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संगीत और योग साधना

Dr. Prem Sagar

Assistance Professor and HOD

Music Vocal (HMV)

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भूमिका

संगीत-कला और योग-साधना का परस्पर सम्बन्ध है

संगीत क्या है? तथा मानव जीवन को सुखद और सार्थक बनाने में संगीत की भूमिका

योग क्या है तथा मानव जीवन को सुखद और सार्थक बनाने में योग की भूमिका

संगीत-साधना एंवम् शरीर के सप्त चक्रों का अन्तर्सम्बन्ध

योग शब्द की व्युत्पत्ति

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भूमिका

  • पर्याप्त शोधों द्वारा अब यह पूरी तरह साबित है! साहित्य-कला, धर्म, दर्शन और विज्ञान आदि सब का चरम लक्ष्य मानव को बेहतर मानव बनाना तथा उसे स्वस्थ जीवन जीने की रीति सिखाना है।

  • नाद और गति अर्थात स्वर और लय के सूक्ष्म तत्वों से निष्पन्न और सम्पन्न संगीत श्रेष्ठ ललित कला है। ज्ञान विज्ञान की अन्य ललित कलाओं का तरह यह कला विद्या भी इसी शाश्वत् उद्देश्य को पूरा करने हेतु क्रियाशील है।

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भूमिका

  • संगीत और योग कुछ सूक्ष्म और स्थूल तत्वों के आधार पर एक दूसरे से सुसम्बद्ध है। संगीत कला मानवीय भावनाओं के चिन्तन तथा नानाविध अनुभवों को अभिव्यक्त करने के सबल साधन है। इस कला निष्पत्ति और सृजन में मन, बुद्धि, आत्मा के साथ-साथ शरीर विज्ञान का अत्यन्त महत्पूर्ण स्थान है।

  • योग भी एक बहुआयामी विद्या-साधना है जिसमें भी उपरोक्त सभी तत्व (मन, बुद्धि, आत्मा और शरीर)अपनी- अपनी भूमिका सक्रिय रूप से निभाते हैं। इस नाते संगीत और योग का अर्न्तसम्बन्ध अध्ययन का विषय है।

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संगीत-कला और योग-साधना का परस्पर सम्बन्ध है

  • संगीत-कला और योग-साधना का परस्पर क्या सम्बन्ध है इस विषय का प्रतिपादन करने हेतु निम्नलिखित तथ्यों पर चिन्तन करना संदर्भ-संगत है।

  • संगीत क्या है? तथा मानव जीवन को सुखद और सार्थक बनाने में संगीत की भूमिका।

  • योग क्या है? तथा मानव जीवन को सुखद और सार्थक बनाने में योग की भूमिका।

  • संगीत कला और योग साधना का अर्न्तसम्बन्ध।

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संगीत क्या है? तथा मानव जीवन को सुखद और सार्थक बनाने में संगीत की भूमिका

  • मानव जीवन बहुआयामी है आदि काल से इस दिशा में अध्ययन होता आया है और निरन्तर जारी रहेगा। शरीर, मन, बुद्धि तथा आत्मा ये चार घटक मानव जीवन में मुखरित होने वाले विशेष तत्व हैं। इन चारों के पोषण, विकास और शान्ति के लिये अनेक विधिआं आदि काल से विकसित होती आयी है। संगीत कला बहुआयामी मानव जीवन के लिये कैसे सहायक सिद्ध हुई है- तत्सम्बन्धि चिन्तन इस प्रकार बयान किया जा सकता है।

  • नाद और गति अर्थात् स्वर और लय के सूक्ष्म तत्वों से निष्पन्न और सम्पन्न होने वाली संगीत कला श्रेष्ठ ललित-कला है।

  • मानव एक भावनाशील प्राणी है। मानवीय मन में भावनाओं का उमड़ना तथा उनकी अभिव्यक्ति की तड़प उसी प्रकार स्वाभविक है जैसे की श्वास लेना और जल ग्रहण करना।

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संगीत क्या है? तथा मानव जीवन को सुखद और सार्थक बनाने में संगीत की भूमिका

  • आदि काल से मानव सुःख, दुःख के अगिनत भावों को भिन्न-भिन्न माध्यमों से अभिव्यक्त करता आया है। जैसे-जैसे मनुष्य विकसित होता गया उसकी अभिव्यंजना के साधन और माधयम भी विकसित होते गये।

