श्रीः �केन्बरासंस्कृतवर्गः�०८.०९.२०२१
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अजरामरवत्प्राज्ञो विद्यामर्थं च चिन्तयेत्।�गृहीत इव केशेषु मृत्युना धर्ममाचरेत्॥
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते।
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः॥गीता १२.२०॥
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥गीता १७.२८॥
॥श्रीरामोदन्तम् – सुन्दरकाण्डः ६॥
रावणस्तु तदाऽभ्येत्य मैथिलीं मदनार्दितः।
भार्या भव ममेत्येवं बहुधा समयाचत॥५.६॥
अभि आ + इण् गतौ + ल्यप् = अभ्येत्य
ह्रस्वस्य पिति कृति तुक् (६.१.७१)
मदीँ हर्षे ग्लेपने च + ल्युट् + सुँ = मदनम्।
अर्दँ हिंसायाम् + क्तः = अर्दितः
टुयाचृँ याच्ञायाम् लङ् प्र॰ एक॰ आत्मने॰ – अयाचत।
॥श्रीरामोदन्तम् – सुन्दरकाण्डः ७॥
अहं त्वदनुगा न स्याम् इत्येषा तं निराकरोत्।
काममन्युपरीतात्मा रावणोऽथ गृहं ययौ॥५.७॥
अनुगः पश्चाद्गामी अनुचरः अनुसरः अन्वक् अन्वक्षः अनुपदः सेवकः दासः।
असँ भुवि – लिङ् स्याम् स्याव स्याम।
काममन्युपरीतात्मा – कामं मन्युं क्रोधं अहङ्कारं परि इतः (इण् गतौ + क्तः) यस्य आत्मा सः।
॥श्रीरामोदन्तम् – सुन्दरकाण्डः ८॥
गते तु रावणे सीतां प्रलपन्तीं स मारुतिः।
उक्त्वा रामस्य वृत्तान्तं प्रददौ चाङ्गुलीयकम्॥५.८॥
यस्य च भावेन भावलक्षणम् (२.३.३७) – सप्तमी इति वर्तते। भावः क्रिया। यस्य च भावेन यस्य च क्रियया क्रियान्तरं लक्ष्यते, ततो भाववतः सप्तमी विभक्तिर्भवति। प्रसिद्धा च क्रिया क्रियान्तरं लक्षयति। गोषु दुह्यमानासु गतः, दुग्धास्वागतः। अग्निषु हूयमानेषु गतः, हुतेष्वागतः। भावेन इति किम्? यो जटाभिः स भुङ्क्ते। पुनर्भावग्रहणं किम्? यो भुङ्क्ते स देवदत्तः।
॥श्रीरामोदन्तम् – सुन्दरकाण्डः ९॥
तत् समादाय वैदेही विलप्य च भृशं पुनः।
चूडामणिं ददौ तस्य करे सा मारुतेः प्रियम्॥५.९॥
चूडामणिः शिरोऽलङ्कारभूतः आभरणविशेषः।
वि लपँ व्यक्तायां वाचि + ल्यप् = विलप्य।
डुदाञ् दाने कर्तरि लिट्लकारः (परस्मैपदम्)�ददौ ददतुः ददुः ददिथ/ददाथ ददथुः दद ददौ ददिव ददिम।
गृहकार्यम् – ०१.०९.२०२१
https://chitrapurmath.net/site/activities-girvanaprathistha-cards - अस्मात् जालपत्रात् पुष्पनामानि स्मरतु।
जालपत्राणि अदृष्टम् अनुवादं करोतु। शब्दकोषे शब्दार्थाः विचेतुं शक्यन्ते।
रात्रौ दीपशिखा भाति दिवा सूर्यकरस्तथा।
काये च कनकं भाति करुणा चित्तवृत्तिषु॥
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नामप्रकरणम् - ३
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नामप्रकरणम् - ४
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सार्वधातुकम् - आर्द्धधातुकम्
तिङः – तिप्तस्झिसिप्थस्थमिब्वस्मस् तातांझथासाथांध्वमिड्वहिमहिङ् (३.४.७८)
तिप् तस् झि सिप् थस् थ मिप् वस् मस् त आताम् झ थास् आथाम् ध्वम् इट् वहि महिङ्
शित् – शप्, श्यन्, शतृ, शानच् इत्यादयः।
णिच्, उ, क्त, क्तवतु, इत्यादयः।
लिट्-लकारस्य तिङ्-प्रत्ययाः साक्षात् आर्द्धधातुकाः।
आहीर्लिङ्-लकारस्य तिङ्-प्रत्ययाः साक्षात् आर्द्धधातुकाः।
Sowmya Krishnapur for Vyoma-samskrta-pathashala, ©2014
इडागमः
Sowmya Krishnapur for Vyoma-samskrta-pathashala, ©2014
अङ्गकार्यम् - गुणः
Sowmya Krishnapur for Vyoma-samskrta-pathashala, ©2014
अङ्गकार्यम् - गुणः
Sowmya Krishnapur for Vyoma-samskrta-pathashala, ©2014
गुणवृद्ध्योः निषेधः
