म को धोखा नहीं दिया जा सकता, कानून को दिया जा सकता हैं, यही कारण है कि जो लोग धर्म भीरू हैं,वे कानून कि त्रुटियों से लाभ उठाने में संकोच नहीं करते।

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पाठ का सार

  • भारतवर्ष में कानून को धर्म की ही तरह माना है। आज एकाएक कानून और धर्म में अंतर कर दिया गया है। जबकि एक जमाना था जब लोग धर्म के रास्ते पर चलते थे। धर्म अर्थात् सच्चाई, ईमानदारी, परोपकार की भावना से भरे थे और एक दूसरे के लिए कार्य किया करते थे।
  • धर्म को धोखा नहीं दिया जा सकता, कानून को दिया जा सकता है। कानून में कुछ ऐसे दाव पेच रहते है की लोग दूसरों के साथ धोखा, और कानून को अपने हाथ में लेकर अपना स्वार्थ पूर्ण कर सकते है लेकिन धर्म के क्षेत्र में धोखा नहीं दिया जा सकता। धर्म को लेखक ने माना है–सच्चाई, ईमानदारी के रास्ते पर चलने वाले लोग। जो अधर्म करने वाले लोग है वो कानून में जो छोटी-मोटी कमियाँ रह गई है उनका लाभ उठाने में जरा-सा भी संकोच नहीं करते। वे अपने स्वार्थ को सर्वप्रथम महत्व देते है की उनका ही फायदा होना चाहिए चाहे दूसरे के साथ अन्याय ही क्यों न हो जाए।

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गद्यांश-6

  • इस बात के पर्याप्त प्रमाण खोजे जा सकते हैं कि समाज के ऊपरी वर्ग में चाहे जो भी होता रहा हो, भीतर-भीतर भारतवर्ष अब भी यह अनुभव कर रहा है कि धर्म कानून से बड़ी चीज़। अब भी सेवा, ईमानदारी, सच्चाई और आध्यात्मिकता के मूल्य बने हुए हैं। वे दब अवश्य गए हैं लेकिन नष्ट नहीं हुये हैं। आज भी वह मनुष्य से प्रेम करता है, महिलाओं का सम्मान करता है, झूठ और चोरी कि गलत समझता है,दूसरे को पीड़ा पहुंचाने को पाप समझता है। हर आदमी अपने व्यक्तिगत जीवन में इस बात का अनुभव करता है। समाचार पत्रों में जो भ्रष्टाचार के प्रति इतना आक्रोश है, वह यही साबित करता है कि हम ऐसी चीजों को गलत समझते हैं और समाज में उन तत्वों कि प्रतिष्ठा कम करना चाहते हैं जो गलत तरीके के धन या मान संग्रह करते हैं।

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पाठ का सार

  • समाज के ऊपरी वर्ग में चाहे जो भी होता हो, भीतर ही भीतर भारतवर्ष अब भी यह अनुभव कर रहा है कि धर्म कानून से बड़ी चीज है। अभी भी भारत में लोग धर्म पर विश्वास रखते है।  धर्म कानून से बहुत बड़ी चीज है इस बात को वो महत्व देते है। जो धार्मिक लोग है, जिनमें सेवा भाव है, ईमानदार व्यक्ति है, सच्चाई के रास्ते पर चलते है। वे किसी न किसी दबाव में जरूर आ गए है लेकिन नष्ट नहीं हुए है। पूरी तरह से उनके अंदर से अच्छाई नष्ट नहीं हुई है वे कम जरूर हुई है।
  • आज भी प्रेम की भावना उसके अन्दर विद्यमान है, महिलाओं की इज्जत करता है। आज भी दुनिया में ऐसे लोग मौजूद है। हर व्यक्ति इस बात को इस सच्चाई को महसूस करता है कि दुनिया में से सच्चाई अभी खत्म नहीं हुई है, कम अवश्य हुई है। आज भी सच्चाई, ईमानदारी पर चलने वाले लोग मौजूद है।
  • समाचार पत्रों में भ्रष्टाचार, बुराई के प्रति लोगों में गुस्सा है। हम ऐसी चीजों को गलत समझते हैं, हम समझते है जो हो रहा है सब गलत है और समाज में उन तत्वों की प्रतिष्ठा कम करना चाहते हैं जो गलत तरीके से धन या मान संग्रह करते हैं। यह सब जानते है कि व्यक्ति के अन्दर ईमानदारी, सच्चाई अन्य गुणों का  होना बहुत ही जरूरी है यही व्यक्ति के अंत तक जाती है और इन्हीं को याद करते है।