  • संगीत-कला भी चिर-काल से मानव-जीवन के लिये अभिव्यंजना का सशक्त साधन रही है।

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संगीत क्या है? तथा मानव जीवन को सुखद और सार्थक बनाने में संगीत की भूमिका

  • बुद्धि- अच्छे बुरे का भेद करने की क्षमता रखती है और इस क्षमता को पोषित करने और विकसित करने में शान्तिदायनी संगीत-कला सकारात्मक भूमिका निभाती है। इसी प्रकार आत्मतत्व के मंथन और सम्पोषण में एकाग्रता और आनंद प्रदान करने वाली संगीत-कला की भूमिका आदि काल से अनुभव की जा रही है।
  • संतुष्ट मन; बुद्धि, आत्मा और शरीर को प्रफुल्लित रखने में अपनी महती भूमिका निभाता है। मानव मन- सुःख, दुःख के अनेक भावों को अनुभव करता है और अभिव्यंजना के अनेक माध्यमों में संगीत कला भी उसकी अभिव्यक्ति और संतुष्टि का सशक्त साधन बनती है।
  • आध्यात्म शब्द की उत्पत्ति ‘अधि’ और ‘आत्म’ की संधि से हुई है।
  • ‘अधि’ का अर्थ है ‘के बारे में’ और ‘तम’ का अर्थ है स्वयं अर्थात् स्वयं के बारे में अध्ययन करना कि मैं क्या कर रहा हूँ और मुझसे क्या अपेक्षित है। इन सब तथ्यों का अध्ययन ही आध्यात्मिकता की वास्तविकता है। इस दिशा में भी कोमलकांत संगीत-कला अपनी प्रभावशाली भूमिका निभाती है।

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संगीत क्या है? तथा मानव जीवन को सुखद और सार्थक बनाने में संगीत की भूमिका

  • मानवीय संवेदना को पोषित करनें में संगीत-कला सक्रिय रहती है तथा संवेदनशीलता मानव के मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास का नींव है।
  • मानव-जीवन के तीन तत्वों- मन, बुद्धि और आत्मा के पोषण में तो संगीत जैसी मृदु कला की भूमिका सहज समझ आ जाती है।
  • मानव के विकास तथा सम्पोषण में संगीत-कला की भूमिका पर विचार करने से यह तथ्य प्रकाशित होता है कि संगीत-कला के तीन अंगोः गायन, वादन और नृत्य के मूर्तमान होने में मानवीय शरीर की सक्रिय भूमिका है। गायन-कला में तो श्वसन प्रक्रिया नींव के रूप में विद्यमान रहती है इसके अतिरिक्त नाभि, हृदय, कंठ, जीह्वा, दंत, नासिका, कपाल आदि विभिन्न शारीरिक अंगो की महत्पूर्ण भूमिका सक्रिय रहती है।
  • उल्लेखित शरीर के ये सब अव्यव संगीत-कला को मूर्तमान करने में अपनी भूमिका निभाते हैं। वहीं गायन का बार-बार अभ्यास इस पूरे शरीर तंत्र को स्वस्थ रखनें में अपनी महती भूमिका निभाता है

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संगीत क्या है? तथा मानव जीवन को सुखद और सार्थक बनाने में संगीत की भूमिका

  • वादन-कला और नृत्य-कला में भी मानवीय शरीर सक्रिय होकर इन कलाओं को मूर्तमान करता है तबला-वादन, सितार-वादन आदि-आदि में अपेक्षित बैठक मानवीय शरीर की भूमिका को ही परिलक्षित करती है।
  • नृत्य-कला में पद-संचालन तथा भिन्न-भिन्न आंगिक चेष्ठाएं मानवीय शरीर की महत्वपूर्ण उपय़ोगिता को दर्शाती हैं।
  • नृत्य-कला का निरन्तर अभ्यास मानवीय शरीर को हृष्ठ-पुष्ठ रखने में रचनात्मक भूमिका निभाता है। सालों हुए शोधों से पता चला है कि संगीत का असर हमारे शरीर और मन दोनों पर ही होता है।
  • ऐसा पाया गया है कि संगीत से तनावपूर्ण मांस पेशियों को आराम मिलता है, किसी भी प्रकार की सूजन कम होती है, स्वास्थप्रद क्रियाएं अच्छी होती है और हृदय से जुड़े रोगों से भी राहत मिलती है।

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संगीत क्या है? तथा मानव जीवन को सुखद और सार्थक बनाने में संगीत की भूमिका