Sowmya Krishnapur for Vyoma-samskrta-pathashala, ©2014
डुकृञ् करणे तनादिः उभयपदी सकर्मकः अनिट् (to do)
| एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | उ तिप् | उ तस् | उ झि |
म॰ | उ सिप् | उ थस् | उ थ |
उ॰ | उ मिप् | उ वस् | उ मस् |
लृट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | करिष्यति | करिष्यतः | करिष्यन्ति |
म॰ | करिष्यसि | करिष्यथः | करिष्यथ |
उ॰ | करिष्यामि | करिष्यावः | करिष्यामः |
लोट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | करोतु | कुरुताम् | कुर्वन्तु |
म॰ | कुरु | कुरुतम् | कुरुत |
उ॰ | कर्वाणि | करवाव | करवाम |
लङ् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | अकरोत् | अकुरुताम् | अकुर्वन् |
म॰ | अकरोः | अकुरुतम् | अकुरुत |
उ॰ | अकरवम् | अकुर्व | अकुर्म |
लिङ् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | कुर्यात् | कुर्याताम् | कुर्युः |
म॰ | कुर्याः | कुर्यातम् | कुर्यात |
उ॰ | कुर्याम् | कुर्याव | कुर्याम |
लट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | करोति | कुरुतः | कुर्वन्ति |
म॰ | करोषि | कुरुथः | कुरुथ |
उ॰ | करोमि | कुर्वः | कुर्मः |
डुलभँष् प्राप्तौ भ्वादिः आत्मनेपदी सकर्मकः अनिट् (to get)
| एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | शप् त | शप् आताम् | शप् झ |
म॰ | शप् थास् | शप् आथाम् | शप् ध्वम् |
उ॰ | शप् इट् | शप् वहि | शप् महिङ् |
लृट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | लप्स्यते | लप्स्येते | लप्स्यन्ते |
म॰ | लप्स्यसे | लप्स्येथे | लप्स्यध्वे |
उ॰ | लप्स्ये | लप्स्यावहे | लप्स्यामहे |
लोट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | लभताम् | लभेताम् | लभन्ताम् |
म॰ | लभस्व | लभेथाम् | लभध्वम् |
उ॰ | लभै | लभावहै | लभामहै |
लङ् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | अलभत | अलभेताम् | अलभन्त |
म॰ | अलभथाः | अलभेथाम् | अलभध्वम् |
उ॰ | अलभे | अलभावहि | अलभामहि |
लिङ् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | लभेत | लभेयाताम् | लभेरन् |
म॰ | लभेथाः | लभेयाथाम् | लभेध्वम् |
उ॰ | लभेय | लभेवहि | लभेमहि |
लट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | लभते | लभेते | लभन्ते |
म॰ | लभसे | लभेथे | लभध्वे |
उ॰ | लभे | लभावहे | लभामहे |
शकॢँ शक्तौ स्वादिः परस्मैपदी अकर्मकः अनिट् (to be able)
| एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | श्नु तिप् | श्नु तस् | श्नु झि |
म॰ | श्नु सिप् | श्नु थस् | श्नु थ |
उ॰ | श्नु मिप् | श्नु वस् | श्नु मस् |
लृट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | शक्ष्यति | शक्ष्यतः | शक्ष्यन्ति |
म॰ | शक्ष्यसि | शक्ष्यथः | शक्ष्यथ |
उ॰ | शक्ष्यामि | शक्ष्यावः | शक्ष्यामः |
लोट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | शक्नोतु | शक्नुताम् | शक्नुवन्तु |
म॰ | शक्नुहि | शक्नुतम् | शक्नुत |
उ॰ | शक्नवानि | शक्नवाव | शक्नवाम |
लङ् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | अशक्नोत् | अशक्नुताम् | अशक्नुवन् |
म॰ | अशक्नोः | अशक्नुतम् | अशक्नुत |
उ॰ | अशक्नवम् | अशक्नुव | अशक्नुम |
लिङ् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | शक्यात् | शक्यास्ताम् | शक्यासुः |
म॰ | शक्याः | शक्यास्तम् | शक्यास्त |
