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Presented by-Prince kumar

Roll no -17

Batch 2023-24

Topic:- Shukravaha Srotas

JEEVAK AYURVEDIC MEDICAL COLLEGE AND RESEARCH CENTRE

KAMLAPUR AKAUNI CHANDAULI

Guided by-

Dr.Amit kumar singh (HOD)

Associate professor

Dr. Varsha gupta

Assistant professor

Department of Rachna sharir

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INDEX

•Introductuon to Srotas

•Total number of srotas

•Srotas Swaroop

•Srotas Dushti

•Clinical importance

•Modern correlation

•Shukravaha Srotas

•Some Articles regarding Shukravaha

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स्रोतस्-शारीर (Channels of Circulation)��आयुर्वेद में प्रत्येक विषय का वर्णन जिस दृष्टि से किया जाता है उसका आधुनिक विचारधारा में सामंजस्य बैठाना कुछ दुरूह सा प्रतीत होता है, क्योंकि कई विषयों के वर्णन में प्राचीन विचारकों में मतभिन्नता प्रतीत होती है जैसा कि पिछले अध्यायों में हमने देखा है। इसी प्रकार स्रोतों के विषय में भी कुछ मतभिन्नता प्रतीत होती है। इस प्रकरण में स्रोतों के विषय में यथावश्यक विवरण दिया जा रहा है।��स्रोत शब्द की व्युत्पत्ति�स्रोतो की व्युत्पत्ति के विषय में विद्वानों के मत इस प्रकार हैं –��# स्रोतांसि खलु परिणाममापद्यमानानां धातूनामभिवाहीनी भवन्त्ययनार्थेन�� चरक वि० 5/3

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स्रवणात् स्रोतांसि(चरक सू० 30/12)��जिसमें स्रवण किया होती है उन्हें स्रोत कहते हैं। स्रोत परिणाम प्राप्त धातुओं को अन्यत्र ले जाने के लिए वहन करने वाले होते हैं।��इनकी व्याख्या में अनेक विद्वानों के मत इस प्रकार हैं-��1. चक्रपाणि-��स्रवणादिति रसादेरेव पोष्यस्य स्रवणात्।��स्रवण कर्म में पोष्य धातुओं में पोषक रसादि का स्पन्दन (शीघ्र गमन) होता है।��2. कविराज गंगाधर जी-��स्रवणाद्रसादिस्रावपथत्वात् स्रोतांस्युच्यन्ते।��

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।�3. कविराज गणनाथ जी-��स्रवणं स्यन्दनं��इस प्रकार तीनों व्याख्याओं से यही जानकारी प्राप्त होती है कि जिन मागों द्वारा धातुपोषक रसों का द्रुतगति से गमन होता है उन्हें स्रोत कहा जाता है।��4. आचार्य डल्हण-��प्राणान्नवारिरसशोणितमांसमेदोवाहित्वं स्रोतसाम् । सु०शा०१/३��प्राण, अन्न, जल, रस रक्तादि पदार्थों का जिन मार्गों से स्रवण होता है उन मागों, को स्रोतस् कहा जाता है।

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स्रोतों का स्वरूप��1. जिन धातुओं को. वहन करते हैं उनके वर्ण के समान आकृति धारण करते हैं। अर्थात् अनेक वर्ण के होते हैं।��2. ये गोल, चपटे और सूक्ष्म होते हैं।��3. पत्र के प्रतान के समान फैले रहते हैं।��4. स्रोतस् शरीरगत नाली के समान या अवकाशयुक्त अवयव हैं।��5. स्रोतों में रस का स्रवण भी होता है।

मूलात् खादान्तरदेहे प्रसृतं त्वभिवाहि यत्। स्रोतस्तदिति विज्ञेयं सिराधमनीविवर्जितम् ।। सु०शा० 9/25

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स्रोतों की संख्या��चरक एवं सुश्रुत में मान्य स्रोतों की संख्या भिन्न-भिन्न है तथा कुछ लोग असंख्य भी मानते है। चरक विमान में लिखा है-��“यावन्तः पुरुषे मूर्तिमन्तो भावविशेषास्तावन्त एवास्मिन् स्रोतसां प्रकारविशेषाः” च०वि० 5/6��प्रकार विशेष- पुरुषों में जितने मूर्तिमान भाव हैं उतने ही इस पुरुष में स्रोतों के प्रकार भेद हैं।��इस प्रकार स्रोतों की संख्या असंख्य मानते हुए पुरुष को स्रोतों का समुदाय ही मानते है|

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चरक - व्यावहारिक दृष्टि से मूल और प्रकोप लक्षणों द्वारा चरक में 13 स्रोत माने गए हैं तथा गर्भ प्रकरण में आर्तववह नामक एक स्रोत और माना है इस प्रकार चरक ने कुल 14 स्रीत माने हैं-L�

