पवन कुमारी �असिस्टेंट प्रोफेसर �हिन्दी �हंसराज महिला महाविद्यालय�जालंधर
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मलिक मोहम्मद जायसी का प्रसिद्ध प्रबंध काव्य 'पद्मावत' है. यह सूफ़ी परंपरा का एक महान महाकाव्य है. जायसी की अन्य रचनाओं में अखरावट, आख़िरी कलाम, कहरनामा, चित्ररेखा, कान्हावत आदि प्रमुख हैं
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पद्मावत
जायसी सूफी संत थे और इस रचना में उन्होंने नायक रतनसेन और नायिका पद्मिनी की प्रेमकथा को विस्तारपूर्वक कहते हुए प्रेम की साधना का संदेश दिया है। रतनसेन ऐतिहासिक व्यक्ति है, वह चित्तौड़ का राजा है, पद्मावती उसकी वह रानी है जिसके सौंदर्य की प्रशंसा सुनकर तत्कालीन सुल्तान अलाउद्दीन उसे प्राप्त करने के लिये चित्तौड़ पर आक्रमण करता है और यद्यपि युद्ध में विजय प्राप्त करता है तथापि पद्मावती के जल थझररने के कारण उसे नहीं प्राप्त कर पाता है। इसी अर्ध ऐतिहासिक कथा के पूर्व रतनसेन द्वारा पदमावती के प्राप्त किए जाने की व्यवस्था जोड़ी गई है, जिसका आधार अवधी क्षेत्र में प्रचलित हीरामन सुग्गे की एक लोककथा है।
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अखरावट का रचनाकाल :-��अखरावट के विषय में जायसी ने इसके काल का वर्णन कहीं नहीं किया है। सैय्यद कल्ब मुस्तफा के अनुसार यह जायसी की अंतिम रचना है। इससे यह स्पष्ट होता है कि अखरावट पद्मावत के बाद लिखी गई होगी, क्योंकि जायसी के अंतिम दिनों में उनकी भाषा ज्यादा सुदृढ़ एवं सुव्यवस्थित हो गई थी, इस रचना की भाषा ज्यादा व्यवस्थित है। इसी में जायसी ने अपनी वैयक्तिक भावनाओं का स्पष्टीकरण किया है। इससे भी यही साबित होता है, क्योंकि कवि प्रायः अपनी व्यक्तित्व भावनाओं स्पष्टीकरण अंतिम में ही करता है।��मनेर शरीफ से प्राप्त पद्मावत के साथ अखरखट की कई हस्तलिखित प्रतियों में इसका रचना काल दिया है। "अखरावट' की हस्तलिखित प्रति पुष्पिका में जुम्मा ८ जुल्काद ९११ हिजरी का उल्लेख मिलता है। इससे अखरावट का रचनाकाल ९११ हिजरी या उसके आस पास प्रमाणित होता है।
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आखिरी कलाम :��जायसी रचित महान ग्रंथ का सर्वप्रथम प्रकाशन फारसी लिपि में हुआ था। इस काव्य में जायसी ने मसनवी- शैली के अनुसार ईश्वर- स्तुति की है। अपने अवतार ग्रहण करने तथा भुकंप एवं सूर्य- ग्रहण का भी उल्लेख किया है। इस के अलावा उन्होंने मुहम्मद स्तुति, शाहतरत- बादशाह की प्रशस्ति और सैय्यद अशरफ की वंदना, जायस नगर का परिचय बड़ी सुंदरता से उल्लेख किया है। जैसा कि जायसी ने अपने काव्य अखरखट में संसार की सृष्टि के विषय में लिखा था। इस आखरी काव्य में जायसी ने आखरी कलाम नाम के अनुसार संसार के खत्म होने एवं पुनः सारे मानवों को जगाकर उसे अपना दर्शन कराने एवं जन्नत की भोग विलास के सूपुर्द करने का उल्लेख किया है।�
