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BLESSINGS

ॐ ह्रीं अर्हम् नमः

श्रीसद्गुरुभ्यो नमः

ॐ ऐं नमः

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SHREE MATI GYANAY NAMAH

SHREE SHRUT GYANAY NAMAH

SHREE AVADHI GYANAY NAMAH

SHREE MANAH - PARYAV GYANAY NAMAH

SHREE KEVAL GYANAY NAMAH

5 GYAN

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Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 22

16 Bhavna

Inspired by:

Yugpradhan Acharyatulya P.P. Panyas Shree Chandrashekar Vijayji M.S.

P.P. Panyas Shree Yashobhushan Vijayji M.S.

P.P. Panyas Shree Manobhushan Vijayji M.S.

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Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 22

१६ भावना

१६ भावना (१२ + ४)

जैनधर्म, भावना पर आधारित है। जीवन की प्रत्येक क्रिया में भावना मूल है। यदि किसी मनुष्य की भावना राग-द्वेष से युक्त है तो उसकी क्रिया में पापबंध होता है और जब उसकी भावनाएँ विशुद्ध है तो उसकी क्रिया में पुण्यबंध होता है। जैनधर्म में वैराग्य की ओर ले जाने वाली बारह भावनाओं का उल्लेख हुआ है। बारह भावनाओं का चिन्तन आस्नव का निरोध और संवर के उपाय कहे गए है।

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१६ भावना

  1. अनित्य भावना - संसार की नश्वरता को देखते हुए मनुष्य यह चिन्तन-मनन करे कि इन्द्रियों के जितने भी विषय हैं, धन-दौलत, यौवन, भोग और शरीर पर्याय आदि, ये सब जल के बुलबुले या इन्द्रधनुष की भाँति अस्थिर हैं।

इस प्रकार का चिंतन अनित्य भावना है। उदाहरण-भरत चक्रवर्ती।

अनित्य भावना

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१६ भावना

२. अशरण भावना - इस संसार में कोई भी पदार्थ शरणदाता नहीं है।

इस संसार में रोग, बुढ़ापा तथा मृत्यु आदि से कोई भी बचा नहीं सकता है, यहाँ तक कि उसके परिजन-स्वजन, उसका धन-वैभव, सम्पत्ति तथा उसका शरीर आदि भी शरणभूत नहीं है, ऐसा नित्य चिंतन अशरण भावना है। इस संसार में यदि कोई शरणदाता है तो वह है- धर्म। उदाहरण- अनाथी मुनि ।

अशरण भावना

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१६ भावना

३. संसार भावना - संसार दुःख का सागर है। यहाँ रहकर कोई भी संसारी मनुष्य जो संसार की मृग तृष्णा के वशीभूत है, सुख प्राप्त नहीं कर सकता।

संसार तो सुख-दुःख, हर्ष विषाद का स्थल है, ऐसा चिंतन संसार भावना है।

उदाहरण मल्ली कुमारी ।

संसार भावना

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१६ भावना

४. एकत्व भावना - संसार में प्रत्येक मनुष्य अकेला ही जन्म लेता है और अकेला ही मरण होता है।

उसके साथ कोई भी स्वजन-परिजन नहीं होता है।

जीव अपने कर्मों का स्वयं कर्ता और भोक्ता होता है, दूसरा कोई नहीं, ऐसा चिंतन एकत्व भावना है।

उदाहरण नमि राजर्षि।

एकत्व भावना

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१६ भावना

५. अन्यत्व भावना - यह जो शरीर मैंने धारण कर रखा है, वह मेरा नहीं है, फिर घर परिवार, कुटुम्ब, जाति, धन-वैभव आदि मेरे कैसे हो सकते हैं? मैं अन्य हूँ और ये सब मुझसे भिन्न हैं, अलग हैं।

शरीरादि तो जड़ हैं, नाशवान हैं, मैं तो आत्मा हूँ, चेतन हूँ, शाश्वत हूँ।

शरीरादि में मोह-आसक्ति रखना हितकारी नहीं है।

जिस प्रकार धान से छिलका, फलों से गुठली और रस अलग हो जाता है उसी प्रकार यह शरीर और आत्मा भिन्न-भिन्न है।

यह अन्यत्व भावना है

अन्यत्व भावना

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१६ भावना

६. अशुचि भावना - शरीर रक्त-माँस-मज्जा-मल-मूत्र आदि घृणित पदार्थों से बना हुआ पिण्डहै।

शरीर जिसमें आत्मा प्रतिष्ठित है उसे सजाने-सँवारने की अपेक्षा साधने की आवश्यकता है। संयमादि से शरीर को साधा जाता है।

