1 of 36

राम की शक्ति पूजा – सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

2 of 36

3 of 36

  • यह कविता ३१२ पंक्तियों की एक ऐसी लम्बी कविता है, जिसमें निराला जी के स्वरचित छंद 'शक्ति पूजा' का प्रयोग किया गया है। चूँकि यह एक कथात्मक कविता है, इसलिए संश्लिष्ट होने के बावजूद इसकी सरचना अपेक्षाकृत सरल है। इस कविता का कथानक प्राचीन काल से सर्वविख्यात रामकथा के एक अंश से है।

4 of 36

  • राम की शक्तिपूजा, सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला‘ द्वारा रचित [1]काव्य है। निराला जी ने इसका सृजन २३ अक्टूबर १९३६ को सम्पूर्ण किया था। कहा जाता है कि इलाहाबाद(प्रयागराज) से प्रकाशित दैनिक समाचारपत्र 'भारत' में पहली बार 26 अक्टूबर 1936 को उसका प्रकाशन हुआ था। इसका मूल निराला के कविता संग्रह 'अनामिका' के प्रथम संस्करण में छपा।

5 of 36

  • इस कविता पर वाल्मीकि रामायण और तुलसी के रामचरितमानस से कहीं अधिक बांग्ला के कृतिवास रामायण का प्रभाव देखा जाता है। किन्तु कृतिवास और राम की शक्ति पूजा में पर्याप्त भेद है। पहला तो यह की एक ओर जहां कृतिवास में कथा पौराणिकता से युक्त होकर अर्थ की भूमि पर सपाटता रखती है तो वही दूसरी ओर राम की शक्तिपूजा में कथा आधुनिकता से युक्त होकर अर्थ की कई भूमियों को स्पर्श करती है। इसके साथ साथ कवि निराला ने इसमें युगीन-चेतना व आत्मसंघर्ष का मनोवैज्ञानिक धरातल पर बड़ा ही प्रभावशाली चित्र प्रस्तुत किया है।

6 of 36

  • निराला बाल्यावस्था से लेकर युवाववस्था तक बंगाल में ही रहे और बंगाल में ही सबसे अधिक शक्ति का रूप दुर्गा की पूजा होती है। उस समय शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार भारत देश के राजनीतज्ञों , साहित्यकारों और आम जनता पर कड़े प्रहार कर रही थी। ऐसे में निराला ने जहां एक ओर रामकथा के इस अंश को अपनी कविता का आधार बना कर उस निराश हताश जनता में नई चेतना पैदा करने का प्रियास किया और अपनी युगीन परिस्थितियों से लड़ने का साहस भी दिया।

7 of 36

  • यह कविता कथात्मक ढंग से शुरू होती है और इसमें घटनाओं का विन्यास इस ढंग से किया गया है कि वे बहुत कुछ नाटकीय हो गई हैं। इस कविता का वर्णन इतना सजीव है कि लगता है आँखों के सामने कोई त्रासदी प्रस्तुत की जा रही है।
  • इस कविता का मुख्य विषय सीता की मुक्ति है राम-रावण का युद्ध नहीं। इसलिए निराला युद्ध का वर्णन समाप्त कर यथाशीघ्र सीता की मुक्ति की समस्या पर आ जाते हैं।

8 of 36

  • अपने प्रतिकार्थ में शक्तिपूजा नैतिक शक्ति की सिद्धि का काव्य है। इस कविता का रचनाकाल पराधीन भारत का वह गाँधीवादी युग था जिसमें आततायी अंग्रेजी शासन के विरूद्ध नैतिक शक्ति का संबल लेकर भारतीय जनता अहिन्सात्मक संघर्ष कर रही थी।

9 of 36

  • निराला के सामने यह समस्या थी कि राम-रावण का युद्ध वर्णन करना है और उसके समानान्तर राम के भीतर चल रही है। लङाई वर्णन करना है, भीतर की लङाई यह है कि युद्ध लङा जाए या न लङा जाए। यदि लङा जाए तो कैसे ? लङने का साधन क्या हो। जीतेंगे इसमें भी संशय था, संकल्प की लङाई राम के भीतर चल रही है। राम द्वन्द्वातीत राम न होकर द्वन्द्व में फंसे राम हैं। राम-राम का द्वन्द्व राम-रावण के द्वन्द्व से महत्त्वपूर्ण हो गया है। निराला के राम आधुनिक मानव हैं जो न्याय के पक्षधर होते हुए भी टूटते हैं। संशय करते हैं यहाँ तक कि अपनी नियति को कोसते हैं-

