धौतिर्वस्तिस्तथा नेतिलौंलिकी त्राटकं तथा ।
कपालभातिश्चैतानि षट्कर्माणि समाचरेत्।।
(ह. यो. प्र. 2/27)
1. धौतिकर्म
2. बस्तिकर्म
3. नेतिकर्म
4. नौलिकर्म
5. त्राटक
6. कपालभाति
“षट्कर्मणाशोधनं” षट्कर्म- शरीर शोधन होता है।
धौति के भेद
धौति
वातसार अन्तर्धीति
विधि- दोनों ओठों को कौए की चोंच के समान करके धीमे-धीमे वायु को पीयें। पूर्णरूप से पान करने के पश्चात् पेट में उसका चालन करें एवं गुदमार्ग द्वारा बाहर निकाल दें । लाभ- शरीर स्वच्छ एवं रोगरहित हो जाता है तथा जठराग्नि की वृद्धि होती हैं।
वारिसार अन्तर्धीति
विधि- मुख से धीमे-धीमे जल पीकर कण्ठ तक भर अधोमार्ग से निकाल दें। फिर उसका चालन करके
लाभ- शरीर निर्मल हो जाता है। शरीरस्थ मल
अन्तर्धीति
धौति
अग्निसार अन्तधति
विधि- श्वास को बाहर निकालकर नाभि को बार-बार मेरुदण्ड के पृष्ठ भाग में लगायें, इस प्रकार एक श्वास में १०० बार करें । लाभ- उदररोग नष्ट होते हैं एवं जठराग्नि तीव्र होती है। इसको करने से शरीर देवताओं के समान हो जाता है।
बहिष्कृत अन्तधति -
विधि - जल में नाभि पर्यन्त खड़े होकर शक्तिनाड़ी (त्रिवली) को बाहर निकालें और उसे भली प्रकार धोकर स्वच्छ करें इसके पश्चात् हाथों से घृत लगा कर पुनः त्रिवली को उदरस्थ कर लें ।
लाभ- शरीर देवताओं के समान हो जाता है
अन्तर्धीति
धौति
दन्तमूलधौति
विधि- खदिर के रस या शुद्ध मिट्टी से दन्तमूलों को नित्य साफ करें ।
लाभ- दन्त रोगों से रक्षा होती है ।
जिह्वामूलधौति-
विधि- तर्जनी, मध्यमा व अनामिका तीनों अँगुलियों को गले में डालकर जिह्वा को जड़ तक स्वच्छ करना चाहिए ।
लाभ- कफ का निवारण होता है एवं रोगों का नाश होता है।
दन्तधौति
धौति
कर्णरन्ध्रधौति
विधि- दोनों कानों के रन्ध्रों को, तर्जनी और अनामिका अंगुलियों को मिलाकर उनसे नित्यप्रति शुद्धि करें ।
लाभ- नाद प्रकट होता है ।
कपालरन्ध्रधौति
विधि- दाँये हाथ के अँगूठे से कपालरन्ध्र का मार्जन करना चाहिए यह नित्य प्रातःकाल भोजन के बाद एवं साँयकाल में करना चाहिए।
लाभ- कफ दोष का निवारण होता है एवं नाड़ी मल रहित हो जाती है।
दन्तधौति
धौति
दण्डधौति
विधि - केला, हरिद्रा या वेंत के दण्ड को हृदय के मध्य (उदर में) बार-बार घुसाकर धीरे धीरे निकालना चाहिए ।
लाभ- कफ, पित्त व क्लेद को बाहर निकालती है एवं हृदयरोगों का नाश करती है।
वमनधौति
विधि- भोजन पच जाने के पश्चात् आकण्ठ जल पीकर ऊपर देखते हुये वमन द्वारा बाहर निकाल दें।
लाभ- कफ एवं पित्त बाहर निकल जाता है।
व्यवहार में वमनधौति के स्थान पर कुञ्जलक्रिया का प्राविधान है ।
वस्त्रधौति
विधि- महीन सूती वस्त्र की ४ अंगुल चौड़ी एवं १५ हाथ लम्बी पट्टी लेकर धीरे-धीरे जल के साथ निगलें। फिर इसे धीरे-धीरे बाहर निकालें । लाभ- कास, श्वास, गुल्म, ज्वर, प्लीहा, कुष्ठ एवं कफपित्त विकारों का शमन होता है। आरोग्य एवं बलवृद्धि की प्राप्ति होती है ।
हदधौति
धौति
विधि - हल्दी की जड़ या मध्यमा अंगुली के द्वारा जल योग से पुनः पुनः मलद्वार का प्रक्षालन करें।
लाभ- कोष्ठकाठिन्य एवं अजीर्ण का नाश होता है। कान्ति एवं पुष्टि की प्राप्ति होती है एवं अग्नि प्रदीप्त होती है ।
