जनपदोद्ध्वंस(EPIDEMIC)
PRESENTED BY – PRIYANKA
ROLL NO. 31
BAMS 3RD PROFF
परिभाषा
बचने के उपाय- धर्मपरायणता , यमनियमादि पालन तथा पर्यावरणीय , शारीरिक , मानसिक तथा अध्यात्मिक शुचिता ही जनपदोद्ध्वंस से बचने के उपाय बताए हैं।
महामारी फैलने के पूर्व औषध संग्रह
“दृश्यन्ते ही खलु सौम्य ! नक्षत्रग्रहगणचन्द्रसूर्यानिलानलानां दिशां चाप्रकृतिभूतानामृतुवैकारिका भावाः ।” (च. वि. ३/३)
अर्थात- अस्वाभाविक रूप में स्थित नक्षत्र , ग्रहगण , चन्द्रमा, सूर्य, वायु, अग्नि तथा दिशाओं के ऋतु विकार से उत्पन्न होने के लक्षण दिखाई पड़ रहे हो, तो पृथ्वी भी शीघ्र ही औषधियों में रस, वीर्य, विपाक और प्रभाव का आधान नहीं कर पायेगी, तथा औषधियों में रस, वीर्य , विपाक, प्रभाव के न होने से लोगों में अधिकांश के रोग ग्रस्त हो जाने की बात निश्चित है,
इसलिए विनाश होने के पहले और पृथ्वी के रसहीन होने के पहले ही जब तक औषधि के रस, वीर्यादि गुण बने हुए हैं तब तक ही उपयोगी औषधियों को उखाड़ कर उनका संग्रह कर लेना चाहिए।
औषधियों को प्रयोग योग्य बनाकर उनका सही ढ़ंग से, रसादि का विचार कर प्रयोग करने से जनपद के उध्वंशक रोगों को आसानी से दूर किया जा सकता है।
जनपदोद्धवंश-विषयक अग्निवेश का प्रश्न
“ कालं तु खलु- यथर्तुलिङ्गाद्विपरीतलिङ्गमतिलिङ्गं हीनलिङ्गं चाहितं व्यवस्येत ।” (च.वि.३/७)
अर्थात- जिस काल में ऋतुओं के अनुसार होने वाले लक्षणों से विपरीत लक्षण या उसी ऋतु के लक्षण अधिक या हीन मात्रा में दिखें, तो उस काल को अहित और रोगकारक जानना चाहिए।
जनपदोद्धवंस के कारण
2.पर्यावरण प्रदूषण से जनपदोद्धवंस होने के अतिरिक्त इसका दूसरा महत्वपूर्ण कारण है शस्त्र प्रयोग।
“ तथा शस्त्रप्रभवस्यापि जनपदोद्धवंसस्याधर्म एव हेतुर्भवति ।( च. वि.३/२४)
शस्त्र प्रयोग से जनपदोद्धवंस का मूल कारण भी अधर्म है।
3.जनपदोद्धवंस का तीसरा प्रत्यक्ष कारण है- रक्षोगणादि भाव।
“रक्षोगणादिभिर्वा विविधैर्भूतसङ्घैस्तमधर्ममन्यद्वाअप्यचारान्तरमुपलभ्याभिन्हन्यन्ते ।”
(च.वि.३/२५)
अर्थात- रक्षोगण से तात्पर्य भूत प्रेतादि तथा अनेक प्रकार के हिंसक प्राणियों अथवा रोगोत्पादक जीवाणुओं से है।इनके प्रभाव से ही जनपदोद्धवंस होता है ,इसका भी मूल कारण अधर्म ही है।
जनपदोद्धवंस प्रतिषेध
EPIDEMIC
PREVENTION OF EPIDEMICS
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