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चित्ररेखा :��जायसी ने पद्मावत की ही भांति "चित्ररेखा' की शुरुआत भी संसार के सृजनकर्ता की वंदना के साथ किया है। इसमें जायसी ने सृष्टि की उद्भाव की कहानी कहते हुए करतार की प्रशंसा में बहुत कुछ लिखा है। इसके अलावा इसमें उन्होंने पैगम्बर मुहम्मद साहब और उनके चार मित्रों का वर्णन सुंदरता के साथ किया है। इस प्रशंसा के बाद जायसी ने इस काव्य की असल कथा आरंभ किया है।��इसकी कथा चंद्रपुर नामक एक अत्यंत सुंदर नगर के राजा, जिनका नाम चंद्रभानु था, की कथा प्रारंभ किया है। इसमें राजा चंद्र भानु की चाँद के समान अवतरित हुई पुत्री चित्ररेखा की सुंदरता एवं उसकी शादी को बयान किया है
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कहरानामा :-��कहरानामा का रचना काल ९४७ हिजरी बताया गया है। यह काव्य ग्रंथ कहरवा या कहार गीत उत्तर प्रदेश की एक लोक- गीत पर आधारित में कवि ने कहरानाम के द्वारा संसार से डोली जाने की बात की है।
या भिनुसारा चलै कहारा होतहि पाछिल पहारे।�सबद सुनावा सखियन्ह माना, हंस के बोला मारा रे।।
जायसी ने हिंदी में कहारा लोक धुनि के आधार पर इस ग्रंथ की रचना करके स्वयं को गाँव के लोक जीवन एवं सामाजिक सौहार्द बनाने का प्रयत्न किया है। कहरानामा में कहरा का अर्थ कहर, कष्ट, दुख या कहा और गीत विशेष है। हमारे देश भारत ब्रह्मा का गुणगान करना, आत्मा और परमात्मा के प्रेम परक गीत गाना की अत्यंत प्राचीन लोक परंपरा है।
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मसला :''��यह जायसी एक काव्य रचना है। इसके आरंभ में जायसी ने अल्लाह से मन लगाने की बात कही है --
यह तन अल्लाह मियां सो लाई।�जिहि की षाई तिहि की गाई।।�बुधि विद्या के कटक मो हों मन का विस्तार।�जेहि घर सासु तरुणि हे, बहुअन कौन सिंगार।।��जायसी कहते हैं, अगर जीवन को निष्प्रेम भाव से जीवन- निर्वाह किया जाए, तो वह व्यर्थ है, जिस हृदय में प्रेम नहीं, वहाँ ईश्वर का वास नहीं हो सकता है। भला सुने गांव में कोई आता है--��बिना प्रेम जो जीवन निबाहा।�सुने गाऊँ में आवै काहा।।
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मलिक मोहम्मद जायसी की काव्यगत विशेषताएं ये रहीं: �
जायसी की कविताओं में रस होता है और उनका भावपक्ष और कला पक्ष प्रभावशाली होता है.
जायसी की कविताओं का मुख्य विषय प्रेम रहा है.
जायसी ने प्रेम के माध्यम से आध्यात्मिक रहस्यों को भी उजागर किया है.
जायसी ने समाज की विषयवस्तु का भरपूर चित्रण किया है.
जायसी ने सामंती जीवन और निम्न जातियों की अभिव्यक्ति की है.
जायसी ने मुस्लिम धर्म दर्शन से लोगों को अवगत कराया है.
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जायसी ने भारतीयों को वृद्धमल संस्कृति की मनोहारी व्याख्या की है.
जायसी ने अपने काव्य वर्णनों में सहज-संशिलष्ट और आलंकारिक शैलियों का प्रयोग किया है.
जायसी ने ज्योतिष, कामशास्त्र, पुराण, दर्शन, कला, राजनीति आदि ज्ञान भी दिया है.
जायसी पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग करते हैं.
जायसी ने लोकोक्तियों और मुहावरों का प्रयोग किया है.
जायसी के वियोग वर्णन की विशेषता है कि उनकी अतिशयोक्ति से बात का जादू नहीं लगता.