आत्मा के अनन्त ज्ञान-दर्शनादि गुणों को प्रकट किया जा सकता है।

उदाहरण सनत्कुमार

अशुचि भावना

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१६ भावना

७. आसव भावना - जिससे कर्म आगमन के द्वारों को समझा जाता है, वह आस्रव भावना है।

कर्मों का आगमन कितने द्वारों से होता है और इनके आगमन के कौन-कौन से कारण है तथा उससे कैसा फल-परिणाम मिलता है आदि विषयों पर चिंतन किया जाता है।

कर्मों के वशीभूत प्रत्येक जीव अनादिकाल से संसार में परिभ्रमण कर रहा है।

उदाहरण- समुद्रपाल

आसव भावना

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१६ भावना

८. संवर भावना - संवर भावना में आश्रव द्वारों को बंद करने के व्रतादि साधनों-उपायों पर चिंतन-मनन किया जाता है।

ऐसे चिंतवन से मनुष्य में धर्मपूर्वक तप, समिति, गुप्ति की ओर प्रवृत्ति बढ़ती है, जिससे कर्मों का द्वार बन्द होता है।

अर्थात् कर्मों का संवर होने लगता है।

उदाहरण- श्री हरकेशी मुनि ।

संवर भावना

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१६ भावना

९. निर्जरा भावना - कर्म निर्जरा के स्वरूप, कारणों तथा उपायों आदि का नित्य चिंतन करना निर्जरा भावना है। निर्जरा का अर्थ है धीरे-धीरे कर्मों का क्षय होते जाना। कर्मों के क्षय के लिए बारह प्रकार के तपों का आराधन करना। इन तपों के स्वरूपादि का, चिंतन-मनन होता है, जिससे मनुष्य परीषहों व उपसर्गों को समभाव के साथ सहता है तथा कषायों पर विजय भी प्राप्त करता है उदाहरण- मुनि अर्जुन।

निर्जरा दो प्रकार से होती है-एक सकाम निर्जरा और दूसरी अकाम निर्जरा

सकाम निर्जरा समकित के स‌द्भाव में आत्म लक्ष्य से किये गये तप से होती निर्जरा।

अकाम निर्जरा समकित के अभाव में आत्म लक्ष्य बिना किये गये तप से होती निर्जरा।

निर्जरा भावना

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१६ भावना

१०. लोक भावना - जिस भावना में लोक के यथार्थ स्वरूप आदि पर चिंतन किया जाता है, वह लोक भावना है।

लोक अनादि, अनन्त व षड्द्रव्यों का समूह है। इन द्रव्यों के स्वरूप तथा परस्पर सम्बन्धों के बारे में चिंतन-मनन करना.

उदाहरण ऋषि शिवराज ।

लोक भावना

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१६ भावना

११. बोधिदुर्लभ भावना - जिस भावना में चौरासी लाख योनियों और चार गतियों में भ्रमणशील मनुष्यों को उत्तम कुल प्राप्त होना और उसमें भी विशुद्ध बोधि या दृष्टि मिलना अत्यन्त दुर्लभ है और जब ऐसी स्थिति प्राप्त हुई है तो क्यों न मोक्षमार्ग की ओर प्रवृत्त हुआ जाए, जब यह चिंतन होता है, वह भावना बोधिदुर्लभ भावना है।

उदाहरण - तीर्थकर भगवान ऋषभदेव के अट्ठानवे पुत्र

बोधिदुर्लभ भावना

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१६ भावना

१२. धर्म भावना - जिस भावना में धर्म और तत्त्व का चिंतन किया जाता है, वह भावना धर्म भावना है।

इसमें मनुष्य यह चिंतन करता है कि यह मेरा अहोभाग्य है कि मुझे यह धर्म मिला है, जो प्राणी मात्र का कल्याण करने में समर्थ तथा सर्वगुण सम्पन्न है क्योंकि यह धर्म तीर्थकरों की देशना से है।

अतः मनुष्य जन्म तभी सार्थक है जब इस धर्म का सतत चिन्तन व मनन कर तदनुरूप आचरण में उतारा जाए।

उदाहरण धर्मरुचि ।

इस प्रकार इन बारह भावनाओं के चिंतवन करने से कोई भी मनुष्य अपने जन्म और मरण दोनों को सार्थक कर सकता है।

धर्म भावना

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१६ भावना

  1. मैत्री भावना - संसार में मित्र शब्द बहत ही प्यारा है।

किसी भी अनजान / अपरिचित व्यक्ति को भी यदि 'मित्र' शब्द से पुकारा जाता है तो वह सहज ही हमारे प्रति आकर्षित हो जाता है।

