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जनपदोद्ध्वंस(EPIDEMIC)

PRESENTED BY – PRIYANKA

ROLL NO. 31

BAMS 3RD PROFF

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परिभाषा

  • किसी रोग-विशेष, ऋतु-विकार या अन्य आत्ययिक कारण से जनसंख्या के बडे अंश का नाश हो जाना और जनपद का उजड़ जाना ही जनपदोद्ध्वंस कहा जाता है।

  • कारण- अधर्म, प्रज्ञापराध, स्वास्थ्यवृत्त, सदवृत अपालन को ही जनपदोद्धवंस का मूल कारण माना गया है।
  • वायु ,जल, देश, काल के विगुणित होने से ही जनपदोद्ध्वंस होने का उल्लेख है।

बचने के उपाय- धर्मपरायणता , यमनियमादि पालन तथा पर्यावरणीय , शारीरिक , मानसिक तथा अध्यात्मिक शुचिता ही जनपदोद्ध्वंस से बचने के उपाय बताए हैं।

  • एसी कल्पना है कि जनपदोद्धवंसक स्थिति उत्पन्न होने के पूर्व उसकी आशंका बोधगम्य है अतः एसी आशंका होने पर प्रतिकारात्मक उपाय औषधि चयन आदि कर लेना चाहिए।

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महामारी फैलने के पूर्व औषध संग्रह

“दृश्यन्ते ही खलु सौम्य ! नक्षत्रग्रहगणचन्द्रसूर्यानिलानलानां दिशां चाप्रकृतिभूतानामृतुवैकारिका भावाः ।” (च. वि. ३/३)

अर्थात- अस्वाभाविक रूप में स्थित नक्षत्र , ग्रहगण , चन्द्रमा, सूर्य, वायु, अग्नि तथा दिशाओं के ऋतु विकार से उत्पन्न होने के लक्षण दिखाई पड़ रहे हो, तो पृथ्वी भी शीघ्र ही औषधियों में रस, वीर्य, विपाक और प्रभाव का आधान नहीं कर पायेगी, तथा औषधियों में रस, वीर्य , विपाक, प्रभाव के न होने से लोगों में अधिकांश के रोग ग्रस्त हो जाने की बात निश्चित है,

इसलिए विनाश होने के पहले और पृथ्वी के रसहीन होने के पहले ही जब तक औषधि के रस, वीर्यादि गुण बने हुए हैं तब तक ही उपयोगी औषधियों को उखाड़ कर उनका संग्रह कर लेना चाहिए।

औषधियों को प्रयोग योग्य बनाकर उनका सही ढ़ंग से, रसादि का विचार कर प्रयोग करने से जनपद के उध्वंशक रोगों को आसानी से दूर किया जा सकता है।

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जनपदोद्धवंश-विषयक अग्निवेश का प्रश्न

  • अग्निवेश का प्रश्न- विभिन्न प्रकृति, आहार, देह, बल, सात्म तथा आयु वाले मनुष्यों के रहते हुए भी एक ही व्याधि से एक ही समय जनपदोद्धवंश क्यों होता है?
  • आत्रेय का उत्तर- प्रकृति, आहार, देह, बल आदि भावों के असमान होते हुए भी मनुष्यों के जो अन्य बहुत से भाव सामान्य हैं , उनमें विकार या दोष आ जाने से एक ही समय में एक ही तरह के लक्षण वाले रोग उत्पन्न होकर ( महामारी के रूप में फैलकर ) जनपद को उजाड़ देते हैं।
  • वे सामान्य भाव हैं – वायु, जल, देश, काल ।
  • जनपदोद्धवंसकर सामान्य भाव- विकृत वायु, विकृत जल, विकृत देश, विकृत काल ।
  • इनके लक्षण निम्न प्रकार हैं।