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गद्यांश-7

  • दोषों का पर्दाफाश करना बुरी बात नहीं है। बुराई यह मालूम होती है कि किसी के आचरण के गलत पक्ष को उद्घाटित करके उसमें रस लिया जाता हैं और दोषोद्घाटन को एकमात्र कर्तव्य मान लिया जाता है। बुराई में रस लेना बुरी बात हैं, अच्छाई में उतना ही रस लेकर उजागर करने से लोक-चित्त में अच्छाई के प्रति अच्छी भावना जागती है।

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पाठ का सार

  • लोगों के द्वारा किये गए गलत कर्म और कामों का भेद खुलना उनके दोषों को उजागर करना कोई बुरी बात नहीं है।  लेकिन लोगों को सच्चाई से अवगत होना चाहिए । उन्हें भी यह जानकारी होनी चाहिए की किस तरह का दोष उसने किया है। बुराई तब मालूम होती है जब किसी के आचरण के गलत पक्ष को उजागर करके किसी के द्वारा किये गए व्यवहार के गलत पक्ष को आनंद लेकर उजागर करना ।

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गद्यांश-8

  • एक बार रेल्वे स्टेशन पर टिकट लेते हुये गलती से मैंने दस के बजाय सौ रुपये का नोट दिया और मैं जलती-जल्दी गाड़ी में आकार बैठ आया। थोड़ी देर में टिकट बाबू उन दिनों के सेकंड क्लास के डिब्बे में हर आदमी का चेहरा पहचानता हुआ उपस्थित हुआ। उसने मुझे पहचान लिया और बड़ी विनम्रता के साथ मेरे हाथ में नब्बे रुपये दिये और बोला, ‘यह बहुत गलती हो गई थी। आपने भी नहीं देखा , मैंने भी नहीं देखा।’ उसके चेहरे पर विचित्र संतोष कि गरिमा थी। मैं चकित रह गया।

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पाठ का सार

  • एक बार लेखक रेल से कही जा रहे थे। जब लेखक रेलवे स्टेशन पर पहुँचे उन्होंने टिकट ली तो गलती से दस रूपये के बजाय सौ का नोट दे दिया और जाकर डिब्बे में बैठ गए। लेकिन टिकट बाबू को  बैचेनी होनी लगी थी और वह हर डिब्बे में लेखक को ढूंढते हुए देख रहे थे कि वह कहाँ है ताकि वह उनके पैसे लौटा सके।
  • टिकट बाबू ने पहचान लिया, टिकट बाबू एक ईमानदार व्यक्ति था । रखने को वो नब्बे रूपये रख सकता था क्योंकि लेखक को तो यह याद ही नहीं था कि उन्होंने कितने पैसे दिए है । लेकिन वह एक सच्चा और ईमानदार व्यक्ति था। इसलिए उसने उसके पैसे लौटाने चाहे और नब्बे रूपये वापस कर दिए। अब जाकर उसे संतोष हुआ कि उसने किसी के पैसे ऐसे ही नहीं रखे हैं। लेखक समाचार पत्रों में देखते थे तो ऐसा लगता था कि समाज में सच्चाई और ईमानदारी कहीं बची ही नहीं है और यहाँ पर टिकट बाबू का व्यवहार देखकर उन्हें विश्वास हुआ कि सच्चाई और ईमानदारी अभी भी बची हुई है।

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गद्यांश-9

  • कैसे कहूँ कि दुनिया से सच्चाई और ईमानदारी लुप्त हो गई है, वैसी अनेक अवांछित घटनाएँ भी हुई हैं, परंतु यह एक घटना ठगी और वंचना कि अनेक घटनाओं से अधिक शक्तिशाली है।

