श्रीः �केन्बरासंस्कृतवर्गः�२९.०९.२०२१
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तेन कृतम्। सः कृतवान्। तया श्रुतम्। सा श्रुतवती।
अहं मया त्वं त्वया रामः रामेण सीता सीतया सा तया।
धातुः | क्त-रूपम् | क्तवतु - रूपम् |
कृत कृता | कृतवान् कृतवती | |
श्रुत श्रुता | श्रुतवान् श्रुतवती | |
हृत हृता | हृतवान् हृतवती | |
स्मृत स्मृता | स्मृवान् स्मृवती | |
क्रीत क्रीता | क्रीतवान् क्रीतवती | |
ज्ञात ज्ञाता | ज्ञातवान् ज्ञातवती |
॥श्रीरामोदन्तम् – सुन्दरकाण्डः १२॥
ततः शक्रजिता युद्धे बद्धः पवननन्दनः।
प्रतापं रघुनाथस्य रावणाय न्यवेदयत्॥५.१२॥
शक्रजित् रावणपुत्रः इति त्रिकाण्डशेषः।
बधँ संयमने + क्त + सुँ = बद्धः
बध् त = बध् ध झषस्तथोर्धोऽघः (८.२.४०)
बध् ध = बद्ध झलां जश् झशि (८.४.५३)
॥श्रीरामोदन्तम् – सुन्दरकाण्डः १३॥
रक्षोदीपितलाङ्गूलः स तु लङ्कामशेषतः।
दग्ध्वा सागरमुत्तीर्य वानरान् समुपागमत्॥५.१३॥
रक्षोभिः दीपितः लाङ्गूलः - रक्षोदीपितलाङ्गूलः
दहँ भस्मीकरणे + क्त्वा - समानकर्तृकयोः पूर्वकाले (३.४.२१)
दघ् त्वा दादेर्धातोर्घः (८.२.३२)
दघ् ध्वा झषस्तथोर्धोऽघः (८.२.४०)
दग्ध्वा झलां जश् झशि (८.४.५३)
॥श्रीरामोदन्तम् – सुन्दरकाण्डः १४॥
गृहकार्यम् – १५.०९.२०२१
https://chitrapurmath.net/documents/cards/Colours/index.html - अस्मात् जालपत्रात् वर्णनामानि स्मरतु।
जालपत्राणि अदृष्टम् अनुवादं करोतु। शब्दकोषे शब्दार्थाः विचेतुं शक्यन्ते।
सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्।
वृणते हि विमृष्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः॥
किरातार्जुनीयम् २.३०
�
5
नामप्रकरणम् - ३
6
नामप्रकरणम् - ४
7
सार्वधातुकम् - आर्द्धधातुकम्
तिङः – तिप्तस्झिसिप्थस्थमिब्वस्मस् तातांझथासाथांध्वमिड्वहिमहिङ् (३.४.७८)
तिप् तस् झि सिप् थस् थ मिप् वस् मस् त आताम् झ थास् आथाम् ध्वम् इट् वहि महिङ्
शित् – शप्, श्यन्, शतृ, शानच् इत्यादयः।
णिच्, उ, क्त, क्तवतु, इत्यादयः।
लिट्-लकारस्य तिङ्-प्रत्ययाः साक्षात् आर्द्धधातुकाः।
आहीर्लिङ्-लकारस्य तिङ्-प्रत्ययाः साक्षात् आर्द्धधातुकाः।
Sowmya Krishnapur for Vyoma-samskrta-pathashala, ©2014
इडागमः
Sowmya Krishnapur for Vyoma-samskrta-pathashala, ©2014
अङ्गकार्यम् - गुणः
Sowmya Krishnapur for Vyoma-samskrta-pathashala, ©2014
अङ्गकार्यम् - गुणः
Sowmya Krishnapur for Vyoma-samskrta-pathashala, ©2014
गुणवृद्ध्योः निषेधः
Sowmya Krishnapur for Vyoma-samskrta-pathashala, ©2014
डुकृञ् करणे तनादिः उभयपदी सकर्मकः अनिट् (to do)
| एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | उ तिप् | उ तस् | उ झि |
म॰ | उ सिप् | उ थस् | उ थ |
उ॰ | उ मिप् | उ वस् | उ मस् |
लृट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | करिष्यति | करिष्यतः | करिष्यन्ति |
म॰ | करिष्यसि | करिष्यथः | करिष्यथ |
उ॰ | करिष्यामि | करिष्यावः | करिष्यामः |
लोट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | करोतु | कुरुताम् | कुर्वन्तु |
म॰ | कुरु | कुरुतम् | कुरुत |
उ॰ | कर्वाणि | करवाव | करवाम |
लङ् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | अकरोत् | अकुरुताम् | अकुर्वन् |
म॰ | अकरोः | अकुरुतम् | अकुरुत |
उ॰ | अकरवम् | अकुर्व | अकुर्म |
लिङ् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | कुर्यात् | कुर्याताम् | कुर्युः |