  • विदेशों में संगीत से उपचार बहुत ही आम है जैसे आपरेशन थियेटर में सर्जरी के दौरान संगीत। कुछ डाक्टरों का ऐसा मानना है कि उन्हें आपरेशन करते समय तनाव नहीं होता तथा स्थिति काफी सहज रहती है।
  • रिसचर्स का यह भी मानना है कि संगीत से मरीज़ को भी लाभ मिलता है।
  • ब्लड प्रेशर जो कि सर्जिकल प्रोसिज़र से बढ़ जाता है उसे संगीत सुन कर कम किया जा सकता है और मरीज़ को स्वस्थ होने में भी कम समय लगता है।
  • पैविया और आक्सफोर्ड युनिवर्सिटी द्वारा किये गये शोधों से पता चलता है कि हृदय के रोग की चिकित्सा के लिए संगीत सहायक होता है। साइंटिस्ट्स द्वारा 24 नवयुवक और युवतियों पर शोध किया गाया और उनकी चिकित्सा संगीत के बिना और संगीत के साथ की गयी। इस शोध में बी्रथिंग रेट, ब्लड प्रेशर और रेस्पाइरेटरी इन्डेक्स पर ध्यान दिया गया। जिससे संगीत कला के प्रभाव के गुणकारी परिणाम पाये गये।

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संगीत क्या है? तथा मानव जीवन को सुखद और सार्थक बनाने में संगीत की भूमिका

  • उपरोक्त विवेचन का उद्देश्य इस तथ्य को पुष्ठ करना है कि संगीत कला किस तरह मानव जीवन के चारों घटकों मन, बुद्धि, आत्मा और शरीर को पोषित करनें में अपनी भूमिका निभाती है तथा ऐसा करके किस तरह से संगीत-कला मानव जीवन को सार्थक बनानें में सहायक सिद्ध होती है।

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योग क्या है तथा मानव जीवन को सुखद और सार्थक बनाने में योग की भूमिका

  • साहित्य और संगीत की तरह योग भी अध्ययन चिन्तन की सनातन शाखा है। जिस तरह संगीत की तीन मुख्य विधाएँ गायन, वादन और नृत्य है तथा इन तीनों के आगे अनेक उपशाखाएँ हैं

  • योग भी बहुआयामी विद्या-वृक्ष है जिसकी अनेक शाखाएँ प्रशाखाएँ हैं। योग का शाब्दिक अर्थ है जुड़ाव, मिलान, विलीन होना, विलय होना एक रूप होना आदि।

  • मानव जीवन के चार मुख्य घटकों मन, बुद्धि, आत्मा और शरीर इन सब के संदर्भ में योग-विद्या का अध्ययन आदि काल से होता आया है और निरन्तर जारी है।

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योग क्या है तथा मानव जीवन को सुखद और सार्थक बनाने में योग की भूमिका

  • आधुनिक युग में कम्प्यूटर साइंस में मानव जीवन से सम्बद्ध अनेक क्षेत्रों को अपने अध्ययन क्षेत्र में समाविष्ट कर लिया है।

  • चिकित्सा, साहित्य, संगीत, गणित, भूगोल, धर्म-दर्शन, आदि कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जिसमें कम्प्यूटर साइंस की सहायता से अध्ययन न किया जा सके

  • मानवीय मन, बुद्धि, आत्मा और शरीर इन सबसे सम्बन्धित योग के अध्ययन का प्रावधान है।

  • मन के सम्बन्ध में शान्ति बुद्धि के सम्बन्ध में एकाग्रता आत्मा के सम्बन्ध में ध्यान तथा शरीर के संदर्भ में अनेक यौगिक क्रियायें तथा अनेक शारीरीक व्यायाम विकसित किये गये हैं।

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योग क्या है तथा मानव जीवन को सुखद और सार्थक बनाने में योग की भूमिका

  • योग शब्द भारत में तो सर्वत्र प्रचलित है ही, बौद्ध धर्म के साथ चीन, जापान, तिब्बत, दक्षिण पूर्व एशिया और लंका में भी फैल गया है।

  • इस समय सारे सभ्य जगत्‌ में लोग इससे परिचित हैं। ऐसी अवस्था में ऐसा प्रतीत होता है कि इसका वाच्यार्थ स्पष्ट होगा और इसकी परिभाषा सुनिश्चित होगी। परंतु ऐसा नहीं है।
  • भगवद्गीता प्रतिष्ठित ग्रंथ माना जाता है। उसमें योग शब्द का कई बार प्रयोग हुआ है, कभी अकेले और कभी सविशेषण, जैसे बुद्धियोग, संन्यासयोग, कर्मयोग। वेदोत्तर काल में भक्तियोग और हठयोग नाम भी प्रचलित हो गए हैं।