उ॰ | शक्यासम् | शक्यास्व | शक्यास्म |
लट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | शक्नोति | शक्नुतः | शक्नुवन्ति |
म॰ | शक्नोषि | शक्नुथः | शक्नुथ |
उ॰ | शक्नोमि | शक्नुवः | शक्नुमः |
कृदन्तप्रत्ययाः – डुदाञ् दाने जुहोत्यादिः उभयपदी सकर्मकः अनिट्
१. ण्वुल् (वु → अक) – दायकः
२. तृच् (तृन्) (तृ) – दाता
३. शतृँ/शानच् (अत्/आन) – ददत् ददानः
४. स्य + शतृँ/शानच् (अत्/आन) – दास्यन्
५क. णिच् (इ) + शतृँ (अत्) – दापयन्
५ख. णिच् (इ) + शानच् (आन) – दापयमानः
६. यक् (य) + शानच् (आन) – दीयमानः
७. क्त (त) – दत्तः
८. क्तवतुँ (तवत्) – दत्तवान् दत्तवती
९. तव्यत् (तव्य) – दातव्यम्
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१०. अनीयर् (अनीय) – दानीयम्
११. ण्यत्/यत् (य) – देयम्
१२. घञ्/अच् (अ) – दायः
१३. क्तिन् (ति) – दत्ति
१४. सन् (स) + अ – दित्सा
१५. ल्युट् (यु → अन) (भावे) – दानम्
१६. तुमुँन् (तुम्) – दातुम्
१७. क्त्वा (त्वा) – दत्त्वा
१८. ल्यप् (य) – प्रदाय
१९. णमुँल् (अम्) – दायम् दायम्
नदी – ईकारान्त स्त्रीलिङ्गः (River)
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतम् च यत्। असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥गीता १७.२८॥
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
प्रथमा | नदी | नद्यौ | नद्यः |
द्वितीया | नदीम् | नद्यौ | नदीः |
तृतीया | नद्या | नदीभ्याम् | नदीभिः |
चतुर्थी | नद्यै | नदीभ्याम् | नदीभ्यः |
पञ्चमी | नद्याः | नदीभ्याम् | नदीभ्यः |
षष्ठी | नद्याः | नद्योः | नदीनाम् |
सप्तमी | नद्याम् | नद्योः | नदीषु |
सम्बोधनम् | हे नदि | हे नद्यौ | हे नद्यः |
मित्रलाभः – प्रथमा कथा – २०
अपरं च – शशिदिवाकरयोर्ग्रहपीडनं गजभुजङ्गमयोरपि बन्धनम्। मतिमतां च विलोक्य दरिद्रतां विधिरहो बलवान् इति मे मतिः॥५१॥
अन्यच्च – व्योमैकान्तविहारिणोऽपि विहगाः सम्प्राप्नुवन्त्यापदं
बध्यन्ते निपुणैरगाधसलिलान्मत्स्याः समुद्रादपि।
दुर्नीतं किमिहास्ति किं सुचरितं कः स्थानलाभे गुणः
कालो हि व्यसनप्रसारितकरो गृह्णाति दूरादपि॥५२॥
इति प्रबोध्य आतिथ्यं कृत्वा आलिङ्ग्य च तेन सम्प्रेषितश्चित्रग्रीवोऽपि सपरिवारो यथेष्टदेशान् ययौ, हिरण्यकोऽपि स्वविवरं प्रविष्टः।
यानि कानि च मित्राणि कर्तव्यानि शतानि च।
पश्य मूषिकमित्रेण कपोता मुक्तबन्धनाः॥५३॥
अथ लघुपतनकनामा काकः सर्ववृत्तान्तदर्शी साश्चर्यम् इदम् आह अहो हिरण्यक! श्लाघ्योऽसि, अतोऽहम् अपि त्वया सह मैत्रीं कर्तुमिच्छामि।
मित्रलाभः – प्रथमा कथा – २१
अतस्त्वं मां मैत्र्येणानुग्रहीतुम् अर्हसि । एतच्छ्रुत्वा हिरण्यकोऽपि विवराभ्यन्तराद् आह – कस्त्वम्। स ब्रूते – लघुपतनकनामा वायसोऽहम्। हिरण्यको विहस्याह का त्वया सह मैत्री।
यतः –
यद् येन युज्यते लोके बुधस्तत् तेन योजयेत्।
अहम् अन्नं भवान् भोक्ता कथं प्रीतिर्भविष्यति॥५४॥
अपरं च –
भक्ष्यभक्षकयोः प्रीतिर्विपत्तेः कारणं मतम्।
शृगालात् पाशबद्धोऽसौ मृगः काकेन रक्षितः॥५५॥
वायसोऽब्रवीत्कथम् एतत्। हिरण्यकः कथयति –
गृहकार्यम् – ०८.०९.२०२१
https://chitrapurmath.net/site/activities-girvanaprathistha-cards - अस्मात् जालपत्रात् पुष्पनामानि स्मरतु।
जालपत्राणि अदृष्टम् अनुवादं करोतु। शब्दकोषे शब्दार्थाः विचेतुं शक्यन्ते।
यावत्स्थास्यन्ति गिरयः सरितश्च महीतले।
तावद्रामायणी कथा लोकेषु प्रचरिष्यति॥
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