BLESSINGS
ॐ ह्रीं अर्हम् नमः
श्रीसद्गुरुभ्यो नमः
ॐ ऐं नमः
SHREE MATI GYANAY NAMAH
SHREE SHRUT GYANAY NAMAH
SHREE AVADHI GYANAY NAMAH
SHREE MANAH - PARYAV GYANAY NAMAH
SHREE KEVAL GYANAY NAMAH
5 GYAN
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 13
Namutthunam Part - 1
Inspired by:
Yugpradhan Acharyatulya P.P. Panyas Shree Chandrashekar Vijayji M.S.
P.P. Panyas Shree Yashobhushan Vijayji M.S.
P.P. Panyas Shree Manobhushan Vijayji M.S.
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 13
नमुत्थुणं (शक्रस्तव) भाग - १
नमुत्थुणं से गंधहत्थीणं
नमुत्थुणं (शक्रस्तव) भाग - १
नमुत्थुणं से गंधहत्थीणं
दो गोडे या दाये गोडे को भूमि से लगा कर व कोणी पेट पर रख कर, अंजलिबद्ध योगमुद्रा से दो हाथ मुंह के पास रख यह सूत्र पढ़ना है।
यहाँ 'नमुत्थुणं' व अंत में 'नमो जिणाणं' पद बोलते समय दो हाथ, दो पैर, और सिर को भूमि पर १ या ३ बार लगाना ध्यान में रहें।
नवकार-सूत्र में मात्र 'नमो' पद होने से अर्थ 'मैं नमस्कार करता हूँ।
यहाँ 'नमोत्थु' = 'नमो अस्तु' है, अर्थ 'मेरा नमस्कार हो’।
इसमें नमस्कार की प्रार्थना है।
'नवकार' में तो इच्छायोग का नमस्कार है इसके हम अधिकारी है, किन्तु यहाँ ऊँचा सामर्थ्ययोग का नमस्कार है जो वीतरागभाव के निकट में ही प्राप्त होता है, अतः अब हम इसके अधिकारी नहीं है किन्तु इसकी मात्र प्रार्थना-आशंसा-अभिलाषा कर सकते हैं।
अतः 'नमोत्थु' कहा।
इस प्रार्थना में दिल की आशंसा व्यक्त होती है, व आशंसा भी धर्म का बीज होने से अवश्य कर्तव्य है।
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नमुत्थुणं (शक्रस्तव) भाग - १
नमुत्थुणं से गंधहत्थीणं
(१) 'अरिहंताणं' बोलने पर सुरासुरेन्द्रपूजित अष्ट प्रातिहार्ययुक्त अनंत अरिहंतो को दृष्टि सन्मुख रखने है।
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नमुत्थुणं (शक्रस्तव) भाग - १
नमुत्थुणं से गंधहत्थीणं
(२) 'भगवंताणं' बोलने पर 'भग' यानी सर्वोत्तम एश्वर्य रूप यशश्री धर्म प्रयत्नवाले देखने है, जैसे कि 'ऐश्वर्य' में प्रभु क्रोड देवों से परिवरित हो कर सुवर्ण-कमल पर पैर रखते हुए, दो बाजु चंवर-भामंडल व गगन में छत्र-सिंहासन -देवदुंदुभि के साथ विहार कर रहे दिखाई पडे, प्रभु को बाजु में पेड नमते हैं, गगन में पक्षी प्रदक्षिणा देते हैं, यह दिखे।
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नमुत्थुणं (शक्रस्तव) भाग - १
नमुत्थुणं से गंधहत्थीणं
(३) 'आईगराणं' में श्रुतधर्म-द्वादशांगी प्रवचन के 'आदि' प्रारम्भकर्तारूप में देखे, बाद में यह धर्म गणधर, आचार्य आदि में चला।
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नमुत्थुणं (शक्रस्तव) भाग - १
नमुत्थुणं से गंधहत्थीणं
(४) 'तित्थयराणं' में तीर्थ यानी चतुर्विध संघ या प्रथम गणधर को स्थापित करने वाले,
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नमुत्थुणं (शक्रस्तव) भाग - १
नमुत्थुणं से गंधहत्थीणं
(५) 'सयं-संबुद्धाणं' में अन्तिम भव में गुरू के बिना स्वयं बोध पा कर चारित्र लेते हुए दृष्टव्य है।
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नमुत्थुणं (शक्रस्तव) भाग - १
नमुत्थुणं से गंधहत्थीणं
(६) 'पुरिसुत्तमाणं' में खाण में पडे हुए जात्यरत्न जैसे प्रभु को अनादि निगोद में से विशिष्ट तथाभव्यत्व की वजह से अन्य जीवों की अपेक्षा उत्तम देखना है।
वही उत्तमता अन्त में तीर्थकरत्व में फलित होती है।
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नमुत्थुणं (शक्रस्तव) भाग - १
नमुत्थुणं से गंधहत्थीणं
(७) 'पुरिससीहाणं' में सिंह की भाँति कर्मों के प्रति कुर, मोह के प्रति असहिष्णु, विषयों के प्रति बेपरवाह, परिसह-उपसर्गों के प्रति अखिन्न इत्यादि रूप में देखना है।
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नमुत्थुणं (शक्रस्तव) भाग - १
नमुत्थुणं से गंधहत्थीणं
(८) 'पुरिसवर - पुंडरीयाणं' में श्रेष्ठ कमल के समान प्रभु कैवल्यश्री (केवलज्ञान स्वरूप लक्ष्मीदेवी) के भवनरूप हैं, अथवा कमल के समान कर्म कीचड में उत्पन्न व भोग जल से वर्धित किन्तु इन दोनो से ऊँचे रहनेवाले हैं।
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नमुत्थुणं (शक्रस्तव) भाग - १
नमुत्थुणं से गंधहत्थीणं
(९) 'पुरिसवर गंधहत्थीणं' में श्रेष्ठ गंधहस्ती के समान मारकाट-मरी-दुष्काल आदि उपद्रवरूप दुष्ट हाथियों को दूर हटानेवाले श्रेष्ठ गंधहस्ती समान देखने हैं।
अनाज के थेले आने से दुष्काल नष्ट होता है व तीड वापस लौटते हैं, बाढ़ वापस घूमती है, सूके खेतों पर बादल आने से बारिस की आशा होती है।