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बाजार दर्शन

लेखक:-जैनेंद्र कुमार

प्रस्तुतकर्ता:-अभय सिंह यादव

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बाजार दर्शन :-जैनेंद्र कुमार

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जीवन परिचय:- जैनेंद्र कुमार

  • जैनेन्द्र कुमार (जन्म: 2 जनवरी1905 - मृत्यु: 24 दिसम्बर1990हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कथाकार, उपन्यासकार तथा निबंधकार थे। ये हिंदी उपन्यास के इतिहास में मनोविश्लेषणात्मक परंपरा के प्रवर्तक के रूप में मान्य हैं। जैनेन्द्र अपने पात्रों की सामान्यगति में सूक्ष्म संकेतों की निहिति की खोज करके उन्हें बड़े कौशल से प्रस्तुत करते हैं। उनके पात्रों की चारित्रिक विशेषताएँ इसी कारण से संयुक्त होकर उभरती हैं।
  • अलीगढ़ में 2 जनवरी1905 को जन्मे जैनेन्द्र ने बाल्यावस्था से ही अलग तरह का जीवन जिया। इनके मामा ने हस्तिनापुर में गुरुकुल स्थापित किया था, वहीं इनकी पढ़ाई भी हुई। दो वर्ष की आयु में ही पिता को खो चुके थे। जैनेन्द्र तो बाद में बने, आपका मूलनाम 'आनंदी लाल' था। उच्च शिक्षा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हुई। 1921 में पढ़ाई छोड़कर असहयोग आंदोलन में कूद पड़े। 1923 में राजनीतिक संवाददाता हो गए। ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार कर लिया। छूटने के कुछ समय बाद लेखन प्रारंभ किया।

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साहित्यिक परिचय :- जैनेंद्र कुमार

  • 'फाँसी' इनका पहला कहानी संग्रह था, जिसने इनको प्रसिद्ध कहानीकार बना दिया। उपन्यास 'परख' से सन्‌ 1929 में पहचान बनी। 'सुनीता' का प्रकाशन 1935 में हुआ। 'त्यागपत्र' 1937 में और 'कल्याणी' 1939 में प्रकाशित हुए। 1929 में पहला कहानी-संग्रह 'फाँसी' छपा। इसके बाद 1930 में 'वातायन', 1933 में 'नीलम देश की राजकन्या', 1934 में 'एक रात', 1935 में 'दो चिड़ियाँ' और 1942 में 'पाजेब' का प्रकाशन हुआ। अब तो 'जैनेन्द्र की कहानियां' सात भागों उपलब्ध हैं। उनके अन्य महत्त्वपूर्ण उपन्यास हैं- 'विवर्त,' 'सुखदा', 'व्यतीत', 'जयवर्धन' और 'दशार्क'। 'प्रस्तुत प्रश्न', 'जड़ की बात', 'पूर्वोदय', 'साहित्य का श्रेय और प्रेय', 'मंथन', 'सोच-विचार', 'काम और परिवार', 'ये और वे' इनके निबंध संग्रह हैं। तालस्तोय की रचनाओं का इनका अनुवाद उल्लेखनीय है। 'समय और हम' प्रश्नोत्तर शैली में जैनेन्द्र को समझने की दृष्टि से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पुस्तक है।

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प्रमुख कृतियाँ

उपन्यास:-

  • 'परख' (1929)
  • 'सुनीता' (1935)
  • 'त्यागपत्र' (1937)
  • 'कल्याणी' (1939)
  • 'विवर्त' (1953)
  • 'सुखदा' (1953)
  • 'व्यतीत' (1953)
  • 'जयवर्धन' (1956)

कहानी संग्रह:-

  • 'फाँसी' (1929)
  • 'वातायन' (1930)
  • 'नीलम देश की राजकन्या' (1933)
  • 'एक रात' (1934)
  • 'दो चिड़ियाँ' (1935)
  • 'पाजेब' (1942)
  • 'जयसंधि' (1949)
  • 'जैनेन्द्र की कहानियाँ' (सात भाग)

निबंध संग्रह:-

  • 'प्रस्तुत प्रश्न' (1936)
  • 'जड़ की बात' (1945)
  • 'पूर्वोदय' (1951)
  • 'साहित्य का श्रेय और प्रेय‘ (1953)
  • 'मंथन' (1953)
  • 'सोच विचार' (1953)
  • 'काम, प्रेम और परिवार‘ (1953)
  • 'ये और वे' (1954)

