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वर्तमान समय में योग की अवधारणा

प्रस्तुतकर्ता :- नितिन सारस्वत

Department of swathavirrata

Roll No.26

शासकीय स्वशासी आयुर्वेद महाविद्यालय,ग्वालियर (म.प्र)

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** योग एक स्वस्थ जीवन जीने की कला तथा तनमन को निर्मल निरोगी एवं स्वस्थ रखने का विज्ञान है योगाभ्यास दैनिक तनाव से विद्यार्थी को मुक्त कर अपनी शक्ति के व्यर्थ व्यय से बचाता है ज्ञान ग्रहण करने के लिए एकाग्रता की आवश्यकता होती है योग एकाग्रता प्राप्ति का साधन है योग विद्यार्थी जीवन को अनुशासित एवं सुसंस्कृत बनाकर उसकी अंत शक्तियों को जागृत करता है ।

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  • कर्म के बिना मनोरथ सफल नहीं होते किंतु इसके लिए हमें एक समुचित एवं स्वस्थ कार्यशैली अपनानी होती है और वह प्राप्त होती है योग से कहा भी गया है “योग कर्मसु कौशलम्” अर्थात कर्म कर्मों में कुशलता ही योग ह।
  • किसी भी कार्य को सफलता तक पहुंचाने हेतु दृढ़ संकल्प भावनाओं पर नियंत्रण समर्पण आदि की आवश्यकता होती है योगाभ्यास इन्हें विकसित करने की विध्या है ।
  • हमारे प्रति एवं प्रयास नियमित एवं दीर्घकालीन होने चाहिए यह भी योगाभ्यास का ही फल है इस प्रकार योग विद्या एवं विद्या है जो आत्मा विकास एवं आत्म शिक्षा प्रदान कर व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास कराती है इस प्रकार के व्यक्तित्व की क्षमता के कारण हम किसी भी क्षेत्र में विकास एवं प्रगति प्राप्त कर सकते हैं।

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  • संक्षेप में कहें तो योग एक ऐसा दर्शन है जो जीवन को समग्र रूप से देखने की दृष्टि प्रदान करता है यही कारण है कि आज पूरे विश्व में योग ने एक परिपूर्ण एवं वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति के रूप में अपनी पहचान बनाई है विगत कुछ ही वर्षों में आरोग्य एवं व्यक्तित्व विकास के साधन के रूप में योग की लोकप्रियता पर्याप्त मात्रा में बड़ी है इसके साथ ही पारंपरिक एवं प्राकृतिक चिकित्सा पद्धतियों की लोकप्रियता में भी वृद्धि हुई है योग एवं स्वास्थ्य पर योग्य व्यापम की लोकप्रियता के कारण योग चिकित्सा योग विज्ञान तथा योग दर्शन में भी रुचि जागृत हुई है वर्तमान कला विधि में प्रतिष्ठित चिकित्सक साहित्य में योग चिकित्सा के विविध लाभ के विषय में अनेक शोध लेख प्रकाशित हुए हैं।

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**योग शब्द की व्युत्पत्ति **

  • योग शब्द संस्कृत के यूज़ धातु में प्रत्यय लगाने पर बना है जिसको जोड़ना मिलाना संयुक्त करना एवं व्यवस्थित करना इत्यादि अनेक अर्थ हैं योग शब्द यूज धातु से निशान है जिसका अर्थ है समाधि अर्थात आत्मसाक्षात्कार समाधि से तात्पर्य है चित्र की एकाग्रता एकाग्रता की पराकाष्ठा ही योग है।

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  • एकाग्रता द्वारा ही मनुष्य विश्व चेतन से जुड़ता है जो विश्व बंधुत्व की भावना को जन्म देता है।
  • योग शब्द का अर्थ
  • युज भावादौ प्रत्यय करने से योग शब्द निस्पनं होता है जिसका अर्थ जोड़ना मिलाना मिलाप संगम मिश्रण आदि होता है वृहत हिंदी कोष ।
  • अनुसार योग शब्द का अर्थ है जोड़ने का कार्य संयोग ,संबंध, संपर्क ,युक्ति युक्त नियम, विधान, सूत्र मेल मिलाप,, का निरोग आदि।
  • योग रत्न शिरोमणि महर्षि पतंजलि के”योगा चित्र वृत्ति निरोधा”: के अनुसार चित्तवृति के निरोध को योग कहते हैं।
  • इस प्रकार योग का वास्तविक अर्थ उस विधि से है जिसमें साधक अपने प्रकृतिजन्य विकारों को त्याग कर अपनी आत्मा के साथ संयुक्त होता है।

