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Elbow Joint and Sandhi Sharir

Presented by. Vipin Sharma

Roll no.19 Batch. 2022-23

Guided by. Dr. Varsha Gupta HOD: Dr.Amit Singh

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सिǎध शारीर

सिǎध fनरुिक्त :सम-् धा fक इस शद रचना से यह सिǎध शद बना है िजसका अथर्द है मेल या संगम।

अिथसंयोगथानम।् च०शा० 7/14

अिथ संयोग थान को सिǎध कहा जाता ह।ै

शाưगधरर्द में सिǎधयों की परभाषा करते हुए fलखा है fक :- "सǎधयश्चांगसǎधानाद् दे हे प्रोक्ताः कफािǎवताः " 5/56

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सिǎध परभाषा

िजस थान पर दो या अfधक अंगों का सǎधान (परपर मेल) होता है उस थान को सिǎध कहा जाता है।

आधुfनक मतानुसार सिǎध परभाषा में fलखा है fक जब दो या दो से अfधक अिथयों के fसरे आपस में जहां fमलते हैं उस मेल या संयोग को सिǎध (Joint या Articulation) कहते हैं

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संfध संख्या एवं fवfवधता

अथ्नां तु सǎधयो होते , के वलाः परकीfतताः । पेशीनायुfशराणां तु सिǎधसंख्या न fवद्यते ।। स०ु ज्ञा० 5/33

आचायर्द चुरक ने सिǎधयों की संख्या का संfक्षप्त वणनर्द fकया है। मात्र संख्या रूप में 200 सिǎधयां बताई गई ह।ैं

अष्टांग हृदय में आत्रये का मत व्यक्त करते हुए वाग्भट्ट fलखत हैं fक सभी सिǎधयों की कु ल संख्या 2 हजार ह।ै इनमें पशीे , fसरा आfद की सिǎधयां भी आती ह।ै "सहस्रे द्व fनजगादाfत्रनǎदनः "

सुश्रुत में इनका fवतार से वणनर्द fकया ह।ै उǎहोंने सिǎध की व्याख्या करते हुए fलखा है fक षडगों में 210 सिǎधयां होती ह।ैं इनमें से :-

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चारों शाखाओं में = 68

मध्य शरीर मे =59 ग्रीवा से ऊपर =83 कु ल योग =210

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सिǎधबǎधन प्रकार एवं सामाǎय रचना

इन सिǎधयों में लम्बी अिथयों के प्राǎत (End) के भाग एक दसरे के साथ fमलकर सिǎधयां बनाते हैं। जैसे-प्रकोष्ठ (Forearm) की दोनों अिथयों के ऊप के fसरे और प्रगुण्डािथ (Humerus) के नीचे के fसरे से कोहनी की कू पर्दर सfन (Elbow Joint) बनाती है। चपटी अिथयों के प्राǎत (Side) Glenoid Cavity भाग fमलकर सिǎधयां बनाते हैं जैसे कǎध सिǎध (Shoulder Joint)। इस सिǎध प्रगण्डािथ के fसर और अंशफलक (Scapula) के प्राǎत (Side) Glenoid Cavity में मेल होता है। छोटी, गोल और fवषम अिथयों के fकसी भी पष्ृ ठ (Surface) पर fमलाकर सिǎधयां बन जाती हैं। जैसे- कशेरुका (Vertebrae) |

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शाखाओं की पथक् सिǎधया :

पांव की प्रत्येक अंगुली में तीन, अंगूठे में दो इस प्रकार प्रत्येक पांव की अंगुfलयों में कु ल 14 सिǎधयां होती है। जानु (Knee) गुल्फ (Ankle) एवं बक्षी मालम 1-1 सिǎध होती हैं। इस प्रकार एक शाखा (टांग) में कु ल 17 साfथयो इस प्रकार चारों शाखाओं में कु ल ७६ सिǎधयां होती हैं।