मूलशोधन
बस्ति
गुदा द्वारा पानी ऊपर आकर्षित करके बड़ी आँतों को धोना बस्ति कर्म कहलाता है।
इस क्रिया में दक्षता प्राप्त करने के लिए नौलि क्रिया, उड्डियान बन्ध का अभ्यास आवश्यक है।
नाभिद्घनजले पायौ न्यस्तनालोत्कटासनः ।
आधाराकुंचनं कुर्यात्क्षालनं बस्तकर्म तत्ः ।। (ह.यो. प्र.2/26)
बस्ति
आवश्यकताऐ :
बड़ा पात्र, लवणयुक्त जल, 7 इंचलम्बो व 1/2 इंच मोटी छिद्रयुक्त नलिका। विधि-नाभि तक पानी आ जाए ऐसे स्वच्छ पानी में उड्डियान क्रिया की भाँति खड़े हो जाना चाहिए। अथवा
1. किसी बड़े पात्र में नाभिपर्यन्त जल भरकर, उत्कटासन में बैठे रहना चाहिए।
2. पश्चात् छिद्रयुक्त नलिका, जिसके दोनों सिर गोल हो, उसको स्नेह से लिप्त करना चाहिए।
3. बाद में 4 इंच तक नलिका को गुद मार्ग में प्रवेश कराना चाहिए।
4. पश्चात् पानी भरे पात्र में उत्कटासन में बैठकर, नली का दूसरा सिरा पानी में डुबा देना चाहिए।
5. और उड्डियानबन्ध लगाकर, बस्ति क्रिया का अभ्यास करना चाहिए।
जल बस्ति
बस्ति
6. इस प्रकार करने से गुदमार्ग का आकुंचन हो जाता है, जिससे पानी अन्दर प्रविष्ट होने लगता है।
7. पानी अन्दर आकर्षित करने के पश्चात् नली को बाहर निकालें, और वाम, दक्षिण नौल (नौलि) क्रिया 10-15 बार
करना चाहिए।
8. इससे पानी छोटी आँत में फैलकर उसे धो देता है।
9. पश्चात् शौच जाने की इच्छा होती है।
10. मलोत्सर्ग करने के पश्चात् मयूरासन करना चाहिए। इससे आँतों पर दबाव पड़कर शेष बचा हुआ पानी भी बाहर निकल आता है।
बस्तिकर्म
लाभ - आँतों का प्रक्षालन होता है।
आँते सक्रिय हो जाती हैं।
उदावर्त हर
गुल्म, प्लीहा, उदर विकार व त्रिदोष व्याधि नाश होता हैं।
जल बस्ति
नेतिकर्म
सूत्रनेति बनाने की विधि / आवश्यकताएँ
15-25 तार का डेढ़ फुट लम्बा सूत्र का गुच्छा लेकर उसे तिहरा बाटे
सूत्र को एक तिहाई बाँटकर बाकी बिना बटा ही रहने दें।
बटे हुए भाग को गरम मोम में डूबाकर हाथ से सूत लें। अथवा रबड़ की नली 2 फोट लम्बी, 1/2 इंच चौड़ाई की लेनी चाहिए।
अथवा 5-6 नम्बर के रबड़ कैथेटर लेने चाहिए।
सूत्रं वितस्ति सुस्निग्धं नासानाले प्रवेशयेत् ।
मुखान्तिर्गमयेच्चेषा नैतिः सिद्धेनिगद्यते ।
(ह.यो. प्र.2/21)
नेतिकर्म
1. सूत्र या रबड़ कैथेटर पहले गरम पानी में डुबोकर, मृदु बनाना चाहिए।
2. धीरे-धीरे सूत्र कैथेटर को दाहिने नासिका छिद्र से प्रविष्ट करना चाहिए।
3. जब सूत्र गले में आ जाएं, तब मुख खोलकर दाहिने हाथ को तर्जनी और मध्यमा अंगुली को प्रविष्ट करके चिमटी की भाँति सूत्र को पकड़कर धीरे से बाहर निकालना चाहिए।
4. दाहिने हाथ में सूत्र के मुख भाग और बाएँ हाथ में सूत्र के नासिका भाग को पकड़कर सूत्रनेति मार्ग को 10-15 बार घर्षण करना चाहिए।
5. पश्चात् मुख की ओर से सूत्र को निकालना चाहिए। 6. पुनः उसी सूत्र को पानी से धोने के बाद दूसरे नासिका छिद्र से करना चाहिए।
नेतिकर्म
सूत्रनेति के लाभ
नेतिकर्म
आवश्यकताओं:
स्थिति: ताड़ासन उत्कटासन
जलनेति
नेतिकर्म
विधि-
जलनेति
नेतिकर्म
जलनेति के लाभ
नौलिकर्म
अमन्दावर्तवेगेन तुन्दं सव्यापसव्यतः ।
नतांसो भ्रामयेदेषा नौलिः सिद्धैः प्रचक्षते ।।
(ह. यो. प्र.)
