कृष्ण काव्य परंपरा में सूरदास का स्थान ��
पवन कुमारी
असिस्टेंट प्रोफेसर
स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग
हंसराज महिला महाविद्यालय
जालंधर
सूरदास का स्थान
हम भक्तन के भक्त हमारे।
भक्तै काज लाज हिय धरिकै पाय
पयोदधाऊँ।
जहँ - जहँ पीर पडै भक्तन पै तहँ - तहँ जाय छुड़ाऊँ।
भक्ति की त्रिवेणी प्रवाहित हुई है।
सकल तत्व ब्रह्मांड देव पुनि ,
माया सब विधि काल।
प्रकृति पुरुष श्रीपति नारायन , सब है अंश गुपाल।।
खेलत खेलत चित्त में आई सृष्टि करन विस्तार।
अपने आप हरि प्रगट कियो हैं हरि पुरुष अवतार ।।
सूरदास कहते हैं
चरन कमल वंदी हरिराई।
जाकी कृपा पंग गिरि लं , अंधे को सब कुछ दरसाई।
बहिरौ सुनै , गूंग पुनि बोले , रंक चलै सिर छत्र धराई।
सूरदास स्वामी करुणामय , बार - बार बंदौ तिहि पाँई।
बल्लभाचार्य ने नवधाभक्ति में प्रेम लक्षणा भक्ति जोड़कर श्दशधा भक्ति का
विधान बनाया। सूरदास ‘ दशधा भक्ति ’ कापूर्णतया पालन करते हैं
श्रवण कीर्तन स्मरण - पाद रत अरचन वंदन दास।
सख्य और आत्मनिवेदन प्रेमलक्षणा जास।।
हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि कृष्ण
कथा की लिखित परंपरा तो है ही ,
लोकजीवन में भी इस कथा की गहरी पैठ है। आज भी हमें ऐसे लोग मिल जाएँगे
जिन्हें कृष्ण कथा की लिखित परंपरा का
बोध नहीं है पर लोक जीवन में रचे - बसे कृष्ण की अद्भुत लीलाओं से वे भलीभाँति परिचित हैं। सूरदास ने कृष्ण कथा के लिए दोनों परंपराओं - शास्त्रीय और लोक से आधार ग्रहण किया है।
सख्य , वात्सल्य और माधुर्य भाव की
भक्ति पर उन्होंने विशेष जोर दिया है।
वे श्रीकृष्ण को सखा मानते हैं।
उनके बालरूप को सर्वाधिक महत्व प्रदान करते हैं और गोपियों के माध्यम से माधुर्यभाव की भक्ति प्रवाहित करते हैं।
सूर के काव्य में राधा स्वकीया हैं और गोपियाँ परकीया। गोपियों का प्रेम अत्यधिक तीव्र और मर्यादाओं का उल्लंघन करने वाला है।
����� धन्यवाद