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प्रमुख

कृतियाँ

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सम्मान और पुरस्कार:-

  • हिन्दुस्तानी अकादमी पुरस्कार, 1929 में 'परख' (उपन्यास) के लिए
  • भारत सरकार शिक्षा मंत्रालय पुरस्कार, 1952 में 'प्रेम में भगवान्' (अनुवाद) के लिए
  • 1966 में साहित्य अकादमी पुरस्कार 'मुक्तिबोध' (लघु उपन्यास) के लिए
  • पद्म भूषण1971
  • साहित्य अकादमी फैलोशिप, 1974
  • हस्तीमल डालमिया पुरस्कार (नई दिल्ली)
  • उत्तर प्रदेश राज्य सरकार (समय और हम-1970)
  • उत्तर प्रदेश सरकार का शिखर सम्मान 'भारत-भारती'
  • मानद डी. लिट् (दिल्ली विश्वविद्यालय, 1973, आगरा विश्वविद्यालय,1974)
  • हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग (साहित्य वाचस्पति-1973)
  • विद्या वाचस्पति (उपाधिः गुरुकुल कांगड़ी)

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हिन्दी साहित्य में स्थान:-

  • जैनेन्द्र कुमार का हिन्दी साहित्य में विशेष स्थान है। जैनेन्द्र पहले ऐसे लेखक हैं जिन्होंने हिन्दी गद्य को मनोवैज्ञानिक गहराइयों से जोड़ा। जिस समय प्रेमचन्द सामाजिक पृष्ठभूमि के उपन्यास और कहानियाँ लिख कर जनता को जीवन की सच्चाइयों से जोड़ने के काम में महारथ सिद्ध कर रहे थे, जब हिन्दी गद्य 'प्रेमचन्द युग' के नाम से जाना जा रहा था, तब उस नयी लहर के मध्य एक बिल्कुल नयी धारा प्रारम्भ करना सरल कार्य नहीं था। आलोचकों और पाठकों की प्रतिक्रिया की चिन्ता किये बिना, कहानी और उपन्यास लिखना जैनेन्द्र के लिये कितना कठिन रहा होगा, इसका अनुमान किया जा सकता है। बहुत से आलोचकों ने जैनेन्द्र के साहित्य के व्यक्तिनिष्ठ वातावरण और स्वतंत्र मानसिकता वाली नायिकाओं की आलोचना भी की परंतु व्यक्ति को रूढ़ियों, प्रचलित मान्यताओं और प्रतिष्ठित संबंधों से हट कर देखने और दिखाने के संकल्प से जैनेन्द्र विचलित नहीं हुए। जीवन और व्यक्ति को बँधी लकीरों के बीच से हटा कर देखने वाले जैनेन्द्र के साहित्य ने हिन्दी साहित्य को नयी दिशा दी जिस पर बाद में हमें अज्ञेय चलते हुए दिखाई देते हैं।

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प्रेमचंद और जैनेन्द्र:-

  • जैनेन्द्र कुमार प्रेमचंद युग के महत्वपूर्ण कथाकार माने जाते हैं। उनकी प्रतिभा को प्रेमचंद ने भरपूर मान दिया। वे समकालीन दौर में प्रेमचंद के निकटतम सहयात्रियों में से एक थे मगर दोनों का व्यक्तित्व जुदा था। प्रेमचंद लगातार विकास करते हुए अंतत: महाजनी सभ्यता के घिनौने चेहरे से पर्दा हटाने में पूरी शक्ति लगाते हुए 'कफ़न' जैसी कहानी और किसान से मज़दूर बनकर रह गए। होरी के जीवन की महागाथा गोदान लिखकर विदा हुए। जैनेन्द्र ने जवानी के दिनों में जिस वैचारिक पीठिका पर खड़े होकर रचनाओं का सृजन किया जीवन भर उसी से टिके रहकर मनोविज्ञान, धर्म, ईश्वर, इहलोक, परलोक पर गहन चिंतन करते रहे। । वामपंथी विचारधारा से जुड़े लेखकों के वर्चस्व को महसूस करते हुए जैनेन्द्र जी कलावाद का झंडा बुलंद करते हुए अपनी ठसक के साथ समकालीन साहित्यिक परिदृश्य पर अलग नजर आते थे। गहरी मित्रता के बावजूद प्रेमचंद और जैनेन्द्र एक दूसरे के विचारों में भिन्नता का भरपूर सम्मान करते रहे और साथ- साथ चले।

