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BLESSINGS

ॐ ह्रीं अर्हम् नमः

श्रीसद्गुरुभ्यो नमः

ॐ ऐं नमः

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SHREE MATI GYANAY NAMAH

SHREE SHRUT GYANAY NAMAH

SHREE AVADHI GYANAY NAMAH

SHREE MANAH-PARYAV GYANAY NAMAH

SHREE KEVAL GYANAY NAMAH

5 GYAN

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Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 40

NAVTATTVA PART - 2

Inspired by:

Yugpradhan Acharyatulya P.P. Panyas Shree Chandrashekar Vijayji M.S.

P.P. Panyas Shree Yashobhushan Vijayji M.S.

P.P. Panyas Shree Manobhushan Vijayji M.S.

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Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 40

नव तत्त्व पार्ट - २

नव तत्त्व पार्ट - २

'तत्त्व' शब्द का अर्थ है जो सम्पूर्ण संसार का अर्थात् लोक-अलोक रूपी समस्त जगत का आधार है। इस जगत् में मुख्य रुप से दो तत्त्व हैं, जीव और अजीव। जीव को चेतन, प्राण, आत्मा (Soul) आदि कहा जाता है। अजीव को जड़ पुद्गल तथा अनात्मा।

जगत् में जीव की जो विभिन्न क्रियाएँ, अवस्थाएँ तथा सुख-दुःख आदि विभिन्न रुप देखने में आते हैं उसका कारण पुण्य, पाप आदि है। इसलिए जीव तत्त्व की व्याख्या व स्वरुप समझने के लिए जैन शास्त्रों में 'नव तत्त्व' का वर्णन किया गया है। नवतत्त्व के क्रमशः नाम इस प्रकार हैं- १. जीव, २. अजीव, ३. पुन्य, ४. पाप, ५. आस्रव, ६. संवर, ७. निर्जरा, ८. बंध और ९. मोक्ष।

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नव तत्त्व पार्ट - २

१. जीव

  1. जीव- हम जगत् में प्राणियों को जीवित देखते हैं।

उन्हें श्वासोच्छ्‌वास लेते, घटते-बढ़ते, हिलते-चलते आदि क्रियाएँ करते देखते हैं। इसका अर्थ है जिससे जीवन है, वह जीव है। जीव के १४ भेद हैं।

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नव तत्त्व पार्ट - २

२. अजीव

२. अजीव- घड़ा, मिट्टी, फर्नीचर, लोहे के औजार आदि जड वस्तुएँ भी हम देखते हैं, उनमें जीव नहीं होता, इसलिए वे 'अजीव' कही जाती हैं। इसके भी १४ भेद हैं।

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नव तत्त्व पार्ट - २

३. पुन्य

३. पुन्य बहुत से जीवों को सुख भोगते, मनचाही वस्तुएँ प्राप्त करते देखते हैं।

इसका कारण है उन जीवों का पूर्वकृत शुभकर्म। इस शुभ कर्म को पुण्य कहा जाता है अथवा जो कर्म जीव को शुभ की ओर प्रेरित करता है, वह भी पुण्य है।

पुण्य नौ प्रकार से किया जाता है। ४२ प्रकार से भोगा जाता है।

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४. पाप

४. पाप - जिस कारण से जीव को दुःख, कष्ट, पीड़ा आदि भोगना पड़ता है, उसे 'पाप' कर्म कहा जाता है।

जो विचार व क्रिया जीव को दुर्गति में ले जाती है अथवा उसको मलिन बनाती है, उसे भी 'पाप' कहा जाता है।

पाप १८ प्रकार से किया जाता है।

८२ प्रकार से भोगा जाता है।

सुख का कारण 'पुण्य' तथा दुःख का कारण 'पाप' है।

इन दोनों को करने वाला जीव स्वयं है।

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५. आस्रव

५. आस्रव - जिन क्रियायों से आत्मा में शुभ-अशुभ कर्म आते हैं, उसे 'आस्स्रव' कहते हैं। जिस प्रकार सरोवर में विभिन्न स्रोतों व मार्गों से जल प्रवेश करता है, उसी प्रकार जीव को एक सरोवर मानें तो इसमें जिन मार्गों से कर्म रुपी जल प्रवेश करता है उन्हे 'आस्रव' कहा जायेगा।

इसके संक्षेप में ५ अथवा विस्तार से ४२ भेद है।

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६. संवर

६. संवर - यह आस्त्रव का प्रतिपक्षी है।

आते हुए कर्मों को जिन क्रियाओं से रोक दिया जाता है या वे रुक जाते हैं, उन व्रत, प्रत्याख्यान आदि क्रियाओं को संवर कहा जाता है।

अर्थात् आत्मा रुपी सरोवर में कर्मरुपी जल आने के रास्तों को रोक देना संवर है।

यह ५७ प्रकार का है।

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७. निर्जरा

७. निर्जरा - आत्मा पर लगे हुए कर्मों का झड़ना, बिखर जाना, नष्ट हो जाना अथवा कर्मों को आत्मा से अलग करने की तपस्या आदि क्रियाएँ निर्जरा है।

जिस प्रकार सरोवर में रहे हुए जल को बाल्टी आदि से उलीचकर बाहर निकाला जाता है या सूर्य की धूप आदि से सुखाया जाता है, उसी प्रकार सहज भाव से अथवा प्रयत्न करके कर्मों का आत्मा से अलग होना निर्जरा है।

निर्जरा में कर्म आंशिक रुप में ही आत्मा से अलग होते हैं।

निर्जरा १२ प्रकार की है।

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८. बंध

८. बंध - आत्मा के साथ कर्मों का सम्बन्ध जुड़ना बंध है।

जैसे दूध में पानी मिलकर एकाकार हो जाता है अथवा लोहे के गोले के साथ अग्नि का सम्मिश्रण होने पर एकाकार प्रतीत होता है, उसी प्रकार आत्मा और कर्मों का सम्बन्ध बना रहना बंध है।

यह चार प्रकार का है।

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९ . मोक्ष

९ . मोक्ष - समस्त कर्मों का आत्मा से अलग हो जाना अर्थात् कर्मों का सम्पूर्ण क्षय होना मोक्ष है।

विविध अपेक्षाओं से इसके ९ भेद है।

नवतत्त्वों में हेय, ज्ञेय, उपादेय पुण्य, पाप, आस्त्रव तथा बंध ये हेय हैं।

जीव, अजीव दो तत्त्व ज्ञेय हैं।

संवर निर्जरा और मोक्ष ये तीन उपादेय हैं। किसी अपेक्षा से पुण्य भी उपादेय माना जाता है।

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  1. जीव

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सारांश

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२. अजीव

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३. पुण्य

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४. पाप

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५. आस्रव

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६. संवर

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७. निर्जरा

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८. बंध

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सारांश

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९. मोक्ष

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सारांश

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