JEEVAK AYURVEDIC MEDICAL COLLEGE
& HOSPITAL RESEARCH CENTRE
Kamlapur, Akauni Chandauli, UP
Topic:- GARBH POSHAN
Guided By:-
Dr. Amit Kumar Singh (H.O.D)
Associate Professor
Dr. Varsha Gupta
Assistant Professor
Department of Rachana Sharira
Presented By:-
Roshani Yadav
Roll No: 41
B.A.M.S 1ST Prof.
Batch:- 2023-24
INDEX
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गर्भ
गर्भ परिभाषा-
आचार्य चरक मतानुसार-
शुक्रशोणितजीवसंयोगे तु खलु कुक्षिगते गर्भसंज्ञा भवति।
( च०शा० 4/5)
गर्भाशय में शुक्र आर्तव और जीव का जब-जब जिस काल में संयोग होता है तब उसे 'गर्भ' नाम दिया जाता है।
आचार्य सुश्रुत मतानुसार -
शुक्रशोणितं गर्भाशयस्थमात्मप्रकृतिविकारसम्मूच्छितं गर्भ इत्युच्यतेI
(सु०शा० 5/3)
अर्थात् गर्भाशय में स्थित आत्मा प्रकृति एवं विकारों से युक्त शुक्र एवं शोणित को 'गर्भ' कहा जाता है।
गर्भ पोषण
गर्भावक्रान्ति एवं गर्भ निर्माण के पश्चात् प्रमुख कार्य गर्भ का पोषण है। इस प्रक्रिया पर ही गर्भ की सम्पूर्णता निर्भर करती है। यदि सभी साधन उपयुक्त होते हुए भी पोषण कर्म उचित नहीं हो तो गर्भ की परिवृद्धि रुक जाती है एवं वह पूर्ण रूप से निर्मित नहीं हो पाता। अतः गर्भ पोषण क्रम तथा उस क्रम में भाग लेने वाले विशेष अवयवों का भी ज्ञान करना आवश्यक हो जाता है। इसे आधुनिक वैज्ञानिक Embryonic Nourishment भी कहते हैं।
शुक्र शोणित का संयोग होने के उपरान्त गर्भाशय में गर्भ का अग्रिम निर्माण कार्य प्रारम्भ हो जाता है। गर्भ की वृद्धि में उसका पोषण प्रमुख है।
परिचय:-
आयुर्वेद के अनुसार गर्भपोषण प्रक्रिया निम्न प्रकार है-
"मातस्तु खलु रसवहायां नाड्यां गर्भनाभिनाड़ीप्रतिबद्धा, साऽस्य मातुराहार रसवीर्यमभिवपति। तेनोपस्नेहेनास्याभिवृद्धिर्भवति।”
(सु.शा. 3/29)
माता के रसवहा नाड़ी में गर्भ की नाड़ी लगी हुई रहती है। वह नाड़ी माता के आहार रस के वीर्य को गर्भ के लिए पहुँचाती है। उसी उपस्नेह से गर्भ की वृद्धि होती है।
आचार्य चरक के अनुसार प्यास और भूख से रहित गर्भ माता के अधीन रहता है। माता के आश्रित होकर सूक्ष्म रूप में सत् (वर्तमान), स्थूल रूप में असत् (अवर्तमान) अङ्ग प्रत्यङ्ग वाला गर्भ गर्भाशय में गर्भाशय के उपस्नेह और उपस्वेद से अपना जीवन निर्वाह करता है। इसके बाद जब सभी अङ्ग प्रत्यङ्ग व्यक्त हो जाते हैं, तब गर्भाशय में गर्भ को उपस्नेह और उपस्वेद रसवाहिनियों द्वारा प्राप्त होता है।
गर्भ की नाभि में नाड़ी (Umbilical cord) लगी रहती है। नाड़ी में अपरा (Placenta) लगी रहती है। और अपरा मातृ हृदय (Uterus) से लगी रहती है। अतः मातृ हृदय की उससे सम्बन्धित सिराओं द्वारा अपरा को रस से परिपूर्ण करता है। उसी रस के कारण गर्भ में बल तथा वर्ण की उत्पत्ति होती है।
