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कृष्ण काव्य परंपरा में सूरदास का स्थान  �

पवन कुमारी

असिस्टेंट प्रोफेसर

स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग

हंसराज महिला महाविद्यालय

जालंधर

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  • भारतीय धर्म साधना संस्कृति साहित्य तथा कलाएं कृष्ण के विलक्षण व्यक्तित्व से जिस रूप में प्रभावित हैं उतने वे किसी अन्य चरित्र से नहीं। कृष्ण आख्यान की परंपरा अत्यंत प्राचीन है जो कि भारतीय साहित्य में विविध रूपों में उपलब्ध होती है। 

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  • वैदिक तथा संस्कृत साहित्य में कृष्ण के तीन रूप मिलते हैं ऋषि एवं धर्म उपदेशक,  नीति विशारद क्षत्रिय राजा,  बाल और किशोर रूप में विभिन्न प्रकार की अलौकिक तथा अलौकिक लीलाकारी अवतार पुरुष के रूप में। 

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  • कृष्ण   काव्य   परंपरा   पर   विचार   किया   गया   है।   इस   परंपरा   में   सूरदास   का   क्या   स्थान   है ,  इस   पर   भी   प्रकाश   डाला   गया   है।   कृष्णकाव्य   की   परंपरा   काफी   प्राचीन   है।   इस   परंपरा   का   विकास   संस्कृत ,  प्राकृत ,  अपभ्रंश   आदि   के   काव्यों   से   होता   हुआ   हिंदी   में   आया   है।   हिंदी   में   सूरदास   के   अलावा   अन्य   कई   कवियों   ने   कृष्ण   का   गुणगान   किया   है।   इस   परंपरा   में   अनेक   महत्वपूर्ण   कवियों   में   सूरदास   का   विशिष्ट   स्थान   है।

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  •  कृष्णकाव्य   परंपरा   के   प्रतिनिधि   कवि   सूरदास   का   महत्व   प्रतिपादित   किया   जाएगा।   सूरदास   भक्तिकाल   के   श्रेष्ठ   कवि   हैं।   वे   कृष्ण   के   उपासक   हैं।   इन्हें   कृष्णभक्ति   काव्य   परंपरा   का   सर्वश्रेष्ठ   कवि   स्वीकार   किया   जाता   है।   सूर   पुष्टिमार्गी   थे।   इनकी   भक्ति   प्रेमाभक्ति   थी।   प्रेमाभक्ति   में   समर्पण   को   ही   सब   कुछ   माना   गया   है।   भारतीय   वांगमय   में   बहुत   पहले   से   ही   कृष्ण   का   उल्लेख   मिलने   लगता   है।   उनकी   लीलाओं   का   भारतीय   साहित्य   में   अनेक   विधि   वर्णन   हुआ   है।

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  • कृष्ण   काव्य   की   परंपरा   काफी   प्राचीन है विष्णु   के   अनेक   अवतारों   में   श्रीकृष्ण   कोभी   एक   अवतार   माना   गया   है।   कृष्णावतार   अद्भुत   और   विविधतापूर्ण   है।   इसील उन्हें   उस   समय   का   अद्वितीय व्यक्ति घोषित   किया   गया   है।   श्री   कृष्ण   का   उल्लेख   हमें   वैदिक   साहित्य   से   ही   मिलने   लगता   है।   ऋग्वेद   में   श्रीकृष्ण   का   उल्लेख   ऋषि   या   रचयिता   के   रूप   में   हुआ   है।   कौषीतकी   ब्राह्मण   में   कृष्ण   आंगिरस   का   उल्लेख   है।

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  • छांदोग्योपनिषद   में   कृष्ण   को   आंगिरस   काशिष्य   बताया   गया   है।   आंगिरस   ने   अपने   शिष्य   कृष्ण   को   जो   उपदेश   दिया   है   तथा   श्रीमद्भागवत्गीता   में   श्रीकृष्ण   ने  अर्जुन   को   जो   उपदेश   दिया   है ,  दोनों   में   पर्याप्त   वैचारिक   समानता   मिलती   है।  छांदोग्य   उपनिषद   के   कृष्ण   देवकी   पुत्र   हैं। 

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  • वैदिक   साहित्य   में   कृष्ण   का   जो   उल्लेख प्राप्त   होता   है ,  उसके   आधार   पर   न   तो   हम   उन्हें   अवतार   कह   सकते   हैं   और   न   देवता।   वे   देवकी   पुत्र   थे   और घोर   आंगिरस   के   शिष्य   थे।   अपने   गुरु  ( आंगिरस )  से   उन्होंने   ब्रह्म   विद्या   की   दीक्षा   ली   थी।   वे   एक   मंत्रदृष्ट   ऋषि   के   रूप   में   स्वीकार   किए   गए   थे।

