राजस्थान की रजत बूँदें
अनुपम मिश्र
राजस्थान भारत का एक बहुत बड़ा राज्य है। जिन जगहों पर ये बिन्दु केन्द्रित हैं। ये वे जगहें हैं जहाँ खड़िया पट्टी चलती है।
अनुपम मिश्र
अनुपम मिश्र
राजस्थान की रजत बूंदें अनुपम मिश्र जी के द्वारा लिखी गई है उन्होंने इस पाठ में राजस्थान में पानी के महत्त्व के बारे में बताया है कि कैसे राजस्थान में पानी को चाँदी के समान कीमती माना जाता है।
जन्म - 1948(63-64उम्र) मध्य प्रदेश, भारत
मृत्यु – 19 दिसंबर 2016 ( प्रोस्टेट कैंसर से )
व्यवसाय - पर्यावरणविद्
प्रसिद्धि - जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन
रचनाएँ – राजस्थान की रजत बूंदें। आज भी खरे हैं तालाब ,‘साफ माथे का समाज’ आदि
अनुपम मिश्र एक भारतीय गांधीवादी, पर्यावरणविद् के रूप में विख्यात हैं इन्होंने जल संरक्षण, जल प्रबन्धन और पारंपरिक स्रोतों को बढ़ावा देने व वर्षा जल संरक्षण की तकनीक पर विशेष रूप से काम किया है। मिश्र जी को 1996 ई. में इन्दिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार से सम्मानित किया गया था । उन्होने पुस्तकों में लिखा है, आज भी खरे हैं (झील अभी भी खड़े हैं, 1993) और राजस्थान की रजत (राजस्थान, 1995 के उज्ज्वल रेनड्रॉप्स) , जल संरक्षण के क्षेत्र में मील का पत्थर काम करता है। �
राजस्थान-एक दृष्टि �राजधानी – जयपुर �क्षेत्रफल -342,236 किमी² �भाषा - हिन्दी,राजस्थानी,गुजराती।
राजस्थान भारत गणराज्य का क्षेत्रफल के आधार पर सबसे बड़ा राज्य है। इसके पश्चिम में पाकिस्तान , दक्षिण-पश्चिम में गुजरात , दक्षिण-पूर्व में मध्य प्रदेश , उत्तर में पंजाब , उत्तर-पूर्व में उत्तर प्रदेश और हरियाणा है। राज्य का क्षेत्रफल 3,42,239 वर्ग कि.मी. (1,32,139 वर्ग मील) है।
पाठ का सार
‘राजस्थान की रजत बूंदे’, ‘अनुपम मिश्र’ द्वारा रचित निबंध है। इस निबंध में लेखक ने राजस्थान की मरुभूमि में अमृत प्रदान करने वाली कुईं के निर्माण का वर्णन किया है। चेलवांजी कुईं का निर्माण कर रहे हैं तीस – पैंतीस हाथ गहरी खोदने पर कुईं का घेरा संकरा हो जाता है जिससे अंदर गर्मी हो जाती है। आदमी को साँस लेने में परेशानी होती है। अंदर की गर्मी को कम करने के लिए ऊपर लोग बीच-बीच में नीचे मुट्ठी भर मिट्टी डालते हैं। जिससे ऊपर की ताजी हवा नीचे जाती है और अंदर की दम घोटने वाली गर्मी ऊपर लौटती है। चेलवांजी के सिर पर टोप पहना होता है जिससे ऊपर से गिरने वाली मिट्टी उसके सिर पर न लगे।
कुआँ और कुंई
कुआँ
कुंई
कुआँ
कुंई
कुंई की खुदाई कुल्हाड़े या फावड़े से नहीं होती उसकी तरह का एक औज़ार बसौली होता है उससे की जाती है।
चेलवांजी और चेज़ारो - एक विशेष तरह से कुंई की खुदाई और चिनाई करने वाले दक्षतम लोग। यह काम चेज़ा कहलाता है।