स्नेह और स‌द्भाव बढ़ने लगता है। विश्व मैत्री का सन्देश ।

उपदेश देने वाले महापुरुषों में भगवान महावीर का नाम सर्वप्रथम आता है।

उन्होंने कहा है

मित्ती मे सव्वभूएसु वेरं मज्झ न केणइ।

मैत्री भावना

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१६ भावना

जगत में जितने भी जीव हैं, जीवमात्र के प्रति मेरे मन में मैत्रीभाव है, कोई भी जीव मेरा शत्रु नहीं है, मैं सब प्राणियों को अपनी आत्मा के समान समझता हूँ।

यदि भूलचूक से, प्रमादवश, अज्ञानवश किसी प्राणी का कोई अपराध हो गया हो, मेरे कारण किसी का अहित हो गया हो, तो खामेमि सव्वजीवे, सव्वे जीवा खमंतु मे।

मैं उन सब जीवों को खमाता हूँ, उनसे क्षमा चाहता हूँ वे मुझे क्षमा प्रदान करें।

मैत्री भावना

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१६ भावना

२. प्रमोद भावना - जैसे फूलों को खिला देखकर भंवरा उनका रस ग्रहण करने लगता है।

वैसे ही हम गुणीजनों को देखकर, उनके सदाचार को देखकर प्रसन्न होवें।

सूर्य में ताप भी है, फूलों में कॉटे भी हैं, परन्तु हम तो सूर्य की ऊर्जा और प्रकाश से प्रफुल्लित होते हैं। ताप से हमें क्या? फूलों में काँटे हैं तो हैं, हम उन काँटों से स्वयं को बचाकर रस व सुगंध के ग्राहक बनकर फूलों का आनन्द उठाते हैं, इसी प्रकार किसी ध्यानी, त्यागी, तपस्वी, मौन व्रती, परोपकारी पुरुष को देखकर प्रसन्न होते हैं।

उसके सद्‌गुणों की महक से मन को सुवासित करने लगते हैं।

किसी को दान करते देखकर, तपस्या करते देखकर, सदाचार का पालन करते देखकर, नैतिकता व प्रामाणिकता का आचरण करते देखकर सहज ही मन से उसकी प्रशंसा का अहोभाव धन्य धन्य के रूप में निकलने लगता है।

प्रमोद भावना

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१६ भावना

३. करुणा भावना - किसी दीन, दुःखी, विपत्तिग्रस्त व्यक्ति को देखकर जिसका मन करुणा द्रवित होकर उनका दुख दूर करने के लिए तत्पर होता है।

वह अपने साधनों से, संपति से, अपनी शक्ति से और अपने प्रभाव से उन दुःखी जनों के दुःख दूर करने के लिए स्वयं प्रयत्न करता है। जैसे भूखों को भोजन देना, प्यासों को पानी पिलाना, अशिक्षितों को ज्ञान दान करना, उनका दुःख / विपत्ति आदि यथाशक्ति दूर करना। कत्लखाने में जाते मूक पशुओं की रक्षा करना, भूखे-प्यासे पशु-पक्षियों का चारा, पानी, दाना आदि डलवाना, इत्यादि सभी कार्य करुणा के लक्षण हैं और करुणाशील पुरुषों का कर्तव्य भी है।

करुणा भावना

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१६ भावना

४. माध्यस्थ भावना - हम सभी के प्रति मैत्रीभाव से व्यवहार करना चाहते हैं।

गुणीजनों के प्रति आदर, सम्मान और प्रशंसा का भाव भी प्रकट करते हैं, और दुःखी, संतप्त जीवाँ का दुःख दूर करने का भी प्रयास करते हैं, किन्तु कभी परिस्थिति ऐसी बन जाती है कि स‌द्भावपूर्वक किये गये हमारे सभी प्रयत्न निष्फल से दीखने लगते हैं। मन में एक प्रकार का खेद, सत्कर्म के प्रति उदासीनता सी आ जाती है।

उसका सुन्दर समाधान है माध्यस्थ भावना।

कोई व्यक्ति आपके सामने हिंसा, अभक्ष्य भक्षण, और अपने देव, गुरु, धर्म की झूठी प्रशंसा कर रहा है, इत्यादि अनेक ऐसे दुष्कृत्य से आपके भीतर क्रोध, रोष और उत्तेजना की लहर उठने लगती है।

तब कैसे अपने मन को स्थिर-शांत रखा जाये व प्रसन्नता बनाये रखें. इसका उपाय है-माध्यस्थ भावना का अभ्यास ।

माध्यस्थ भावना

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