मध्य शरीर की सिǎधयां

ओfणफलकों में 3, पष्ृ ठवंशों में 24, पाश्वों में 24 और वक्ष में 8

इस प्रकार मध्यशरीर में कु ल 59, सिǎधयां होती हैं।

ग्रीवा के ऊपर की सिǎधयां

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ग्रीवा में 8, कण्ठ में 3, हृदय व क्लोम से सम्बिǎधत नाड़ी में 18, दांतों के मूल में 32, काकलक (Uvula यूव्यूला) में 1, नासा में 1, नत्रे के वमर्द मण्डल में 2 गण्ड (गाल) में 11, कणर्द एवं शंख में दोनों तरफ 2-2, 2 हनु सिǎधयां, भौहों और शंखों के ऊपर 22, fशरकपालों में 5, मूधार्द में 1, इस प्रकार कु ल 83 सिǎधयां होती ह।ैं (इनमें दोनों पाश्व तथा दोनों अंगों की गणना करनी चाfहए)

सिǎधयों के प्रकार एवं भदे

ये सम्पूणर्द अिथ सिǎधयां 2 प्रकार की बताई गई हैं:

चेष्टावान

िथर

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सǎधयतु द्fवfवधाः सिǎत चेष्टवǎतः िथरातथा " सु०शा०

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इन सिǎधयों को चल और अचल या Movable और Immovable भी कहा जाता ह।ै दो अिथयों या तरुणािथयों क बीच में जो गfत होती है वह के वल सिǎध के थान पर होती ह।ै अतः गfत के fवचार से उपरोक्त दो प्रकार बताये गये हैं योंfक कु छ में गfत होती है कु छ में नहीं होती इसfलए इǎहें चल या अचल भी कहा जाता ह।ै

शाखासु हǎवोः कट्यां च चेष्टावǎततु सǎधयः। शषातुे सǎधयः सवर्वे fवज्ञेया fह िथरा बधैु ः ॥ स०शा०ु 5/27

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चल सिǎध

िजन सिǎधयों में गfत हो सकती है वे चेष्टावान ् या चल सिǎधयां कहलाती है। शाखा, कु fद, हुनु में चेष्टावान ् सिǎधयां बताई गई हैं

। fवशेष प्रत्यंगों जैसे-कǎध सिǎच (Shoulder Joint), कपर सिǎध (Elbow Joint) इसी प्रकार जानू सिǎध (Knee Joint) तथा वंक्षण (Hip Joint) आfद हैं। बहुत सी चल सिǎधयों में गfत अच्छी प्रकार होती है। जैसे हाथ-पैर की सिǎधयों तथा fसर की सिǎधयों में, कु छ चल सिǎधयों में गfत कम होती है जैसे अक्षक (Clavicle) वक्षोिथ आfद। चल सिǎधयों के इस अǎतर के कारण ही दो भेद fकये गये हैं:- 1. अल्पचेष्ट 2. बहुचेष्ट।

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अचल सिǎध

जैसा fक इसके नाम से ही fसद्ध होता है fक इनमें गfत नहीं होती इसी कारण अचल कहलाती है। ऊपर के श्लोक के अनुसार

िजतनी चल सिǎधयां बताई गई हैं उनके अfतरक्त शेष सभी अचल सिǎधयां होती हैं। इन सिǎधयों में गfत न होने का कारण यह है fक इनका संधान (Articulation) ही ऐसा होता है जो गfत में समथर्द नहीं होता। इस प्रकार की सिǎधयां fवशेष रूप से fसर कपालों की होती है। यहां दोनों अिथयां आपस में जुड़ी हुई होती हैं। fकसी प्रकार का रक्त थान नहीं होता। अतः गfत होती ही नहीं।

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सिǎधयों के अष्टfवध भेद

रचना की दृिष्ट से या कायर्द एवं थान भेद से आयुवर्वेद में इन अिथ संधानों के 8 प्रकार बताये गये हैं।

