राजस्थान की रजत बूंदें
लेखक – अनुपम मिश्र
राजस्थान की रजत बूंदें
लेखक – अनुपम मिश्र
कक्षा -११ हिन्दी आधार (वितान भाग–१)
प्रस्तुतकर्ता : कुलदीप कुमार
पी. जी. टी. हिंदी
ज. न. वि. जोधपुर
लेखक परिचय : अनुपम मिश्र का जन्म महाराष्ट्र के वर्धा में सन १९४८ में हुआ | ये पर्यावरण प्रेमी हैं तथा पर्यावरण संबंधी कई आन्दोलनों से घनिष्ठ रूप से जुड़े रहे हैं | पर्यावरण सम्बन्धी मुद्दों पर इन्होने कई पुस्तकें भी लिखी हैं, जिनमें आज भी खरे हैं तालाब तथा राजस्थान की रजत बूंदें विशेष प्रसिद्ध हैं |
अनुपम मिश्र
राजस्थान की रजत बूंदें
पाठ परिचय :
रेतीली भूमि वाले राजस्थान में पानी की एक-एक बूंद कीमती होती है | इसीलिए पानी को चांदी के समान अनमोल बताया गया है |
इस पाठ में लेखक ने राजस्थान की मरुभूमि में पानी के स्रोत कुंई का वर्णन किया है | वर्षा का मीठा पानी रेतीली भूमि में समाकर खड़िया पट्टी के कारण नमी के रूप में सुरक्षित रहता है | इसी पानी को प्राप्त करने के लिए कुंई का निर्माण किया जाता है | कुंई के निर्माण का कार्य चेजारो या चेलवांजी द्वारा किया जाता है |
मरुभूमि राजस्थान के चुरू, बीकानेर, जैसलमेर और बाड़मेर आदि जिलों में कुंइयाँ बनाई गई हैं | इस प्रकार पानी की कमी में भी खडिया पट्टी के बल पर कुंई खारे पानी के बीच मीठा पानी देती हैं |
इस पाठ के माध्यम से कुंई निर्माण की प्रक्रिया तथा जल संरक्षण का महत्त्व बताया गया है |
राजस्थान की रजत बूंदें
पाठ सारांश –
कुंई की खुदाई :
पसीने में तरबतर चेलवांजी कुंई के भीतर काम कर रहे हैं | कोई तीस पैंतीस हाथ गहरी खुदाई हो चुकी है | कुंई का व्यास, घेरा बहुत ही संकरा है | इतनी संकरी जगह में खोदने का काम कुल्हाड़ी या फावड़े की बजाय बसौली से किया जाता है | बसौली छोटी डंडी का छोटे फावड़े जैसा औजार होता है | नुकीला फल लोहे का और हत्था लकड़ी का |
कुंई की गहराई में काम करते समय चेलावांजी को गरमी से बचाने के लिए ऊपर जमीन पर खड़े लोग बीच–बीच में मुट्ठी भर रेत बहुत जोर के साथ नीचे फेंकते हैं जिससे ऊपर की ताज़ा हवा नीचे पहुंचती है और नीचे की दमघोंटू गरम हवा ऊपर लौटती है | रेत के कणों से बचने के लिए चेलवांजी अपने सिर पर कांसे या पीतल आदि का बर्तन टोप की तरह पहने हुए हैं |
चेलवांजी का परिचय :
चेलवांजी यानी चेजारो, कुंई की खुदाई और एक विशेष तरह की चिनाई करने वाले दक्षतम लोग | यह काम चेजा कहलाता है
कुंई और कुंए में अंतर :
कुंई यानी बहुत ही छोटा सा कुआँ | कुआँ पुल्लिंग है, कुंई स्त्रीलिंग | यह छोटी भी केवल व्यास में है | गहराई तीस पैंतीस हाथ से साठ पैंसठ हाथ तक होती है | कुआँ भूजल से जुडा होता है जबकि कुंई रेजाणी पट्टी से | वर्षा का जल मरुभूमि में तुरंत रेत में समाकर भूजल में मिल जाता है लेकिन कहीं-कहीं रेतीली सतह के नीचे दस पंद्रह हाथ से पचास साठ हाथ नीचे खड़िया पत्थर की एक पट्टी (रेजाणी पट्टी )चलती है | यह पट्टी