मध्यमनौलिः
स्थिति: ताड़ासन
विधि-
1. पैरों को एक-दो फुट के अन्तर पर रखकर खड़े होना चाहिए।
2. हाथों को घुटने पर या जंघा पर रखकर आगे की ओर झुकना चाहिये।
3. घुटने भी थोड़े मुड़े हुए रहना चाहिए।
नौलिकर्म
4. हाथों से घुटनों को दबाना चाहिए।
5. श्वास बाहर निकाल कर, यानि केवल कुम्भक स्थिति में, हाथों से जंघा/घुटने को कसकर दबाना चाहिए।
6. इसके बाद, उदर को संकुचित करके, सामने वाली दोनों माँसपेशियों को बाहर निकालना चाहिये।
नौलिकर्म
दक्षिण नौलिः
स्थिति- ताड़ासन
विधि-वामनौलि की भाँति, केवल कुम्भक धारण करके,
शरीर का दबाव दाहिनी ओर रखना चाहिए।
इससे उदर की दक्षिणभाग की पेशी आगे निकल जाएगी।
इस पूरी प्रक्रिया में उदर का बायाँ भाग ढीला रहता है।
नौलिकर्म
वामनौलि :
स्थिति- ताड़ासन
त्राटक
जब साधक किसी वस्तु पर अपनी दृष्टि और मन को बांधता है, तो वह क्रिया त्राटक कहलाती है त्याटक शब्द से त्राटक बना है। यह 'त्रि ' शब्द तीन संख्या का वाचक नहीं है, यह निरन्तरता का वाचक है। जब हम कोई वस्तु को एक बार देखते हैं तो यह एकटक कहलाती है। वहीं जब कुछ देर तक देखते हैं तो उसे द्घाटक कहलाती है। वही जब किसी वस्तु को निरन्तर, अक्षिनिमेष रहित दीर्घकाल तक देखते हैं तो उसे ब्याटक/त्राटक कहा गया है। एकाग्रचित्त होकर निश्चल दृष्टि से किसी भी सूक्ष्म लक्ष्य को लगातार देखना, जब तक अश्रुपात न हो जाऐं उसे त्राटक कहा गया है।
त्रिवारं आसमन्तात् टंकयति इति त्राटकम् ।।
त्राटक
त्रिवारं आसमन्तात् टंकयति इति त्राटकम् ।।
प्रधान कर्म:
स्थिति — ध्यानात्मक आसन में स्थित होना चाहिए।
एकान्त और शान्त स्थान में दीवार से 3-4 फुट के अन्तर पर बैठना चाहिए।
दीपक जलाकर उसे 3 फुट की दूरी पर आँखों के सीध रखना चाहिए।
दीपक निवात स्थान पर रखना चाहिए।
बिना पलक झपके दीपक की लौ को निरन्तर देखे ।
जब अश्रुपात या आँखों में जलन होने लगे तब, आँख बन्द कर देना चाहिए।
पश्चात् दोनों हाथो को मर्दन करके, आँखों पर मृदु अभ्यङ्ग करके, धीरे-धीरे आँखों को खोलना चाहिए।
त्राटक
1. अन्तः त्राटक आँखें बन्द करके भ्रूमध्य, हृदय, नाभि, चक्रों को देखना।
2. मध्य त्राटक-किसी धातु/पत्थर से बनी वस्तु को देखना, नासिका अग्र भाग को देखना।
3. बाह्य त्राटक चन्द्रमा, नक्षत्र, तारें, सूर्य की किरणों आदि को देखना।
त्रिवारं आसमन्तात् टंकयति इति त्राटकम् ।।
लाभ –
कपालभाति
भस्त्रवल्लोहकारस्य रेचपूरौ ससंभ्रमौः ।
कपालभाति विख्याता कफदोषविशोषणी: । (ह.यो. प्र. 2/35)
