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छंद

पवन कुमारी

असिस्टेंट प्रोफेसर हिन्दी

हंसराज महिला महाविद्यालया

जालंधर

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  • संस्कृत वाङ्मय में सामान्यतः लय को बताने के लिये छन्द शब्द का प्रयोग किया गया है। विशिष्ट अर्थों या गीत में वर्णों की संख्या और स्थान से सम्बंधित नियमों को छ्न्द कहते हैं

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छंद के प्रकार�

मात्रिक छंद ː जिन छंदों में मात्राओं की संख्या निश्चित होती है उन्हें मात्रिक छंद कहा जाता है। जैसे - अहीर, तोमर, मानव; अरिल्ल, पद्धरि/ पद्धटिका, चौपाई; पीयूषवर्ष, सुमेरु, राधिका, रोला, दिक्पाल, रूपमाला, गीतिका, सरसी, सार, हरिगीतिका, तांटक, वीर या आल्हा

वर्णिक छंद ː वर्णों की गणना पर आधारित छंद वर्णिक छंद कहलाते हैं। जैसे - प्रमाणिका; स्वागता, भुजंगी, शालिनी, इन्द्रवज्रा, दोधक; वंशस्थ, भुजंगप्रयाग, द्रुतविलम्बित, तोटक; वसंततिलका; मालिनी; पंचचामर, चंचला; मन्दाक्रान्ता, शिखरिणी, शार्दूल विक्रीडित, स्त्रग्धरा, सवैया, घनाक्षरी, रूपघनाक्षरी, देवघनाक्षरी, कवित्त / मनहरण। इसके दो प्रकार हैं-

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  • १. साधारण२. दण्डक1. साधारण वर्णिक छंद में प्रत्येक चरण में २६ वर्ण तक होते हैं। जैसे - सवैया छंद2. जिस छंद रचना में प्रत्येक चरण में २६ से अधिक वर्ण होते हैं , उसे दण्डक वर्णिक छंद कहा जाता है । जैसे- घनाक्षरी छंद।
  • वर्णवृत ː सम छंद को वृत कहते हैं। इसमें चारों चरण समान होते हैं और प्रत्येक चरण में आने वाले लघु गुरुमात्राओं का क्रम निश्चित रहता है। जैसे - द्रुतविलंबित, मालिनी

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  • मुक्त छंदː भक्तिकाल तक मुक्त छंद का अस्तित्व नहीं था, यह आधुनिक युग की देन है। इसके प्रणेता सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' माने जाते हैं। मुक्त छंद नियमबद्ध नहीं होते, केवल स्वछंद गति और भावपूर्ण यति ही मुक्त छंद की विशेषता हैं।

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दोहा छंद

  • दोहा मात्रिक छंद है। इसे अर्द्ध सम मात्रिक छंंद कहते हैं । दोहे में चार चरण होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम तथा तृतीय) चरण में 13-13 मात्राएँ और सम चरणों (द्वितीय तथा चतुर्थ) चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं। सम चरणों के अंत में एक गुरु और एक लघु मात्रा का होना आवश्यक होता है। दोहे के मुख्य 23 प्रकार हैं:- 1.भ्रमर, 2.सुभ्रमर, 3.शरभ, 4.श्येन, 5.मण्डूक, 6.मर्कट, 7.करभ, 8.नर, 9.हंस, 10.गयंद, 11.पयोधर, 12.बल, 13.पान, 14.त्रिकल 15.कच्छप, 16.मच्छ, 17.शार्दूल, 18.अहिवर, 19.व्याल, 20.विडाल, 21.उदर, 22.श्वान, 23.सर्प। दोहे में विषम एवं सम चरणों के कलों का क्रम निम्नवत होता है
  • विषम चरणों के कलों का क्रम 4+4+3+2 (चौकल+चौकल+त्रिकल+द्विकल) 3+3+2+3+2 (त्रिकल+त्रिकल+द्विकल+त्रिकल+द्विकल)
  • सम चरणों के कलों का क्रम 4+4+3 (चौकल+चौकल+त्रिकल) 3+3+2+3 (त्रिकल+त्रिकल+द्विकल+त्रिकल) उदाहरण -
  • रात-दिवस, पूनम-अमा, सुख-दुःख, छाया-धूप।यह जीवन बहुरूपिया, बदले कितने रूप॥

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सोरठा छंद �

  • सोरठा अर्द्धसम मात्रिक छंद है और यह दोहा का ठीक उलटा होता है। इसके विषम चरणों चरण में 11-11 मात्राएँ और सम चरणों (द्वितीय तथा चतुर्थ) चरण में 13-13 मात्राएँ होती हैं। विषम चरणों के अंत में एक गुरु और एक लघु मात्रा का होना आवश्यक होता है। उदाहरण -
  • जो सुमिरत सिधि होय, गननायक करिबर बदन।करहु अनुग्रह सोय, बुद्धि रासि सुभ गुन सदन॥