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पाठ का सार

  • लेखक को विश्वास है कि अभी भी दुनिया में सच्चाई और ईमानदारी बची हुई है। हमारे आस-पास ऐसी भी कुछ घटनाएँ हो जाती है जिनकी कल्पना भी नहीं की जाती है, परन्तु यह एक घटना ठगी और वंचना की अनेक घटनाओं से अधिक शक्तिशाली है। जब लेखक ट्रेन में यात्रा कर रहे थे और उन्हें टिकट बाबू ने पैसे लौटाए, अपनी सच्चाई और ईमानदारी का सबूत प्रस्तुत किया। यह सब देखकर लेखक को विश्वास है कि दुनिया कहीं न कहीं सच्चाई और ईमानदारी मौजूद है।

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गद्यांश-10

  • एक बार मैं बस में यात्रा कर रहा थामेरे साथ मेरी पत्नी और तीन बच्चे भी थे । बस में कुछ खराबी थी, रुक-रुककर चलती थी। गंतव्य से कोई आठ किलोमीटर पहले ही एक निर्जन सुनसान स्थान में बस ने जवाब दिया । रात के कोई दस बजे होंगे। बस में यात्री घबरा गए । कंडक्टर उतर गया और एक साइकिल लेकर चलता बना । लोगों को संदेह हो गया कि हमें धोखा दिया जा रहा है।
  • बस में बैठे लोगों ने तरह-तरह की बातें शुरू कर दीं । किसी ने कहा, “यहाँ डकैती होती है, दो दिन पहले इसी तरह

एक बस को लूटा गया था।” परिवार सहित अकेला मैं ही था । बच्चे पानी-पानी चिल्ला रहे थे। पानी का कहीं ठिकाना न था। ऊपर से आदमियों का डर समा गया था ।

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पाठ का सार

  • लेखक एक और घटना का ज़िक्र करते है, उनके साथ पत्नी और तीन बच्चे थे। जिस बस में  लेखक अपने परिवार सहित यात्रा कर रहे थे वह कुछ खराब थी और उसमें कुछ खराबी के कारण वह वह रूक रूककर चल रही थी। रास्ते में जंगल पड़ता था सुनसान रास्ता था ज्यादा आवाजाही नहीं थी ।यह रात का समय था अंधेरा हो चुका था। जब बस रूक गई तो यात्रियों में घबराहट स्वाभाविक थी।  कंडक्टर उतर गया और एक साइकिल लेकर चलता बना। जब यात्रियों ने देखा कि कंडक्टर उतर कर अपनी साइकिल लेकर कहीं चला गया है तो उनमें और बैचेनी हो गई।उन्हे शक हो गया कि हमें धोखा दिया जा रहा है। वह अब तरह-तरह के बाते शुरू करने लगे ।किसी ने पुरानी घटना का ज़िक्र किया कि दो दिन पहले इसी तरह एक बस को लूटा गया था। लेखक अपने बारे में कह रहे है किवे ही एक व्यक्ति था जो अकेला था अपने परिवार के साथ।उनके बच्चे भूख-प्यास से चिल्ला रहे थे। आस-पास कहीं पानी की व्यवस्था नहीं थी। ऊपर से डकैतियों का डर दिल में समा गया था ।

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गद्यांश-11

  • कुछ नौजवानो ने ड्राईवर को पकड़कर मारने-पीटने का हिसाब बनाया। ड्राईवर के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं । वह बड़े कातर ढंग से मेरी और देखने लगा और बोला, “हम लोग बस का कोई उपाय कर रहे हैं, बचाइए, ये लोग मारेंगे ।” डर तो मेरे मन में था पर उसकी कातर मुद्रा देखकर मैंने यात्रियों को समझाया कि मारना ठीक नहीं है। परंतु यात्री इतना घबरा गए कि मेरी बात सुनने को तैयार नहीं हुए । करने लगे, “इसकी बातों में मत आइए ,धोखा दे रहा है। कंडक्टर को पहले ही डाकुओं के यहाँ भेज दिया है।”

