गुरू तेग बहादुर जी का काव्य �
पवन कुमारी
असिस्टेंट प्रोफेसर
स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग
हंसराज महिला महाविद्यालय
जालंधर
गुरू तेग बहादुर जी का काव्य
मानव जीवन की सोउद्देश्यता
प्राणी नारायण सुधि लेहु ॥
छिन छिन अउध घटै निस बासुर बिरथा जातु हैं देह ॥
समन्वय,स्वतंत्र एवं विद्रोह की त्रिवेणी
सहिष्णुता, समन्वय ,निर्भीकता ,लोक – धर्मिता हेतु आत्म बलिदान ,भौतिक पदार्थो के प्रति उदासीनता एवं अत्याचार के समक्ष न झुकना इत्यादि गुरु जी को स्वीकार्य थे
आत्मा की अमरता पर विश्वास
साधो यह तन मिथ्या मानउ॥
या भीतर जो राम बसत हैं साचउ ताहि पछानउ ॥
समन्वय भावना और समत्व योग
उसतति निंदा दोउ परहर हरि किरति उर आनो ॥
जन नानक सम ही मै पूरन एक पूरखु भगवानों॥
हरि की महत्ता
हरि की गति नाहि कोई जानै ॥
जोगी जती तपी पचि हारे अरु बहु लोग सिआने ॥
नाम और गुरु का महत्व
हरि के नाम बिना दुख पावै ॥
भगति बिना सहसा नह चुकै गुर इह भेदु बतावै॥
मन की चंचलता से मुक्ति
साधो इह मन गहिओ न जाई ॥
चंचल त्रिसना संगि बसतु है याते थिरु न रहाई ॥
सदाचार अथवा शुद्ध जीवनचरण
तीरथ बरत अरु दान करि मन धरै गुमानु ॥
नानक निहफल जात तिहि जिउ कुंचर इसनानु ॥
निष्काम सदाचरण – रत कर्मण्य जीवन
दुरलभ देह पाई मानस की बिरथा जनमु सिरावै ॥
ईश्वर मे आस्था
भै काहु को देत नहि, नहि भै मानत आनि ॥
कहु नानक सुनि रे मना , गिआनी ताहि बखानि॥
मोक्ष की प्राप्ति
हरख सोगु जा कै नही बैरी मीत समानि ॥
कहु नानक सुनु रे मना मुकति ताहि तै जानि ॥
परमात्मा की सर्वव्यापकता
बाहर भीतरि एको जानहु इहु गुर गिआन बताई ॥
अहम का त्याग
जतन बहुत मै करि रहिओ , मिटिओ मन का मानु
ब्रह्म एक हैं
एक ओंकार सतनाम करता पुरखु,�निरभउ निरवैरु अकाल मूरति�अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
परमात्मा अनंत हैं
एका माई जुगति बिआई तिनि चेले परवाणु ॥
इकु संसारी इकु भंडारी , इकु लाए दीवानु ॥
बाहरी आडंबरो का विरोध
काहे रे वन खोजन जाई ॥
सरब निवासी सदा अलेपा तोही संगि समाई ॥
परमात्मा सृष्टि का कर्ता
साधो रचना राम बनाई ॥
इकि बिनसै,इक असथिरु मानै अचरजु लखिओ न जाई
नाम स्मरण पर बल
रामु नामु उरि महि गहिओ जा कै सम ही नहीं कोई ॥
जिह सिमरत संकट मिटै दरसु तुहारों होइ ॥
धन्यवाद