कोरोदखलसामुद्गाः प्रतरतुǎनसेfवनी।

काकतुण्डं मण्डलं च शंखावतर्तोऽष्टसǎधयः ॥ भाव० 2/286

(1) कोर (2) उलूखल (3) सामुद्ग (4) प्रतर (5) तुǎनसेfवनी (6)

वायस तुण्ड (7) मण्डल (8) शंखावत।

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कोर सिǎध

ये चल सिǎधयां हैं। कोर नामक सिǎध (Joint) को कोर (Hinge joint) कहा जाता है। कोर कली का नाम भी है। अतः जहां दो अिथयों के fसरे कोर के समान जुड़े रहते हैं उसे कोरसिǎध कहते हैं। कोर से fकवाड़ के कजों का भी ज्ञान होता है।

fकवाड़ व सǎदकू आfद के जड़े जाने वाले लोहे या पीतल क कजों (Hinge) के समान िजस सिǎध की रचना हो वह कोर सिǎध कहलाती ह।ै सम्पूणर्द सिǎधयों में से अंगुली, कलाई, गुल्फ, जानु तथा कू परर्द में कोर सिǎध होती हैं इǎह Interphalangeal, Ankle, Knee and Elbow Joint कहत ह।ैं नतोदर अिथ प्राǎतों में उभार वाले अिथ भागों में जुड़ने से ये सिǎधयां बनती ह।ै

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चार प्रकार की होती हैं। (1) खल्ल कोर, (2) सदंश कोर, (3) चक्रकोर (4) परपर कोर। कोर सिǎध की गfत के वल एक अक्ष (uniaxial) पर अथार्दत ् दरवाजे के fकवाड़ की तरह एक तरफ आगे पीछे होती हैं। गुल्फ के दोनों पाश्वर्द (Side) में भी गfत होती है। fकǎतु यह गfत सिǎधबǎधन के ढीले होने के कारण होती है। कोर सिǎधयों में मfणबǎध की सिǎधयां मानी गई हैं। वह पूण कोर न होकर उसका एक प्रकार है। यह खल्ल कोर सिǎध में माना जाता है। इस प्रकार की सिǎध में दीघर्द गोलाकार बाहरी भाग का गड्ढेदार भाग में सǎधान होता है, इस प्रकार के जोड़ में आंकु चन, प्रसारण, आकषणर्द , उपकषणर्द , परकषणर्द ये गfतयांहोती हैं। fकǎतु पूणकोर के समान अक्ष भ्रमण (Axial Rotation) नहीं होता। इसका वणनर्द चल सिǎधयों में आगे fकया गया है।

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उलूखल

ये सिǎधयां भी बहुचेष्ट होती है। इस प्रकार की सिǎधयों में एक अिथ में ऊखल के समान गड्ढा सा बना होता है तथा दसरी अिथ का fसरा मूसल के समान गोल होता है, जो उसमें फं सा रहता है। इस सुिǎध की रचना उलूखन (धान कू टने के ऊखल) क समान होने से ही इसे उलूखल कहा जाता है। इǎहें Ball and Socket Joint कहते हैं इस प्रकार की सिǎध में सभी प्रकार की गfत होती है। इनमें कु छ ऐसी भी हैं िजनमें गfत fबलकु ल नहीं होती। इसीfलए इनके दो भेद fकए गए हैं। (1) चल तथा अचल। चल सिǎधयों में कक्षा सिǎध Shoulder Joint तथा वंक्षण (Hip Joint) आfद आते हैं। दांतों की आकृ fत भी उलूखन क समान होने से दांतों की अचल सिǎधयां बताई गई हैं। इनमें

fकं fचत ् मात्र भी गfत नहीं होती। इस प्रकार की सिǎधयों को

Gomphosis कहा जाता है।

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सामुद्ग सिǎध

जो सिǎधयां भली प्रकार fटकी रहती हैं या सम्पुट के समान बनी हुई होती है उǎहें सामुद्ग कहा जाता है। इसमें जुड़ने वाली दोनों अिथयों के fसरे गड्ढेदार होने से उनका संधान होने पर fडिबया के समान आकृ fत हो जाती है। इस प्रकार की रचना में गfत थोड़ी होती है। इसी कारण इǎहें अल्पचेष्ट कहा जाता है।