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  • योग हमारी अमूल्य धरोहर है जो अनादि काल से ऋषि यों के मध्य प्रचलित था योग सारी संप्रदायों और मत-मतान्तरो की पक्षपात और वाद-विवाद से रहित सार्वभौमिक धर्म है जो तत्व का ज्ञान समय अनुभव द्वारा प्राप्त करना सिखाता है ।
  • भारतीय दर्शन में योग एक अति महत्वपूर्ण शब्द है आत्म दर्शन एवं समाधि से लेकर कर्म क्षेत्र तक योग का व्यापक व्यवहार हमारी शास्त्र में हुआ है।

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*योग प्रार्थना *

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*योग शरीर में लचीलापन लाता है।**

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** अष्टांग योग**

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**योग और स्वास्थ्य तथा योग की वर्तमान समय में उपादेयता तथा अवधारणा**

  • “शरीरमाघं खलु धर्म साधनम्”
  • धर्म धर्म का मूल आधार शरीर है संसार का हर व्यक्ति सुखी रहना चाहता है सुखी रहने के लिए शरीर और मन का स्वस्थ होना प्राणी मात्र के लिए आवश्यक है।

संसार मैं बहुत कम ऐसे भाग्यशाली होंगे जिनके तन और मन दोनों स्वस्थ हो भौतिक साथ सामानों या खाद वस्तुओं का चाहे जितना संग्रह कर दिया जावे यदि उनका उपयोग करने के लिए हमारा तन मन तैयार नहीं है तो यह सब साधन व्यर्थ हैं।

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  • पद प्रतिष्ठा अधिकार और धन से सुख प्राप्त किया नहीं जा सकता है चेहरे को सुंदर बनाने के लिए अनेकों सौंदर्य प्रसाधन है किंतु अंदर की वास्तविक सौंदर्य अर्थात मन को सुंदर बनाने के लिए एकमात्र रास्ता योग भी है योग तन और मन दोनों को स्वस्थ रखने की राह बताता है किसान मजदूर कुली रिक्शा चालक पैदल चलने वालों का तो श्रम हो जाता है किंतु अध्यापक छात्र लेखक पत्रकार वकील नेता कर्मचारी व्यापारी बुद्धिजीवी वर्ग का शारीरिक श्रम नहीं हो पाता है केवल मानसिक श्रम ही होता है फिर ऐसे लोगों का भोजन कैसे हजम होगा भोजन नहीं पचने से रक्त कैसे बनेगा भोजन पाचन ठीक से नहीं होगा तो अनेकों और रोग की उत्पत्ति होगी निरंतर मानसिक तनाव झेलने वाले व्यक्ति की पाचन क्रिया रक्त संस्थान मल विसर्जन क्रिया प्रसादी की कार्यप्रणाली में अवरोध उत्पन्न होता है।

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  • योग में जहां शरीर में लचीलापन आता है तथा आवश्यक परिश्रम की पूर्ति होने से भोजन आसानी से पचता है वहीं दूसरी ओर यम -नियम की आचरण से व्यक्ति संयमित होता है संयम अतिभोग से बचाता है एवं परिश्रम से भूख तेज होती है अतः अच्छे स्वास्थ्य के लिए संयम और परिश्रम दोनों आवश्यक है।
  • विविध प्रकार के प्रदूषण से विश्व में हिंसा युद्ध आतंकवाद से जीव मात्र व्यथित है सुखी जीवन जीने के लिए अच्छा स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए व्याधि एवं वृद्धावस्था से बचने के लिए हमारे प्राचीन विषयों की देन योग विद्या को ही अपनाना हुआ योग के विषय में कहा भी गया है।

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  • अर्थात योग साधक के शरीर को रोग व्याधि और बुढ़ापा भी दुष्ट प्रभावित नहीं कर सकते योग से ही व्यक्ति का तन मन स्वस्थ होगा तथा तन मन के स्वस्थ रहने पर ही वह भौतिक साधनों का समुचित उपयोग का जीवन को सुखी समृद्ध बनाने में असमर्थ होगा ।

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  • “ योग का मानवता के लिए एक संदेश है ।योग का मानव शरीर के लिए संदेश है ।उसका मानव और मानव आत्मा के लिए भी संदेश है तो क्या सुबुद्ध और सुयोग युवक इस संदेश को ,केवल भारत के ही नहीं अपितु विश्व के अन्य सभी भावों के प्रति व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए आगे आवेंगे” ???????
  • —स्वामी कुवलयानन्द

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  • **THANKS A LOT**
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