म॰ | कुर्याः | कुर्यातम् | कुर्यात |
उ॰ | कुर्याम् | कुर्याव | कुर्याम |
लट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | करोति | कुरुतः | कुर्वन्ति |
म॰ | करोषि | कुरुथः | कुरुथ |
उ॰ | करोमि | कुर्वः | कुर्मः |
डुलभँष् प्राप्तौ भ्वादिः आत्मनेपदी सकर्मकः अनिट् (to get)
| एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | शप् त | शप् आताम् | शप् झ |
म॰ | शप् थास् | शप् आथाम् | शप् ध्वम् |
उ॰ | शप् इट् | शप् वहि | शप् महिङ् |
लृट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | लप्स्यते | लप्स्येते | लप्स्यन्ते |
म॰ | लप्स्यसे | लप्स्येथे | लप्स्यध्वे |
उ॰ | लप्स्ये | लप्स्यावहे | लप्स्यामहे |
लोट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | लभताम् | लभेताम् | लभन्ताम् |
म॰ | लभस्व | लभेथाम् | लभध्वम् |
उ॰ | लभै | लभावहै | लभामहै |
लङ् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | अलभत | अलभेताम् | अलभन्त |
म॰ | अलभथाः | अलभेथाम् | अलभध्वम् |
उ॰ | अलभे | अलभावहि | अलभामहि |
लिङ् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | लभेत | लभेयाताम् | लभेरन् |
म॰ | लभेथाः | लभेयाथाम् | लभेध्वम् |
उ॰ | लभेय | लभेवहि | लभेमहि |
लट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | लभते | लभेते | लभन्ते |
म॰ | लभसे | लभेथे | लभध्वे |
उ॰ | लभे | लभावहे | लभामहे |
शकॢँ शक्तौ स्वादिः परस्मैपदी अकर्मकः अनिट् (to be able)
| एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | श्नु तिप् | श्नु तस् | श्नु झि |
म॰ | श्नु सिप् | श्नु थस् | श्नु थ |
उ॰ | श्नु मिप् | श्नु वस् | श्नु मस् |
लृट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | शक्ष्यति | शक्ष्यतः | शक्ष्यन्ति |
म॰ | शक्ष्यसि | शक्ष्यथः | शक्ष्यथ |
उ॰ | शक्ष्यामि | शक्ष्यावः | शक्ष्यामः |
लोट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | शक्नोतु | शक्नुताम् | शक्नुवन्तु |
म॰ | शक्नुहि | शक्नुतम् | शक्नुत |
उ॰ | शक्नवानि | शक्नवाव | शक्नवाम |
लङ् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | अशक्नोत् | अशक्नुताम् | अशक्नुवन् |
म॰ | अशक्नोः | अशक्नुतम् | अशक्नुत |
उ॰ | अशक्नवम् | अशक्नुव | अशक्नुम |
लिङ् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | शक्यात् | शक्यास्ताम् | शक्यासुः |
म॰ | शक्याः | शक्यास्तम् | शक्यास्त |
उ॰ | शक्यासम् | शक्यास्व | शक्यास्म |
लट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | शक्नोति | शक्नुतः | शक्नुवन्ति |
म॰ | शक्नोषि | शक्नुथः | शक्नुथ |
उ॰ | शक्नोमि | शक्नुवः | शक्नुमः |
कृदन्तप्रत्ययाः – डुदाञ् दाने जुहोत्यादिः उभयपदी सकर्मकः अनिट्
१. ण्वुल् (वु → अक) – दायकः
२. तृच् (तृन्) (तृ) – दाता
३. शतृँ/शानच् (अत्/आन) – ददत् ददानः
४. स्य + शतृँ/शानच् (अत्/आन) – दास्यन्
५क. णिच् (इ) + शतृँ (अत्) – दापयन्
५ख. णिच् (इ) + शानच् (आन) – दापयमानः
६. यक् (य) + शानच् (आन) – दीयमानः
७. क्त (त) – दत्तः
८. क्तवतुँ (तवत्) – दत्तवान् दत्तवती
९. तव्यत् (तव्य) – दातव्यम्
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१०. अनीयर् (अनीय) – दानीयम्
११. ण्यत्/यत् (य) – देयम्
१२. घञ्/अच् (अ) – दायः
१३. क्तिन् (ति) – दत्ति
१४. सन् (स) + अ – दित्सा