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  • विकृत वायु के लक्षण- ऋतु के प्रतिकूल प्रवाहित होने वाली बहुत स्थिर, अतिचंचल अतिकठोर,अतिशीतल, अतिगरम, अतिरूक्ष,अति अभिष्यन्दी (नमी या जलवाष्प लिए हुए), अत्यन्त गर्जन करने वाली, परस्पर टकराती हुई, बहुत बवण्डर युक्त , अप्रिय गंध ,वाष्प,बालू, धूल और धुआं से युक्त वायु रोगजनक है।
  • विकृत जल के लक्षण- जो जल अत्यंत विकृत गंध,वर्ण,रस और स्पर्श वाला हो,क्लेद युक्त हो, जिसमें रहने वाले जीव जन्तु और पक्षी ने उसे छोड़ दिया हो, जलाशय, पोखरा, तालाब में जल बहचत घट गया हो,जो अच्छा न लगे और गुणहीन हो गया हो, उसे रोगजनक जानना चाहिए।
  • विकृत देश के लक्षण- विकृत वर्ण, गंध , रस, स्पर्श वाला ।
  • क्लेद बहुल व उपसृष्ठ देश।
  • सर्प आदि हिंसक जन्तु, मच्छर, टिड्डी, मक्खी, मूषक, उलूक, गिध्द, चील आदि शमशानिक जन्तुओं की बहुलता वाला।

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  • वृक्ष व गुल्म युक्त उपवन से युक्त, लता प्रतान की बहुलता वाला, अभूतपूर्व रूप से गिरे हुए तथा सूखकर नष्ठ हुए धान्यों वाला।
  • धूम के समान वायु वाला, रोगी पशु पक्षियों की बहुलता वाला,सद्वृत एवं आचार अपालन करनेवाले मनुष्यों वाला।
  • लगातार उल्कापात, वज्रपात, भयंकर दृश्यों एवं आवाजों से युक्त तथा भय के वातावरण से युक्त एवं विलाप युक्त शब्दों से गुंजित देश को अहितकर जानना चाहिए।
  • विकृत काल के लक्षण-

“ कालं तु खलु- यथर्तुलिङ्गाद्विपरीतलिङ्गमतिलिङ्गं हीनलिङ्गं चाहितं व्यवस्येत ।” (च.वि.३/७)

अर्थात- जिस काल में ऋतुओं के अनुसार होने वाले लक्षणों से विपरीत लक्षण या उसी ऋतु के लक्षण अधिक या हीन मात्रा में दिखें, तो उस काल को अहित और रोगकारक जानना चाहिए।

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जनपदोद्धवंस के कारण

  • “ इमानेवं दोषयुक्तांश्चतुरो भावाञ्जनपदोद्ध्वंसकरान् वदन्ति कुशलाः,अतोअन्यथाभूतांरतु हितानाचक्षते। (च.वि.३/७)
  • अर्थात इस प्रकार के दोषों से युक्त वायु, जल, देश और काल को विद्वान लोग जनपदोद्धवंस का कारण कहते हैं, इसके विपरीत अपने प्राकृतिक लक्षणों वाले वायु, जल, देश, काल को हितकर कहते हैं।
  • वायु, जल , देश, काल के विकृत होने के कारण-
  • इनके विकृत होने के चार मूल कारण हैं।
  • वायु, जल, देश, काल इन चारों पर्यावरणीय भावों की विकृती का मूल कारण अधर्म है अर्थात जनपदवासियों में कर्तव्य परायणता का अभाव हो जाना है।

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2.पर्यावरण प्रदूषण से जनपदोद्धवंस होने के अतिरिक्त इसका दूसरा महत्वपूर्ण कारण है शस्त्र प्रयोग।

“ तथा शस्त्रप्रभवस्यापि जनपदोद्धवंसस्याधर्म एव हेतुर्भवति ।( च. वि.३/२४)

शस्त्र प्रयोग से जनपदोद्धवंस का मूल कारण भी अधर्म है।

3.जनपदोद्धवंस का तीसरा प्रत्यक्ष कारण है- रक्षोगणादि भाव।

“रक्षोगणादिभिर्वा विविधैर्भूतसङ्घैस्तमधर्ममन्यद्वाअप्यचारान्तरमुपलभ्याभिन्हन्यन्ते ।”

(च.वि.३/२५)

अर्थात- रक्षोगण से तात्पर्य भूत प्रेतादि तथा अनेक प्रकार के हिंसक प्राणियों अथवा रोगोत्पादक जीवाणुओं से है।इनके प्रभाव से ही जनपदोद्धवंस होता है ,इसका भी मूल कारण अधर्म ही है।

