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नवोदय विद्यालय समिति �नोएडा –ई-सामग्री

कक्षा-10

विषय : हिंदी ‘ब’ पाठ्यक्रम

स्पर्श-भाग-2

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पाठ -5

पर्वत प्रदेश में पावस

(सुमित्रानंदन पंत)

प्रस्तुत कर्ता : दामोदरन पी वी

पी. जी. टी -हिंदी

जवाहर नवोदय विद्यालय,तृश्शूर,केरल

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कवि परिचय

कवि परिचय सुमित्रानंदन पंत

जन्म: 20 मई 1900

(उत्तराखंड के कौसानी -अलमोड़ा)

मृत्यु: 28 दिसंबर 1977

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प्रमुख रचनाएं

1 वीणा 8 गुंजन

2 पल्लव 9 युगांत

3 युगवाणी 10 चिदंबरा

4 ग्राम्या 11 कला और बूढ़ा चाँद

5 स्वर्णकिरण

6 लोकायतन

7 ग्रंथी

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प्रमुख पुरस्कार

1 साहित्य अकादेमी पुरस्कार

(कला और बूढ़ा चाँद -1960)

2 पद्मभूषण पुरस्कार -1961

3 ज्ञानपीठ पुरस्कार

(चिदंबरा 1969)

(हिंदी के प्रथम ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता )

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पर्वत प्रदेश में पावस

पावस ऋतु थी,पर्वत प्रदेश� पल-पल परिवर्तित प्रकृति- वेश I

मेखलाकार पर्वत अपार

अपने सहस्र दृग-सुमन फाड़

अवलोक रहा है बार-बार

नीचे जल में निज महाकार ,

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जिस के चरणों में पला ताल

दर्पण –सा फैला है विशाल |

गिरि का गौरव गाकर झर-झर

मद में नस-नस उत्तेजित कर

मोती की लड़ियो-से सुंदर

झरते है झाग भरे निर्झर

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गिरिवर के उर से उठ-उठ कर

उच्चाकांक्षाओं से तरुवर

हैं झाँक रहे नीरव नभ पर

अनिमेष ,अटल, कुछ चिंता पर

उड़ गया , अचानक लो ,भूधर

फड़का अपार पारद के पर |

रव शेष रह गए हैं निर्झर |

है टूट पड़ा भू पर अंबर

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,,,,,,,,,,

धँस गए धरा में सभी शाल |

उठ रहा धुआँ ,जल गया ताल

यों जलद-यान में विचर –विचर

था इंद्र खेलता इंद्रजाल |

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पर्वत प्रदेश में पावस

पावस ऋतु थी,पर्वत प्रदेश� पल-पल परिवर्तित प्रकृति- वेश I

शब्दार्थ

पावस = वर्षा

पल-पल=-क्षण-क्षण

परिवर्तित= बदला हुआ

प्रकृति-वेश =प्रकृति का रूप

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भावार्थ

  • कवि कहता है कि पर्वतीय क्षेत्र था , वहाँ वर्षा ऋतू का आगमन हो गया है| पर्वत प्रदेश में वर्षा ऋतू के आगमन से प्रकृति पल-पल अपना रूप बदल रही थी|

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मेखलाकार पर्वत अपार

अपने सहस्र दृग-सुमन फाड़

अवलोक रहा है बार-बार

नीचे जल में निज महाकार ,

मेखलाकार =करघनी के आकार की पहाड़ की ढाल

सहस्र = हज़ार, अपार = विशाल

दृग-सुमन= पुष्प रूपी आँखें

फाड़ = खोल कर

अवलोक= देख

निज= अपना

महाकार=विशाल आकार

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भावार्थ

  • सामने विशालकाय पर्वत करघनी के समान दूर-दूर तक फैला हुआ है| उन्ही पहाड़ों पर हज़ारों फूल खिले हुए हैं| कवि के अनुसार ये फूल पर्वत की आँखें हैं| पर्वत अपनी पुष्परूपी आँखें खोलकर अपना विशाल आकार पानी में देख रहा है, अर्थात पर्वत का प्रतिबिंब पानी में दिखाई पड़ता है| इन पंक्तियों में पर्वत का मानवीकरण किया गया है|

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जिस के चरणों में पला ताल

दर्पण –सा फैला है विशाल |

गिरि का गौरव गाकर झर-झर

मद में नस-नस उत्तेजित कर

मोती की लड़ियो-से सुंदर

झरते है झरते हैं झाग भरे निर्झर

शब्दार्थ

गौरव=महिमा , मद=मस्ती , नस-नस=रग-रग , लड़ी=माला ,झरता=गिरता निर्झर=झरना , झाग=फेन