वर्षा के जल को गहरे खारे भूजल तक जाकर मिलने से रोकती है, वर्षा का पानी रेजाणी पट्टी के बीच नमी के रूप में सुरक्षित रह जाता है | कुओं का पानी खारा होने के कारण पीने के काम नहीं आ सकता, बस तब इन क्षेत्रों में कुंइयाँ बनाई जाती हैं | मरुभूमि में रेत के कण समान रूप से बिखरे रहने के कारण अपनी जगह नहीं छोड़ते और आपस में नहीं चिपकते | इस कारण धरती में दरार नहीं पड़ती और वर्षा का जल नमी के रूप में सुरक्षित रहता है, तेज गरमी में वाष्प बनकर उड़ता नहीं है |
पानी के तीन रूप –
इस अमृत जैसे पानी को प्राप्त करने के लिए मरुभूमि के समाज ने खूब मंथन किया है और समाज में उपलब्ध पानी को तीन रूपों में बाँटा है | पहला रूप है पालर पानी, यानी सीधे बरसात से मिलने वाला पानी | यह धरातल पर बहता है और इसे नदी, तालाब आदि में रोका जाता है |
पानी का दूसरा रूप है पाताल पानी | यह पानी भूजल है, जो कुएं, हैंडपंप, बोरिंग आदि से निकाला जाता है |
पालरपानी और पातालपानी के बीच पानी का एक तीसरा रूप है, जिसे रेजाणीपानी कहते हैं | धरातल से उतरा लेकिन पाताल में न मिल पाया पानी रेजाणी पानी है | वर्षा की मात्रा मापने में भी इंच, सेंटीमीटर नहीं बल्कि रेज़ा शब्द का उपयोग होता है | रेज़ा का माप धरातल पर हुई वर्षा को नहीं बल्कि धरातल में समाई वर्षा को मापता है | रेजाणी पानी खड़िया पट्टी के कारण पातालपानी से अलग बना रहता है और खड़िया पट्टी न होने पर भूजल में मिल जाता है |
कुंई चिनाई की प्रक्रिया –
इस रेजाणी पानी को समेटने वाली कुंई बनाना सचमुच एक विशिष्ट कला है | चेजो यानी चिनाई का श्रेष्ठतम काम कुंई का प्राण है | इसमे थोड़ी सी भी चूक चेजारो के प्राण ले सकती है | हर दिन थोड़ी-थोड़ी खुदाई होती है, डोल से मलबा निकाला जाता है और फिर आगे की खुदाई रोक कर अब तक हुए काम की चिनाई की जाती है ताकि मिटटी भसके, धंसे नहीं |
किसी-किसी जगह ईट की चिनाई से मिटटी को रोकना संभव नहीं हो पाता, तब कुंई को रस्से से बांधा जाता है |
पहले दिन कुंई खोदने के साथ-साथ खींप नाम की घास का ढेर जमा कर लिया जाता है | चेजारो खुदाई शुरू करते हैं और बाकी लोग खींप की घास से कोई तीन अंगुल मोटा रस्सा बंटने लगते है | पहले दिन का काम पूरा होते-होते कुंई कोई दस हाथ गहरी हो जाती है | खुदाई रोककर इसके तल पर दीवार के साथ सटाकर रस्से का पहला गोला बिछाया जाता है फिर उसके ऊपर दूसरा, तीसरा, चौथा | खींप घास से बना खुरदरा मोटा रस्सा हर घेरे पर अपना वजन डालता है | रस्से का आखिरी छोर ऊपर रहता है |
अगले दिन की खुदाई के बाद रस्से की पहले दिन जमाई गई कुंडली दुसरे दिन खोदी गई जगह में सरका दी जाती है और ऊपर छूटी दीवार में नया रस्सा बांधा जाता है | लगभग पांच हाथ के व्यास की कुंई में रस्से का एक घेरा पंद्रह हाथ का बैठता है और एक हाथ की गहराई में रस्से के आठ दस लपेटे खप जाते हैं | इस प्रकार तीस हाथ गहरी कुंई बनाने के लिए लगभग चार हज़ार हाथ लंबा रस्सा चाहिए होता है |
