मीराबाई
पवन कुमारी
असिस्टेंट प्रोफेसर
स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग
हंसराज महिला महाविद्यालय
जालंधर
भाव तथा कला पक्ष�
-:भावपक्ष के मुख्य पद-:
कला पक्ष-
रचनाएं , साहित्य व पदावली�
मीराबाई के प्रसिद्ध भजन �
जौहरि की गति जौहरी जाणै, की जिन जौहर होय।�सूली ऊपर सेज हमारी, सोवण किस बिध होय।
गगन मंडल पर सेज पिया की किस बिध मिलणा होय।�दरद की मारी बन-बन डोलूँ बैद मिल्या नहिं कोय।�मीरा की प्रभु पीर मिटेगी, जद बैद सांवरिया होय।
भक्त कारण रूप नरहरि, धरयो आप शरीर।�हिरणकश्यपु मार दीन्हों, धरयो नाहिंन धीर॥
बूडते गजराज राखे, कियो बाहर नीर।�दासि ‘मीरा लाल गिरिधर, दु:ख जहाँ तहँ पीर॥
मैं तो मेरे नारायण की आपहि हो गई दासी रे।
लोग कहै मीरा भई बावरी न्यात कहै कुलनासी रे॥
विष का प्याला राणाजी भेज्या पीवत मीरा हाँसी रे।
‘मीरा’ के प्रभु गिरिधर नागर सहज मिले अविनासी रे॥
मीराबाई की काव्यगत विशेषताएं�
कृष्णा के रूप- सौंदर्य का वर्णन
मोर मुकुट मकराकृत कुण्डलै अरुण तिलक सोहां भाल।�मोहन मूरत संवारां सूरत नैणा बण्या बिसाल।'�
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मीराबाई की भक्ति भावना
�मीरा कृष्णा के भक्त हैं। उनकी भक्ति कांता भाव की है। वे गिरधार-नागर अपना स्वामी और अपने आपको उनकी दासी कहती हैं-� भज मन चरण कंवल अविनासी।� �अरज करौं अबला कर जोरे श्याम तुम्हारी दासी।�मीरा के प्रभु गिरधर नागर, काटौ जम की फांसी।।
संयोग की भावानुभूति-
विरह-वर्णन -
भाषा :
शैली :
रस-योजना -
अलंकार विधान -
डॉ शिवकुमार शर्मा लिखते हैं-'मीरा का काव्य आंसुओं के जल से सिक्त, पल्लवित एवं पुष्पित प्रेमबेल के मनोहारिणी सुगंध से सुवासित है।'
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धन्यवाद