  • महात्मा गांधी ने अनासक्ति योग का व्यवहार किया है। पातंजल योगदर्शन में क्रियायोग शब्द देखने में आता है। पाशुपतयोग और माहेश्वरयोग जैसे शब्दों का भी चर्चा मिलता है।

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योग क्या है तथा मानव जीवन को सुखद और सार्थक बनाने में योग की भूमिका

  • विभिन्न प्रयोगों को देखने से यह तो स्पष्ट हो ही जाता है कि योग की परिभाषा करना कठिन काम है।

  • परिभाषा ऐसी होनी चाहिए जो अव्याप्ति और अतिव्याप्ति दोषों से मुक्त हो, योग शब्द के वाच्यार्थ का ऐसा लक्षण बतला सके जो प्रत्येक प्रसंग के लिये उपयुक्त हो और योग के सिवाय किसी अन्य वस्तु के लिये उपयुक्त न हो।

  • दिवादिगणीय युज धातु समाध्यार्थक है, रूधादिगणीय यजुर धातु योगार्थक अर्थात मेलनार्थक है और चुरादिगनीय युज धातु संयमनार्थक है।

  • उपरोक्त तीनों धातुओं के आगे घन प्रत्यय लगाने से योग शब्द व्युत्पन्न होता है और तब शब्द शास्त्र के अनुसार इस योग का अर्थ होता है- चित्तवृत्ति का निरोध, मिलाना या संयम कराना।

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योग शब्द की व्युत्पत्ति

  • दिवादिगणीय युज धातु समाध्यार्थक है, रूधादिगणीय यजुर धातु योगार्थक अर्थात मेलनार्थक है और चुरादिगनीय युज धातु संयमनार्थक है।

  • उपरोक्त तीनों धातुओं के आगे घन प्रत्यय लगाने से योग शब्द व्युत्पन्न होता है और तब शब्द शास्त्र के अनुसार इस योग का अर्थ होता है- चित्तवृत्ति का निरोध, मिलाना या संयम कराना।

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योग शब्द की व्युत्पत्ति

  • डॉ. मुंशीराम शर्मा के अनुसार योग चित्वृतियों के निरोध का नाम है।

  • चित्त की वृत्तियां जब तक बाहर भटकती है तब तक संस्कृति भी अपने से दूर रहती है इन वृतियों का संस्कार संशोधन अर्न्तमुखी वृत्ति में होता है।

  • अर्न्तमुखी होने पर बाहर का नहीं अंतर के आंतरिक तत्वों का ज्ञान होने लगता है।

  • चित्त का एक नामकरण मन है। मन का स्वभाव चंचल रहता है। मन को चंचलता से हटाकर किसी एक ही वस्तु पर स्थिर अथवा केन्द्रित करना योग है।

  • योग मन को संयत करता है तथा पाश्विक वृत्तियों से खिंच कर एकाग्रवृत्ति में निहित कर देता है।

  • किसी भी क्षेत्र में जीवन की सम्पूर्ण सफलता संयत मन पर ही निर्भर करती है मन की स्थिरता के अभाव में कर्ता किसी भी कार्य में सफल नहीं हो सकता।

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योग शब्द की व्युत्पत्ति

  • आध्यापक मन की एकाग्रता के अभाव में छात्रों को सरल से सरल पाठ्य विषय को भी अच्छी तरह नहीं पढ़ा सकता तथा छात्र भी मानसिक एकाग्रता के अभाव में सरल विषय को भी सम्यक रूप से हृदयगंम नहीं कर सकता।

  • वायुयान का चालक थोड़ी सी मानसिक स्थिरता के अभाव में अपने तथा यात्रीयों के प्राण खो सकता है। साधारण से साधारण कार्यों में भी सर्वत्र मानसिक संयम का प्रयोग लाभप्रद होता है।

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योग शब्द की व्युत्पत्ति

  • कर्ता अपने कार्य में जब तक तन्मय न हो सके तब तक उसे सफल कार्यकर्ता नहीं माना जाता।

  • एक निरक्षर कुली भी अपनी श्वासक्रिया को रोके बिना भारी बोझ उठाने में असमर्थ होता है भारी बोझ उठाने के समय वे अपने मन को पूर्ण एकाग्र कर अनजाने ही पूरक तथा कुम्भक नामक प्राणायम रूप यौगिक क्रिया के द्वारा ही सफल होता है।