लोहार की धौंकनी को दबाने से उसमें स्थित वायु नेत्र से बाहर निकलती है, उसी प्रकार कपाल भाँति में श्वास का बाहर निकालना सक्रिय (active exhalation) और अन्दर लेना निष्क्रिय (passive inhalation) होगा।
केवल जोर से श्वास को बाहर निकलना चाहिए। अन्दर श्वास स्वतः चला जाता है।
यहाँ कपाल का अर्थ है मस्तिष्क के सामने के भाग (Frontal lobe) और भाति का अर्थ है शुद्ध करना, कपालभाति को भालभाति भी कहा गया है।
कपालभाति
स्थिति - ध्यानात्मक आसन।
विधि - ध्यानात्मक आसन में बैठकर, नाभि से नीचे के पेट को पीछे धक्का देते हुए श्वास को बाहर फेंकना चाहिए।
निष्क्रियता से श्वास अपने आप अन्दर प्रवेश होने लगता है।
पुनः पेट को पीछे धक्का देते हुए श्वास को वेग सहित बाहर निकालना चाहिए।
इस प्रकार बार बार करना चाहिए।
कपालभाति
1. वातक्रम कपालभाति-(घेरण्ड संहिता 1/57)
विधि - ध्यानात्मक आसन में बैठना चाहिए।
बायें नासा रन्ध्र से शीघ्रता से पूरक करके, बिना कुम्भक किये दायें नासारन्ध्र से रेचक करना चाहिए।
फिर दायें रन्ध्र से पूरक करके, बायें रन्ध्र से रेचक करना चाहिए।
इस प्रकार बार-बार करना चाहिए।
लाभ - कफदोष हर।
कपालभाति
2. युत्क्रम कपाल भाति- (घेरण्ड संहिता 1/59)
विधि-ध्यानात्मक आसन में बैठना चाहिए।
नासारन्ध्र से सुखोष्ण पानी को पीकर मुख से बाहर निकालना ही व्युत्क्रम कपाल भाँति है।
कपालभाति
3. शीत्कर्म कपालभाती (घेरण्ड संहिता 1/160-162)
विधि - ध्यानात्मक आसन में बैठना चाहिए।
मुख में पानी भरकर, नासारन्ध्रों से
निकालना शीत्क्रम कपालभांति कहलाता है।
नौलिक्रिया द्वारा उदरगत अङ्गों की सम्यक् गति एवं उनमें रक्तसञ्चार होता है जिससे पाचनतन्त्र के रोगों से मुक्ति मिलती है एवं उदरगत वसा के कम होने से स्थौल्य में भी लाभकारी है ।
• धौतिक्रिया द्वारा पाचनतंत्र, कान, नाक, दन्त आदि का शोधन होता है जिसमे इनके रोग नहीं होते ।
• वस्तिक्रिया द्वारा मलमार्ग का शोधन होता है जिससे विबन्ध, अपानवायु आदि रोगों से मुक्ति मिलती है ।
• नेतिक्रिया द्वारा नासिका मार्ग का शोधन होता है जिससे (chronic rhinitis, और sinusitis) आदि रोग ठीक हो जाते हैं ।
• कपालभाति द्वारा उदरगत वसा कम होकर स्थौल्य ठीक होता है एवं उदर के अङ्गों में रक्तसंचार एवं गति की वृद्धि होती है जिससे पाचनतंत्र के रोगों से मुक्ति मिलती है। फैफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ती है जो कि तमकश्वास आदि में अत्यन्त लाभकारी है ।
• त्राटक द्वारा नेत्रों का शोधन होता है जिससे नेत्ररोगों से बचाव होता है एवं एकाग्र होने की क्षमता बढ़ती है ।
षट्कर्म के लाभ