रश्मिरथी का कर्ण
“जिसके पिता सूर्य थे ,माता कुंती सती कुमारी
उसका पालना हुआ धार पर बहती हुई पिटारी”
“सूत वंश में पला,चखा भी नहीं जननी का क्षीर
निकला कर्ण सभी युवको में तबभी अद्धभूत वीर”
“तन से समरशूर, मन से अभिमानी, स्वभाव से दानी
जाति-गोत्र का नहीं ,शील का , पौरुष का अभिमानी”
“तूने जो – जो किया , उसे मै भी दिखला सकता हूँ
चाहें तो कुछ नयी कलाएं भी सीखा सकता हूँ”
“अंगदेश का मुकुट कर्ण के मस्तक पीआर धरता हूँ
एक राज्य इस महावीर के हित अर्पित करता हूँ”
“कर्ण और गल गया,हाय मुझ पर भी इतना स्नेह
वीर बंधु ! हम हुए आज से एक प्राण ,दो देह”
“गो ,धरती , गज, वाजि, अन्न ,धन वसन जहां
दानवीर ने हृदय खोलकर उसको वही लुटाया”
“मंत्रमुग्ध सा मौन चतुर्विक जन का पारवार
गूंज रही थी मात्र कर्ण के धन्वा की टंकार”
“ज्ञान ध्यान शास्त्रसन का शास्त्र का सम्यक अभ्यास
अपने गुण का किया कर्ण ने स्वयं सुविकास”
“चढ़े नहीं चीटियां बदन पर , पड़े न तृण पात कही
कर्ण सजग है उजट जाए न गुरुवर की नींद कही”
“कर्ण भले ही सूत्रोपुत्र हो, अथवा श्वपच, चमार,�मलिन, मगर, इसके आगे हैं सारे राजकुमार।
“तूने जनकर भी नहीं पुत्र कर जाना
उसने पाकर भी मौजे तनय निज माना
अब तुम्ही कहो कैसे निज आत्मा को मारू
माता कह उसके बदले तुझे”
“सुतपुत्र में शूद्र कर्ण हूँ करुणा का अभिलाषी हूँ
जो भी हूँ पर देव आपका अनुचर अंतेवासी हूँ”
अतः आपने जो माँगा है दान वही मैं दूँगा,�शिवि-दधिचि की पंक्ति छोड़कर जग में अयश न लूँगा.�पर कहता हूँ, मुझे बना निस्त्राण छोड़ते हैं क्यों?�कवच और कुंडल ले करके प्राण छोड़ते हैं क्यों?
कहा कर्ण ने, 'वृथा भाग्य से आप डरे जाते हैं,�जो है सम्मुख खड़ा, उसे पहचान नहीं पाते हैं.�विधि ने क्या था लिखा भाग्य में, खूब जानता हूँ मैं,�बाहों को, पर, कहीं भाग्य से बली मानता हूँ मैं.
वचन माँग कर नहीं माँगना दान बड़ा अद्भुत है,�कौन वस्तु है, जिसे न दे सकता राधा का सुत है?�विप्रदेव! मॅंगाइयै छोड़ संकोच वस्तु मनचाही,�मरूं अयश कि मृत्यु, करूँ यदि एक बार भी 'नाहीं'
“क्षत्रिय है, यह राजपुत्र है, यों ही नहीं लड़ेगा,�जिस-तिस से हाथापाई में कैसे कूद पड़ेगा?�अर्जुन से लड़ना हो तो मत गहो सभा में मौन,�नाम-धाम कुछ कहो, बताओ कि तुम जाति हो कौन?'�
“भरी सभा के बीच आज तूने जो मान दिया है,�पहले-पहल मुझे जीवन में जो उत्थान दिया है।�उऋण भला होऊँगा उससे चुका कौन-सा दाम?�कृपा करें दिनमान कि आऊँ तेरे कोई काम।'
“कर्ण मुग्ध हो भक्ति-भाव में मग्न हुआ-सा जाता है,�कभी जटा पर हाथ फेरता, पीठ कभी सहलाता है,
“पर मेरा क्या दोष? हाय! मैं और दूसरा क्या करता,�पी सारा अपमान, द्रोण के मैं कैसे पैरों पड़ता।�और पाँव पड़ने से भी क्या गूढ़ ज्ञान सिखलाते वे,�एकलव्य-सा नहीं अँगूठा क्या मेरा कटवाते वे?
“हाय, कर्ण, तू क्यों जन्मा था? जन्मा तो क्यों वीर हुआ?�कवच और कुण्डल-भूषित भी तेरा अधम शरीर हुआ?�धँस जाये वह देश अतल में, गुण की जहाँ नहीं पहचान?�जाति-गोत्र के बल से ही आदर पाते हैं जहाँ सुजान?�
“अब समझा, किसलिए रात-दिन तू वैसा श्रम करता था,�मेरे शब्द-शब्द को मन में क्यों सीपी-सा धरता था।�देखें अगणित शिष्य, द्रोण को भी करतब कुछ सिखलाया,�पर तुझ-सा जिज्ञासु आज तक कभी नहीं मैंने पाया।
“तुम तो स्वयं दीप्त पौरुष हो, कवच और कुण्डल-धारी,�इनके रहते तुम्हें जीत पायेगा कौन सुभट भारी।�अच्छा लो वर भी कि विश्व में तुम महान् कहलाओगे,�भारत का इतिहास कीर्ति से और धवल कर जाओगे।
हाँ, एक विनय है मधुसूदन,�मेरी यह जन्मकथा गोपन,�मत कभी युधिष्ठिर से कहिए,�जैसे हो इसे छिपा रहिए,�वे इसे जान यदि पाएँगे,��सिंहासन को ठुकराएँगे.�"साम्राज्य न कभी स्वयं लेंगे,�सारी संपत्ति मुझे देंगे.�मैं भी ना उसे रख पाऊँगा,��दुर्योधन को दे जाऊँगा.�पांडव वंचित रह जाएँगे,�दुख से न छूट वे पाएँगे.
दान जगत का प्रकृत धर्म है, मनुज व्यर्थ डरता है,�एक रोज तो हमें स्वयं सब-कुछ देना पड़ता है।�बचते वही, समय पर जो सर्वस्व दान करते हैं,�ऋतु का ज्ञान नही जिनको, वे देकर भी मरते हैं।
“वंदनीय तू कर्ण, देखकर तेज तिग्म अति तेरा,�काँप उठा था आते ही देवत्वपूर्ण मन मेरा.�किन्तु, अभी तो तुझे देख मन और डरा जाता है,�हृदय सिमटता हुआ आप-ही-आप मरा जाता है.
“दानवीर! जय हो, महिमा का गान सभी जन गाये,�देव और नर, दोनों ही, तेरा चरित्र अपनाये.'
“डूबते सूर्य को नमन निवेदित करके,�कुन्ती के पद की धूल शीश पर धरके।�राधेय बोलने लगा बड़े ही दुख से,�तुम मुझे पुत्र कहने आयीं किस मुख से ?�
धन्यवाद
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