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आदमीनामानज़ीर अकबराबादी

जवाहर नवोदय विद्यालय, तिनसुकिया (असम )

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नज़ीर अकबराबादी

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कवि परिचय

  • जीवन परिचय नज़ीर अकबराबादी का जन्म उत्तर प्रदेश के आगरा शहर में सन 1735 में हुआ था। इन्होंने आगरा में ही सुप्रसिद्ध शिक्षाविदों से अरबी- फारसी की शिक्षा प्राप्त की। इन्हें हर प्रकार के तीज- त्योहारों में बहुत दिलचस्पी थी।
  • ये हिंदू त्योहारों में भी भाग लेकर आनंद उठाते थे । इन्हें किसी भी विषय पर कविता करने में कोई कठिनाई नहीं होती थी । इनके प्रशंसक रास्ते में रोककर इनसे अपने मनपसंद की कविता सुनते थे | सन् 1833 में इनका निधन हो गया।

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रचनाएं :-

नज़ीर अकबराबादी ने विभिन्न विषयों पर कविताएँ लिखी हैं। इनकी कविता उर्दू की नज्म शैली में आती है। इन्होंने सब ठाठ पड़ा रह जायेगा, जब लाद चलेगा बंजारा, जैसी नीति से संबंधित नज़्मों के अतिरिक्त भिश्ती, ककड़ी बेचने वालों, बिसाती, गाना गाकर जीवनयापन करने वालों के काम में सहायता देने वाली नज्में भी लिखी है। आदमीनामा इनकी एक उद्बोधनात्मक कविता है।

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आदमीनामा

केन्द्रीय - मूलभाव

आदमीनामा नज़ीर अकबराबादी द्वारा रचित एक उद्बोधनात्मक कविता है जिसमें कवि ने आदमी को संसार की सर्वश्रेष्ठ रचना मानते हुए उसे उसकी कमियों से परिचित कराते हुए उसे अपने जीवन में सद्गुणों को अपनाकर संसार को और भी अधिक सुंदर बनाने की प्रेरणा दी है। इस दुनिया में आदमी सब कुछ करता प्रतीत होता है। वही दुनिया का बादशाह है और वही प्रजा है। मालदार भी वही है और गरीबी वही है। रोजी रोटी देने वाला भी वही है और रोटी खाने वाला भी वही है। मस्जिद बनाने वाला,नमाज पढ़ने वाला,वहां से जूते चुरानेवाला, यदि आदमी है तो इमाम और खुतबाख्वां भी आदमी है। आदमी का अपमान करने वाला आदमी है;हत्यारा भी आदमी है; अपमान करने वाला आदमी है तो रक्षक भी आदमी है। शरीफ भी आदमी है और कमीना भी आदमी है। आदमी गुरु है और चेला भी आदमी ही है। अच्छा भी आदमी है और बुरा भी वही है।

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दुनिया में बादशाह है सो है वह भी आदमी ।�और मुफ़लिस ओ- गदा है सो है वो भी आदमी ॥�ज़रदार बेनवा है सो है वो भी आदमी ।�निअमत जो खा रहा है सो है वो भी आदमी ॥�टुकड़े चबा रहा है सो है वो भी आदमी ॥

कवि कहता है कि इस संसार में आकर जो राजा बनता है वह आदमी होता है तथा इस संसार में दीन – हीन, गरीब और भिखारी भी आदमी ही होता है | दौलत वाला आदमी है और कमजोर भी आदमी ही है जो प्रतिदिन स्वादिष्ट भोजन खाता है वह आदमी है और रूखे टुकड़े चबाने वाला भी आदमी ही है |

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बादशाह - राजा

मुफ़लिस - गरीब

गदा - भिखारी

ज़रदार - अमीर

बेनवा - कमज़ोर

निअमत - स्वादिष्ट भोजन

  • शब्दार्थ

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प्रश्न:-

  • कवि इस अवतरण में क्या बताना चाहता है?
  • अमीर और गरीब इस धरती पर को है?

