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कक्षा 11�विषय - हिन्दी �आरोह भाग 1�अध्याय - कबीर

मुकेश कुमार

परास्नातक शिक्षक (हिन्दी)

जनवि - अजमेर

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प्रसंग-प्रस्तुत पद पाठ्यपुस्तक आरोह

भाग-1 में निर्गुण परंपरा के सर्वश्रेष्ठ

कवि कबीर के पदों से उद्धृत है।

इस पद में, कबीर ने एक ही परम

तत्व की सत्ता को स्वीकार किया है,

जिसकी पुष्टि वे कई उदाहरणों से

करते हैं।

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शब्दार्थ

एक-परमात्मा, एक

दोई-दो

तिनहीं-उनको

दोजग-नरक

नाहिंन-नहीं

एकै-एक

पवन-हवा

जोति-प्रकाश

समाना-व्याप्त

खाक-मिट्टी

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गढ़े-रचे हुए

भांड़े-बर्तन।

कोहरा-कुम्हार

सांनां-एक साथ मिलकर

बाढ़ी-बढ़ई

काष्ट-लकड़ी

अगिनि-आग

घटि-घड़ा, हृदय

अंतरि-भीतर, अंदर

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व्यापक-विस्तृत

धरे-रखे

सरूपै-स्वरूप

सोई-वही

जगत-संसार

लुभाना-मोहित होना

नर-मनुष्य

गरबानां-गर्व करना

निरभै-निडरा

भया-हुआ

दिवानां-बैरागी।

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विशेष-

  1. कबीर ने आत्मा और परमात्मा को

एक बताया है।

2. उन्होंने माया-मोह व गर्व की व्यर्थता

पर प्रकाश डाला है।

3. एक-एक में यमक अलंकार है।

4. खाक और कोहरा में रूपकातिशयोक्ति

अलंकार है।

  1. अनुप्रास अलंकार की छटा दर्शनीय है।
  2. सधुक्कड़ी भाषा है।
  3. उदाहरण अलंकार है।
  4. पद में गेयता व संगीतात्मकता है।

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भाव सौंदर्य

  • इस पद में कवि ने ईश्वर की एक सत्ता को

माना है।

  • संसार के हर प्राणी के दिल में ईश्वर है, उसका

रूप चाहे कोई भी हो।

  • कवि माया-मोह को निरर्थक बताता है।
  • इस पद में कबीर की अक्खड़ता व निभीकता का

पता चलता है।��

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शिल्प सौंदर्य

 आम बोलचाल की सधुक्कड़ी भाषा है।� ‘जैसे बाढ़ी काटै। कोई में उदाहरण अलंकार है।

बढ़ई, लकड़ी व आग का उदाहरण प्रभावी है।� ‘एक एक में यमक अलंकार है-एक-परमात्मा,

एक-एक।� अनुप्रास अलंकार की छटा है-काटै। कोई, सरूप

सोई, कहै कबीर।� ‘खाककोहरा में रूपकातिशयोक्ति अलंकार

है।�  पूरे पद में गेयता व संगीतात्मकता है।

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पुनरावृत्ति प्रश्न

  1. कबीरदास परमात्मा के विषय में क्या कहते हैं?
  2. भ्रमित लोगों पर कवि की क्या टिप्पणी है?
  3. संसार नश्वर है, परंतु आत्मा अमर है-स्पष्ट कीजिए।
  4. कबीर ने किन उदाहरणों दवारा सिदध किया है

कि जग में एक सत्ता है?

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उत्तर-

1. कबीरदास कहते हैं कि परमात्मा एक है। वह हर प्राणी के हृदय में समाया हुआ है

भले ही उसने कोई भी स्वरूप धारण किया हो।

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उत्तर 2. जो लोग आत्मा व परमात्मा को अलग-अलग मानते हैं, वे भ्रमित हैं। वे ईश्वर को पहचान नहीं पाए। उन्हें नरक की प्राप्ति होती है।

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उत्तर 3. कबीर का कहना है कि जिस प्रकार लकड़ी को काटा जा सकता है, परंतु उसके

अंदर की अग्नि को नहीं काटा जा सकता,

उसी प्रकार शरीर नष्ट हो जाता है, परंतु

आत्मा अमर है। उसे समाप्त नहीं किया

जा सकता।

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उत्तर 4. कबीर ने जग की सत्ता एक होने यानी ईश्वर एक है के समर्थन में कई उदाहरण दिए हैं। वे कहते हैं कि संसार में एक जैसी पवन, एक जैसा पानी बहता है। हर प्राणी में एक ही ज्योति समाई हुई है। सभी बर्तन एक ही मिट्टी से बनाए जाते हैं, भले ही उनका स्वरूप अलग-अलग होता है।

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प्रसंग-प्रस्तुत पद पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-1 में संकलित निर्गुण परंपरा के सर्वश्रेष्ठ कवि कबीर के पदों से उद्धृत है। इस पद में उन्होंने धर्म के नाम पर हो रहे बाहय आडंबरों पर तीखा प्रहार किया है।