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  • कृष्ण   चरित्र   का   विस्तृत   वर्णन   भागवत   पुराण   में   हुआ   है।   इस   पुराण   में   कृष्ण के   असुर   संहारक   रूप ,  बाल   लीला ,  रासलीला ,  राजनीतिवेत्ता ,  कूटनीतिज्ञ ,  योगेश्वर  औरपरमब्रह्म   स्वरूप   की   विस्तृत   विवेचना  हुआ  है।   भागवत   के   दशम   स्कंध   के  पूर्वार्द्धऔर   उत्तरार्द्ध   में   कृष्ण   कथा   का   विस्तृत वर्णन   है। 

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सूरदास का स्थान

  • विद्यापति   के   बाद   सूरदास   को   ब्रज   भाषा   का   प्रथम   कृष्ण   कवि   माना   गया   है।   सूरदास   की    सूरसागर  ,   सूरसारावली   और   साहित्यलहरी   नामक   तीन   रचनाएँ   हैं।   सर   साहित्य   के   कुछ   अध्येता    साहित्यलहरी   को   सूरदास   की   रचना   नहीं   मानते।   सूरदास  ने अपन रचनाओं   में   कृष्ण जन्म ,  उनकी   बाल   क्रीड़ाओं ,  गोचारण ,  राधा   और   गोपियों   के   साथ   प्रेमक्रीड़ा ,  अनेक   असुरों   को   वध ,  गोवर्धन   धारण ,  मथुरा गमन ,  कंस   वध ,  द्वारिका   गमन   और   कुरुक्षेत्र   में   राधा   ओर   गोप -गोपियों   से   पुनर्मिलन   का   प्रभावी   चित्रण   किया   है। 

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  • सूरदास   के   कृष्ण   पूर्णब्रह्म   हैं।   उनकी   भक्ति   सख्य   भाव   की   है।   उनके   साहित्य में   विनय   और   दास्य   भाव   के   पद   कम   हैं ,  किंतु   कृष्ण   काव्य   में   इन   पदों का   विशेष   महत्व   है।   उनके   भगवान भक्तों   की   पुकार   पर   दौड़   पड़ते   हैं।   सूरदास   के   कृष्ण   की   घोषणा   है

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हम   भक्तन   के   भक्त   हमारे।

भक्तै   काज   लाज   हिय   धरिकै   पाय 

पयोदधाऊँ।

जहँ - जहँ   पीर   पडै   भक्तन   पै   तहँ - तहँ   जाय   छुड़ाऊँ।

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  • सूरदास   का   प्रमुख   ग्रंथ    सूरसागर    है।   इस   ग्रंथ   में   वात्सल्य ,  शृंगार   और   

भक्ति   की   त्रिवेणी   प्रवाहित   हुई   है।

  • सूर   ने   श्रीकृष्ण   को   परब्रह्म   माना   है।   उनके   अनुसार   संपूर्ण   ब्रह्मांड   में   श्रीकृष्ण   ही   व्याप्त   हैं ,  कोई   दूसरा   नहीं।   ब्रह्म   के   इसी   रूप   का   चित्रण   करते   हुए    सूरदास   ने   लिखा   है

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सकल   तत्व   ब्रह्मांड   देव   पुनि ,  

माया   सब   विधि   काल।

प्रकृति   पुरुष   श्रीपति   नारायन ,  सब   है   अंश   गुपाल।।

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  • यही   ब्रह्म   भक्तों   को   आनंद   प्रदान   करने के   लिए   अवतार   लेते   हैं।   भगवान श्रीकृष्ण   ने   भक्तों   को   आनंद   प्रदान   करने   के   उद्देश्य   से   ही   अपनी   समस्त   शक्तियों   सहित   वृंदावन   में   अवतार   लिया   है।   सूरदास   ने   श्रीकृष्ण   की   लीला   तथा   विस्तार   के   संबंध   में   लिखा   है

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खेलत खेलत   चित्त   में   आई   सृष्टि   करन   विस्तार।

अपने   आप   हरि   प्रगट   कियो   हैं   हरि   पुरुष   अवतार   ।।

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  • सूरदास   पूर्णतया   पुष्टिमार्ग   के   अनुयायी   थे। ब्रह्म   की   कृपा   प्राप्ति   के   पश्चात   ही   जीव   सर्व   समर्थ   होता   है।   वह   कुछ   भी कर   सकने   में   सक्षम   हो   जाता   है। 