  • धिक् जीवन जो पाता ही आया विरोध�धिक् साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध।

10 of 36

  • निराला की सर्जनात्मकता प्रतिभा में ढ़लकर वाल्मीकि और तुलसी के राम आधुनिक स्वाधीनता संग्राम के संवेदनशील मानव के रूप में मूर्तिमान हो उठे। उनकी ’जानकी’ मात्र ’प्रिया’ नहीं स्वाधीनता की देवी हैं, जिसकी मुक्ति के लिए वे व्याकुल हैं। एक निर्बल देश को सबसे अधिक ताकत की आवश्यकता थी, शक्ति अर्जित करने की आवश्यकता थी।

11 of 36

राम की शक्तिपूजा का ऐतिहासिक संदर्भ

  • निराला के युग में भारतीय समाज की संरचना का सारतत्व क्या है ? उन्नीसवीं सदी के अंत में भारत में दो नये वर्गों का उदय हुआ था, ये नये वर्ग थे : औद्योगिक पूँजीपति और उनके तहत काम करने वाला मजदूरवर्ग। देश पर राज्य करने वाले ब्रिटिश पूंजीपति पूरे भारतीय समाज का शोषण कर रहे थे, इसलिए भारतीय समाज का टकराव ब्रिटिश पूंजीपति वर्ग और उनकी राजसत्ता से होना ही था।

12 of 36

  • निराला के समय में भारतीय समाज और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के बीच का युद्ध और अधिक तीव्र होता जा रहा था। इस दौर में इस युद्ध में भारतीय समाज का नेतृत्व यहाँ का उदीयमान पूंजीपति वर्ग कर रहा था क्योंकि यह ऐतिहासिक जिम्मेदारी कई कारणों से इसी वर्ग के कंधों पर आ गई थी, इसे अपने विकास के लिए यहाँ का बाज़ार मुक्त कराना था जो कि उस समय तक ब्रिटिश पूंजीपतियों के हाथों में था।

13 of 36

  • कांग्रेस पार्टी भारतीय पूंजीपतिवर्ग की ही हितसाधक पार्टी थी, किंतु स्वाधीनता की लड़ाई में विजय हासिल करने के लिए पूरे भारतीय समाज की एकता ज़रूरी थी, इसलिए पूंजीपति नेतृत्व के लिए यह ज़रूरी था, वह पूरे राष्ट्र की मुक्ति की बात करे और सभी के हितों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करे|

14 of 36

  • “राम की शक्तिपूजा” जिस दौर में लिखी गयी थी, उस दौर में पूंजीपतिवर्ग के साथ ही यहाँ का मजदूरवर्ग भी राजनीति में कूद चुका था, उस वर्ग ने भी अपनी राजनीतिक पार्टी जो कि हर देश में कम्युनिस्ट पार्टी के रूप में वजूद में आती ही है, भारत में बना ली थी और वह भी भारत के तमाम शोषित जनों को साम्राज्यवाद से मुक्त कराने के लिए संघर्षरत था।

15 of 36

  • हिंदी साहित्य ही नहीं, अन्य भारतीय भाषाओं का साहित्य भी इन दो उदीयमान नये वर्गों यानी भारतीय पूंजीपति वर्ग और मजदूर वर्ग की विचारधाराओं से और उनके संघर्षों से प्रेरित हो रहा था। हमारे यहाँ भी गौर से देखें तो भारतेंदु हरिश्चन्द्र से लेकर मैथिलीशरण गुप्त और निराला, पंत, प्रसाद, महादेवी वर्मा आदि और फिर प्रगतिवादी साहित्य को इन्हीं वर्गों के विचारों की अनुगूंज से भरा हुआ पायेंगे। “राम की शक्तिपूजा” को इस ऐतिहासिक संदर्भ से काटकर विश्लेषित करना कतई सही नहीं होगा।