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पाठ का सार

  • कुछ नौजवानों ने सोचा कि ड्राइवरको जबरदस्ती पूछा जाए । ड्राइवर ने डरकर लेखक को अपनी मदद करने के लिए पुकारा और उन्हें कहाँ कि कंडक्टर कोई उपाय जरूर लेकर आएगा । बस थोड़ी देर में ठीक हो जाएगी या फिर कोई और अन्य साधन के लिए उपास्थित हो जाएगा, कृपा कर हमें माफ करें । उन्होंने लेखक से गुजारिश कि मुझे इन लोगों से बचाइए, कहीं यह मुझे मार न डाले। ड्राइवर की यह हालत देखकर उन्हें भी उस पर दया आ गई और उन्होंने यात्रियों को समझना शुरू कर दिया की यह मार पिटाई का काम करना ठीक बात नहीं है।
  • यात्री पूरी तरह से डरे हुए थे । कहने लगे इसकी बातों में मत आईए, धोखा दे रहा है क्योंकि कुछ ऐसी घटनाये पहले भी हो चुकी थी। कहने लगे कंडक्टर जो साइकिल लेकर निकला है, वो अपने डाकुओं मित्रों के साथ मिला हुआ है उनके पास गया है और उन्हें अभी ही लेकर आता होगा।

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गद्यांश-12

  • मैं भी बहुत भयभीत था पर ड्राईवर को किसी तरह मार-पीट से बचाया। डेढ़-दो घंटे बीत गए। मेरे बच्चे भोजन और पानी के लिए व्याकुल थे । मेरी और पत्नी कि हालत बुरी थी । लोगों ने ड्राईवर को मारा तो नहीं पर उसे बस से उतारकर एक जगह घेरकर रखा। कोई भी दुर्घटना होती है तो पहले ड्राईवर कि समाप्त कर देना उन्हें उचित जान पड़ा। मेरे गिड़गिड़ाने का कोई विशेष असर नहीं पड़ा। इसी समय क्या देखता हूँ कि एक खाली बस चली आ रही है और उस पर हमारा बस कंडक्टर भी बैठा हुआ है । उसने आते ही कहा, “अड्डे से नई बस लाया हूँ,इस बस पर बैठिए। वह बस चलाने लायक नहीं है।”फिर मेरे पास एक लोटे में पानी और थोड़ा दूध लेकर आया और बोला, “पंडित जी! बच्चों का रोना मुझसे देखा नहीं गया । वही दूध मिल गया, थोड़ा लेता आया।” यात्रियों में फिर जान आई। सबने उसे धन्यवाद दिया। ड्राईवर से माफी मांगी और बारह बजे से पहले ही सब लोग बस अड्डे पहुँच गए ।

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पाठ का सार

  • लेखक ने ड्राइवर की मदद की उन्हें मार पीट से बचाया इस सब में डेढ़-दो घंटे बीत गए। लेखक और उनकी परिवार की बुरी हालत हो गयी थी।लोगों ने ड्राइवर को बस से उतारकर एक जगह घेरकर रखा कि यह कहीं भी भाग न जाए। लेखक ने उन्हें रोकने का बहुत प्रयास किया। तभी एक नई बस आती दिखी।  उसमें कंडक्टर बैठा था।  उसने यात्रियों से नई बस में बैठने को कहा क्यूंकि वह बस खराब हो चुकी थी। कंडक्टर सिर्फ बस ही नहीं लेकर आया था, बच्चों के लिए कुछ पानी और थोड़ा सा दूध लेकर भी आया था। जब कंडक्टर जा रहा था, उसने नजारा देख लिया था कि अंधेरे रात में बच्चे घबराए हुए थे और भूख प्यास से तड़प रहे थे, इसलिए उनके लिए दूध लेकर आया था।
  • यात्रियों ने उसका धन्यवाद किया, ड्राइवर से माफी माँगी और बारह बजे से पहले ही सब लोग बस अड्डे पहुँच गए।

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गद्यांश-13

  • कैसे कहूँ कि मनुष्यता एकदम समाप्त हो गई! कैसे कहूँ कि लोगों में दया-माया रह ही नहीं गई ! जीवन में जाने कितनी ऐसी घटनाएँ हुई हैं जिन्हें मैं भूल नहीं सकता।

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पाठ का सार

  • यह सब घटनाएँ देखकर लेखक को विश्वास हो गया कि दुनिया में अभी भी लोगों में ईमानदारी बची हुई है जैसे कंडक्टर है, टिकट बाबू है, ऐसे ही लोग और भी है। अभी भी ऐसे लोग हैं जो दूसरे का दुख देख नहीं सकते उनकी मदद करने के लिए दौड़े चले जाते हैं।