ऐसीसिǎधयांAmphiarthrosis कही जाती हैं ये सिǎधयां अंश, पीठ, गुदा, भगः तथा fनतम्व आfद में होती हैं।

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प्रतर सिǎध

इस प्रकार की सिǎधयों में प्रतरण होता है अथार्दत ् fफसलन के समान कु छ गfत्ति होती है िजसे

Gliding movement कहते हैं। इस सिǎध में अिथयां ऊपर नीचे (तर प्रतर) जुड़ी रहती हैं।

इस प्रकार की सिǎध को Arthrodia कहते ह।ैं ये सिǎधयां Processes में हाती ह।ैं श्री गणनाथ ग्रीवा, पष्ठवंश और कशेरुका (Vertebra) के Processes सेन जी ने इस सिǎध प्रकार का वणनर्द करते हुए fलखा है fक प्रतर भाव की सिǎध थोड़े चेष्टाशील अिथखण्डों क समतल भागों के पशर्द से बनती ह

इन सिǎधयों में जुड़ने वाले अिथ खण्ड कु छ fतरछे होते हैं इसीfलए इनका नाम प्रतर ह।ै ये तीन प्रकार की हैं (1) चल प्रतर (2) युक्त प्रतर (3) दृढ़ प्रतर। इनमें श्लेवमधरा कला क व्यवधान से िथत चल वभाव की संfधयां चल प्रतर और दृढ़ प्रतर ह।ैं

जैसे हाथ और पांव की कू चार्दिथयों की परपर संfधयां बीच में रहने वाली नायु रज्जुओं से अथवा मजबूत कला द्वारा संयोग होने से युक्त प्रतर संfधयां बनती हैं इस प्रकार की सिǎधयां प्रकोष्ठािथयों (Radio ulnar), जंघािथयों (Tibio fibular) तथा नलकों क परपर संधान में भी ह।ैं

मध्यवतर्ती तरुणािथयां चक्र के द्वारा सजातीय अिथयों में दृढ़ संधान होने पर दृढ़ प्रतर संfधयां बनती हैं जैसे-पष्ठवंश के कशेरुकाओं की परपर संfध दृढ़ प्रतर ह।ै

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तुǎन सेवनी

िजस सिǎध में सीवन के समान सिǎधबǎधन हो उसे तुǎन सेवनी सिǎध कहते हैं। इस प्रकार की सिǎधयों में दो अिथयों क दांते इस प्रकार fमले हुए होते हैं जैसे दजार्द की Zig zag fसलाई की हुई हो। इस प्रकार की सिǎधयां fसर के कपालों में यौवन से पूवर्द या शवच्छे दन द्वारा देखी जा सकती हैं। श्री गणनाथ सेन जी ने इन सेवfनयों के दो प्रकार बताये हैं। (1) सीमǎत सेवनी

(2) ग्रत सेवनी। fसर कपालों में सीमǎत सेवनी तथा fसरयािथ (Vomer) और जतुकािथ के मेल को ग्रत सेवनी कहते हैं।

आधुfनक दृिष्ट से ये कई प्रकार की होती हैं। इनमें एक प्रकार की अिथयों के fकनारे दǎतुर (Structure serrate) होते हैं। दसर प्रकार की सेवनी में अिथयों के दोनों fकनारे सीधे fमल जाते हैं