16 of 36

  • निराला ने तमाम मिथकीय प्रतीकों को चाहे वह “सरस्वती” का हो या “दुर्गा” का हो या ” राम” का हो मातृभूमि की गुलामी से मुक्ति के संवेदनात्मक उद्देश्य से ही अपनी कविताओं में प्रयुक्त किया है। यदि वे मिथकीय प्रयोग सिर्फ मिथकों को ही व्याख्यायित करने के लिए करते या सिर्फ अपनी मनोगत चिंताओं और निजी दुखों या भावनाओं को व्यक्त करने के लिए करते तो ये कविताएं स्थायी महत्व की हो भी नहीं सकती थीं।

17 of 36

संवेदनात्मक उद्देश्य

  • राम की शक्तिपूजा” का संवेदनात्मक उद्देश्य जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, रचना के देश और काल तथा समाज के संदर्भ में ही खोजा जा सकता है और इस प्रक्रिया में ही उसका एक नया आलोचनात्मक विमर्श भी तैयार होता है। रचना का अभिधात्मक पाठ यह बताता है कि राम और रावण के बीच एक समर चल रहा है, इस समर में राम को लगता है “मित्रवर, विजय होगी न समर” । इसकी वजह क्या है? इसकी वजह यह है कि शक्ति-संतुलन रावण के पक्ष में है, “अन्याय जिधर, है उधर शक्ति।”

18 of 36

  • कविता यह भी संकेत देती है कि यह समर किसके लिए लड़ा जा रहा है, “जानकी ! हाय उद्धार प्रिया का हो न सका !” यह लड़ाई प्रिया की मुक्ति की लड़ाई है। इस लड़ाई में “विजय” तब तक संभव नहीं जब तक शक्ति-संतुलन रावण के पक्ष में है। “अन्याय” को तब तक परास्त नहीं किया जा सकता जब तक शक्ति-संतुलन न्याय के पक्ष में न हो जाये। यह सामरिक रणनीति का सार्वभौमिक सत्य है। यह कविता अपने देश और काल के संदर्भ में भारत की मुक्ति की लड़ाई से जुड़ जाती है क्योंकि इसमें जिस शक्ति की प्रतीकात्मक पूजा है, वह अपने स्वरूप में भारतमाता की छवि है, असल में वह प्रतीकात्मक रूप में भारत की जनशक्ति है जिसे न्याय के पक्ष में होना है।

19 of 36

  • संपूर्ण भारत की जनशक्ति यदि ब्रिटिश साम्राज्यवाद रूपी रावण के विरुद्ध खड़ी हो जाती है, तो उसी क्षण “विजय” की आशा बलवती हो जाती। इस तरह “राम की शक्तिपूजा” भारतभूमि की मुक्ति की लड़ाई की एक फैंटेसी है, जिसमें जनशक्ति की प्रमुख भूमिका को रेखांकित किया गया है।

20 of 36

सार्वभौमिकता का तत्व

  • राम की शक्तिपूजा’ में देश, काल और अपने समाज का संदर्भ तो है ही, उसमें एक सार्वभौमिक सत्य भी छिपा है। हर बड़ी रचना के पीछे एक सार्वभौमिक सत्य भी होता है जो उसे अपने देश और काल से अतिक्रमित करा के बार-बार प्रासंगिक बनाता है। यह कविता इस मिथ्या चेतना को तोड़ती है कि कोई अवतारी देवता हमें मुक्ति दिलाता है, ‘संभवामि युगे युगे’ का उद्घोष एक झूठ है, सच्चाई यह है कि शोषित जनशक्ति ही संगठित हो कर अन्याय पर आधारित समाज व्यवस्था से मुक्ति दिलाती है और उसकी एक ऐतिहासिक प्रक्रिया है।

21 of 36

  • समाज के विकास में यह प्रक्रिया घटित होती है। जब शक्ति संतुलन अन्यायपूर्ण व्यवस्था के पक्ष में होता है तो अन्याय की विजय होती रहती है और जब यह शक्तिसंतुलन न्याय की शक्तियों के पक्ष में होता है तो अन्याय से मुक्ति मिल जाती है। योरप में फ्रांस की क्रांति (1789) के वक्त यह सार्वभौमिक सत्य सामने आ गया था।