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बादशाह-

मस्जिद भी आदमी ने बनाई है यां मियां।बनते हैं आदमी ही इमाम और खु़तबाख़्वां॥पढ़ते हैं आदमी ही कु़रान और नमाज़ यां।और आदमी ही उनकी चुराते हैं जूतियां॥जो उनको ताड़ता है सो है वह भी आदमी॥

कवि कहता है कि इस संसार में मस्जिद भी आदमी ने बनाई है और आदमी ही मस्जिद में नमाज़ पढाने वाले तथा कुरान शरीफ़ का अर्थ बताने वाले धर्मगुरू बनते है | आदमी ही कुरान शरीफ़ पढ़ते है और नमाज़ अदा करते है | आदमी ही मस्जिद में आने वालों के जूते चुराते हैं और उन जूतों को चुराने वालों पर नज़र रखने वाला भी आदमी ही होता है |

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शब्दार्थ

मियाँ - श्रीमान

इमाम - नमाज़ पढ़ाने वाले धर्मगुरू

खुतबख्वां - कुरान शरीफ़ का अर्थ बताने वाला

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प्रश्न:-

  1. मस्जिदें किसने बनाई हैं और उनमें नमाज़ पढ़ने वाले कौन हैं?
  2. नमाज़ पढ़ने वाले धर्मगुरु को क्या कहते हैं?

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यां आदमी पे जान को वारे हैं आदमी ।�और आदमी पे तेग़ को मारे है आदमी ॥�पगड़ी भी आदमी की उतारे है आदमी ।�चिल्ला के आदमी को पुकारे है आदमी ॥�और सुन के दौड़ता है सो है वह भी आदमी ।

कवि कहता है कि इस संसार में मनुष्य ही मनुष्य के लिए अपने प्राणों को न्योछावर कर देता है और आदमी ही आदमी को तलवार से मार देता है | आदमी ही दुसरे आदमी का अपमान करता है | आदमी ही आदमी के ऊपर अधिकार जमाते हुए उसे चिल्लाकर पुकारता है तो उसकी सेवा करने वाला आदमी उसकी पुकार सुनकर दौड़ता चला जाता है |

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शब्दार्थ

1. जान को वारे - प्राण न्योछावर करना

3. पगड़ी उतारना - अपमान करना

2. तेग - तलवार

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प्रश्न:-����

पगड़ी उतारने से क्या तात्पर्य हैं?

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अशराफ़ और कमीने से ले शाह ता वज़ीर ।�ये आदमी ही करते है सब कारे दिलपज़ीर ॥यां आदमी मुरीद है और आदमी ही पीर ।अच्छा भी आदमी ही कहाता है ए नज़ीर॥और सब में जो बुरा है सो है वह भी आदमी ॥

इन पंक्तियों में कवि कहता है कि आदमी ही सज्जन और नीच होता है | राजा से मंत्री तक भी कोई आदमी ही होता है | आदमी ही ऐसा कार्य करता है जो सब के दिल को लुभाने वाले होते हैं | इस संसार में आदमी ही शिष्य होता है तो दूसरा आदमी उसका गुरु होता है | कवि नज़ीर कहते है कि संसार में अच्छा भी आदमी होता और संसार में जो सब से बुरा है वह भी आदमी ही होता है |

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शब्दार्थ:-

  1. अशराफ़- शरीफ़
  2. कमीना- नीच
  3. शाह - राजा
  4. वज़ीर - मंत्री
  5. करे - काम
  6. दिलपंजीर - दिल को अच्छा लगने वाला
  7. मुरीद- शिष्य
  8. पीर - गुरु

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गृहकार्य

‘आदमीनामा’ शीर्षक कविता के इन अंशो को पढ़कर आपके मन मे मनुष्य के प्रति क्या धारणा बनती हैं?

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धर्मेन्द्र

जवाहर नवोदय विद्यालय, तिनसुकिया असम

(प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक)