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आओ मिलकर बचाएँ

निर्मला पुतुल

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निर्मला पुतुल

जन्म : सन्‍ १९७२ ई. दुमुका (झारखंड)

प्रमुख रचनाएँ : नगाड़े की तरह बजते शब्द, अपने घर की तलाश में

उन्होंने आदिवासी समाज की विसंगतियों को तल्लीनता से उकेरा है – कड़ी मेहनत के बावज़ूद खराब दशा, कुरीतियों के कारण बिगड़ती पीढ़ी, थोड़े लाभ के लिए बड़े समझौते, पुरुष वर्चस्व, स्वार्थ के लिए पर्यावरण की हानि, शिक्षित समाज का दिक्कुओं और व्यवसायियों के हाथों की कठपुतली बनना आदि वे परिस्थितियाँ हैं जो पुतुल की कविताओं के केन्द्र में हैं।

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पाठ-प्रवेश

पाठ्यपुस्तक में ली गई कविता आओ मिलकर बचाएँ में कवयित्री आदिवासी जीवन के कुछ अनछुए पहलुओं से, कलात्मकता के साथ हमारा परिचय कराती हैं और संथाली समाज के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं को बेबाकी से सामने रखती हैं। संथाली समाज में जहाँ एक ओर सादगी, भोलापन, प्रकृति से जुड़ाव और कठोर परिश्रम करने की क्षमता जैसे सकारात्मक तत्व हैं, वहीं दूसरी ओर उसमें अशिक्षा, कुरीतियाँ और शराब की ओर बढ़ता झुकाव भी है।

इस कविता में दोनों पक्षों का यथार्थ चित्रण हुआ है। बृहत्तर संदर्भ में यह कविता समाज में उन चीज़ों को बचाने की बात करती है जिनका होना स्वस्थ सामाजिक-प्राकृतिक परिवेश के लिए ज़रुरी है। प्रकृति के विनाश और विस्थापन के कारण आज आदिवासी समाज संकट में है, जो कविता का मूल स्वर है। संथाली भाषा से हिन्दी रुपांतर अशोक सिंह ने किया है।

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शब्द-छवि

आबो-हवा जलवायु

सोंधापन सुंगध

उम्मीद आशा

दौर समय

अक्खड़पन किसी बात को लेकर रुखाई से तन जाने का भाव

जुझारुपन जूझने या संघर्ष करने की प्रवृत्ति

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अपनी बस्तियों को

नंगी होने से

शहर की आबो-हवा से बचाएँ उसे

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बचाएँ डूबने से

पूरी की पूरी बस्ती को

हड़िया में

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अपने चेहरे पर संथाल परगना की माटी का रंग

भाषा में झारखंडीपन

ठंडी होती दिनचर्या में जीवन की गर्माहट

मन का हरापन

भोलापन दिल का

अक्खड़पन, जुझारुपन भी

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भीतर की आग

धनुष की डोरी तीर का नुकीलापन

कुल्हाड़ी की धार

जंगल की ताज़ी हवा

नदियों की निर्मलता

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पहाड़ों का मौन

गीतों की धुन

मिट्टी का सोंधापन

फ़सलों की लहलहाहट

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नाचने के लिए खुला आँगन

गाने के लिए गीत

हँसने के लिए थोड़ी - सी खिलखिलाहट

रोने के लिए मुट्ठी भर एकांत

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बच्चों के लिए मैदान

पशुओं के लिए हरी-हरी घास

बूढ़ों के लिए पहाड़ों की शांति

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और इस अविश्वास भरे दौर में

थोड़ा-सा विश्वास

थोड़ी-सी उम्मीद

थोड़े-से सपने

आओ मिलकर बचाएँ

कि इस दौर में भी बचाने को

बहुत कुछ बचा है, अब भी हमारे पास

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गृह कार्य

  1. आप अपने शहर या बस्ती की किन चीज़ों को बचाना चाहेंगे ?

  • आदिवासी समाज की वर्तमान स्थिति पर टिप्पणी करें।

  • बस्तियों को शहर की किस आबो-हवा से बचाने की आवश्यकता है ?