22 of 36

  • उस समय योरप में सामंतवाद एक अन्यायपूर्ण व्यवस्था बनाये रखने वाला शासकवर्ग था, उभरते हुए पूंजीवाद समेत बाकी सभी वर्ग उसके अधीन रह कर समाज को आगे विकसित नहीं कर सकते थे, इसलिए उस अन्यायपूर्ण सामंती व्यवस्था के खिलाफ पूंजीवाद के नेतृत्व में समाज के अन्य सभी शोषित एकजुट हो गये और ‘समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व’ के नये मानवीय मूल्यों के उद्घोष के साथ अन्यायपूर्ण व्यवस्था को खत्म कर दिया, मगर पूंजीवाद ने शासक बन कर इन मानवीय मूल्यों का फिर ध्वंस करना शुरू कर दिया, इसलिए इससे भी मुक्ति के प्रयास शुरू हुए।

23 of 36

  • पेरिस कम्यून के ऐतिहासिक संघर्ष को इस प्रयास का ही एक रूप माना जाता है। पूंजीवाद से मुक्ति की ऐतिहासिक जिम्मेदारी मज़दूरवर्ग पर है क्योंकि सीधेसीधे पूंजीवादी शोषण का एहसास उसी को है। इसीलिए उसने अपने मुक्ति के प्रयासों के दौरान सबसे अधिक क्रांतिकारी विचारधारा और वैज्ञानिक दर्शन- मार्क्सवाद को जन्म दिया। यह दर्शन ही यह बताता है कि मात्रात्मक परिवर्तन एक स्तर पर पहुँचकर गुणात्मक परिवर्तन बन जाता है। समाज व्यवस्थाएं भी इसी प्रक्रिया से परिवर्तित होती हैं।

24 of 36

  • हमारी आज़ादी की लड़ाई में भी यही प्रक्रिया घटित हो रही थी। ब्रिटिश शासक रूपी रावण के पक्ष में बहुत समय तक भारत की जनशक्ति रही, किंतु धीरेधीरे भारतीय पूंजीपति के उदय के साथ यह जनशक्ति ‘राष्ट्रवाद’ की नयी विचारधारा के प्रभाव में आकर ‘स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है’ की चेतना तक पहुँची। जैसे-जैसे जनशक्ति के बड़े हिस्से इस संघर्ष के साथ जुड़ते गये मुक्तिसंग्राम में विजय की आशा भी बलवती होती गयी।

25 of 36

  • राम की शक्तिपूजा’ इसी सार्वभौमिक सत्य को एक मिथकीय आख्यान के माध्यम से अभिव्यक्त करती है। इस सार्वभौमिक सत्य को रूस की क्रांति, चीनी क्रांति, वियतनाम की क्रांति आदि में भी देखा जा सकता है कि जब जनशक्ति नेतृत्व के साथ हो कर नया संतुलन बना देती है तो समर में विजय अवश्य होती है। जब तक यह जनशक्ति अन्याय की ताकतों का साथ भ्रमवश देती रहती है, मुक्तिकामी वर्गों का साथ नहीं देती, तब तक मुक्ति की ताकतों को शिकस्त मिलती है, तब तक ‘रह रह उठता जग जीवन में रावण-जय-भय।

26 of 36

कविता का पाठावलोकन�’

  • “राम की शक्तिपूजा” का पाठालोकन कई तरह के भाष्यों की गुंजाइश देता है। इसकी वजह यह है कि यह कविता अपनी संरचना में काफी संश्लिष्ट है, उसमें कविता के अनेक स्तरीय उपादानों का कलात्मक प्रयोग किया गया है। उसे मिथ, प्रतीक, बिंब, छंद, अलंकार और ध्वन्यात्मकता आदि उपकरणों से सजाया गया है और मुक्तिकामी विचारधारा की आँच से प्राणवान बनाया गया है। इस कविता के सार्थक आलोचनात्मक विमर्श के लिए इसके दो केंद्रीय बिंबों पर ध्यान देना ज़रूरी है। ये बिंब हैं, “ज्योति” और “नयन” |

27 of 36

  • कविता की शुरुआत “रवि हुआ अस्त/ज्योति के पत्र” से होती है और फिर इस “ज्योति के पत्र” पर लिखे “आज” के समर का वर्णन होता है जिसके केंद्र में “विच्छरित – वहिन – राजीवनयन” एक ओर हैं, तो दूसरी ओर “लोहित लोचन रावण” है। राम की आँखों में अग्नि है, रावण की आंखों में लहू। एक दिन के इस युद्ध-वर्णन के बाद शाम गहराती है, “उतरा ज्यों दुर्गम पर्वत पर नैशांधकार/चमकती दूर ताराएं ज्यों हों कहीं पार’