कुंई निर्माण की प्रक्रिया –
मरुभूमि में कहीं-कहीं न तो चिनाई के लिए पत्थर मिलता है न खींप घास लेकिन रेजाणी पट्टी है तो कुंई बनाई जाती है | ऐसी जगहों पर भीतर की चिनाई लकड़ी के लम्बे लट्ठों से की जाती है | लट्ठे अरणी, बण (कैर) बावल या कुम्बट के पेड़ों की डगालों से बनाए जाते हैं | लट्ठे नीचे से ऊपर की ओर एक दूसरे में फंसाकर सीधे खड़े किए जाते हैं | फिर इन्हें खींप या चग की रस्सी से बांधा जाता है |
नीचे खुदाई और चिनाई का काम कर रहे चेलवांजी को मिटटी की खूब परख रहती है | खड़िया पत्थर की पट्टी आते ही नीचे धार लगा दी जाती है और काम पूरा हो जाता है | चेजारो ऊपर आ जाते हैं |
चेजारो का सम्मान –
कुंई की सफलता यानी सजलता उत्सव का अवसर बन जाती है | यों तो पहले दिन से ही काम करने वालों का विशेष ध्यान रखना यहाँ की परंपरा रही है, पर काम पूरा होने पर तो विशेष भोज का आयोजन होता था |
चेलवांजी को विदाई के समय तरह-तरह की भेंट दी जाती थी | चेजारो के साथ गाँव का यह सम्बन्ध उसी दिन नहीं टूट जाता था | आच प्रथा से उन्हें वर्ष भर के तीज त्योहारों में, विवाह जैसे मंगल अवसरों पर नेग, भेंट दी जाती और फसल आने पर खलिहान में उनके नाम से अनाज का एक अलग ढेर भी लगता था |
अब चेजारो का इतना सम्मान नहीं किया जाता | अब तो केवल मजदूरी देकर ही काम करवाने का रिवाज़ आ गया है |
कुंई का मुँह छोटा रखने का कारण –
कुंई का मुँह छोटा रखने के तीन बड़े कारण हैं | रेत में जमा नमी से पानी की बूंदें बहुत धीरे-धीरे रिसती हैं | दिन भर में एक कुंई में इतना ही पानी जमा होता है कि मुश्किल से दो-तीन घड़े भर सकें | कुंई के तल पर पानी की मात्रा इतनी कम होती है कि यदि कुंई का व्यास बड़ा हो तो कुंई का पानी सतह पर फैल जाएगा और उसे ऊपर निकालना संभव नहीं होगा |
छोटे व्यास की कुंई में पानी दो चार हाथ की ऊंचाई ले लेता है और उसमे बाल्टी या घड़ा डूब जाता है | कई जगहों पर बाल्टी के बजाय छोटी चडस का उपयोग किया जाता है |
धातु की बाल्टी पानी में आसानी से डूबती नहीं पर मोटे कपडे या चमड़े की चडस के मुँह पर लोहे का वज़नी कड़ा बंधा होता है | चडस पानी से टकराता है ऊपर का वज़नी भाग नीचे के भाग पर गिरता है और इस तरह कम मात्रा के पानी में भी ठीक से डूब जाता है | भर जाने के बाद ऊपर उठते ही चडस अपना पूरा आकार ले लेता है |
कुंई के व्यास का सम्बन्ध इन क्षेत्रों में पड़ने वाली तेज गरमी से भी है | व्यास कम हो तो कुंई के भीतर का पानी ज्यादा फैल जाएगा | बड़ा व्यास पानी को भाप बनकर उड़ने से रोक नहीं पायेगा |
कुंई को, उसके पानी को साफ़ रखने के लिए उसे ढककर रखना जरुरी है | छोटे मुँह को ढकना सरल होता है | रेगिस्तान में अमृत जैसे इस मीठे पानी की सुरक्षा के लिए कुंइयों के ढक्कनों पर छोटे-छोटे ताले भी लगने लगे हैं |
