JEEVAK AYURVEDIC MEDICAL COLLEGE
AND RESEARCH CENTRE
Kamlapur, Akauni Chandauli, UP
Topic:- Asthi Sharir & Ischium
Guided By:-
Dr. Amit Kumar Singh (H.O.D)
Associate Professor
Dr. Varsha Gupta
Assistant Professor
Department of Rachana Sharira
Presented By:-
Aashama Parveen
Roll No.-59
B.A.M.S 1ST Prof.
Batch:-2023-24
TOPIC-�ASTHI SHARIR�& ISCHIUM�
INDEX
• दोषधिष्ठान
Ischium
अस्थि शारीर
अस्थि शारीर(OSTEOLOGY)��
अस्थि परिभाषा
शरीर के दोष, धातु एवं अंग प्रत्यंगों को सहारा देकर शरीर को धार्म रखने वाले शरीर के ठोस भाग को अस्थि कहते हैं।
अस्थि शब्द की निरुक्ति तथा व्याख्या
शब्दस्तोम-अस्थि शब्द का वर्णन करते हुए शब्दस्तोमकार लिखते है कि- "अस्थते अस् क्थिन् मांसाभ्यतरस्थे 'हाड' इति
अस्थि की उत्पत्तिः-
. मेदस्ततोऽस्थि प्रजायते। (चरक चि) अ० शारीर
. मेदसोऽस्थि प्रजायते। (सु०सू०)
अस्थि की उत्पत्ति बताते हए चरक, सुश्रुत आदि संहिता ग्रन्थों में इस प्रकार वर्णन किया है|
अस्थि निर्माण
रस से रक्त, रक्त से मांस, मांस से मेद, मेद से अस्थि, अस्थि से मज्जा, मज्जा से शुक्र तथा शुक्र से गर्भ की उत्पत्ति होती हैं।
अस्थि का निर्माण बताते हुए शाङ्गधर एवं भावप्रकाश लिखते हैं कि :
मेदो धातु अग्नि से पाक होकर तथा पृथ्वी, अग्नि और वायु का संयोग प्राप्त कर खर बन जाती है। इसी खर हुई मेदा का नाम अस्थि है।
अस्थि की पांचभौतिक रचना (अस्थि भवन)
पांचभौतिक स्वरूप
दोषाधिष्ठान
"अधोनाभ्यस्थिमज्जानौ वातस्थानं प्रचक्षते" सू० 27/10
. चरक, सुश्रुत, अष्टांग हृदय एवं संग्रह में जो वात के अधिष्ठान बताये गये हैं उनमें अस्थि की भी गणना की गई है।काश्यप संहिता में लिखा है कि :-
नाभि के नीचे के अंग एवं अस्थि तथा मज्जा वात के अधिष्ठान बताते हैं।
अस्थि धातु का मल
“कफः पित्तं मलं खेषु स्वेदः स्यान्नखरोम च। नेत्रविद्त्वक्षु च स्नेहो धातूनां क्रमशो मलाः” ।। सु०सू० 46
भावमिश्र के अनुसार | सुश्रुत के अनुसार | चरक के अनुसार |
नख | नख | केश |
रोम | रोम | लोम |
| | |
अस्थि गणना
S.no. | Text book | No. |
1 | Charak samhita | 360 |
2 | ,Ashtang hirdaya | 360 |
3 | Shushruta samhita | 300 |
4 | Ashtang sangraha | 360 |
5 | Bhavaprakasha | 300 |
6 | Kashyapa samhita | 360 |
प्राचीन और आधुनिक मतानुसार अस्थि के पंच और चतुर्विध भेद एवं परस्पर समन्वय
एतानि पञ्चविधानि भवन्ति तद्यथा कपालरुचक तरुणवलयनलकसंजानि"
कपालास्थि
तेषां जानुनितम्बांस-गण्डतालुशंखशिरः सुकपालानि।" सु०शा० 5/22
रुचक अस्थि
“दन्तेषु रुचकानि च।”
तरुणास्थियां
“घ्राणकर्णग्रीवाक्षिकोषेषु तरुणानि।” सु०शा० 5/22
वलयास्थि
पार्श्वपृष्ठोरःसु वलयानि। सु०शा० 5/22
नलकास्थि
हस्तपादांगुलितले कूर्चे च मणिबन्धके। बाहुजंघाद्वये चापि जानीयान्नलकानि तु॥ (गर्भ प्रकरण 189)
अस्थियों के कार्य
मांसन्यन्त्राणि बद्धानि शिराभिः स्नायुभिस्तथा । अस्थीन्यालम्बनं कृत्वा न दीर्यन्ते पतन्ति च।। 2/190
-1. शरीर को दृढ़ रखती हैं।
2. शरीर के आकार को स्थिर रखती हैं।
3. कोमल अंगों की पूर्ण सुरक्षा करती हैं।
4.शरीर को स्वरूप प्रदान करती है।
चिकित्सकीय महत्त्व
विशेष रूप से अस्थि ज्ञान इस कारण जानना आवश्यक है
. अस्थि भग्न को जोड़ने के लिए।
TOPIC
ISCHIUM
Body
Ends
1 The upper end forms the posteroinferior two-fifths of the acetabulum.
.2 The lower end forms the ischial tuberosity. It gives off the ramus of the ischium which forms an acute angle with the body
Borders
. It also forms part of the lower border of the greater sciatic notch.
surfaces
From above downwards, it presents a convex surface adjoining the acetabulum, a wide shallow groove, and the upper part of the ischial tuberosity
Conjoined Ischiopubic Rami
Borders
Surfaces
Attachments
Ischial Spine
Lesser Sciatic notch
Femoral Surface
Ischial tuberosity
.Semitendino sus long head of the biceps femoris-origin
Pelvic surface of the Ischum
Outer surface of Ischium
Inner Surface of ischium