28 of 36

  • विश्व साहित्य में प्रकाश को ज्ञान के लिए प्रयुक्त किया गया है। “तमसो मा ज्योतिर्गमय’ की प्रार्थना के समय से हमारे यहाँ भी प्रकाश को इसी अर्थ में लिया जाता रहा है। इस कविता में प्रकाश के बिंब में मात्रात्मक परिवर्तन भी एक अर्थ ध्वनित करता चलता है। “नैशांधकार” में “चमकती दूर ताराएं” प्रकाश की झीनी किरण हैं, ये शायद मुक्ति की आशा लगाये सीता की आंखें हैं, लेकिन मात्रात्मक रूप में अंधकार ज्यादा है, इसी तरह “ गगन घन अंधकार” में “केवल जलती मशाल” भी मात्रात्मक रूप में बहुत बड़ी ज्योति नहीं है।

ऐसे क्षण अंधकार घन में जैसे विद्युत

जागी पृथ्वी-तनया-कुमारिका-छवि, अच्युत

29 of 36

  • इस कविता में भी वर्तमान से अतीत की ओर और अतीत से वर्तमान की ओर बार-बार लौटा जाता है, तब अंत में भविष्य की रूपरेखा तय होती है। प्रारंभ निकट अतीत “आज” का समर के विश्लेषण से ही होता है, उसके बाद वर्तमान क्षण के अंधकार और उसमें झीने प्रकाश का चित्रण होता है

फिर देखी भीमा मूर्ति, आज रण देखी जो

आच्छादित किये हुए सम्मुख समग्र नभ को

ज्योतिर्मय अस्त्रसकल बुझ बुझकर हुए क्षीण

पा महानिलय उस तन में क्षण में हुए लीन

30 of 36

  • इस परिस्थिति में रावण पर विजय पाना आसान नहीं, शक्ति संतुलन उसके पक्ष में है। इस शंकाकुल स्थिति में “खिंच गये दृगों में सीता के राममय नयन।” और फिर “भावित नयनों से सजल गिरे दो मुक्ता दल!” हनुमान ने उन नयनों को देखा, “देखा कपि ने, चमके नभ में ज्यों तारा दल” | “बैठे वे वही कमल लोचन, पर सजल नयन/व्याकुल व्याकुल कुछ चिर प्रफुल्ल मुख निश्चेतन।” राम की ऐसी व्याकुल स्थिति देख कर हनुमान पंचतत्वों को समन्वित करके उस महाशक्ति से टक्कर लेने के लिए महाकाश में पहुँचते हैं जो रावण को सुरक्षा प्रदान किये हुए है :

तोड़ता बंध – प्रतिसंध धरा…

शत वायु वेग बल, डुबा अतल में देश भाव ।

31 of 36

  • रावण की पक्षधर शक्ति को “श्यामा विभावरी, अंधकार” कहा गया है, जाहिर है कि अज्ञान के अंधकार में डूबी जनशक्ति ही अन्याय का जाने अनजाने पक्ष लेती है। जर्मनी में हिटलर हो या पूँजीवादी देशों में लोकतंत्र की आड़ में शोषकों का वर्चस्व हो इसी जनशक्ति के पक्ष लेने के कारण सत्ता में रहते हैं। न्याय के पक्ष को जिसका प्रतिनिधित्व इस कविता में राम करते हैं हारते हुए देखकर जो कपि विचलित हो रहा है उसे “रुद्र राम पूजन प्रताप तेजःप्रसार” कहा गया है जो कि ज्योति का ही एक रूप है। पंचतत्वों पर विजय विज्ञान कर रहा है और यह विज्ञान भी समर में काम आ रहा है। आज तो विज्ञान का दुरुपयोग संपूर्ण पृथ्वी का संहार कर सकता है, निराला के समय में भी इस विज्ञान की युद्ध सामग्री का जनविनाशकारी रूप कुछ हद तक सामने आ चुका था। भारत की मुक्ति की लड़ाई में इस जनविनाशकारी रास्ते को वरेण्य नहीं माना गया था। इसीलिए शिव अपनी दुर्गा को अंजनीरूप धारण करने को कहते हैं और बताते हैं कि “विद्या का ले आश्रय इस मन को दो प्रबोध।” 