िजसे Sutura harmonia कहते हैं।

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वायस तुण्ड

वायस तुण्ड को काकमुख भी कहा जाता है। अथार्दत जो सिǎध कौवे की चोंच के समान हो उसे वायसतुण्ड सिǎध कहते हैं। इनमें एक सिǎध का fसरा कौवे की चोंच की तरह होने से दसरी अिथ में जुड़ा रहता है। यह सिǎध अधोमण्डी हनु (Condyle of lower jaw) के साथ संखिथयो (temporal bone) में िथत हनुसंfध के थोड़े पशर्द मात्र से fमलने पर बताती हैं| इसके द्वारा मुख खोलने और अंदर करने की fक्रया होती हैं| यह कोर संfध क ही खल्लकोर का एक भेद है|

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मण्डल

जहां अिथयां मण्डल या चक्र के आकार में परणत हो जाती हैं या

िजनमें घेरा बन जाता है जैसे श्वास मागर्द की नfलका आfद में गोलाई होने से मण्डल कहलाती हैं। इसी प्रकार नेत्र और क्लोम नाड़ी में भी मण्डल सिǎध होती है।

शंखावतर्द

शंख के भीतरी घुमाओं की तरह जो सिǎध होती है उसे शंखावत कहते हैं। ये श्रोत्र (कान) और श्रगाटक में बताई जाती है। िजसे Cavernous Sinus कहते हैं। अथार्दत ् कान की अिथ का घुमाव ऐसा ही होता है।

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अचेष्ट सिǎध

इन सिǎधयों में गfत नहीं होती, अतः इǎहें अचल या अचेष्ट कहा जाता है। इसके तीन प्रकार बताये गये हैं।

1. सेवनी - (Suture) ये fसलाई के समान होती हैं जैसे कपाल की सिǎधयां। 2. दशनोदखल - (Socket Joint) दांतों और मसूड़ों की सिǎधयां। 3. अǎतसर्दिǎध अǎदर और बाह्य प्रकोष्ठािथयों के मध्य की सिǎध (Middle radioulnar joint by interosseus membrane)

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अल्पचेष्ट

अल्पचेष्ट सिǎधयां शरीर में बहुचेष्ट की अपेक्षा कम हैं। जो संfधयां चल होते हुए भी कम गfत करती हैं उǎहें अल्पचेष्ट सिǎध कहा जाता है। ये सिǎधयां fवशेष रूप से पष्ृ ठवंश (Vertebral Column) में होती हैं इन सिǎधयों में अिथ fसरों के मध्य में कहीं पर संधान चfक्रका (Articular disc) या Cartilage होती है जैसे पष्ृ ठवंश की कशेरुकाओं में (Intervertebral disc) तथा कहीं-कहीं नहीं भी होती

। जहां-जहां नहीं होती वहां उनके मध्य भाग में नायु

(Interosseous Ligments) होते हैं।

सिǎधयां दो प्रकार की होती हैं:-

1. संयुक्त-जैसे दीघार्दिथयों के fसर गात्र (Synchondrosis) की अिथ सिǎध, e.g. First sternocostal joint.

2. प्रतर-जैसे कशेरुकाओं की सिǎधयां (Symphysis), e.g. Pubic symphysis.

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बहु चेष्ट

इन चल सिǎधयों में गfत अfधक होती है। अतः बहुचेष्ट कही जाती हैं। इन सिǎधयों में सिǎधत होने वाली अिथयों के fसरों के बीच में कु छ अǎतर रहता है। सिǎधवत होने वाले पष्ृ ठ भाग पर सूत्रfवहीन तरुणािथयों की पतली fचकनी तह चढ़ी रहती है और उसके ऊपर एक कोष (Capsule) भी चढ़ा रहता है। कहीं- कहीं fसरों के बीच में सǎधान चfक्रका भी रहती है।

