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16 महाजनपद

प्रो सुरेश देवड़ा

शा महाविद्यालय सुवासरा

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    • राज्य में जन(कबीला) का महत्त्व अधिक व क्षेत्र का कम
    • पशुचारण से कृषि की ओर

वैदिक काल

    • सामाजिक वर्गीकरण का कठोर होते जाना,
    • अनेक राज्यों का उदय।
    • बड़ी संख्या में नगरों का विकास,

महाजनपद काल

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  • उत्तरवैदिक काल के अन्तिम चरण में भारत में क्षेत्रीय राज्यों का उदय हुआ। इन राज्यों में राजतंत्रीय और गणतंत्रीय दोनों प्रकार के राज्य थे।
  • लोहे के प्रयोग ने जमीन के महत्व को बढ़ाया और राज्य के स्वरूप में भूमि महत्वपूर्ण घटक बन गई।
  • राजनीतिक क्षेत्र में हुए इन परिवर्तनों के लिए वैचारिक आधार प्रदान करना भी आवश्यक था और यह कार्य किया नवीन धार्मिक आंदोलनों ने। इनमें भी जैन और बौद्ध धर्म ने प्रमुख भूमिका अदा की।

पंचमार्क सिक्का / आहात मुद्रा

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  1. आर्थिक क्षेत्र में हुए परिवर्तन- लोहे के प्रयोग ने आर्थिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण परिवर्तन किये |

(1) व्यापारिक विकास – उत्तर वैदिक काल में मुद्रा ,परिवहन साधन ,नगरीकरण से व्यापर का विकास हुआ |

मुद्रा के प्रयोग से वस्तुविनिमय की तुलना में व्यापर सुगम हुआ |

कृषि विकास से अधिशेष उत्पादन हुआ व् व्यापर विकास हुआ |

क्षेत्रीय राज्यों के उदय को आर्थिक सुदृढ़ आधार मिलने लगा जिससे वे मजबूती से खड़े हो सके।

व्यापरी

    • व्यापर सुरक्षा की आवश्यकता हुई

राजा

    • आर्थिक सहयतासे सेना का निर्माण

(2) सिक्कों का प्रयोग - सुसंगठित वाणिज्य के विकास में मदद मिली और विनिमय व्यवस्था में सुधार हुआ।

कर की नकद अदायगी होने लगी और कर संग्रह करना आसान हो गया। अब लोगों को बचत करने में सुविधा हुई।

साहूकारी और धन के निवेश करने की नई प्रवृत्ति का उदय हुआ। इसी कारण सेट्ठी और गहपति वर्ग का उदय हुआ और इन्होंने राज्यों को आर्थिक आधार प्रदान किया।

सतमान चाँदी की सर्वोच्च मुद्रा होती थी। इसके बाद कार्षापण का स्थान था। मसण और काकिनी ताँबे के बने होते थे।

भारत के इतिहास में लगभग 600-500 ई. पू. के आसपास पहली बार सिक्कों का प्रयोग देखने को मिलता है। ये सिक्के चाँदी और बाद में ताँबे के होते थे। सबसे पहले प्राप्त सिक्के आहत मुद्रा के नाम से जाने जाते हैं। यह मुद्रा संभवतः व्यापारियों द्वारा जारी की जाती थी। इनके एक ओर कुछ चिह्न अंकित होते थे। अतः इन्हें पंचमार्क सिक्के भी कहा जाता था

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(3) कृषि का विकास –

लोहे के प्रयोग ने बड़े जंगलों को साफ करके कृषि योग्य बनाने में सहयोग दिया| लोहे के फाल से हल जोतने के प्रयोग ने भूमि को अधिक गहराई तक जोतने में सुविधा हुई।

500 ई.पू. के आसपास धान रोपने की तकनीक का प्रयोग प्रारंभ हुआ।

कृषि के अधिक उत्पादन से राज्यों की समृद्धि में वृद्धि हुई और धन की बचत होने लगी। इन सबने मिलकर क्षेत्रीय राज्यों को स्थापित होने और बढ़ने में काफी सहयोग किया।