32 of 36

  • शक्ति की. मौलिक कल्पना” में ही इस कविता का प्रतीकार्थ खुलता है। यह परंपरागत दुर्गा या पार्वती या काली की पूजा का आख्यान नहीं है। यह कविता अपने प्रतीकार्थ में भारत के स्वाधीनता संग्राम की रणनीति की कविता है। यह पूजा उस जनशक्ति को अपने पक्ष में करने का उद्यम है जिसको साथ लिये बगैर कोई भी मुक्तिकामी नेतृत्व लड़ाई जीत नहीं सकता। फ्रांस की पूंजीवादी क्रांति हो, या रूस की अक्टूबर क्रांति या चीन और वियतनाम के मुक्तिसंग्राम या भारत की आज़ादी की लड़ाई हो इनमें विजय उसी बिंदु पर संभव हुई जब वर्गों का संतुलन मुक्ति की ताकतों के पक्ष में हो गया। कोई एक व्यक्ति चाहे वह अवतारी पुरुष ही क्यों न हो अकेले या जनशक्ति को अपने पक्ष में किये बगैर सत्ता हासिल नहीं कर सकता है। इसीलिए शोषक वर्गों के नेता और उनके दल भी अविद्या फैलाकर या झूठे वायदे करके इसी जनशक्ति को भरमाये रहते हैं और अपने पक्ष में किये रहते हैं और इस तरह सत्ता पर कब्जा किये रहते हैं।

33 of 36

  • यह नयी दृष्टि मध्ययुगीन दृष्टि से बिल्कुल भिन्न है। आज भी अज्ञानवश बहुत से लोग यह समझते हैं कि कोई अवतारी पुरुष नेतृत्व में आ जाये तो सभी दुखों और क्लेशों से उनकी मुक्ति हो सकती है। यह व्यक्तिकेंद्रित दृष्टिकोण अवैज्ञानिक और मिथ्याचेतना पर आधारित है। 

  • “राम की शक्तिपूजा” में यही वैज्ञानिक रणनीतिक सार्वभौमिक सत्य मिथकीय रूप धारण करके आया है। कविता में राम हनुमान से 108 या उससे भी ज्यादा कमल लाने को कहते हैं, जिन्हें चढ़ाकर राम शक्ति की पूजा करेंगे। 

34 of 36

सारांश

  • इस तरह “राम की शक्तिपूजा” अपने पूरे कलात्मक सौंदर्य के साथ अपने युग के सामाजिक सत्य से जुड़ती हुई एक सार्वभौमिक प्रक्रिया का बयान करती है जिसे असत्य के ऊपर सत्य की विजय के लिए हर बार अपनाना पड़ेगा। स्वाधीनता का पक्ष सत्य का पक्ष था, ब्रिटिश साम्राज्यवाद का पक्ष असत्य का पक्ष था, उस असत्य के खिलाफ विजय तभी हासिल हुई जब भारत की जनशक्ति नेतृत्व के साथ हो गयी। 

35 of 36

  • जब तक शोषित जनता बड़े पूंजीपतियों भूस्वामियों के राजनीतिक-वैचारिक नेतृत्व के चंगुल में फंसी रहेगी यानी असत्य की गोद में रहेगी, तब तक शोषण विहीन समाज बनाने वाली शक्तियों की विजय संभव नहीं। इसलिए सर्वहारा वर्ग को भी शक्तिपूजा की मौलिक कल्पना करनी पड़ती है। सारी क्रांतियों का इतिहास इस बात का साक्षी है। “राम की शक्तिपूजा” इसी ऐतिहासिक अनुभव को काव्यात्मक स्तर पर प्रस्तुत करती है। संवेदनात्मक स्तर पर समाहित यह सार्वभौमिक सत्य ही इस रचना को महान बनाता है, इसी तत्व की वजह से यह कविता एक इलहामी या प्रोफेटिक कविता भी बन जाती है। निराला की यह कविता हिंदी साहित्य की श्रेष्ठतम रचनाओं में से एक है।

36 of 36

धन्यवाद