  • उपरोक्त कार्य में कुली का एकाग्रता, पूरक और कुम्भक क्रिया की शाब्दिक या यौगिक निश्पत्ति या परिभाषा का अर्थ ज्ञाता होना आवश्यक नहीं है।

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योग शब्द की व्युत्पत्ति

  • हिन्दु अपनी सगुण व निगुर्ण उपासना में, इसाई बाइबल निर्दिष्ट प्रार्थना में और मुस्लिम कुराण की साधना में पुर्ण सिद्धि के लिये मानसिक एकाग्रता को सर्वोत्तम साधन समझते है।

  • योगबल या मन संयम का तात्पर्य एक समय में किसी एक ही पदार्थ या तत्व पर चित्त को स्थिर करना है।

  • महार्षि पतान्जलि ने अपने दर्शन के प्रराम्भ में ही कहा है कि चित्त की वृत्तियों का निरोध अर्थात सर्वथा एकाग्र हो जाना योग है।

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योग शब्द की व्युत्पत्ति

  • पुराणों में प्रतिपादन है कि आत्मज्ञान के प्रयत्न भूत, यम, नियम आदि के अपेक्षक मन की जो विशिष्ट गति है उसका बह्म के साथ संयोग होना ही योग कहलाता है।

  • पातन्जल परिभाषा में बह्म का उल्लेख न कर चित्त वृत्तियों के केवल निरोध को ही योग कहा गया है।

  • पौराणिक परिभाषा में प्रारम्भ में ही ब्रह्म का नाम निदेशित हुआ है। किन्तु चरम लक्षण दोनों पद्धतियों का एक ही है।

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योग शब्द की व्युत्पत्ति

  • महार्षि पतन्जलि ने यम, नियम, आसन, प्रणायाम, प्रत्याहार धारणा ध्यान और समाधि ये आठ योग के अंग निर्दिष्ट किये हैं।

  • आग्नेय पुराण में भी कोशिध्वज ने योग के आठ अंग ही खांडिक्य को समझाये हैं। सम्भव इन आठों में से प्रत्येक का एक दुसरे से क्रमिक सम्बन्ध है।

  • साधक के प्रथम में प्रतिष्ठत हो जाने पर ही द्वितीय अंग या सोपान पर जाने का अधिकारी हो सकता है और इसी क्रम से तृतीय से चतुर्थ, पंचम, षष्ठ, सप्तम और अंत में अपने चरम लक्ष्य समाधि की स्थिति में।

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योग शब्द की व्युत्पत्ति

  • गायन-कला का उद्गम वेदों में पाया जाता है। अध्यात्म-विद्या एवं योगशास्त्र का उद्गम भी वेदों से ही है।

  • ऋग्वेदीय संध्या में गायत्री पुनरश्चरण का आदेश प्राप्त होता है। उसमें ‘अथ प्राणायामे विनियोगः मंत्र से प्राणायम प्रारंभ किया जाता है।

  • प्राणायम का सीधा सम्बन्ध योग से होता है। बायें नाथुने से सांस भीतर खींचना एवं दाहिने नथुने से उसे बाहर छोड़ना यह क्रिया प्रणायाम में महत्वपूर्ण होती है।

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योग शब्द की व्युत्पत्ति

  • बायें नथुने को ‘ह’ अक्षर का एवं दाहिने नथुने को ‘ठ’ अक्षर का सांकेतिक मान दिया गया है।

  • ‘हठ’ योग का वास्तिवक अर्थ श्वासोच्छवास योग ही है।

  • ‘योगतारावली’नामक अपने ग्रंथ में आदि शंकराचार्य जी ने ‘हठयोग’ का विशेष रूप से उल्लेख किया है।

  • श्वास प्रक्रिया को ही ‘स्वर-परिवर्तन’ नाम से भी जाना जाता है। यह तथ्य महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ पर‘स्वर’शब्द ‘श्वास’ शब्द के समानार्थक रूप में प्रस्तुत किया गया है। हम यह कह सकते है कि योग एवं संगीत का यही उद्गम स्थान है। यही संगीत की गंगोत्री एवं योग की यम्नोत्री है।

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योग शब्द की व्युत्पत्ति

  • श्वास क्रिया जो कि मनुष्य के शरीर एवं मन को जोड़ती है का अध्ययन ही वैज्ञानिक ढंग का है।