चेलवांजी को मिट्टी की खूब परख रहती है इस चित्र में चेज़ारो रस्सी से कुई की चिनाई कर रहा है। जिस रस्सी से चिनाई की जाती है उस रस्सी को खीप कहते हैं। कहीं-कहीं चग की रस्सी भी काम आती है। यह बंदही भी कुंडली का आकार लाती है,इसलिए इसे साँपणी भी कहते हैं।
कुंई अगर गहरी बनी तो पानी खींचने की सुविधा के लिए उसके ऊपर घिरनी या चकरी भी लगाई जाती है। यह फरेड़ी भी कहलाती है। फरेड़ी लोहे की दो भुजाओं पर भी लगती है। लेकिन प्राय: यह गुलेल के आकार के एक मजबूत तने को काट कर, उसमें आर-पार छेद बना कर लगाई जाती है।
कुईं का मुँह छोटा रखने का कारण
1) छोटे व्यास में पानी की मात्रा अधिक हो जाती है। पानी को आराम से निकाला जा सकता है। बड़ा व्यास होने से पानी का फैलाव अधिक हो जाता है तथा पानी निकालने में मुश्किल होती है।
2)अधिक गर्मी पड़ना-अधिक बड़ा व्यास होने से अधिकतर पानी भाप बनकर उड़ सकता है। इसीलिए छोटा मुँह होने के कारण नीचे का पानी सुरक्षित रहता है।
3)कुईं को ढँककर रखना-छोटे मुँह वाले कुईं को ढँककर रखना आसान होता है। बड़ा व्यास होने से ढँककन रखने में परेशानी होती है।
��उत्तर - धातु की बाल्टी पानी में आसानी से डूबती नहीं। पर मोटे कपड़े या चमड़े की चड़स के मुँह पर लोहे का वजनी कड़ा बंधा होता है। चड़स पानी से टकराता है, ऊपर का वजनी भाग नीचे के भाग पर गिरता है और इस तरह कम मात्रा के पानी में भी ठीक से डूब जाता है। भर जाने के बाद ऊपर उठते ही चड़स अपना पूरा आकार ले लेता है।
कुईं में से पानी निकालने का काम बाल्टी से नहीं बल्कि चड़स से होता है। �
प्र०- चड़स क्या होता है? कुईं में बाल्टी के बदले चड़स का उपयोग क्यों होता है।
चित्र अगले पेज पर है
चमड़े की चड़स
पालरपानी
रेजाणी पानी
पातालपानी
पानी के प्रकार
पालरपानी
पाताल पानी
रेजाणीपानी
मरुभूमि में वर्षा के पानी को मापना
मरु भूमि में वर्षा के पानी की मात्रा को इंच या सेंटीमीटर में नहीं मापा जाता। इस कार्य के लिए रेज़ा शब्द का प्रयोग होता हैं। इससे धरातल की वर्षा को नहीं बल्कि भीतर समाई वर्षा को मापा जाता है । यदि इस भूमि पर इतना पानी गिरे की यह छह अंगुल भीतर तक समा जाए तो उस वर्षा को छह अंगुल रेज़ा कहा जाएगा। इस माप का कारण है-मरूभूमि की रेत। इस रेत में पानी की बूंदे धरातल पर नहीं टिक पाती।
गोधूलि –वेला
गोधूलि के समय पूरा गाँव कुईं पर आता है। तब वहाँ मेला-सा लग जाता है।
राजस्थान में पानी भरकर लाती महिलाएँ
राजस्थान भारत का एक बहुत बड़ा राज्य है,जैसे कि इसके नाम से ही पता चलता है कि राजस्थान दो शब्दों से मिलकर बना है राजा और स्थान जिसका अर्थ है की राजाओं का स्थान जहाँ राजाओं का निवास होता है।
राजस्थान की संस्कृति
की कुछ तस्वीरें।
राजस्थान-धरती धोराँ री
धन्यवाद!