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  • प्रस्तुतकर्ता :- भारती (टीजीटी हिंदी)
  • जवाहर नवोदय विद्यालय सिरसा (हरियाणा)
  • जयपुर संभाग
  • विषय:- हिंदी
  • उपविषय:- बाल महाभारत कथा
  • कक्षा:- सातवीं

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संक्षिप्त विवरण :

  • विषय - हिंदी
  • पाठ्यपुस्तक - बाल महाभारत कथा
  • कक्षा – सातवीं
  • पाठ - 24 , मंत्रणा

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13 वर्ष पूरा होने पर पांडव विराट की राजधानी छोड़कर विराट राज के ही राज्य में स्थित उपप्लव्य नामक नगर में जाकर रहने लगे । आगे का कार्यक्रम तय करने के लिए उन्होंने अपने भाई बंधुओं एवं मित्रों को बुलाने के लिए दूत भेजें । भाई बलराम, अर्जुन की पत्नी सुभद्रा तथा पुत्र अभिमन्यु और यदुवंश के कई वीरों को लेकर श्री कृष्ण उपप्लव्य जा पहुंचे । इंद्रसेन काशीराज तथा शैव्य आदि राजा भी अपनी अक्षौहिणी सेना के साथ युधिष्ठिर के नगर पहुंच गए ।राजा द्रुपद भी अपनी अक्षौहिणी सेना के साथ आए। शिखंडी , द्रौपदी का भाई धृष्टद्यूमन और द्रौपदी के पुत्र भी आ पहुंचे । सर्वप्रथम अभिमन्यु और उत्तरा का विवाह संपन्न कराया गया । इसके बाद सभी राजा मंत्रणा के लिए खट्टे हुए ।

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  • श्री कृष्ण बोले" सम्माननीय बंधुओं और मित्रों ! आज हम सब यहां इसलिए इकट्ठे हुए हैं कि कुछ ऐसे उपाय सोचें जो युधिष्ठिर और राजा दुर्योधन के लिए लाभप्रद हों न्यायोचित हों और जिन से पांडवों तथा कौरवों का सुयश बढ़े। जो राज्य युधिष्ठिर से छीना गया है वह उन्हें मिल जाए तो पांडव शांत हो जाएंगे और दोनों में संधि हो सकती है । बलराम उठे और बोले "कृष्ण ने जो सलाह दी है वह मुझे न्यायोचित लगती है आप लोग जानते ही हैं कि पांडवों को आधा राज्य दिया गया था किंतु युधिष्ठिर उसे जुए में हार गए ।" बलराम जी का कहने का तात्पर्य था कि युधिष्ठिर ने जानबूझकर अपनी इच्छा से जुआ खेला और राज्य गंवा दिया उनकी इन बातों से पांडवों का हितैषी सात्यकि आग बबूला होकर बलराम जी का विरोध करने लगे सात्यकि की जोरदार बातों से राजा द्रुपद बड़े खुश हुए। वे उठे और सात्यकि का समर्थन करने लगे उन्होंने कहा हमें राजा शल्य , जयत्सेन , धृष्टकेतु आदि राजाओं के पास अभी से दूत भेज देने चाहिए।

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  • कृष्ण बोले पांचालराज ने जो सलाह दी है वह बिल्कुल ठीक है। वह बोले " द्रुपद राज ! आप सभी राजाओं में श्रेष्ठ हैं बुद्धि एवं आयु में भी बड़े हैं तथा राजा धृतराष्ट्र भी आपकी बड़ी इज्जत करते हैं अत: उचित तो यही होगा कि जो कुछ दूत को समझाना बुझाना हो आप ही समझा दें ।" इसके बाद सभी राजा अपने-अपने राज्य लौट गए तथा सभी युद्ध की तैयारियों में लग गए समस्त भारतवर्ष में भावी युद्ध का कोलाहल गूंजने लगा ।

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  • अर्जुन और दुर्योधन दोनों ही युद्ध में सहायता पाने के उद्देश्य से श्री कृष्ण से मिलने द्वारका आए। संयोग से दोनों एक साथ वहां पहुंचे उस समय श्री कृष्ण आराम कर रहे थे| अर्जुन श्री कृष्ण के पैताने ही हाथ जोड़कर खड़े रहे तथा दुर्योधन सिरहाने एक ऊंचे आसन पर जाकर बैठ गया । जब श्री कृष्ण की आंख खुली तो उन्होंने सर्वप्रथम अर्जुन को देखा क्योंकि वह उनके पैताने खड़े थे। उन्होंने दोनों का स्वागत किया। और फिर उनकी इच्छा पूछी सर्वप्रथम अर्जुन से पूछा गया तो अर्जुन ने अपने पक्ष में श्री कृष्ण को मांगा किंतु दुर्योधन ने श्री कृष्ण की लाखों वीरों वाली भारी - भरकम द्वारका की सेना का चयन किया । इसके बाद वह बलराम जी के पास गया तब बलराम जी ने उनसे कहा कि वह इस युद्ध में तटस्थ रहेंगे।

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  • मद्र प्रदेश के राजा शल्य, नकुल और सहदेव की मां माद्री के भाई थे , जब वे पांडवों की सहायता के लिए उपप्लव्य की ओर रवाना हुए तब यह खबर दुर्योधन को पता चलते ही उसने शल्य की सेना को अपनी सेना में मिलाने का निश्चय किया । उसने अपने सैनिकों से कहा की राजा शल्य की सेना डेरा डाले वहां उन्हें हर तरह की सुविधा पहुंचाई जाए । इस तरह राजा शल्य दुर्योधन की चालाकी का शिकार हो गए और विवशता के कारण उन्हें वचन दे बैठे की वे युद्ध में उनकी तरफ से लड़ेंगे । किंतु जब वे उपप्लव्य पहुंचे तब उन्होंने सारी घटना पांडवों को जा सुनाई और उन्हें आश्वासन देते हुए कहा कि युद्ध में यदि कर्ण ने उन्हें अपना सारथी बनाया तो निश्चय ही इससे अर्जुन के प्राणों की रक्षा होगी उन्होंने पांडवों से कहा कि धैर्य रखें जीत उन्हीं की होगी । उन्होंने कहा कर्ण और दुर्योधन की बुद्धि फिर गई है । अपनी दुष्टता के फल स्वरुप कौरवों का सर्वनाश होकर रहेगा

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धन्यवाद|