  • मानव जन्मते ही श्वास अंदर लेता है(Inhaling) एवं मृत्यु के समय श्वास बाहर छोड़ता है (Exhaling) इसका यह स्पष्ट अर्थ होता है कि प्रत्येक श्वास एवं उच्छवास के साथ मानव का जीवन मृत्यु-चक्र अविरत गति से घुमता रहता है।

  • योग शास्त्र की विस्तारपूर्वक एवं सुन्दर शैलीयुक्त चर्चा सर्वप्रथम ज्ञानेश्वरी ग्रंथ के छठे अध्याय में प्राप्त होती है। ज्ञानेश्वर महाराज ‘नाथ पंथीय’ थे एवं उनका योग ‘हठयोग’ था। उसे ही श्वासयोग अथवा कुंडलिनी योग भी कहते है।
  • जब हम गहरी साँस लेते हैं, तब वह श्वास नाभि तक पहुँच जाती है। उस स्थान का यौगिक नाम भी नाभि-च्रक है। वहाँ पर स्थित सुप्त उर्जा-शक्ति को कुंडलिनी नाम से जाना जाता है।

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योग शब्द की व्युत्पत्ति

  • श्वास क्रिया की विशिष्ट पद्दति अपनाकर इस शक्ति जगाया जा सकता है।

  • यह शक्ति जागृत होने पर हृदय चक्र को स्पर्श करती है। यहाँ पर साधक में प्रेम भक्ति का झरना फूट पड़ता है।

  • जब वह शक्ति भ्रूमध्य च्रक को स्पर्श करती है जिससे सामाधि लाभ होता है। अन्त में वह शक्ति सहस्रार चक्र जिससे मानव जीवन मुक्त हो जाता है। यही कुडंलिनी शक्ति का यात्रा मार्ग है, ऐसा हठयोगियों का कथन है।

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योग शब्द की व्युत्पत्ति

  • संगीत के स्वर मंद्र, मध्य एवं तार इन तीन सप्तकों से लिये जाते हैं। इन स्वरों के उच्चारण में पेट, वक्षस्थल, कंठ एवं तालू आदि स्थानों का प्रयोग क्रमशः होता है।

''नासा: कंठमुरस्य तालु जिह्वा दंतस्य संस्पृष्ण,

षड़मय: संजायते यस्मात् तस्मात् षडज़ स्मृता:।''

“वाग्गेयकार के रूप में पंडित गनेश प्रसाद शर्मा जी का हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत को योगदान”- पृष्ठ संख्या 325, लेखक- डॉ. प्रेम सागर

  • यह श्लोक इसी कथन को स्पष्ट करता है। जब यह निश्चत हो जाए कि श्वास ही योग एवं संगीत की कड़ी है। तब अध्ययन की दिशा भी निश्चत हो जाती है। जिस प्रकार श्वास योग शास्त्र का मूलाधार है उसी प्रकार स्वर भारतीय संगीत का मूलाधार है।

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योग शब्द की व्युत्पत्ति

  • षड़ज हो या कोई अन्य स्वर हो, लगाने में श्वास-उच्छावास क्रिया ही होती है।

  • प्रदीर्घ उच्छवास के लिये सर्वप्रर्थम ओउमsssss गाकर ओउमकार करने की आवश्यकता है।

  • आवाज़ शास्त्र में स्वर-निर्मिति एवं स्वर में गुंजन पैदा करना ये दो प्रमुख स्तंभ हैं।

  • व्यवहारिक रूप में स्वर-निर्मिति एवं स्वर में गुंजन की क्रिया इस प्रकार होगी। मंद्र पंचम को ऊ कार में गाना। तत्पश्चात मध्य षड़ज को ओंकार में गाना फिर मध्य पंचम को ओंकार में गाना। अन्त में तार षड़ज आकार में गाना।

  • गाते समय ठोड़ी उठी रहनी चाहिये। कंठ आकार धीरे-धीरे विस्तृत होनेवाली नलिका के समान बनाये रखने के लिये ठोड़ी उठाना आवश्यक है।