इसको जानने के बाद यह शंका नहीं करनी चाहिए कि जब तक गर्भनाड़ी बनती ही नहीं तब तक गर्भ का पोषण कैसे होता है।
इसके लिए यह समझना आवश्यक है कि गर्भात्पत्ति के लिए जब शुक्र का गर्भाशय में निपात होता है तब वे शुक्र कीटाणु शोणित डिम्ब के साथ मिलकर गर्भ को उत्पन्न करने की प्रक्रिया में आते हैं। इस गर्भ का पोषण होना आवश्यक है क्योंकि यह अंग-प्रत्यंगों से हीन होता है।
इस अवस्था में गर्भनाड़ी के न रहते हुए भी केदारी कुल्या न्याय के अनुसार तिरछे जाने वाली, सम्पूर्ण शरीर के अवयवों का अनुसरण करने वाली, रसों को ले जाने वाली धमनियों का सार भाग गर्भ को जीवन रस देता है। यह पोषण का परोक्ष रूप है।
जैसे: तालाब के किनारे वृक्षों के लिए तालाब का जल अप्रत्यक्ष रूप से वृद्धि का कारण होता है वैसे ही गर्भ का पोषण अप्रत्यक्ष रूप से धमनियों द्वारा होता है।
सभी रसों से युक्त वह आहार रस गर्भिणी स्त्री के शरीर में तीन भागों में विभक्त होता है-
1. एक भाग - उसके अपने शरीर की पुष्टि के लिए होता है।
2. दूसरा भाग - क्षीरोत्पत्ति (दूध बनाने) के लिए होता है।
3. तीसरा भाग - गर्भ पोषण के लिए है।
तीसरा भाग पुनः गर्भ पुष्टि दो प्रकार से करता है-
1. उपस्वेद
2. उपस्नेह
1. उपस्वेद (Moisture, sweat) - उपस्वेद का अर्थ वाष्प, आर्द्रता से है। जब तक अपरा नहीं बनती, तब तक गर्भका पोषण बीज द्वारा स्वयं ग्रहण किए गए आहार से होता है। यह आहार उसे गर्भस्थमार्ग स्थित मातृ रस और रक्त से मिलता है। अथवा गर्भाधान के बाद जब प्रत्यंग अव्यक्त रहते हैं तथा अपरा और नाभिनाड़ी नहीं बनी होती है, तो गर्भका पोषण गर्भस्थ रसवाहिनी धमनी के परिस्रवण करने वाली आर्द्रता, वाष्प (उपस्वेद) से होता है।
‘उपस्वेद’ वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा भ्रूण और मां के बीच नाड़ी संचार स्थापित होता है और प्लेसेंटल परिसंचरण द्वारा बनाए रखा जाता है। इस विशेष प्रक्रिया को आधुनिक विज्ञान के हेमोट्रोफिक पोषण आपूर्ति के साथ सहसंबंधित किया जा सकता है जहां पोषक पदार्थ मां के परिसंचारी रक्त से भ्रूण में गुजरता है।
मां और भ्रूण के बीच संवहनी संचार का चित्रण करते हुए, वाग्भट कहते हैं कि भ्रूण के नाभि क्षेत्र से जुड़ी एक नाभि नाल शुरू होती है और साथ ही शरीर के अंगों और उप-भागों का विकास होता है। यह नाभि नाल से जुड़ी रहती है जिसका रक्त वाहिकाओं के माध्यम से मां के हृदय से अप्रत्यक्ष संचार होता है। इस प्रकार माँ में तैयार 'रस-धातु' (पोषक पदार्थ) धमनी संचार के माध्यम से माँ के हृदय से स्पंदित नाल तक पहुँचता है। फिर बाद में यह नाभि नाल के माध्यम से भ्रूण तक पहुँचता है और अंतर्निहित थैली। ट्रोफोब्लास्ट एक आक्रामक ऊतक है जो धीरे-धीरे सतही मातृ ऊतकों में फैलता है।