कुंई गहरी बने तो पानी खीचने की सुविधा के लिए उसके ऊपर घिरनी या चकरी भी लगाईं जाती है | यह गरेडी, चरखी या फरेडी भी कहलाती है | फरेडी लोहे की दो भुजाओं पर भी लगती है | लेकिन प्रायः यह गुलेल के आकार के एक मजबूत तने को काटकर, उसमें आर पार छेद कर लगाईं जाती है | इसे ओडाक कहते हैं | ओडाक और चरखी चडसी को यहाँ वहाँ बिना टकराए सीधे ऊपर तक लाती हैं, पानी बीच में छलक कर गिरता नहीं | वज़न खीचने में तो इससे सुविधा रहती ही है |
कुंइयों पर ग्राम समाज का अंकुश –
निजी और सार्वजनिक संपत्ति का विभाजन करने वाली मोटी रेखा कुंई के मामले में बड़े विचित्र ढंग से मिट जाती है | हरेक की अपनी-अपनी कुंई है | उसे बनाने और उससे पानी लेने का हक़ उसका अपना हक़ है |
लेकिन कुंई जिस क्षेत्र में बनती है, वह गाँव समाज की सार्वजनिक जमीन है | उस जगह बरसने वाला पानी ही बाद में वर्ष भर नमी की तरह सुरक्षित रहेगा और इसी नमी से साल भर कुंइयों में पानी भरेगा | अब उस क्षेत्र में बनने वाली नई कुंई का अर्थ है, पहले से तय नमी का बंटवारा | इसलिए निजी होते हुए भी सार्वजनिक क्षेत्र में बनी कुंइयों पर ग्राम समाज का अंकुश बना रहता है | बहुत जरुरत पड़ने पर ही समाज नई कुंई की स्वीकृति देता है |
कुंई से दिन भर में बस दो तीन घड़े मीठा पानी निकाला जा सकता है | इसलिए प्रायः पूरा गाँव गोधूलि वेला में कुंइयों पर आता है | दो-तीन घड़े भरने पर डोल और रस्सियाँ समेट ली जाती हैं | कुंइयों के ढक्कन बंद हो जाते हैं | अब रात-भर और अगले दिन-भर कुंइयाँ आराम करेंगी |
राजस्थान में कुंइयाँ –
रेत के नीचे सब जगह खड़िया पट्टी नहीं है, इसलिए कुंई भी पूरे राजस्थान में नहीं मिलेगी | चुरू, बीकानेर, जैसलमेर और बाड़मेर के कई क्षेत्रों में यह पट्टी चलती है और इसी कारण वहाँ गाँव-गाँव में कुंइयाँ ही कुंइयाँ हैं | जैसलमेर जिले के एक गाँव खडेरों की ढाणी में तो एक सौ बीस कुंइयाँ थी | कहीं-कहीं इन्हें पार भी कहते हैं | जैसलमेर तथा बाड़मेर जिले के कई गाँव पार के कारण ही आबाद हैं और इसीलिए उन गाँवों के नाम भी पार के नाम पर ही हैं | जैसे- जानरे आलो पार, सिरगु आलो पार आदि | अलग-अलग जगह पर खडिया पट्टी के भी अलग-अलग नाम हैं | कहीं यह चारोली है, तो कहीं धाधड़ो, धडधडो, कहीं पर बिट्टू रो बल्लियो के नाम से जानी जाती है, तो कहीं इस पट्टी का नाम केवल “खड़ी” भी है |
और इसी खड़ी के बल पर खारे पानी के बीच मीठा पानी देती खड़ी रहती है कुंई |
काठिन्य-निवारण :
तरबतर - पूरी तरह गीला
उखरूँ - उकड़ूँ बैठना, पंजे के बल घुटने मोड़कर बैठना
खींप - एक प्रकार की घास जिसके रेशों से रस्सी बनाई जाती है
डगालों - तना या मोटी टहनियाँ
आच प्रथा - कुंई खोदने वालों को सम्मानित करने वाली प्रथा
चड़स - चमड़े से बना पानी निकालने का पात्र
पेचीदा - उलझा हुआ
मरुभूमि - मरुस्थल, रेगिस्तान |
मूल्यांकन-प्रश्न :-
पाठ्य-पुस्तक के बोधात्मक प्रश्न—
सधन्यवाद |
प्रस्तुतकर्ता
कुलदीप कुमार
पी.जी.टी. हिंदी
ज.न.वि.,जोधपुर