महाभारत कथा महर्षि पराशर के पुत्र वेद व्यास ने लिखी है।व्यास जी ने यह सबसे पहले अपने पुत्र शुकदेव को और बाद में अपने शिष्यों को भी याद कराई।
व्यास जी के शिष्य वैशंपायन ने मानव जाति में प्रसार किया।
ऐसा माना जाता है कि महाराज परीक्षित के पुत्र जनमेजय द्वारा किए महायज्ञ में ऋषियों की एक सभा बुलाई जिसके अध्यक्ष महर्षि शौनक हुए।इस सभा में सुतजी ने कथा प्रारंभ की।
महाराज शांतनु के बाद उनके पुत्र चित्रांगद हस्तिनापुर के राजा हुए। उनकी अकाल मृत्यु के कारण विचित्र वीर्य राजा हुए जिनके दो पुत्र हुए धृतराष्ट्र और पांडु।
बड़े बेटे धृतराष्ट्र के जनमांध होने से पांडु राजा हुए।
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महाभारत कथा
पाण्डु की दो रानियाँ थीं- कुंती व माद्री | पाण्डु किसी अपराध के प्रायश्चित के कारण रानियों सहित वनवास गए जहा कुंती व माद्री ने पांच पुत्रो को जन्म दिया | वहीं पाण्डु की मृत्यु होने के कारण पांडवो का पालन-पोषण ऋषि मुनियों ने किया | जब वे युवा हुए तो ऋषियों ने पांडवो को हस्तिनापुर ले जाकर भीष्म को सौंप दिया |
पांचो पांडव बुद्धि से तेज़, बलवान व वीर थे | धृतराष्ट्र के पुत्र इनसे जलते थे | उन्होंने पांडवो को अनेक कष्ट पहुंचाना शुरू कर दिए | इस प्रकार पांडवो और कौरवों मे वैर-भाव बढ़ता गया |
भीष्म के आदेशानुसार कौरवों को हस्तिनापुर और पांडवो को इंद्रप्रस्थ राज्य दिया गया |
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दुर्योधन द्वारा कपटी शकुनि मामा के साथ मिलकर चौसर का खेल खेला गया | छलपूर्वक युधिष्ठिर से राज्य छीन लिया गया और पांडवो को तेरह वर्ष का वनवास एवं एक वर्ष का अज्ञातवास दिया गया | अज्ञातवास से लौटने के बाद दुर्योधन ने राज्य देने से मना कर देने के बाद कौरवों और पाँडवो के बीच घनघोर युद्ध हुआ | पांडवों को विशाल साम्राज्य मिल गया | इसके बाद छत्तीस वर्ष तक पांडवों ने राज्य किया और अपने पोते परीक्षित को राज्य देकर तपस्या करने हिमालय चले गए|
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अंबा और भीष्म
सत्यवती के दोनों पुत्र चित्रांगद और विचित्रवीर्य बड़े ही वीर थे किंतु चित्रांगद की अकाल मृत्यु के बाद दूसरे पुत्र विचित्रवीर्य को हस्तिनापुर की गद्दी पर बैठाया गया | विवाह योग्य होने पर भीष्म को उनके विवाह की चिंता सताने लगी, उन्हें समाचार मिला कि काशीराज की कन्याओं का स्वयंवर होने वाला है जिसमें कई राजा सम्मिलित होने वाले हैं |
भीष्म विचित्रवीर्य की ओर से स्वयंवर स्थल पर पहुंचे | सभा मे सभी राजा उन पर फब्तियां कसने लगे | भीष्म इस अपमान को सह न सके एवं बलपूर्वक काशीराज की तीनों कन्याओं अम्बा, अम्बिका , अम्बालिका अपहरण कर हस्तिनापुर ले आये |
विचित्रवीर्य के विवाह की सारी तैयारियां हो रही थी | विवाह मंडप में जाने के पूर्व अम्बा ने विवाह करने से मना करते हुए यह कहा की वह सौभदेश के राजा शाल्व से विवाह करना चाहती है |
भीष्म ने अम्बा की इच्छानुसार उचित प्रबंध के साथ उसे शाल्व के पास भेज दिया और अम्बिका, अम्बालिका का विवाह विचित्रवीर्य से करा दिया |
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उधर अम्बा जब शाल्व के पास पहुंची तो उसने विवाह करने से इंकार कर दिया | अम्बा पुनः हस्तिनापुर भीष्म के पास पहुंची और उनसे विवाह का प्रस्ताव करने लगी , किन्तु भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा का उल्लेख करते हुए मना कर दिया | दुःखी अम्बा ऋषि मुनियों के पास जाकर अपनी पीड़ा कहती है | ऋषि-मुनि उसे महर्षि परशुराम के पास जाने की सलाह देते है| प्रतिहिंसा की आग में वह मन ही मन जलने लगी | अम्बा की करुण कहानी सुनकर परशुराम का हृदय पिघल गया और वे भीष्म का वध करने के लिए तैयार हो गए , दोनों योद्धा समान थे इसलिए हार जीत का फैसला न हो सका | अम्बा ऐसी बातों से विचलित हो गयी उसने वन मे जाकर तपस्या की और तपोबल से स्त्री रूप छोड़कर पुरुष बन गयी और अपना नाम शिखंडी रख लिया |
कुरुक्षेत्र के मैदान में शिखंडी को आगे कर के अर्जुन ने भीष्म पितामह पर हमला किया और अंत मे विजय प्राप्त की तब जाकर अम्बा का क्रोध शांत हुआ |