बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर
आरोह भाग-2 कक्षा-बारहवीं
पुरस्कार :–
शैक्षणिक बिन्दु:-
विषयवस्तु:- (पाठ के बारे में)
प्रस्तुत पाठ आंबेडकर के विख्यात क्रांतिकारी भाषण
‘एनीहिलेशन ओफ़ कास्ट’(1936)के हिन्दी रूपान्तरण ‘जाति-भेद का उच्छेद’ के दो प्रकरणों के तौर पर है|
उनके अनुसार समानता, स्वतन्त्रता, व बन्धुता – ये तीन तत्व आदर्श समाज में अनिवार्यतः होने चाहिए, जिससे लोकतंत्र सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति तथा समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान – प्रदान की प्रक्रिया के अर्थ तक भी पहुंच सके |
श्रम विभाजन और जाति-प्रथा –�लेखक कहता है कि आज के युग में भी जातिवाद के पोषकों की कमी नहीं है | समर्थक कहते हैं कि आधुनिक सभ्य समाज कार्यकुशलता के लिये श्रम –विभाजन को आवश्यक मानता है | इसमें आपत्ति यह है कि जातिप्रथा श्रम-विभाजन के साथ-साथ श्रमिक-विभाजन का भी रूप लिये हुए है | भारत की जाति –प्रथा श्रमिकों के अस्वाभाविक विभाजन के साथ-साथ विभिन्न वर्गों को एक – दूसरे की अपेक्षा ऊंच-नीच भी करार देती है |
जाति-प्रथा को श्रम-विभाजन मान लिया जाए तो यह भी मानव की रुचि पर आधारित नहीं है | सक्षम समाज को चाहिए कि वह लोगों को अपनी रुचि का पेशा करने के लिए सक्षम बनाए | जाति-प्रथा में यह् दोष है कि इसमें मनुष्य का पेशा उसके प्रशिक्षण या निजी क्षमता पर आधारित न होकर उसके माता-पिता के सामाजिक स्तर पर निर्भर होता है | हिन्दूधर्म में पेशा बदलने की अनुमति न होने के कारण कई बार बेरोजगारी की समस्या उभर जाती है | �आर्थिक पह्लू से भी जाति-प्रथा हानिकारक है क्योंकि यह उनकी स्वाभाविक प्रेरणा, रुचि व आत्म-शक्ति को दबाकर उन्हें स्वाभाविक नियमों जकडकर निष्क्रिय बना देती है |
� � मेरी कल्पना का आदर्श समाज:– �लेखक का आदर्श समाज स्वतन्त्रता, समता, व भ्रातृता पर आधारित होगा | समाज में इतनी गतिशीलता होनी चाहिए कि कोई भी परिवर्तन समाज में तुरंत प्रसारित हो जाए | सबको संपर्क के साधन व अवसर मिलने चाहिए | यही लोकतंत्र है | लोकतंत्र मूलतः सामाजिक जीवनचर्या की एक रीति तथा समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान – प्रदान का नाम है | विभिन्न मूलभूत अधिकारों के साथ व्यवसाय चुनने की स्वतन्त्रता उसके विकास के लिए आवश्यक है | इस स्वतन्त्रता के अभाव में व्यक्ति दासता में जकडा रहेगा | ‘दासता केवल कानूनी नहीं होती | यह कुछ लोगों को दूसरों द्वारा निर्धारित व्यवहार व कर्तव्यों के पालन भी मौजूद रहती है |�
‘समता’ शब्द सदैव विवादित रहा है किन्तु समता असंभव होते हुए भी नियामक सिद्धांत है | मनुष्य की क्षमता तीन बातों पर निर्भर है-1.शारीरिक वंश परंपरा 2.सामाजिक उत्तराधिकार 3.मनुष्य के अपने प्रयत्न | इन तीनों दृष्टियों से मनुष्यों की विविधताओं के बावजूद उनसे असमान व्यवहार करना उचित नहीं | हर व्यक्ति को विकास के समान अवसर मिलने चाहिए | �लेखक कहता है कि एक राजनेता को अनेक लोगों से मिलना होता है| उसके पास हर व्यक्ति के साथ अलग व्यवहार करने का समय नहीं होत | ऐसे में वह व्यवहार्य सिद्धान्त का पालन करता है कि सब मनुष्यों के साथ समान व्यवहार किया जाए | �समता एक काल्पनिक वस्तु है, फिर भी राजनीतिविदों के लिए यही एकमात्र उपाय व मार्ग है |
आदर्श समाज-व्यवस्था पर गाँधी के विचार:-�
भाषा प्रयोग:-
भाषण के अनुकूल भाषा का प्रयोग हुआ हैं तत्सम और विदेशी
शब्दों का प्रयोग। यथा:-
शैली:- संबोधन शैली, गम्भीर, चिंतन प्रधान, विश्लेषण प्रधान, विषय प्रतिपादन में पूर्णतया समर्थ शैली |
अवबोध प्रश्न:-
अवबोध प्रश्न:-
4. शारीरिक वंश-परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार की दृष्टि से मनुष्यों में असमानता संभावित रहने के बावजूद आंबेडकर ‘समता‘ को एक व्यवहार्य सिद्धांत मानने का आग्रह क्यों करते हैं? इसके पीछे उनके क्या तर्क हैं?
5. सही में आंबेडकर ने भावनात्मक समत्व की मानवीय दृष्टि के तहत जातिवाद का उन्मूलन चाहा है, जिसकी प्रतिष्ठा के लिए भौतिक स्थितियों और जीवन-सुविधाओं का तर्क दिया है। क्या इससे आप सहमत हैं?
उत्तर- 1
1.श्रम-विभाजन मनुष्य की रुचि पर आधारित नहीं है।
2. व्यक्ति की क्षमताओं की उपेक्षा की जाती है।
3.व्यक्ति के जन्म से पहले ही उसका पेशा निर्धारित कर दिया जाता है। उसे पेशा चुनने की आज़ादी नहीं होती।
4.व्यक्ति को अपना व्यवसाय बदलने की अनुमति नहीं देती।
5.संकट में भी व्यवसाय बदलने की अनुमति नहीं होती जिससे कभी-कभी भूखों मरने की नौबत भी आ जाती है।
उत्तर - 2
उत्तर - 3
उत्तर - 4
उत्तर - 5
प्रस्तुतकर्ता- �वेद प्रकाश गौतम�(स्नातकोत्तर शिक्षक- हिन्दी) केन्द्रीय विद्यालय, बैंक नोट प्रेस, देवास(म.प्र.)
धन्यवाद