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गद्यांश-14

  • ठगा भी गया हूँ, धोखा भी खाया है, परंतु बहुत कम स्थलों पर विश्वासघात नाम कि चीज मिलती है। केवल उन्हीं बातों का हिसाब रखो, जिनमें धोखा खाया है तो जीवन कष्टकर हो जाएगा, परंतु ऐसी घटनाएँ भी बहुत कम नहीं हैं जब लोगों ने अकारण सहायता की है, निराश मन को ढाढस दिया है और हिम्मत बंधाई है। कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अपने प्रार्थना गीत में भगवान से प्रार्थना की थी कि संसार में केवल नुकसान ही उठाना पड़े, धोखा ही खाना पड़े तो ऐसे अवसरों पर भी हे प्रभों! मुझे ऐसी शक्ति दो कि मैं तुम्हारे ऊपर संदेह न करूँ ।
  • मनुष्य कि बनाई विधियाँ गलत नतीजे तक पहुँच रही हैं तो इन्हें बदलना होगा। वस्तुत: आए दिन इन्हें बदला ही जा रहा है, लेकिन अब भी आशा कि ज्योति बुझी नहीं है। महान भारतवर्ष को पाने कि संभावना बनी हुई है, बनी रहेगी।
  • मेरे मन! निराश होने कि जरूरत नहीं है।

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पाठ का सार

  • लोगों ने लेखक के साथ धोखा भी किया है। बुरी घटनाएँ हुई है अगर उन्हीं को याद करते रहेगें तो यह जीवन कठिन हो जाएगा जिनमें धोखा खाया है तो जीवन  कष्ट देने वाला हो जाएगा, जीवन को काटना बहुत मुश्किल हो जाएगा।  परन्तु ऐसी घटनाएँ बहुत ही कम ही मिलती है जब लोगों के बिना कारण सहायता की है । अपना स्वार्थ भूल कर भी आगे बढ़े हो और हमारी मदद की हो ऐसे भी दुनिया में लोग है। जब हमारे मन को निराशा ने घेर लिया तो ऐसे व्यक्ति सामने आए उन्होंने तस्सली भी दिलाई हिम्मत बढ़ाई हमारी कि आगे बढ़ो कोई बात नहीं जो हो गया सो हो गय ऐसे भी दुनिया में लोग है। जो बिना सोचे समझे, बिना लाभ नुकसान के लोगों की मदद करते हैं।
  • रवींद्रनाथ ठाकुर जी ने अपनी कविता में प्रार्थना करते हुए ईश्वर से प्रार्थना की है कि मेरे जीवन में चाहे लाखों कठिनाइयाँ और परेशानियाँ आई दुख तकलीफ आई लेकिन उनको कम न करकर मुझे सिर्फ इतनी शक्ति देना जिन्हें मैं अपने साहस से अपने परिश्रम से सफलता पाऊँ, और तुम पर जरा सा संदेह न करूं। यहाँ पर ईश्वर पर संदेह न करने की बात की है तुम पर मेरा विश्वास बना रहे ऐसा ईश्वर में उनका विश्वास बना रहे ऐसी शक्ति दो।
  • मनुष्य की बनाई हुई तरह-तरह की जो तरीके है वो गलत प्रणाम ला रहे है तो इन्हें बदलना ही होगा। कुछ परिस्थियों में हम देखते है कि मनुष्य ने जो तौर- तरीके बनाए है उनका गलत प्रणाम निकल रहा है तो इन्हें बदलना आवश्यक  है। अगर उम्मीद आशा नहीं होगी तो किसी का भी जीवन कष्टदायक  हो जाएगा। अभी हमारे भारतवर्ष को और तरक्की पानी है और भी साधन और तरीके है जिन पर हमें काम करना है। लेखक कहते है कि हे मेरे मन! निराश होने का अब समय नहीं है प्रयास करने होगें हमें हिम्मत नहीं हराने की जरूरत है, उम्मीद नहीं छोड़नी है, अभी भी बहुत ही संभावनाएँ बची है।

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धन्यवाद