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अनावश्यक क्रय-

लेखक के मित्र एक मामूली चीज खरीदने बाजार गए थे। लौटे तो उनके साथ अनेक बण्डल थे। इस फिजूलखर्ची के लिए उन्होंने अपनी पत्नी को जिम्मेदार बताया। स्त्रियाँ अधिक सामान बाजार से खरीदती हैं। यह ठीक है किन्तु पुरुष अपना दोष पत्नी पर डालकर बचना चाहते हैं। खरीदारी में एक अन्य चीज का भी महत्व है। वह है मनीबैग अर्थात् पैसे की शक्ति।

पाठ का सार:-

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पैसे की पॉवर:-

  • पैसा पॉवर है। इसका प्रमाण लोग अपने आस-पास माल-असबाब, कोठी-मकान आदि इकट्ठा करके देते हैं। कुछ संयमी लोग इस पॉवर को समझते हैं, किन्तु वे प्रदर्शन में विश्वास नहीं करते। वे संयमी होते हैं। वे पैसा जोङते जाते हैं तथा इस संग्रह को देखकर गर्व का अनुभव करते हैं। मित्र का मनी बैग खाली हो गया था। लेखक ने समझा कि जो सामान उन्होंने खरीदा था वह उनकी आवश्यकता के अनुरूप था। उन्होंने अपनी ’पर्चेजिंग पावर’ अर्थात् क्रय के अनुसार ही सामान खरीदा था।

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बाजार का जादू :–

बाजार में आकर्षण होते है। उसमें प्रदर्शित वस्तुएँ ग्राहक को आकर्षित करती हैं कि वह उनको खरीदे। इस आकर्षण से बहुत कम लोग बच पाते हैं। संयमहीन व्यक्ति को बाजार कामना से व्याकुल ही नहीं पागल बना देता है, उसमें असन्तोष ईर्ष्या और तृष्णा उत्पन्न करके उसको बेकार कर देता है

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जादू से रक्षा:–

  • लेखक के एक अन्य मित्र भी बाजार गए थे। वहाँ अनेक चीजें थीं। वह बाजार में रुके भी बहुत देर तक। उनका सभी चीजें खरीदने का मन हो रहा था। सोचते रहे क्या लूँ क्या न लूँ? उन्होंने कुछ नहीं खरीदा, खाली हाथ लौटे। बाजार का जादू उसी पर चलता है जिसकी जेब भरी हो मन खाली हो मन खाली होने का मतलब यह पता न होना है उसकी आवश्यकता की वस्तु क्या है। वह सभी चीजों को खरीद लेना चाहता है जब यह जादू उतरता है तो पता चलता है कि अनावश्यक चीजें खरीदने से आराम नहीं कष्ट ही होता है। बाजार जाना हो तो खाली मन जाना ठीक नहीं। बाजार जाते समय अपनी आवश्यकता ठीक से पता होनी चाहिए।

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खाली और बन्द मन:–

  • मन खाली न रहे इसका मतलब मन का बन्द होना नहीं है। मन के बन्द होने का अर्थ है-शून्य हो जाना। शून्य होने का अधिकार परमात्मा को है। वह पूर्ण है, मनुष्य अपूर्ण है। उसके मन में इच्छा उत्पन्न होना स्वाभाविक है। मन को बलात् बन्द करना केवल हठ है। सच्चा ज्ञान अपूर्णता के बोध को गहरा करता है। सच्चा कर्म इस अपूर्णता को स्वीकार करके ही होता है। अतः मन को बलात् बन्द नहीं करना है। किन्तु मन को चाहे सो करने की छूट नहीं देनी है।