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योग शब्द की व्युत्पत्ति

  • गायन महाऋर्षि अल्लादिया खाँ साहिब स्वरों का गुंजन बढ़ाने उसे चौड़ाई देने के लिये वे अचरक नामक स्वरालंकार एवं फिकरे नामक तान प्रकार गाते थे।
  • सा s ss।
  • सासा s ss।
  • साऩि सा s ss।
  • साऩि साऩि-साऩि सा s ss। ।
  • योग एवं संगीत इन दोनों विषयों की व्यापकता तथा गहनता वर्णन के परे है।
  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इन विषयों की गहराई में जाने पर स्पष्ट होता है। कि इन दोनों विषयों को श्वास नामक सेतु ने जोड़ रखा है।
  • श्वशन क्रिया को विशिष्ट दिशा में दिक्षित करना यही योग एवं संगीत का प्रथम कर्तव्य है। इस निश्चय से हमारी प्रथम आवश्यकता निश्चित हो जाती है। वह अवश्यता उच्छावास अथवा स्वर की उपलब्धि ही है।

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संगीत-साधना एंवम् शरीर के सप्त चक्रों का अन्तर्सम्बन्ध

  • योगाभ्यास का प्रत्येक आसन तथा योग की प्रत्येक क्रिया मेरूदण्ड में स्थापित चक्रों को प्रभावित करती है तथा सतत् साधना से ये चक्र जाग्रत होते है।
  • प्रणायाम के द्वारा शरीर में प्रवाहित इड़ा, पिंगला सुषुमुन्ना नाड़ियों का शोधन होता है तथा उसे ऊपर चढ़ने का पथ मिलता है।
  • प्रत्येक मनुष्य के शरीर में महत्वपूर्ण स्थानों पर छोटे से मस्से के रूप में सात चक्र स्थापित है जिनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार हैः-
  • प्रथम चक्रः मूलाधार चक्र - यह चक्र पुरूषों में मूत्र द्वार तथा गुदा द्वार के बीच में सीवन के ठीक पीछे की ओर तथा स्त्रियों में गर्भाशय के ठीक पीछे स्थापित है। जिस स्थान पर सिद्धासन या सिद्धयोनि आसन में बायें पैर की एड़ी दबाव डालती है, ठीक उसी स्थान पर स्थापित है। इसका रंग गहरा लाल है।
  • द्वितीय चक्रः स्वाधिष्ठान चक्र- यह चक्र ठीक जहां से मेरू दंड प्रारम्भ होता है, मेरुदंड के अंतिम सिरे पर स्थापित है इसका रंग सिंदुरी है।

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संगीत-साधना एंवम् शरीर के सप्त चक्रों का अन्तर्सम्बन्ध

  • तृतीय चक्रः मणिपुर चक्र - यह चक्र ठीक नाभि के पीछे मेरूदंड में स्थापित है तथा इसका रंग गहरा पीला है।
  • चतुर्थ चक्रः अनाहत चक्र - यह चक्र हृदय-स्थल, जहाँ छाती के बीचो-बीच गड्डा पड़ता है। उसके पीछे मेरूदंड में स्थापित है तथा इसका रंग आसमानी नीला है।
  • पंचम चक्रः विशुद्धि चक्र - यह चक्र जहाँ से गर्दन प्रराम्भ होती है। ठीक उसके पीछे मेरू-दंड में, जो स्थान जालंधर बंध में ठोड़ी को छाती से लगाते समय प्रभावित होता है, ठीक उसी स्थान पर स्थापित है और इसका रंग गहरा जामुनी है।
  • षष्ठ चक्रः आज्ञा चक्र - यह चक्र दोनों भृकुटियों के बीच जिस स्थान पर महिलाएं बिन्दी लगाती हैं अथवा जिस स्थान पर नाड़ी- शोधन प्राणायाम में दाहिने हाथ का तर्जनी तथा मध्यमा अंगुलियां रखी जाती हैं ठीक इस स्थान के पीछे मेरू-दंड के अंतिम सिरे पर स्थापित है तथा इसका रंग है भूरा (सफेद)।

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संगीत-साधना एंवम् शरीर के सप्त चक्रों का अन्तर्सम्बन्ध

  • सप्तम चक्र नहीं, वरन स्थान विशेष हैः बिन्दु विसर्ग - यह वह स्थान है जहाँ ब्राहम्ण लोग चोटी रखते थे या रखते हैं। इसी स्थान पर स्थापित है बिन्दु विसर्ग, जिसे अमृतकुंड के नाम से भी जाना जाता है। इसको चाँदनी रात में तारागणों के मध्य चन्द्रमा के रूप में देखा जाता है।

  • अंतिम चक्र है सहस्रार चक्र- यह चक्र कपाल में जहाँ बचपन में कोमल स्थान होता है, ठीक उसी स्थान स्थापित है और इसका रंग गुलाबी है। सम्पूर्ण विश्व में व्यापत नाद का मूल स्त्रोत संगीत के सात स्वर ही हैं।