ये सिǎधयां छः प्रकार की होती हैं

() संदेशकोर, () चक्रकोर () खल्लकोर () परपर कोर

() उदखल () सरला।

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चल के इन प्रकारों का वणनर्द करते हुए श्री गणनाथ जी ने fलखा है fक "कोरानाम सǎधयः बहुचेष्टाः। ते चतुfवधाः खल्लकोर, परपरकोर, चक्रकोर, संदंशकोरश्चेfत। उदखल नाम सǎधयोऽfप बहुचेष्टाः।" (प्रत्यक्ष शारीर)

. सदं ंशकोर - (Ginglymus) जैसे कू परर्द सिǎध (Elbow Joint)

इनमें सिǎधत होने वाले भाग संडासी (संदंश) के समान होते ह।ैं

. चक्रकोर - (Trochoid) जैसे प्रथम ग्रेवयके कशेरुका (First Cervical Vertebra) का द्fवतीय ग्रेवयके कशेरुका के दǎतचूड़ा नामक प्रवधनर्द (Dens process) पर घूमना।

. खल्लकोर - (Condyloid) जैसे गुल्फ सिǎध (Ankle-Joint)। घ. परपरकोर- (Saddle Joint) जैसे अंगुष्ठ मूल।

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. उद्खल (Ball and Socket) कǎध एवं वंक्षण सिǎध (Shoulder and Hip Joint)1

. सरला (Plane) कशेरुकाओं के सिǎध थल। सिǎधयों की रचना

प्रायः यह देखा जाता है fक भारी काम करने या अचानक fकसी जोड़ पर चोट लगने से कमजोरी आ जाती है तथा तीव्र गfत के कारण रगड़ भी उत्पǎन हो जाती ह।ै इस प्रकार दोष सिǎधत अिथयों में अfधक होते ह।ैं अगर ये दोष दरू हो जायें तो सिǎध-थान शरीर के fलए fवशेष उपयोगी ह।ै शरीर क सिǎध बǎधन में बहुत सी fवशेषताएं ह।ैं अचल सिǎधयों के जोड़ रचना की दृिष्ट से बहुत अच्छे हैं जैसे तुǎन सेवनी (Suture) जो fसलाई के समान होती ह।ैं इसके fकनारे दǎतुर होते हैं जो आपस में सीधे fमले जाते हैं, इǎह suture harmonia कहते ह।ैं

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दसरे प्रकार का जोड़ suture squamosa कहलाता है िजसमें एक fकनारा दसरे fकनारे के ऊपर चढ़ता है। अल्पचेष्ट और बहुचेष्ट सिǎधयों के जुड़ने वाले अिथयों के चारों ओर से रज्जु या पट्टबǎधनों के द्वारा इस तरह बǎधे रहते हैं fक यfद Capacity से अfधक आघात या दबाव न हो तो संfध में कु छ भी कमजोरी नहीं आती। ये बǎधन नायु कहलाते हैं। नायु शरीर में सफे द सूत्रमय मजबूत उपधातु हैं जो सिǎधबǎधन में काम आते हैं। इǎहें Fibrous कहते हैं। जहां पर गfत अfधक होती है वहां रगड़ से बचने के fलए सिǎधयों में एक श्लेष्मधरा कला होती है। इनके कोfशकाओं से एक fचकनाईदार तरल पदाथर्द का स्राव fनकलता है। इससे संfधयों की कला और अिथयों के fसर सदैव fमले हैं। यह तरल नेह पदाथर्द मशीन के तेल की तरह काम करता है।

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मशीन में िजस प्रकार ग्रीस या तेल देने से पुजें आपस तेल की नहीं खाते उसी प्रकार इस तरल के द्वारा अिथयों के fसरे रगड़ नहीं खाते तथा सिǎध की गfत अच्छी प्रकार होती रहती है। इससे अिथयों के fसरे fघसते भी नहीं हैं। िजस कला से यह तरल fनकलता है उसे सिǎध श्लेष्मधरा कला (Synovial Membrane) और उस तरल को सिǎध श्लेष्मा synovial fluid कहते हैं। इसका उल्लेख सुश्रुत में भी इस प्रकार fकया है-

