BLESSINGS
ॐ ह्रीं अर्हम् नमः
श्रीसद्गुरुभ्यो नमः
ॐ ऐं नमः
SHREE MATI GYANAY NAMAH
SHREE SHRUT GYANAY NAMAH
SHREE AVADHI GYANAY NAMAH
SHREE MANAH - PARYAV GYANAY NAMAH
SHREE KEVAL GYANAY NAMAH
5 GYAN
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 2
Samavasaran
Inspired by:
Yugpradhan Acharyatulya P.P. Panyas Shree Chandrashekar Vijayji M.S.
P.P. Panyas Shree Yashobhushan Vijayji M.S.
P.P. Panyas Shree Manobhushan Vijayji M.S.
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 2
Samavasaran
सबसे ऊपर के प्रथम रत्नमय प्राकार के मध्य भाग में एक दिव्य अशोकवृक्ष की रचना की जाती है।
यह भगवान के शरीर प्रमाण से बारह गुणा ऊँचा होता है।
इस वृक्ष के ऊपर भगवान का चैत्यवृक्ष (जिस वृक्ष के नीचे भगवान को केवल ज्ञान हुआ था, वह वृक्ष) की रचना की जाती है।
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 2
Samavasaran
उसी समय देवगण तीनों दिशाओं में भगवान के जैसे ही तीन प्रतिबिम्बों की रचना करते हैं। जिससे चारों तरफ बैठी जनता को भगवान के एक समान दर्शन हो सकें। इस कारण भगवान दिखते हैं।
प्रभु के बाजू में देवता चामर डोलते हैं। प्रभु के मस्तक के पीछे सूर्य से भी ज्यादा तेजस्वी भामण्डल होता है।
प्रभु के मस्तक के ऊपर पिरामिड के आकार के तीन छत्र होते हैं।
Samavasaran
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 2
भगवान के समवशरण में विराजमान होने पश्चात्, उनके पीछे पूर्व द्वार से गणधर प्रवेश करके भगवान की प्रदक्षिणा कर उनके सामने दायीं ओर बैठते हैं। उनके पीछे अन्य गणधर, उनके पीछे केवली, उनके पश्चात् मन:पर्यय ज्ञानी, अवधिज्ञानी तथा सामान्य मुनि भी पूर्व द्वार से प्रवेश कर भगवान की प्रदक्षिणा कर क्रमशः बैठते हैं।
फिर भवनवासी, ज्योतिष्क, व्यंतर देवियाँ क्रमशः दक्षिण द्वार से समवशरण में प्रवेश करती हैं और नैऋत्य कोण में खड़ी हो जाती हैं। फिर भवनपति ज्योतिष्क तथा व्यन्तर देव क्रमशः पश्चिम द्वार से आकर भगवान की प्रदक्षिणा करके वायव्य कोण में बैठते हैं। वैमानिक देव तथा मनुष्य (भाइयों तथा बहनें) उत्तर द्वार से प्रवेश कर प्रदक्षिणा करके ईशानकोण में बैठ जाते हैं। इस तरह तीसरे गढ़ में देव मानवों की कुल बारह सभाएं होती हैं।
उनके पीछे वैमानिक देवियाँ तथा उनके पश्चात् साध्वियाँ पूर्व द्वार से ही समवशरण में प्रवेश करती हैं। परन्तु साध्वियाँ उनके पीछे खड़ी रहती हैं, बैठती नहीं।
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 2
Samavasaran
दूसरे गढ़ में पशु-पक्षी सब आकर बैठते हैं। वे भी भगवान के दिव्य प्रभाव से आपस का वैर भाव भूल जाते हैं, शांति के साथ प्रभु की देशना सुनते हैं और अपनी-अपनी भाषा में समझ लेते हैं। पहले गढ़ में देवताओं तथा मनुष्यों के वाहनों के ठहरने (पार्किंग) की व्यवस्था होती है। तीनों गढ़ के दरवाजों पर देवगण पहरेदार बनकर पूरी व्यवस्था संभालते हैं। चारों दिशाओं में बड़ी-बड़ी ध्वजाएँ फहराती हैं।