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संगीत-साधना एंवम् शरीर के सप्त चक्रों का अन्तर्सम्बन्ध

  • इन प्रत्येक चक्रों के स्थान रंग तथा आकार को ध्यान में रखकर यदि संगीत का अभ्यास करेगें तो मेरूदंड एक सितार की तरह झंकृत होता हुआ प्रतीत होगा।

  • भारतीय संगीत विश्व का प्राचीनतम संगीत है। संगीत की उत्पत्ति सृष्टि के साथ हुई। सृष्टि की उदय बेला का प्रथम चरण हो या मृत्यु का अंतिम पग हो, सुनहरे पल हो या दुःख भरे क्षण, संगीत का अस्तित्व हर पल, हर क्षण बना रहता है।

  • संगीत में एक ही स्थान पर साधना करने के लिए शरीर, मन व मस्तिष्क पूर्ण स्वस्थ होना चाहिए। और इसके लिए योग सर्वश्रेष्ठ है।

  • योग से शरीर, मन, मस्तिष्क स्वस्थ रहता है। मनुष्य एकाग्र रहता है व प्रसन्न मन से काम करता है।

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निष्कर्ष

  • विभिन्न वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध हो चुका है कि संगीत साधना व योग साधना दोनों से मनुष्य के जीवन में शक्ति का विकास होता है।
  • शरीर तथा मन को स्वस्थ्य, प्रफुल्लित रखने के लिए योग शास्त्र व संगीत शास्त्र दोनों समान रूप से आवश्यक है। दोनों से शरीर, मन, मस्तिष्क स्वस्थ रहता है, एकाग्रता रहती है।
  • योग की तरह ही संगीत-कला के द्वारा भी तनाव दूर होता है।
  • आज की भागम-भाग ज़िन्दगी और अनेक चुनौतियों के चलते उत्पन्न तनाव से मनुष्य का जीना दूभर हो रहा है-तनाव जानलेवा भी हो सकता है! जीवन को नारकीय बना सकता है! यह उन बच्चों के जीवन को भी कई तरीकों से प्रभावित कर रहा है जिनके माँ बाप तनाव ग्रस्त हैं! इस विकट स्थिति से राहत पाने के लिये संगीत और योग साधना मानव जीवन के लिये वरदान स्वरूप हैं।

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निष्कर्ष

  • आधुनिक विज्ञान की पद्धति को अपना कर बर्लिन और अमेरिकामें विगत 25 वर्षों से शोधरत भारतीय मूल की अमेरिकन नागरिक वैज्ञानिक डॉ. जैस्लीन ए मिश्रा का कहना है आज हमारी जीवनशैली बहुत से तनाव और परेशानियों से घिरी हुई है। हरकिसी के पास बहुत से काम हैं और इस भागदौड़ में तनाव के बारे में सोचने का भी किसी के पास समय नहीं। जब हम संगीत सुनते हैं तो हमारी नर्वस रिलैक्सिंग मोड में चली जाती हैं और हम हर रोज़ के तनाव से कहीं दूर चले जाते हैं।
  • मद्धम या धीमा संगीत का सुनना आपके जीवन के तनावपूर्ण समय में भी आपको शांत रहने में बहुत सहायक हो सकता है। अक्सर आजकल लोग अपने दैनिक जीवन में विभिन्न प्रकार के तनाव और चिंताओं का सामना करते रहते हैं,जिससे उनका मन हमेशा अशांत रहता है। तब इन परेशानियों से बचाव करने व छुटकारा पाने में संगीत आपकी बहुत मदद करता है और आप भी संगीत का आनंद ले कर इन समस्याओं से छुटकारा पा सकते हैं।

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  • आज की भागम-भाग ज़िन्दगी और अनेक चुनौतियों के चलते उत्पन्न तनाव से मनुष्य का जीना दूभर हो रहा है-तनाव जानलेवा भी हो सकता है! जीवन को नारकीय बना सकता है! यह उन बच्चों के जीवन को भी कई तरीकों से प्रभावित कर रहा है जिनके माँ बाप तनाव ग्रस्त हैं!

  • तनाव के चलते दाम्पत्य जीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है यहाँ तक की लोगों की उम्र भी तनाव के चलते घट रही है-रोगों से शरीर के लड़ने की कुदरती शक्ति लगातार तनाव के चलते घटती जाती है और एक समय शरीर पर अनेक रोगों का हमला हो जाता है!