2. उपस्नेह (To become wet) - अपरा तथा नाभिनाड़ी से युक्त गर्भ का पोषण प्रसव पर्यन्त अपरा की अनुसरण करने वाली रसवाहिनियों (Uterine vessels) के अंकुर (choronic villi) से होता है। माता की रसवहानाड़ी (placenta and uterine vessels) के साथ गर्भ की नाभिनाड़ी (Umbilical cord) प्रतिबद्ध रहती है, वही माता के आहार रस के वीर्य (शक्ति) का संवहन करती है। और उसके उपस्नेह से गर्भ की वृद्धि होती है।
अपने शरीर की चयापचय प्रक्रियाओं (कायाग्नि) के साथ संबंधित शरीर के ऊतकों (पाकवासय) में चयापचय हो जाता है; इस प्रकार भ्रूण द्वारा प्राप्त पोषक तत्व अतिरिक्त सार (प्रसादभाग) से समृद्ध होकर भ्रूण की वृद्धि और विकास को बनाए रखता है। भ्रूण को पोषण की आपूर्ति का अगला तरीका रोम छिद्रों के माध्यम से 'रस-धातु' (बफर एमनियोटिक द्रव) की 'उपस्नेह' प्रक्रिया द्वारा बनाए रखा जाता है और प्रसव के बाद, वही 'रस-धातु' नवजात शिशु की ज़रूरतों को पूरा करती है|
आधुनिक विचारः-
गर्भ का पोषण क्रम (Nutrition of the Ovum) स्वतन्त्र एवं परतन्त्र क्रिया पर निर्भर करता है। इनमें स्वतन्त्र वृत्ति वह है कि जब तक अण्डे के स्वरूप में गर्भ रहता है तब तक वह अपने ही शरीर में रहने वाले योक (Yolk) भाग पर जीवन चलाता है। इसके पश्चात् अपरा का आश्रय लेकर माता के शोणित से अपना जीवन क्रम चलाता है। यही परतन्त्र वृत्ति जीवन क्रम होता है।
चिकित्सीय महत्व :-
प्राथमिक ध्यान मां के आहार पर है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वह पर्याप्त मात्रा में आवश्यक पोषक तत्व जैसे-प्रोटीन, विटामिन (विशेष रूप से फोलेट और विटामिन बी12), खनिज (लौह, कैल्शियम) और स्वस्थ वसा का सेवन करे, जो भ्रूण के विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं।
(2) आयुर्वेदिक सिद्धांत:
गर्भ पोषण आयुर्वेदिक प्रथाओं में गहराई से निहित है, जहां "रस" (भोजन का सार) की अवधारणा को महत्वपूर्ण माना जाता है, जिसमें भोजन की गुणवत्ता और भ्रूण पर इसके प्रभाव पर जोर दिया जाता है।
(3) तिमाही के आधार पर आहार में संशोधनः
आहार को अक्सर गर्भावस्था के विभिन्न चरणों के अनुरूप बनाया जाता है, तथा बढ़ते भ्रूण की विशिष्ट आवश्यकताओं के आधार पर पोषक तत्वों के सेवन को समायोजित किया जाता है।
(4) पोषण संबंधी कमियों का प्रबंधन:
माता में विद्यमान पोषण संबंधी कमियों, जैसे कि लौह की कमी से होने वाला एनीमिया, की पहचान करना और उसका समाधान करना, भ्रूण के इष्टतम विकास के लिए महत्वपूर्ण है।
(5) जीवनशैली में संशोधन:
आहार के अलावा, गर्भ पोषण में पर्याप्त जलयोजन, नियमित व्यायाम (जहां उपयुक्त हो), तनाव प्रबंधन और पर्याप्त नींद जैसे पहलुओं पर जोर दिया जाता है, जो समग्र मातृ स्वास्थ्य और भ्रूण की भलाई में योगदान करते हैं।