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चौपाई छंद �

  • चौपाई\ मात्रिक सम छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राएँ होती हैं

  •  विलोकित, पद्धरि, अरिल्ल, अड़िल्ल, पादाकुलक आदि छंद चौपाई के समान लक्षण वाले छंद हैं।उदाहरण -

बंदउँ गुरु पद पदुम परागा।

सुरुचि सुबास सरस अनुराग॥

अमिय मूरिमय चूरन चारू।

समन सकल भव रुज परिवारू॥

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गीतिका (छंद) मात्रिक सम छंद है जिसमें ​२६ मात्राएँ होती हैं​​​​।​ १४​ और ​१२ पर यति तथा अंत में लघु -गुरु ​आवश्यक है। ​इस छंद की तीसरी, दसवीं, सत्रहवीं और चौबीसवीं अथवा दोनों चरणों के तीसरी-दसवीं मात्राएँ लघु हों तथा अंत में रगण हो तो छंद निर्दोष व मधुर होता है। उदाहरण-

खोजते हैं साँवरे को,हर गली हर गाँव में।

आ मिलो अब श्याम प्यारे,आमली की छाँव में।।आपकी मन मोहनी छवि,बाँसुरी की तान जो।गोप ग्वालों के शरीरोंं,में बसी ज्यों जान वो।।

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सवैया छंद �

  • सवैया चार चरणों का समपद वर्णछंद है। वर्णिक वृत्तों में 22 से 26 अक्षर के चरण वाले जाति छन्दों को सामूहिक रूप से हिन्दी में सवैया कहा जाता है।। उदाहरण-

मानुस हौं तो वही रसखान,

बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।

जो पसु हौं तो कहा बस मेरो,

चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥

पाहन हौं तो वही गिरि को,

जो धर्यो कर छत्र पुरंदर कारन।

जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदी कूल कदम्ब की डारन॥

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  • कवित्त एक वार्णिक छन्द है। इसमें चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में १६, १५ के विराम से ३१ वर्ण होते हैं। प्रत्येक चरण के अन्त में गुरू वर्ण होना चाहिये। उदाहरण-

नाव अरि लाब नहि,उतरक दाब नहि,

एक बुद्धि आब नहि,सागर अपार में।

वीर अरि छोट नहि, संग एक गोट नहि,

लंका लघु कोट नहि, विदित संसार में।।

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  • इसे वंशस्थविल अथवा वंशस्तनित भी कहते हैं । इसके चार चरण होते हैं। प्रत्येक चरण में १२ वर्ण होते हैं और गणों का क्रम होता है – जगण, तगण, जगण, रगण। प्रत्येक चरण में पाँचवे और बारहवे वर्ण के बाद यति होती है। जैसे -

गिरिन्द्र में व्याप्त विलोकनीय थी

वनस्थली मध्य प्रशंसनीय थी

अपूर्व शोभा अवलोकनीय थी

असेत जम्बालिनी कूल जम्बुकीय।।

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  • वसन्ततिलका छन्द सम वर्ण वृत्त छन्द है। यह चौदह वर्णों वाला छन्द है। 'तगण', 'भगण', 'जगण', 'जगण' और दो गुरुओं के क्रम से इसका प्रत्येक चरण बनता है।उदाहरण-

हे हेमकार पर दुःख-विचार-मूढकिं माँ मुहुः क्षिपसि वार-शतानि वह्नौ।

सन्दीप्यते मयि तु सुप्रगुणातिरेकोलाभः परं तव मुखे खलु भस्मपातः॥

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  • इन्द्रवज्रा छन्द एक सम वर्ण वृत्त छन्द है। इसके प्रत्येक चरण में 11-11 वर्ण होते हैं। इन्द्रवज्रा के प्रत्येक चरण में दो तगण, एक जगण और दो गुरु के क्रम से वर्ण रखे जाते हैं।उदाहरण-

विद्येव पुंसो महिमेव राज्ञःप्रज्ञेव वैद्यस्य दयेव साधोः।

लज्जेव शूरस्य मुजेव यूनो,सम्भूषणं तस्य नृपस्य सैव॥

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मालिनी छन्द�

मालिनी एक सम वर्ण वृत छन्द है। इसके प्रत्येक चरण में "न न म य य" अर्थात दो 'नगण' एक 'मगण' और दो 'यगण' के क्रम से 15 वर्ण होते हैं। आठवें और सातवें वर्णों पर यति होती है। उदाहरण-

प्रिय पति वह मेरा, प्राण प्यारा कहाँ है।

दुख-जलधि निमग्ना, का सहारा कहाँ है।

अब तक जिसको मैं, देख के जी सकी हूँ।

वह हृदय हमारा, नेत्र तारा कहाँ है।

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����धन्यवाद