1. प्राणवह�2. उदकवह�3. अन्नवह�4. रसवह�5. रुधिरवह�6. मांसवह�7. मेदोवह�8. अस्थिवाह �9. मज्जावह�10.शुक्रवह�11. मूत्रवह�12. पुरीषवह�13.स्वेदवह�14. आर्तववह�

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सुश्रुत-शल्यतन्त्र में 11 स्रोत माने गए हैं तथा इनकी दो-दो संख्या मानी हैं। इस प्रकार कुल 22 स्रोत हो जाते हैं-��1. रसवह 2�2. रक्तवह 2�3. मांसवह 2�4. मेदवह 2�5. मूत्रवह 2�6. पुरीषवह 2�7. शुक्रवह 2�8. आर्तववह 2�9. अन्नवह 2�10. प्राणवह 2�11. उदकवह 2

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शुक्रवाह स्रोतस

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“शुक्रवहे द्वे, तयोर्मूलं स्तनौ वृषणौ च”सुश्रुत में शुक्रवह दो स्रोत बताए हैं। उनका मूल स्तन और वृषण हैं।��ज्ञातव्य- अनेक विद्वानों के मत इस प्रकार हैं-इसके वक्तव्य में श्री घाणेकर जो लिखते हैं-शुक्रवहा दो नालियों से Ductus deferens का ग्रहण करना चाहिए और उनमें जो अनेक स्रोतस् आगे वृषण की ओर होते हैं उनसे Ductuli efferentes का ग्रहण करना चाहिए। वृषण ग्रन्थि में उत्पन्न हुआ शुक्र इनके द्वारा ही बाहर आता है।

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2. चरक में शुक्रवह स्रोतों का मूल वृषण और मेद्र माना है। “शुक्रवहानां स्रोतसां वृषणौ मूलं शेफश्च” (च० विमान)�3. इस विषय पर परिषद के विचार इस प्रकार हैं-��क. शुक्र बहने वाला पदार्थ है जो नालियों या स्रोतों में होकर बहता है।��ख. इन नालियों का एक सिरा दोनों वृषणों से जुड़ा रहता है और दूसरा श या मेद्र से जुड़ा रहता है।��ग. वृषणों में शुक्र बनता है तथा मेढू द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है।��घ. वृषणों से लेकर मेढू तक शुक्रवहन करने का एक स्पष्ट मार्ग है। यह म दोनों वृषणों से पृथक् पृथक् चलता है तथा मेढू में खुलता है।��चरक एवं सुश्रुत के विचार इस पर विशेष अन्तर नहीं रखते केवल अन्तर इत

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शुक्रवह स्रोत दुष्टि के हेतु (चरक द्वारा)��शुक्र का वेग रोकने से, असमय और अयोनि मे मैथुन करने से, शुक्रवाही स्रोत पर शस्त्र, क्षार या अग्नि लग जाने से शुक्रवाही स्रोत दुष्ट हो जाते हैं।��शुक्रवह स्रोतों के दुष्टि के लक्षण (चरक)��शुक्रवह स्रोतों के विकृत हो जाने पर नपुंसकता, मैथुन में उत्साह का न होना, यदि सन्तान हो तो कुरूप एवं अल्पायु होती है तथा सुश्रुत में वर्णित सभी लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं।��सुश्रुत द्वारा दुष्टि के लक्षण��यहां वेध होने से षंढता, देर से वीर्य स्खलन और कभी-कभी रक्तयुक्त वीर्य निकलता है।

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शुक्रवाह स्रोतस से जुड़े शोध पत्रों में से एक शोध पत्र का शीर्षक है, ‘शुक्र क्षय से संबंधित अल्पशुक्राणुता का एक केस अध्ययन’. यह शोध पत्र आयुर्वेद और एकीकृत चिकित्सा पर आधारित है. इस शोध पत्र का मकसद, शुक्र क्षय में आयुर्वेदिक उपचारों के प्रभाव का पता लगाना था.

इस शोध पत्र की मुख्य बातें:

�शुक्रवाह स्रोतस दूष्टि से पुरुष बांझपन को जोड़ा जा सकता है.�पुरुष बांझपन के मुख्य कारण कम शुक्राणुओं की संख्या (ओलिगोस्पर्मिया) और कम शुक्राणु गतिशीलता (एस्थेनोस्पर्मिया) हैं.�आचार्य सुश्रुत ने दस तरह की शुक्र दूष्टि का वर्णन किया है.�आधुनिक चिकित्सा में शुक्र धातु को प्रजनन शक्ति से जोड़ा जाता है.�शुक्र क्षय को पुरुषों में ओलिगोस्पर्मिया से जोड़ा जा सकता

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