भारत में लोहे के प्रयोग के साक्ष्य लगभग 1000 ई. पू. से प्राप्त होने लगे थे 600 ई. पू. तक लोहे का प्रयोग हथियार बनाने और औजार बनाने में किया जाने लगा था।

विश्व में सर्वप्रथम हित्ती शासकों ने लौह धातु का उपयोग किया। हित्ती साम्राज्य एशिया माइनर में 1800 से 1200 ई,पू, अस्तित्व में था और जब इस साम्राज्य का विभाजन हुआ तो विश्व के दूसरे भागों में भी लोहे का प्रयोग प्रारंभ हुआ।

(C) नगरीयकरण

राज्यों के विकास का संकेत नगरों के विकास से मिलने लगा था। इस समय के साहित्य में पुर, पत्तन, निगम, नगर, महानगर और दुर्ग जैसे शब्दों का प्रचुर प्रयोग मिलता है।चंपा, राजगृह, साकेत, कौशाम्बी, वाराणसी तथा कुशीनारा श्रावस्ती पाटलिपुत्र जैसे कई नगरो का उड़ाई हुआ |

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(D) सामाजिक-धार्मिक परिवर्तन

वर्ण व्यवस्था में क्षत्रियो का महत्त्व ज्यादा होने लगा था |

यज्ञ अनुष्ठानो में पशु बलि होती थी जबकि कृषि विस्तार के कारन पशुओ का महत्त्व बढ़ गया |

भू स्वामी औए श्रमिको का उद्भाव हुआ | शुद्र – श्रमिको किम भांति कार्य करने लगे |

इसके अलावा इस युग के नए धार्मिक आंदोलनों - जैन, बौद्ध और आजीवक - ने वैदिक यज्ञवाद और कर्मकाण्डीय अनुष्ठानों की निरर्थकता को समाज के सामने प्रस्तुत किया और तात्कालिक आर्थिक आवश्यकताओं के अनुरूप नए दार्शनिक विचारों को प्रस्तुत किया।

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सोलह महाजनपद की भोगोलिक स्थिति और � राजनैतिक स्थिति

  • ई. पू. छठी शताब्दी में उत्तरी भारत में सोलह महाजनपद विद्यमान थे। अंगुत्तर निकाय और भगवती सूत्र के अनुसार इस समय के सोलह महाजनपद इस प्रकार थे। इनके अलावा महावत्थु नामक बौद्ध ग्रन्थ में भी सोलह महाजनपदों की सूची मिलती है, परन्तु उसमें गांधार और काम्बोज का नाम नहीं मिलता
  • जनपद का शाब्दिक अर्थ होता है, वह स्थान जहाँ आदमी निवास करता हो। उत्तरी भारत के इस समय में जनपद का अर्थ थाः कृषि समुदाय के लोगों का स्थाई निवास।

(1) अंग – वर्तमान भागलपुर और मुंगेर क्षेत्र में थी। इसकी राजधानी चंपा थी। बुद्ध के समय में चंपा एक समृद्ध नगर था और यह छह बड़े नगरों में से एक था। यह अपने व्यापारिक और वाणिज्यिक क्रियाकलापों के लिए प्रसिद्ध था। यहाँ से कई व्यापारी विदेशों तक यात्रा करते थे।अंग देश के दूसरे नगरों के नाम थे - अश्वपुर और भद्रिका|

छठी शती ई. पू. के अन्त तक मगध ने अंग पर अधिकार कर लिया था।

(2) मगध - राज्य आधुनिक बिहार के गया और पटना जिलों में स्थित था | राजधानी राजगृह थी जिसे गिरिव्रज भी कहते थे। बाद में उसकी राजधानी पटना हो गई थी।

(3) काशी - काशी की राजधानी वाराणसी थी। इसके अन्य नाम जैसे केतुमति, सुरुन्धना, सुदासना, पुप्पहवती, रम्मा, मोलिनी आदि। वाराणसी नाम भी वरुणा और असी नामक दो नदियों से व्युत्पन्न है।

काशी अपने सूती वस्त्रों और घोड़ों के बाजार के लिए प्रसिद्ध था। एक बड़े नगर के रूप में वाराणसी का उत्थान

लगभग 450 ई. पू. में हुआ था। (इसका काशी नाम संस्कृत कशाय नामक बौद्ध संन्यासियों के संतरी भूरे रंग के अंगवस्त्रों के कारण पड़ा)

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प्रसेनजित यहाँ का प्रसिद्ध राजा हुआ। जैन तीर्थकर पार्श्वनाथ के पिता अग्रसेन भी काशी के राजा थे। काशी और कौशल जनपदों में अकसर युद्ध हुआ करता था। बुद्ध के समय के अन्त तक काशी का राजनीतिक पतन हो चुका था। अन्ततः काशी को कौशल नरेश ने जीतकर मगध के राजा को दहेज में दे दिया था |

(4) कौशल - वर्तमान का अयोध्या और रुदौली का निकटवर्ती इलाका कौशल राज्य के अन्तर्गत आता था।

इसमें अनेक छोटे-छोटे प्रदेश तथा कई गोत्रों का मिश्रण हुआ था। इससे उसकी शक्ति में अभूतपूर्व वृद्धि हुई थी। इन प्रदेशों में एक कपिलवस्तु के शाक्य थे और दूसरा प्रमुख कुल था केशपुत्त के कलामो का ।

उत्तरी कौशल को राजधानी श्रावस्ती और दक्षिणी कौशल की राजधानी कुशावती थी। इसमें तीन बड़े नगर थे अयोध्या, साकेत और श्रावस्ती।

इस राज्य के राजाओं के जो नाम मिलते हैं, वे इस प्रकार हैं - हिरण्याम, प्रसेनजित एवं शुद्धोधन। कौशल राज्य को एक शासन के सूत्र में बाँधने का कार्य प्रसेनजित ने किया था।

(5) वज्जि संघ – मगध व गंगा नदी के उत्तर में स्थित था | गंडक के किनारे था यह नदी इसे कुशल से अलग करती थी | इसमें 8 गणराज्य थे | इसकी राजधानी वैशाली थी बाद में कुंडग्राम हो गयी

रामग्राम के कोलिय मिथिला के विदेह • अलकध के बुलि

वैशाली के लिच्छवी केसपुत्र के कलाम सुंसुमारपर्वत के मग्ग

पिप्पलीवन के मौर्य कपिलवास्तु के शाक्य

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(8) चेदि जनपद - चेदि की राजधानी शुक्तिमती थी और यह यमुना के किनारे वर्तमान बुन्देलखण्ड के क्षेत्र में फैला हुआ था। राजा शिशुपाल जिसने श्रीकृष्ण से युद्ध किया था, यहीं का निवासी था।

(9) कुरु जनपद - महाभारत का एक कबीला था जो कि दिल्ली और मेरठ के क्षेत्र में बसा हुआ था। इसकी राजधानी इन्द्रप्रस्थ थी। हस्तिनापुर, कुंडि, वर्णावत इसके प्रमुख नगर थे| महाभारत के कौरव और पांडव इसी वंश के थे।

(10) पांचाल जनपद - उत्तर पांचाल की राजधानी अहिच्छत्र और दक्षिण पांचाल की राजधानी काम्पिल्य थी। कन्नौज नामक नगर पांचाल में ही स्थित था। पाण्डवों की पत्नी पांचाली द्रौपदीपांचाल की राजकुमारी थी।

पांचाल नाम पाँच कुलों के होने से पड़ा। ये पाँच कुल थे - क्रिवि, तुर्वस, केशिन, श्रीन्याय, और सोमक।

कुरुओं और पांचालों में उत्तर पांचाल क्षेत्र को लेकर संघर्ष हुआ था।

 

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(13) अवन्ति जनपद -

उत्तरी अवन्ति की राजधानी उज्जैन थी और दक्षिणी अवन्ति की राजधानी महिष्मती थी

यहाँ का राजा प्रद्योत था जिसने वत्स के राजा उदयन को परास्त किया था। छठी शताब्दी ई.पू. के महाजनपदों में यह सबसे शक्तिशाली जनपद था।

(14) गांधार जनपद - प्राचीन साहित्य में उत्तरापथ के नाम से जाना जाता था। यह आधुनिक पेशावर तथा रावलपिंडी के क्षेत्र में स्थित था। इसकी राजधानी तक्षशिला थी। यह विद्या और व्यापार का मुख्य केन्द्र भी था।

(15) काम्बोज जनपद - यह गांधार के पास ही स्थित था। वर्तमान के हिन्दूकुश पर्वत शृंखला और गांधार के बीच स्थित था। इसकी राजधानी हाटक थी |

(16) अश्मक जनपद - सोलह महाजनपदों में यह एक मात्र जनपद है जो दक्षिण में स्थित है। यह गोदावरी के किनारे स्थित था। इसकी राजधानी प्रतिष्ठान या पोत्तन थी।

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  • इस समय दोनों प्रकार के जनपद विद्यमान थे - (i) गणराज्य और (ii) राजतंत्र, किन्तु साम्राज्यवादी प्रवृत्ति के कारण राजतंत्र की प्रवृत्ति बढ़ रही थी और गणराज्यों को भी संघ राज्यों का निर्माण करना पड़ रहा था।
  • प्रमुख जनपदों ने साम्राज्यवादी प्रवृत्ति से अपनी रक्षा के लिए तथा अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए पारस्परिक विवाह संबंधों का सहारा लिया। कौशल के राजा ने अपनी पुत्री महाकौशला का विवाह मगध के राजा बिम्बसार से किया। इसके बाद प्रसेनजित ने अपनी पुत्री वजिरा का विवाह बिम्बसार के पुत्र अजातशत्रु के साथ किया। उसने शाक्यों के साथ भी विवाह संबंध स्थापित करने का प्रयत्न किया था। ये विवाह संबंध मुख्यतः साम्राज्यवादी प्रवृत्ति के प्रसारण के लिए हुए थे। वत्स के राजा शतनीक ने भी अपनी शक्ति को सुदृढ़ करने के लिए विदेह की राजकुमारी से विवाह किया। उसके पुत्र उदयन ने प्रद्योत की पुत्री वासवदचा से विवाह किया, जिसके कारण दोनों राज्यों में मित्रता स्थापित हो गई।

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  • सोलह महाजनपदों की सामान्य विशेषताएँ
  • अधिकांश जनपदों के नाम वंशों पर आधारित थे। एक शाखा के लोग ही जनपद में बसते थे, चाहे कालान्तर में अन्य लोग भी उनमें सम्मिलित हो गए, किन्तु उसके बाद भी शाखा या वंश का बहुमत बना रहा।
  • जनपदों के शासक अधिकांश में क्षत्रिय थे।
  • केवल एक जनपद अश्मक राज्य की स्थिति दक्षिण में थी।
  • महाजनपदों का इतिहास बहुत लम्बा नहीं चला। इसका कारण पारस्परिक संघर्ष तथा साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का उदय होना था।
  • गणतंत्र एवम राजतन्त्र दोनों राज्यों का अस्तित्व था
  • राज्य की शक्ति में वृद्धि हेतु वैवाहिक संबंधो की स्थापना - कौशल के राजा ने अपनी पुत्री महाकौशला का विवाह मगध के राजा बिम्बसार से किया। प्रसेनजित ने अपनी पुत्री वजिरा का विवाह बिम्बसार के पुत्र अजातशत्रु के साथ किया। वत्स के राजा शतनीक
  • विदेह की राजकुमारी से विवाह किया। उसके पुत्र उदयन ने प्रद्योत की पुत्री वासवदचा से विवाह किया, जिसके कारण दोनों राज्यों में मित्रता स्थापित हो गई।