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मीराबाई

पवन कुमारी

असिस्टेंट प्रोफेसर

स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग

हंसराज महिला महाविद्यालय

जालंधर

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  • नाम – मीरा बाई
  • बचपन का नाम – पेमल
  • जन्म – 1498 ई. (विक्रम संवत् 1555)
  • जन्म स्थान – मेड़ता (राजस्थान)
  • पिता – रतन सिंह
  • पति – भोजराज
  • मृत्यु – 1546 ई. ( विक्रम संवत् 1603) के आसपास

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भाव तथा कला पक्ष�

  • ■ भाव पक्ष-: कृष्ण की भक्ति प्रद शाखा की सर्वगुण संपन्न कवित्री मीराबाई है, इनकी सारी काव्य रचनाएं, कविताएं , भजन एकमात्र गिरधर नागर से ही संबंधित है।

-:भावपक्ष के मुख्य पद-:

  • प्रार्थना व विनय संबंधित पद
  • प्रेम से संबंधित पद
  • गिरधर के सौंदर्य वर्णन संबंधित पद
  • जीवन से संबंधित पद
  • रहस्यवादी भावना के पद

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कला पक्ष-

  • : कृष्ण की भक्त मीराबाई भक्ति काल की प्रसिद्ध कवित्री है।
  • -:भाषा शैली-: वे राजस्थानी , पंजाबी , भोजपुरी , तथा गुजराती शब्दों को मिलाकर ब्रज भाषा में मधुर गीत गाने वाली है। (कृष्ण भक्त मीरा का जीवन परिचय)
  • -: रस : अलंकार : छंद -: इनके छंद गेय पद में अनेक राग रांगनियों से परिपूर्ण है।�रस की बात करें तो श्रृंगार रस (संयोग , वियोग) का मुख्य रूप से वर्णन किया है और साथ ही शांत रस का भी प्रयोग किया गया है। अलंकार में विशेष रूप से रूपक , उपमा , व दुष्टांत आदि का प्रयोग भी किया गया है। (मीरा के छंद)

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  • काव्य की बोलियां
  • इनके पदों की भाषा कहीं शुद्ध ब्रज है तो कहीं राजस्थानी व गुजराती है, कभी-कभी पंजाबी का प्रयोग कर काव्य की रचना की गई है। मुख्य रूप से ब्रजभाषा के पुट में 4 बोलियां आती है जो कि इस प्रकार है -: गुजराती , पंजाबी , राजस्थानी व ब्रजभाषा।

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रचनाएं , साहित्य व पदावली�

  • श्री कृष्ण के विभिन्न पदों की रचना इनके द्वारा ही की गई है , उन्होंने प्रेम भरे कई पद गाए हैं। इनकी रचनाओं में प्रमुख-:

  • नरसी जी का मायरा,
  • गीत गोविंद कि टीका,
  • राग सीरठ के पद,
  • रामगोविंद आदि है

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मीराबाई के प्रसिद्ध भजन

  • हे री मैं तो प्रेम-दिवानी मेरो दरद न जाणै कोय।�घायल की गति घायल जाणै, जो कोई घायल होय।

जौहरि की गति जौहरी जाणै, की जिन जौहर होय।�सूली ऊपर सेज हमारी, सोवण किस बिध होय।

गगन मंडल पर सेज पिया की किस बिध मिलणा होय।�दरद की मारी बन-बन डोलूँ बैद मिल्या नहिं कोय।�मीरा की प्रभु पीर मिटेगी, जद बैद सांवरिया होय।

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  • हरि तुम हरो जन की भीर।�द्रोपदी की लाज राखी, तुम बढायो चीर॥

भक्त कारण रूप नरहरि, धरयो आप शरीर।�हिरणकश्यपु मार दीन्हों, धरयो नाहिंन धीर॥

बूडते गजराज राखे, कियो बाहर नीर।�दासि ‘मीरा लाल गिरिधर, दु:ख जहाँ तहँ पीर॥

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  • पग घूँघरू बाँध मीरा नाची रे।

मैं तो मेरे नारायण की आपहि हो गई दासी रे।

लोग कहै मीरा भई बावरी न्यात कहै कुलनासी रे॥

विष का प्याला राणाजी भेज्या पीवत मीरा हाँसी रे।

‘मीरा’ के प्रभु गिरिधर नागर सहज मिले अविनासी रे॥

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 मीराबाई की काव्यगत विशेषताएं�

  • संत काव्य के अन्य कवियों की भांति मीरा ने अपने पदों में भाव पर अधिक ध्यान दिया है। उन्हें व्यक्त करने के लिए जो सब अधिक उपयुक्त लगे उसका उन्होंने प्रयोग किया है�मीरा कृष्णा के प्रेम में दीवानी थी। कृष्णा उनके जीवन के केंद्रबिंदु हैं। उनका सारा काव्य कृष्णा से समृद्ध है। उनके मू काव्य में प्राय: कृष्णा के रूप सौंदर्य, उनके प्रति भक्ति तथा  भावनात्मक संयोग-वियोग के चित्र दिखाई देते हैं। उनके काव्य का वर्ण्य विषय इस प्रकार है