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शब्दार्थ

जग-संसार

बौराना-पागल होना

साँच-सच

मारन-मारने

धावै-दौड़े

पतियाना-विश्वास करना

नेमी-नियमों का पालन करने वाला

धरमी-धर्म का पालन करने वाला

प्रात-सुबह

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असनाना-स्नान करना

आतम-स्वयं

पखानहि-पत्थरों को, पत्थरों की मूर्तियों को

पीर औलिया-धर्म गुरु, मोलवी और संत ज्ञानी

कितेब-ग्रंथ

मुरीद-शिष्य

तदबीर-उपाय

डिंभ धरि-घमंड करके

गुमाना-घमंड

पाथर-पत्थर।

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पहिरे-पहने

छाप तिलक अनुमाना-माथे पर तिलक व छापा लगाना

साखी-दोहा, साक्षी

सब्दहि-वह मंत्र जो गुरु शिष्य को दीक्षा के अवसर पर

देता है, पद

गावत-गाते

आतम खबरि-आत्मा का ज्ञान, आतम ज्ञान

मोहि-मुझे

तुर्क-मुसलमान

दोउ-दोनों

लरि-लड़ना

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मुए-मरना

मर्म-रहस्य

काहू-किसी ने

मन्तर-गुप्त वाक्य बताना

महिमा-उच्चता

सिख्य-शिप्य

बूड़े-डूबे

अंतकाल-अंतिम समय

भर्म-संदेह

केतिक कहीं-कहाँ तक कहूँ

सहजै-सहज रूप से

समाना-लीन होना

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विशेष-

1. कवि ने धार्मिक आडंबरों पर करारी

चोट की है।2. उन्होंने पाखंडी धर्मगुरुओं को लताड़

लगाई है।3. सधुक्कड़ी भाषा है।4. अनुप्रास अलंकार की छटा दर्शनीय है।5. चित्रात्मकता है।7. कबीर का अक्खड़पन स्पष्ट है।8. पद में गेयता व संगीतात्मकता है

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भाव सौंदर्य

  •  इस पद में कवि ने संसार की गलत प्रवृत्ति

पर व्यंग्य किया है।

  • लोग सांसारिक जीवन को सच मानते हैं।
  • समाज में हिंदू-मुसलमान धर्म के नाम लड़ते

हैं। वे तरह-तरह के आडंबर रचाकर स्वयं को

श्रेष्ठ जताने की कोशिश करते हैं।

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  • कवि संसार को इन आडंबरों की निरर्थकता के

बारे में बार-बार बताता है, परंतु उन पर

कोई प्रभाव नहीं होता।

  • कबीर सहज भक्ति मार्ग को सही मानते हैं।
  • कवि ने आत्मबल पर बल दिया है तथा बाहय

आडंबरों को निरर्थक बताया है।

  • शांत रस है।
  • प्रसाद गुण विद्यमान है।

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शिल्प सौन्दर्य

  • अनुप्रास अलंकार की छटा है-

पीपर पाथर पूजन� कितेब कुराना� भर्म भुलाना� सहजै सहज समाना� सहित शिष्य सब� साखी सब्दहि� केतिक कहौं कहा

● ‘घर-घर’, ‘लरि-लरिमें पुनरुक्तिप्रकाश

अलंकार है।

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● आम बोलचाल की सधुक्कड़ी भाषा है।�● भाषा में व्यंग्यात्मकता है।�● पूरे पद में गेयता व संगीतात्मकता है।�● चित्रात्मकता है।�

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पुनरावृत्ति प्रश्न

1. कबीर किसे संबोधित करते हैं तथा क्यों?

2. कबीर संसार को पागल क्यों कहते है?

3. कबीर ने हिंदुओं के किन आडंबरों पर चोट

की है तथा मुसलमानों के किन पाखंडों पर

व्यंग्य किया है?

4. अज्ञानी गुरुओं व शिष्यों की क्या गति होगी?

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उत्तर

1. कबीर दास जी संसार के विवेकी व

सज्जन लोगों को संबोधित कर रहे हैं,

क्योंकि वे संतों को धार्मिक पाखंडों के

बारे में बताकर भक्ति के सहज मार्ग

को बताना चाहते हैं।

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2. कवि संसार को पागल कहता है।

इसका कारण है कि संसार सच्ची बात

कहने वाले को मारने के लिए दौड़ता है

तथा झूठी बात कहने वाले पर विश्वास

कर लेता है।�

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3.  कबीर ने हिंदुओं के नित्य स्नान, धार्मिक

अनुष्ठान, पीपल-पत्थर की पूजा, तिलक,

छापे, तीर्थयात्रा आदि आडंबरों पर चोट की

है। इसी तरह उन्होंने मुसलमानों के

ईश्वर-प्राप्ति के उपाय, टोपी पहनना, पीर

की पूजा, शब्द गाना आदि पाखंडों पर

व्यंग्य किया है।�

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4. अज्ञानी गुरुओं व उनके शिष्यों को अंतकाल

में पछताना पड़ता है, क्योंकि ज्ञान के अभाव

में वे गलत मार्ग पर चलते हैं तथा अपना

विनाश कर लेते हैं।

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गृहकार्य

सभी विद्यार्थी अपनी लेखन पुस्तिका मे दोनों पदों का अर्थ एवं पाठ्य पुस्तक के प्रश्नोत्तर लिख कर लाएँगे ।

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धन्यवाद