१५. ल्युट् (यु → अन) (भावे) – दानम्
१६. तुमुँन् (तुम्) – दातुम्
१७. क्त्वा (त्वा) – दत्त्वा
१८. ल्यप् (य) – प्रदाय
१९. णमुँल् (अम्) – दायम् दायम्
नदी – ईकारान्त स्त्रीलिङ्गः (River)
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतम् च यत्। असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥गीता १७.२८॥
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
प्रथमा | नदी | नद्यौ | नद्यः |
द्वितीया | नदीम् | नद्यौ | नदीः |
तृतीया | नद्या | नदीभ्याम् | नदीभिः |
चतुर्थी | नद्यै | नदीभ्याम् | नदीभ्यः |
पञ्चमी | नद्याः | नदीभ्याम् | नदीभ्यः |
षष्ठी | नद्याः | नद्योः | नदीनाम् |
सप्तमी | नद्याम् | नद्योः | नदीषु |
सम्बोधनम् | हे नदि | हे नद्यौ | हे नद्यः |
मित्रलाभः – प्रथमा कथा – २१
अतस्त्वं मां मैत्र्येणानुग्रहीतुम् अर्हसि । एतच्छ्रुत्वा हिरण्यकोऽपि विवराभ्यन्तराद् आह – कस्त्वम्। स ब्रूते – लघुपतनकनामा वायसोऽहम्। हिरण्यको विहस्याह का त्वया सह मैत्री।
यतः –
यद् येन युज्यते लोके बुधस्तत् तेन योजयेत्।
अहम् अन्नं भवान् भोक्ता कथं प्रीतिर्भविष्यति॥५४॥
अपरं च –
भक्ष्यभक्षकयोः प्रीतिर्विपत्तेः कारणं मतम्।
शृगालात् पाशबद्धोऽसौ मृगः काकेन रक्षितः॥५५॥
वायसोऽब्रवीत्कथम् एतत्। हिरण्यकः कथयति –
मित्रलाभः – द्वितीया कथा – १
अस्ति मगधदेशे चम्पकवती नाम अरण्यानी । तस्यां चिरात् महता स्नेहेन मृगकाकौ निवसतः। स च मृगः स्वेच्छया भ्राम्यन् हृष्टपुष्टाङ्गः केनचित् शृगालेनावलोकितः। तं दृष्ट्वा शृगालोऽचिन्तयत् – कथम् एतन्मांसं सुललितं भक्षयामि। भवतु। विश्वासं तावद् उत्पादयामि। इति आलोच्य उपसृत्याब्रवीत् – मित्रं ! कुशलं ते। मृगेणोक्तम् – कस्त्वम्। स ब्रूते क्षुद्रबुद्धिनामा जम्बुकोऽहम्। अत्रारण्ये बन्धुहीनो मृतवत् एकाकी निवसामि। इदानीं त्वां मित्रम् आसाद्य पुनः सबन्धुर्जीवलोकं प्रविष्टोऽस्मि। अधुना तवानुचरेण मया सर्वथा भवितव्यम् इति । मृगेणोक्तम् - एवम् अस्तु।
मित्रलाभः – द्वितीया कथा – २
ततः पश्चाद् अस्तं गते सवितरि भगवति मरीचिमालिनि तौ मृगस्य वासभूमिं गतौ। तत्र चम्पकवृक्षशाखायां सुबुद्धिनामा काको मृगस्य चिरमित्रं निवसति। तौ दृष्ट्वा काकोऽवदत् – सखे चित्राङ्ग ! कोऽयं द्वितीयः। मृगो ब्रूते – जम्बुकोऽयम्। अस्मत्सख्यमिच्छन्नागतः। काको ब्रूते - मित्र ! अकस्माद् आगन्तुना सह मैत्री न युक्ता। तन्न भद्रम् आचरितम्। तथा चोक्तम् –
अज्ञातकुलशीलस्य वासो देयो न कस्यचित् ।
मार्जारस्य हि दोषेण हतो गृध्रो जरद्गवः॥५६॥
तौ आहतुः – कथम् एतत्। काकः कथयति –
गृहकार्यम् – २९.०९.२०२१
https://chitrapurmath.net/documents/cards/Colours/index.html - अस्मात् जालपत्रात् वर्णनामानि स्मरतु।
जालपत्राणि अदृष्टम् अनुवादं करोतु। शब्दकोषे शब्दार्थाः विचेतुं शक्यन्ते।
केयूरा न विभूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वला
न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालङ्कृता मूर्धजाः।
(सा) वाण्येका समलङ्करोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते
क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणम् भूषणम्॥
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भूषँ अलङ्करणे (चुरादिः उभयपदी सकर्मकः सेट्)
अलँ भूषणपर्याप्तिवारणेषु क्षि क्षये
केयूरम् – के बाहुशिरसि भूषणतां याति, केयूरः, पुं, रतिबन्धविशेषः
केयूराणि न भूषयन्ति