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कृष्णा के रूप- सौंदर्य का वर्णन 

  • मीरा ने अपनी कतिपय  पदों में श्री कृष्णा के रूप सौंदर्य का अत्यंत हृदयस्पर्शी चित्र खींचा है। एक उदाहरण प्रस्तुत है-�  'बस्यां म्हारो णेणण मां नंदलाल।                   

 मोर मुकुट मकराकृत कुण्डलै अरुण तिलक सोहां भाल।�मोहन मूरत संवारां सूरत नैणा बण्या बिसाल।'

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मीराबाई की भक्ति भावना

�मीरा कृष्णा के भक्त हैं। उनकी भक्ति कांता भाव की है। वे गिरधार-नागर अपना स्वामी और अपने आपको उनकी दासी कहती हैं-�       भज मन चरण कंवल अविनासी।�        �अरज करौं अबला कर जोरे श्याम तुम्हारी दासी।�मीरा के प्रभु गिरधर नागर, काटौ जम की फांसी।।

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संयोग की भावानुभूति-

  •  मीरा कृष्णा के साथ भाव जगत में ऐक्य अनुभव करती है। उन्होंने अपने अनेक पदों में इसकी भावाभिव्यक्ति की है। उदाहरण के लिए
  •   'मैं तो संवारे के रंग रांची।�साजिद सिंगार बांधि पग घुंघरू लोक लाज तजी नांची।।'

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विरह-वर्णन -

  • .  विरह-वेदना और पीड़ा की जितनी मार्मिक अभिव्यंजना मीरा के काव्य में हुई है, वैसे अत्यंत दुर्लभ है। उनके बिरह-वर्णन में तल्लीनता, तन्मयता तथा भावुकता है। अन्य कवियों का वर्णन जहां कल्पना-आधारित है,  वही मेरा वर्णन व्यक्तिगत अनुभूति है। वे कहती हैं-
  • �      पान जयूं पीली पड़ी रे, लोग कहैं पिण्ड रोग।�      छाने लांघन मैं किया रे, राम मिलन के जोग ।�       बाबल वैद बुलाइया रे, पकड़ दिखाई म्हारी बांह।�      मूरख वैद मरम नहिं जानै, कसक कलेजे मांह। �        जा वैदा घर आपने रे, म्हांरे नांव न लेय।�मैं तो दाघी विरह की रे, तू काहे कं औषध देर।।

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भाषा : 

  •  मीरा की भाषा कृत्रिमता से दूर ब्रज भाषा है जिसमें अनेक प्रांतों के शब्द प्राप्त होते हैं। इनकी भाषा पर मुख्य रूप से राजस्थानी और गुजराती का प्रभाव है। पूर्वी, पंजाबी और फारसी के भी सब यत्र तत्र मिलते हैं। इन्होंने अनेक प्रांतों का भ्रमण किया अतः पर्यटन शीलता का प्रभाव इनकी भाषा पर स्पष्ट दिखाई देता है। जिससे इनके पदों की भाषा में एकरूपता का अभाव है।

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शैली :

  •  मीरा ने गीतात्मक शैली का अनुसरण करके पदों की रचना की है। उनके पदों में गेयता, संगीतात्माकता और अनुभूति की तीव्रता विद्यमान है। इनकी शैली को गीत काव्य की भावपूर्ण शैली कहा जा सकता है यह स्वयं ही इस शैली की जन्म दात्री तथा पोषिका हैं।

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रस-योजना -

  • मीराबाई के काव्य में प्राय: श्रृंगार रस की अभिव्यंजना हुई है। श्रृंगार के दोनों पक्षों संयोग तथा वियोग का अपने पदों में उन्होंने सुंदर निरूपण किया है। उनके भक्ति तथा विनय संबंधी पदों में शांत रस का प्रयोग है। पदों में मुख्य रूप से माधुर्य तथा प्रसाद गुण है।

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अलंकार विधान -

  •  मीरा के काव्य का सृजन अलंकार निरूपण की दृष्टि से नहीं हुआ है तथापि इनके पदों में उपमा रूपक दृष्टांत आदि अलंकार स्वाभाविक रीति से आए हैं।

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  • निष्कर्ष�   मीरा के पद हिंदी साहित्य में अनूठे हैं। वे उनके हृदय की गहराई से निकले हैं, उनका दर्द उनके काव्य को अद्वितीय बनाता है।

 डॉ शिवकुमार शर्मा लिखते हैं-'मीरा का काव्य आंसुओं के जल से सिक्त, पल्लवित एवं पुष्पित प्रेमबेल के मनोहारिणी सुगंध से सुवासित है।'

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धन्यवाद