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  • 4. जनपदोद्धवंस का चौथा प्रत्यक्ष कारण है- अभिशाप।
  • अभिशापजन्य जनपदोद्धवंस का मूल कारण भी अधर्म ही है।
  • अतः बिना अधर्म के किसी अशुभ की उत्पत्ति नहीं होती, ऐसा अतीत में भी कभी नहीं हुआ।
  • “प्रागपि चाधर्मादृते नाशुभोत्पत्तिरन्यतोअभूत् ।”
  • जनपदोद्धवंस में रोग भय से मुक्ति- जनपद् के उद्ध्वंसक इन वातादि भावों में वैगुण्य होने पर भी समुचित औषधि का सेवन करने से रोगों के उत्पन्न होने का भय नहीं होता है।
  • जनपदोद्धवंस की सामान्य चिकित्सा- जब वायु, जल , देश और काल- ये चारों दूषित हों तब मनुष्यों की औषधि द्वारा चिकित्सा करने पर वे रोगी नहीं होते हैं।
  • जिन लोगों का रोग मृत्युदायक नहीं है और जिनका भाग्य या कर्म मृत्युजनक नहीं है, ऐसे लोगों की चिकित्सा के लिए पञ्चकर्म चिकित्सा श्रेष्ठ है।

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  • विधिपूर्वक रसायनों का प्रयोग करना उत्तम उपचार है और जनपदोद्धवंस रोग होने से पूर्व में संग्रहित औषधियों का शरीर के पालन के लिए प्रयोग करना श्रेष्ठ उपाय है।
  • अधर्म जन्य अभिशाप से जनपदोद्ध्वंस- अभिशाप से उत्पन्न जनपदोद्ध्वंस का कारण भी अधर्म ही है। जिनका धर्म लुप्त हो गया है ,जो धर्म हीन हो जाते हैं बे गुरुजनों ,विद्धावृध्दों, वयोवृद्धों सिध्दजनों और ऋषियों तथा पूज्यजनों का तिरस्कार कर अहितकर आचरण करने लगते हैं।उसके बाद बे गुरु आदि अनेक पुरुष कुलों के नाश के लिए जब शाप देते हैं तब सर्वसाधारण प्रजा जनों का नाश हो जाता है अन्य अनियमित आयु वाले पुरुष भी शाप रूपी नियत कारण के फल स्वरुप बिनष्ट हो जाते हैं ।

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जनपदोद्धवंस प्रतिषेध

  • जनपदोद्धवंस काल में प्रभावित जनपद में भी धर्मपरायण पुरुष प्रभावित नहीं होता है।
  • जनपदोद्धवंस के पूर्व एकत्रित गुणयुक्त औषधियों की सहायता से जनपदोद्धवंस प्रभावित व्यक्तियों की रक्षा की जा सकती है।
  • वायु, जल, देश, काल विगुणित रहते हुए भी गुणयुक्त औषधियां हितकारी होती हैं।
  • जिनके मृत्यु का समय नहीं आया है और जिनके कर्म उत्तम हैं उनके लिए पंचकर्म श्रेष्ठ औषधि है।
  • जनपदोद्धवंस काल में जिनकी मृत्यु अनियत है। उनके लिए निम्न लिखित भाव ही श्रेष्ठ औषधि है-
  • सत्य व्यवहार, प्राणियों पर दया, दान, बलि कर्म, देव पूजन, सदाचार पालन, शमन एवं आत्मरक्षा, कल्याणकारी जनपदों में वास, ब्रह्मचर्य पालन आदि।

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EPIDEMIC

  • The unusual occurrence in a community of disease, specific health related behaviour, or other health related events clearly in excess of expected occurrence.
  • Epidemic can occur upon endemic states too.
  • Cause of epidemics- epidemics are commonly caused by a disease of infectious or parasitic origin.
  • Infectious disease such as cholera, meningococcal, meningitis, typhoid, viral hemorrhagic fever pose considerable threats to a community.

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  • Sign and symptoms of epidemics- it may include-
  • Fever and chills
  • Headache
  • Rapid breathing
  • Body and muscle aches
  • Rash
  • Cough
  • Nausea
  • Vomiting etc.

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PREVENTION OF EPIDEMICS

  • WHO develops global strategies for the prevention and control of epidemic- prone disease, such as yellow fever, cholera, and influenza with partners from a wide range of technical, scientific and social fields .
  • WHO brings together all globally available resources to counter these high threats infectious hazard and scale these strategies to regional and country levels.

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