 सूरदास   कहते   हैं

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चरन   कमल   वंदी   हरिराई।

जाकी   कृपा   पंग   गिरि   लं ,  अंधे   को   सब   कुछ   दरसाई।

बहिरौ   सुनै ,  गूंग   पुनि   बोले ,  रंक   चलै   सिर   छत्र   धराई।

सूरदास   स्वामी   करुणामय ,  बार - बार   बंदौ   तिहि   पाँई।

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  • भक्ति   नौ   प्रकार   की   मानी   जाती   है :   श्रवण ,  कीर्तन ,  स्मरण ,  पाद   सेवन ,  अर्चन ,  वंदन ,  दास्य ,  सख्य   और   आत्म निवेदन।   इसे    नवधा   भक्ति    कहते   हैं।   

बल्लभाचार्य   ने   नवधाभक्ति   में   प्रेम   लक्षणा   भक्ति   जोड़कर   श्दशधा   भक्ति   का   

विधान   बनाया।   सूरदास    दशधा   भक्ति    कापूर्णतया   पालन   करते   हैं

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श्रवण   कीर्तन   स्मरण - पाद   रत   अरचन   वंदन   दास।

सख्य   और   आत्मनिवेदन   प्रेमलक्षणा   जास।।

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  • कृष्ण   काव्य   परंपरा   के   अनुशीलन   से   यह   ज्ञात   होता   है   कि   कृष्ण   कथा   तीन   स्थलों   गोकुल ,  मथुरा   और   द्वारिका   से   जुड़ी   हुई   हैं।   गोकुल ,  जहाँ   कृष्ण   का   बचपन   बीता   था।   जहाँ   उनकी   बाल   लीला   और   किशोर   लीला   संपन्न   हुई   थीं   उनकी   इन   रसमयी   लीलाओं   पर   माता - पिता ,  गोप - गोपी   आदि   मुग्ध   हुए   थे।   इस   बात   पर   ध्यान   देना   चाहिए   कि   मथुरा   और   द्वारिका   में   रहने   वाले   कृष्ण   वही   नहीं   हैं   जो   गोकुल   में   थे।   मथुरा   और   द्वारिका   में   कृष्ण   के   ऐश्वर्यमयी   रूप   में   निखार   आया   है। 

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  • कृष्ण   काव्य   परंपरा   पर   बात   करते   हुए   

हमें   यह   ध्यान   रखना   चाहिए   कि   कृष्ण   

कथा   की   लिखित   परंपरा   तो   है   ही ,  

लोकजीवन   में   भी   इस   कथा   की   गहरी   पैठ है।   आज   भी   हमें   ऐसे   लोग   मिल   जाएँगे   

जिन्हें   कृष्ण   कथा   की   लिखित   परंपरा   का   

बोध   नहीं   है   पर   लोक   जीवन   में   रचे - बसे   कृष्ण   की   अद्भुत   लीलाओं   से   वे   भलीभाँति   परिचित   हैं।   सूरदास   ने   कृष्ण   कथा   के   लिए   दोनों   परंपराओं - शास्त्रीय   और   लोक   से   आधार   ग्रहण   किया   है। 

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  • सूरदास   ने   राधा   और   कृष्ण   के   प्रेम   के   सहज   विकास   में   अनेक   नवीन   प्रसंगों   की   उद्भावना   की   है।   कृष्ण   और   राधा   का   बाल   सखा सखी   रूप   सूर   की   मौलिक   उद्भावना   है।   निःसंदेह   कृष्ण   काव्य   परंपरा   में   सूरदास   की   गणना   सर्वश्रेष्ठ   कवि   के   रूप   में   पूरी   तरह   तर्कसंगत   है।

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  • सूरदास   के   साहित्य   में   भक्ति   के   सभी   भावों   का   वर्णन   मिल   जाता   है   पर 

सख्य ,  वात्सल्य   और   माधुर्य   भाव   की   

भक्ति   पर   उन्होंने   विशेष   जोर   दिया   है।

   वे   श्रीकृष्ण   को   सखा   मानते   हैं।   

उनके   बालरूप   को   सर्वाधिक   महत्व   प्रदान   करते   हैं   और   गोपियों   के   माध्यम   से   माधुर्यभाव   की   भक्ति   प्रवाहित   करते   हैं।   

सूर   के   काव्य   में   राधा   स्वकीया   हैं   और   गोपियाँ   परकीया।   गोपियों   का   प्रेम   अत्यधिक   तीव्र   और   मर्यादाओं   का   उल्लंघन   करने   वाला   है।

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����� धन्यवाद