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चूरनवाले भगत जी –

  • लेखक के पङोसी चूरनवाले भगत जी हैं। वे चूरन बेचते हैं। उनका चूरन प्रसिद्ध है। वह नियत समय पर चूरन की पेटी लेकर निकलते हैं। लोग उनसे सद्भाव रखते हैं। उनका चूरन तुरन्त बिक जाता है। छः आने की कमाई होते ही वह शेष चूरन बच्चों में बाँट देते हैं। बाजार का जादू उन पर प्रभाव नहीं डालता। पैसा उनसे प्रार्थना करता है कि मुझे अपनी जेब में आने दीजिए। किन्तु वह निर्दयतापूर्वक उसका निवेदन ठुकरा देते हैं। वे नियम से चूरन बनाते हैं, बेचते हैं और उतना ही कमाते हैं, जितने की उनको जरूरत होती है।
  • भगत जी बाजार से नित्य सामान खरीदते हैं। वह बाजार में सबसे हँसते-बोलते हैं। वह वहाँ आँखें खोलकर चलते हैं। बाजार में फँसी स्टोर हैं। बाजार माल से भरा पङा है, वह सबको देखते आगे बढ जाते हैं और पंसारी की दुकान पर रुकते हैं, काला नमक तथा जीरा खरीदते हैं। इसके बाद चाँदनी चैक (बाजार)का आकर्षण उनके लिए शून्य हो जाता है।

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पैसे की व्यंग्य शक्ति –

  • पैसे की व्यंग्य शक्ति चुभने वाली होती है। पैदल चलने वाले के पास से गुजरती धूल उङाती मोटर उस पर व्यंग्य करती है कि तेरे पास मोटर नहीं है। वह सोचता है- मैं अभागा हूँ, नहीं तो किसी मोटरवाले के घर जन्म क्यों न लेता। पैसे की व्यंग्य शक्ति का प्रभाव चूरनवाले भगतजी पर नहीं होता उनमें इससे बचने का बल है। यह बल उसी को प्राप्त होता है, जिसमें तृष्णा तथा संचय की प्रवृति नहीं है। इस बल को आत्मिक, नैतिक, धार्मिक कोई भी बल कह सकते हैं। जिसमें यह बल होता है, वह बाजार के व्यंग्य से प्रभावित नहीं होता निर्बल ही धन की ओर झुकता है।

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बाजार की सार्थकता:-

  • जो मनुष्य जानता है कि उसको क्या चाहिए। उसी से बाजार को सार्थकता प्राप्त होती है। अनावश्यक चीजें खरीदने वाले बाजार की शैतानी और व्यंग्य शक्ति ही बढाते हैं। ऐसे लोगों के कारण बाजार का सामाजिक सद्भाव नष्ट होता है। और कपट बढता है। ऐसा बाजार मानवता के लिए विडम्बना है। ऐसे बाजार का पोषण करने वाला अर्थशास्त्र पूर्णतः उल्टा है। वह मायावी शास्त्र है। ऐसा अर्थशास्त्र अनीति शास्त्र है।

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शब्द छवि:-

  • पर्चेजिंग पॉवर - खरीदने की शक्ति  
  • असबाब- सामान 
  • दरकार- जरूरत 
  • परिमित- सीमित 
  • अतुलित- जिसकी  तुलना न की जा सके  
  • पेशगी- अग्रिम राशि 
  • नाचीज- महत्वहीन 
  • अपदार्थ-जिसका अस्तित्व ना हो 
  • दारुण- भयंकर 
  • अकिंचितकर- अर्थहीन 
  • पसोपेश- असमंजस 

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गृहकार्य:-

  • बाजार का जादू चढ़ने और उतरने पर मनुष्य पर क्या-क्या असर पड़ता हैं?
  • बाजार में भगत जी के व्यक्तित्व का कौन-सा सशक्त पहलू उभरकर आता हैं? क्या आपकी नजर में उनका आचरण समाज में शांति-स्थापित करने में मददगार हो सकता हैं?
  • लेखक ने पाठ में संकेत किया है कि कभी-कभी बाजार में आवश्यकता ही शोषण का रूप धारण कर लेती हैं । क्या आप इस विचार से सहमत हँ‘? तर्क सहित उतार दीजिए?
  • ‘बाज़ार दर्शन’ पाठ के आधार पर बताइए कि पैसे की पावर का रस किन दो रूपों में प्राप्त होता है ?
  • भगत जी की चरित्र की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए I

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प्रस्तुतकर्ता:-

  • अभय सिंह यादव
  • पीजीटी (हिंदी)
  • जवाहर नवोदय विद्यालय सरदारशहर
  • जिला चूरु ( राजस्थान )

धन्यवाद