विप्लव गायन
कवि-बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’
वसंत भाग -2 (अध्याय 20)
जवाहर नवोदय विद्यालय� झाबुआ-1, म. प्र. 457661
सुनीता पटेल
प्रशिक्षित स्नातक शिक्षिका - हिंदी
बालकृष्ण शर्मा नवीन (1897-1960 ई०) हिंदी कवि थे। वे परम्परा और समकालीनता के कवि हैं। उनकी कविता में स्वच्छन्दतावादी धारा के प्रतिनिधि स्वर के साथ-साथ राष्ट्रीय आंदोलन की चेतना, गांधी दर्शन और संवेदनाओं की झंकृतियां समान ऊर्जा और उठान के साथ सुनी जा सकती हैं। आधुनिक हिन्दी कविता के विकास में उनका स्थान अविस्मरणीय है।
वे जीवनभर पत्रकारिता और राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े रहे।
नवीन जी द्विवेदी युग के कवि हैं। इनकी कविताओं में भक्ति-भावना, राष्ट्र-प्रेम तथा विद्रोह का स्वर प्रमुखता से आया है। आपने ब्रजभाषा के प्रभाव से युक्त खड़ी बोली हिन्दी में काव्य रचना की।
उन्हे साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में सन 1960 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था।
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विषय विस्तार
कविता
शब्दार्थ
भावार्थ
कवि, कुछ ऐसी तान सुनाओ,
जिससे उथल-पुथल मच जाए,�एक हिलोर इधर से आए,
एक हिलोर उधर से आए,
सावधान! मेरी वीणा में,
चिनगारियाँ आन बैठी हैं,�टूटी हैं मिजराबें,
अंगुलियाँ दोनों मेरी ऐंठी हैं।
भावार्थ : विप्लव गायन कविता की इन पंक्तियों में कवि एक ऐसा गीत गाने की इच्छा व्यक्त कर रहे हैं, जो समाज में क्रांति पैदा करे और जिससे परिवर्तन की शुरुआत हो।
अगली पंक्तियों में कवि लोगों को सावधान करते हुए कहते हैं कि मेरा यह गीत समाज में क्रांति की चिंगारियां पैदा कर सकता है, आपकी शांति भंग हो सकती है और इस क्रांति से आने वाले बदलाव आपको कष्ट दे सकते हैं। वो कहते हैं कि उनके इस गीत से समाज में कई बदलाव आएंगे और वर्तमान व्यवस्था उलट-पुलट सकती है।
शब्दार्थ: तान=लय, स्वर
उथल-पुथल = परिवर्तन
हिलोर = लहर
मिजराबें = वीणा के तारों को
बजने के लिये उंगली में पहने जाने वाला छल्ला
कंठ रुका है महानाश का�मारक गीत रुद्ध होता है,�आग लगेगी क्षण में, हृत्तल�में अब क्षुब्ध युद्ध होता है,
झाड़ और झंखाड़ दग्ध हैं -�इस ज्वलंत गायन के स्वर से�रुद्ध गीत की क्रुद्ध तान है�निकली मेरे अंतरतर से!
शब्दार्थ : कंठ =गला , महानाश=विनाश या बर्बादी ,
मारक=मरने वाला, रुद्ध = रुका हुआ,
हृतल = ह्रदय की गहराई से, शुब्ध = कुपित ,
दग्ध = जला हुआ, क्रुद्ध = क्रोध में, अंतर = मन, ह्रदय
भावार्थ :- कवि ने विप्लव गायन कविता की इन पंक्तियों में कहा है
कि मेरे गीत से पैदा हुए हालातों की वजह से महाविनाश का गला रुंध गया है और उसने मृत्यु का गीत गाना रोक दिया है। असल में, इन पंक्तियों में कवि कहना चाह रहे हैं कि जब भी समाज में बदलाव के लिए आवाज़ उठाई जाती है, तो उसे दबाने की लाखों कोशिशें की जाती हैं। मगर, क्रांति की आवाज़ ज्यादा समय तक दबाई नहीं जा सकती।
कवि के दिल में सामाजिक बुराइयों और वर्तमान व्यवस्था के प्रति को रोष है, उसकी ज्वाला से हर अवरोध जल कर राख हो जाएगा। फिर बदलाव के गीतों की तान दोबारा दोगुने ज़ोर से शुरू हो जाती है और उसके वेग से सभी सामाजिक कुरीतियां और ढोंग-पाखंड पल भर में समाप्त हो जाते हैं।
कण-कण में है व्याप्त वही स्वर�रोम-रोम गाता है वह ध्वनि,�वही तान गाती रहती है,�कालकूट फणि की चिंतामणि,
आज देख आया हूँ - जीवन�के सब राज़ समझ आया हूँ,�भ्रू-विलास में महानाश के�पोषक सूत्र परख आया हूँ,
शब्दार्थ:- व्याप्त = समाया हुआ, ध्वनि = आवाज़,
भ्रू-विलास = भोहें टेढ़ी होना, कालकूट = ज़हर,
फणि = साँप,, पोषक = पालने वाला, परख = जाँच
भावार्थ:- विप्लव गायन कविता की इन पंक्तियों में कवि कहते हैं कि संसार के हर एक कण में क्रांति का गीत समा गया है, हर दिशा से उसी की प्रतिध्वनि आ रही है। जिस तरह शेषनाग अपनी मणि की चिंता में डूबे रहते हैं, उसी प्रकार यह सारा संसार भी नवनिर्माण के चिंतन में लीन हो गया है।
विप्लव गायन कविता की अगली पंक्तियों में कवि कहते हैं कि मैं तो यह जानता हूँ कि बदलाव के बाद समाज में कैसी परिस्थितियां पैदा होंगी। इसीलिए वो कहते हैं कि समाज के विचारों और नज़रिए में बदलाव आने के साथ ही बुराइयों से भरे दूषित समाज का विनाश होने लगेगा और इसके बाद ही एक नए राष्ट्र और समाज का निर्माण प्रारम्भ होगा।
कविता का सारांश
कवि बालकृष्ण शर्मा नवीन ने अपनी इस कविता में लोगों से सामाजिक बुराईयों और पाखंडों की ज़ंजीरें तोड़कर प्रगति के मार्ग पर बढ़ने का आह्वान किया है। वो कहते हैं कि अब तुम शांति के गीत गाना छोड़ो और क्रांति की तान सुनाओ ताकि बुराईयों और बुरे लोगों में हलचल मच जाए। कवि ने इस कविता के जरिए समाज को एक महान बदलाव करने का संदेश दिया है।
कवि मानते हैं कि पुराने कुविचारों और पाखंडों का अंत करके ही हम एक नए और स्वच्छ समाज की नींव रख पाएंगे। इसीलिए कवि ने विप्लव गायन कविता में हम सभी से एक क्रांति लाने का अनुरोध किया है, ताकि एक बेहतर समाज बनाया जा सके।
धन्यवाद्