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भावार्थ

  • कवि कहता है –वर्षा का पानी पर्वत के नीचे जम गया है| वह विशाल तालाब बन गया है,जो दर्पण के समान चमक रहा था | उस में से पर्वत का प्रतिबिंब झाँक रहा था|पहाड़ों की छाती पर बहनेवाले झाग जैसे जलवाले झरने मोती की लड़ियों की तरह सुंदर प्रतीत होते हैं| ये झर-झर की ध्वनी में पर्वतों की उच्चता व महानता का गुणगान कर रहे हैं| यह सुनकर दर्शकों की नस-नस में उत्तेजना भर जाती है| वे उत्साह और उमंग से ओतप्रोत हो जाते हैं|

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गिरिवर के उर से उठ-उठ कर

उच्चाकांक्षाओं से तरुवर

हैं झाँक रहे नीरव नभ पर

अनिमेष ,अटल, कुछ चिंता पर

शब्दार्थ

गिरिवर = ऊँचा पर्वत, उर=दिल

उच्चाकांक्षा = ऊँचा उठने की इच्छा, तरु=पेड़

, नीरव=मौन, अनिमेष=एकटक

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भावार्थ

  • कवि कहता है-पहाड़ की छाती पर बहुत सारे पेड़ उगे हुए हैं | वर्षा में नहाए हुए ये पेड़ ऐसे प्रतीत होते है ,मानो ये पर्वत के ह्रदय से उठने वाली उच्चाकाँक्षाएँ हो | जिस प्रकार मानव हमेशा ऊंचा उठने की कामना करते हैं उसी प्रकार ये वृक्ष भी शांत आकाश में मौन-अपलक एवं स्थिर रह कर आकाश की और निहारते हुए प्रतीत होते हैं|

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उड़ गया , अचानक लो भूधर

फड़का अपार पारद के पर |

रव -शेष रह गए निर्झर |

है टूट पड़ा भू पर अंबर |

शब्दार्थ

भूधर=पहाड़

पारद के पर =बादल के पंख

रव = आवाज़ ,भू=धरती

अंबर=आकाश

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भावार्थ

  • कवि कहता है-लो,उधर देखो |लगता है पूरा पहाड़ ही गायब हो गया है| वह पहाड़ अपने बादल रूपी पंख फड़फड़ाते हुए कहीं उड़ गया है| अर्थात अचानक सफेद बादल आकाश में छा गए हैं| पूरा पहाड़ अदृश्य हो गया है|यहाँ तक कि झरने भी दीखना बंद हो गए है|बस उनकी झर-झर आवाज़ शेष रह गई है |तुरंत बाद उन बादलों से इतनी तेज़ वर्षा हुई कि लगा जैसे आकाश धरती पर टूट पड़ा हो |

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धँस गए धरा में सभी शाल |

उठ रहा धुआँ ,जल गया ताल

यों जलद-यान में विचर –विचर

था इंद्र खेलता इंद्रजाल |

शब्दार्थ

धँस गए =दब गए ,ताल=तालाब

शाल=एक वृक्ष का नाम ,

जलद-यान=बादल रूपी विमान

विचर-विचर=घूम-घूम कर

इंद्रजाल=जादूगरी

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भावार्थ

आकाश ने वर्षा रूपी बाणों से धरती पर आक्रमण करना शुरू किया अर्थात घनघोर वर्षा होने लगी| शाल के पेड़ बादलों के झुंड में ऐसे धँसे हुए प्रतीत हो रहे हैं ,लगता है मानो वे भयभीत होकर धरती में धँस गए हो | उस के बाद तालाब के जल से इस तरह धुँआ उठने लगा है मानो तालाब के जल में आग लग गई हो | अर्थात तालाब से बादल ऊपर उठ रहे थे तो कवि को ऐसा लगा कि ताल जल गया है ,इसलिए धुँआ ऊपर उठ रहा है | इस प्रकार वर्षा का देवता इंद्र बादल रूपी विमान में घूम-घूम कर अपना इंद्रजाल दिखा रहा है| आशय यह है कि पर्वत प्रदेश में वर्षा ऋतू के आगमन से पल-पल अद्भुत दृश्य उपस्थित हो रहे हैं|

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मूल्यांकन

1 पावस ऋतु में प्रकृति में कौन-कौन सा परिवर्तन आते है?

2 ‘मेखलाकार’ शब्द का अर्थ क्या है?

3 ‘सहस्र दृग-सुमन’ से क्या तात्पर्य है?

4 कवि ने तालाब की तुलना किस से की है?

5 झरने किस के गौरव का गान कर रहे है?

6 कविता से मानवीकरण,उपमा ,एवं अनुप्रास अलंकार का एक-एक

उदाहरण बताइए|

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पाठ से संबंधित अन्य लिंक -

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