सिǎधथः श्लेष्मा सवर्दसिǎधसंश्लेषात ् सवर्दसǎध्यनुग्रह करोfत " 21/14 इस प्रकार अष्टांग संग्रह में भी fलखा है :-

"पवर्दथोऽिथ सिǎधश्लेष्मात ् श्लेषक इfत " (अ०स०सू० 21/16)

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इस श्लेष्मधरा कला में कभी-कभी सूजन उत्पǎन होती है उसे सिǎध श्लेष्म-कला शोथ (Synovitis) कहते हैं। इसमें सिǎध थान में सूजन, वेदना और गfत में रुकावट भी हो जाती है। कभी-कभी fवशेष दबाव के कारण सिǎध नायु जोर से fखच जाती है िजससे कु छ सूत्र टू ट भी जाते हैं परǎतु इससे पूरी नायु गfतहीन नहीं होती। इस अवथा को मोच आना कहते हैं। इनक अfधक fखचं जाने या fवशेष दशा में गfत करने में सिǎध में थोड़ा ददर्द होता है। जब कभी नायु टू ट जाते हैं तब fमली हुई अिथयां अपने थान से हट जाती हैं। ऐसी अवथा को सिǎधभग्न (Dislocation) कहते हैं। बहुचेष्ट सिǎधयों की रचना के सिǎधत होने वाले पष्ृ ठ भाग पर सूत्रfवहीन तरुणािथयों की पतली तह चढ़ी रहती है और इनके ऊपर एक कोष (Capsule) भी चढ़ा रहता है।

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ELBOW JOINT

Elbow Joint is formed byTwo articulations –

  1. Humero-ulnar

  • Humero-radial

the complexity of elbow joint is increased by its continuity with superior radio ulnar joint.

humero-radial

+

= cubital articulation

humero-ulnar

+

superior radioulnar

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TYPE OF JOINT:

- synovial joint

  • hinge variety
  • compound
  • typical

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ARTICULAR SURFACES

  • Capitulum and trochlea of the lower end of humerus
  • Upper surface of head of radius and trochlear notch of ulna

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LIGAMENTS

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CAPSULAR LIGAMENT

  • Superiorly, it is attached to the lower end of the humerus in such a way that the capitulum, the trochlea, the radial fossa, the coronoid fossa and the olecranon fossa are intracapsular.
  • Inferomedially, it is attached to the margin of the trochlear notch of the ulna except laterally; inferolaterally, it is attached to the annular ligament of the superior radioulnar joint.
  • The synovial membrane lines the capsule and the fossae The anterior ligament, and the posterior ligament are thickenings of the capsule.

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Ulnar collateral ligament

  • The ulnar collateral ligament is triangular in shape.
  • Its apex is attached to the medialepicondyle of the humerus, and its base to the ulna.
  • The ligament has thick anterior and posterior bands:These are attached below to the coronoid process andthe olecranon process, respectively.
  • Their lower ends are joined to each other by an oblique band whichgives attachment to the thinner intermediate fibres of the ligament.
  • The ligament is crossed by the ulnar nerve and it gives origin to the flexor digitorum superficialis.
  • It is closely related to the flexor carpi ulnaris and the triceps brachii.

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RADIAL COLLATERAL

  • The radial collateral or lateral ligament: It is a fan-shaped band extending from the lateral epicondyle to the annular ligament.

  • It gives origin to the supinator and to the extensor carpi radialis brevis.

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RELATIONS

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RELATIONS

  • Anteriorly: Brachialis, median nerve, brachial artery and tendon of biceps brachii.

  • Posteriorly: Triceps brachii and anconeus.

  • Medially: Ulnar nerve, flexor carpi ulnaris and common flexors.

  • Laterally: Supinator, extensor carpi radialis brevis and other common extensors.

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BURSAE RELATED TO ELBOW JOINT

  1. Subtendinous olecranon bursa
  2. Subcutaneous olecranon bursa
  3. Bicipitoradial bursa
  4. Bursa separating biceps tendon from oblique cord

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STABILITY OF ELBOW JOINT

  1. Trochlea of humerus fits into trochlear notch of ulna
  2. Ulnar collateral ligament
  3. Radial collateral ligament

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BLOOD SUPPLY

Anastomosis around elbow joint

  • -brachial artery
  • -radial artery
  • -ulnar artery

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NERVE SUPPLY

  • Articular branches from
    • radial nerve
    • musculocutaneous nerve
    • ulnar nerve
    • median nerve

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CARRYING ANGLE

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CARRYING ANGLE

  • The transverse axis of the elbow joint is directed medially and downwards.

  • Because of this, the extended forearm is not in straight line with the arm, but makes an angle of about 13° with it.

  • This is known as the carrying angle. The factors responsible for formation of the carrying angle are as follows.

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  • a. The medial flange of the trochlea is 6 mm deeper than the lateral flange.
  • b. The superior articular surface of the coronoid process of the ulna is placed oblique to the long axis of the bone.

The carrying angle disappears in full flexion of the elbow, and also during pronation of the forearm.

The carrying angle disappears in full flexion of the elbow, and also during pronation of the forearm.

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APPLIED

Posterior dislocation of elbow

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GOLFER’S ELBOW (Medial epicondylitis)

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GOLFERS ELBOW

  • Golfer’s elbow is the microtrauma of medial epicondyle of humerus, occurs commonly in golf players.

  • The common flexor origin undergoes repetitive strain and results in a painful condition on the medial side of the elbow .

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TENNIS ELBOW

(Lateral epicondylitis)

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TENNIS ELBOW

Tennis elbow occurs in tennis players. Abrupt pronation with fully extended elbow may lead to pain and tenderness over the lateral epicondyle which gives attachment to common extensor origin. This is possibly due to:

  1. Sprain of radial collateral ligament.

  • Tearing of fibres of the extensor carpi radialis brevis.

  • Recent researches have pointed out that it is more of a degenerative condition rather than inflammatory condition.

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PULLED ELBOW

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STUDENTS ELBOW

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STUDENTS (MINERS) ELBOW

  • Student’s (miner’s) elbow is characterised by effusion into the bursa over the subcutaneous posterior surface of the olecranon process.

  • Students during lectures support their head (for sleeping) with their hands with flexed elbows. The bursa on the olecranon process gets inflamed

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DISTENSION (EFFUSION)OF ELBOW JOINT

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NERVE SUPPLY

The joint receives branches from the following nerves.

  1. Ulnar nerve

  • Median nerve

  • Radial nerve

  • Musculocutaneous nerve through its branch to the brachialis

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RESARCH PAPER ON ELBOW JOINT :

Abstract

The elbow joint is a complex structure that provides an important function as the mechanical link in the upper extremity between the hand, wrist and the shoulder. The elbow's functions include positioning the hand in space for fine movements, powerful grasping and serving as a fulcrum for the forearm. Loss of elbow function can severely affect activities of daily living. It is important to recognize the unique anatomy of the elbow, including the bony geometry, articulation, and soft tissue structures. The biomechanics of the elbow joint can be divided into kinematics, stabilizing structures in elbow stability, and force transmission through the elbow joint. The passive and active stabilizers provide biomechanical stability in the elbow joint. The passive stabilizers include the bony articular geometry and the soft tissue stabilizers. The active stabilizers are the muscles that provide joint compressive forces and function. Knowledge of both the anatomy and biomechanics is essential for proper treatment of elbow disorders.

Citation : Fornalski, S., Gupta, R., & Lee, T. Q. (2003).

Anatomy and biomechanics of the elbow joint. Sports medicine and arthroscopy review, 11(1), 1-9.

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