सर्वशक्तिमान ईश्वर ( मनुष्य की कल्पना)
ईश्वर के कई रूप
सांसारिक मोह-माया में फँसा इंसान….मुक्ति की कामना..
सामान्य प्रार्थना कविताओं में मनुष्य अपनी रक्षा के लिए तथा सुख- समृद्धि के लिए ईश्वर से प्रार्थना करता है ; किंतु यह प्रार्थना (आत्मत्राण) अन्य प्रार्थनाओं से बिल्कुल भिन्न है क्योंकि इसमें कवि ईश्वर की मदद नहीं चाहता बल्कि अपनी रक्षा खुद करना चाहता है।
आत्मत्राण
मूल रचना (बंगला) - रवींद्रनाथ ठाकुर
अनुवाद (हिन्दी) - आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी
रवींद्रनाथ ठाकुर
जन्म- १८६१ मृत्यु – १९४१
शिक्षा-दीक्षा – घर पर स्वाध्याय
परिवार – बंगाल का संपन्न परिवार
रुचि – चित्रकला, संगीत भावनृत्य, प्रकृति से लगाव
स्थापना – शांति निकेतन में स्थित विश्वभारती विश्वविद्यालय ( शैक्षिक और सांस्कृतिक संस्था )
रचनाएँ – लोक संस्कृति का स्वर प्रमुख
‘ गीतींजलि ’ के लिए नोबल पुरस्कार
नैवेद्य,पूरबी,बलाका,क्षणिका,चित्र और सांध्यगीत,काबुलीवाला। गोरा,घरेबाइरे(उपन्यास)
पाठ- प्रवेश
तैरना सीखने वाले को पानी में कोई उतार तो सकता है,उसके आस-पास भी बना रह सकता है, मगर तैरना चाहने वाला जब स्वयं हाथ-पाँव चलाता है तभी तैराक बन पाता है।
परीक्षा देने जाने वाला जाते समय बड़ों से आशीर्वाद की कामना करता है, बड़े आशीर्वाद देते भी हैं, लेकिन परीक्षा तो उसे स्वयं ही देनी पड़ती है।
जब दो पहलवान कुश्ती लड़ते हैं तब उनका उत्साह तो सभी दर्शक बढ़ाते हैं, इससे उनका मनोबल बढ़्ता है, मगर कुश्ती तो उन्हें खुद ही लड़नी पड़ती है।
प्रस्तुत पाठ में कविगुरु मानते हैं कि प्रभु में सब कुछ संभव कर देने की शक्ति होती है , फिर भी वह यह कतई नहीं चाहता कि वही सब कुछ कर दें । कवि कामना करता है कि किसी भी आपद-विपद में , किसी भी द्वंद्व में सफल होने के लिए संघर्ष वह स्वयं करे, प्रभु को कुछ न करना पड़े। फिर आखिर वह अपने प्रभु से चाहते क्या हैं?
रवींद्रनाथ ठाकुर की प्रस्तुत कविता का बंगला से हिन्दी अनुवाद श्रद्धेय आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी ने किया है। द्विवेदी जी का हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने मेम अपूर्व योगदान है। यह अनुवाद बताता है कि अनुवाद कैसे मूल रचना की ‘ आत्मा ’ को अक्षुण्ण बनाए रखने में सक्षम है।
विपदाओं से मुझे बचाओ, यह मेरी प्रार्थना नहीं
केवल इतना हो (करुणामय) कभी न विपदा में पाऊँ भय
दुःख-ताप से व्यथित चित्त को न दो सांत्वना नहीं सही
पर इतना होवे(करुणामय) दुख को मैं कर सकूँ सदा जय
कोई कहीं सहायक न मिले तो अपना बल पौरुष न हिले
हानि उठानी पड़े जगत में लाभ अगर वंचना रही
तो भी मन में ना मानूँ क्षय
मेरा त्राण करो अनुदिन तुम यह मेरी प्रार्थना नहीं
बस इतना होवे (करुणामय) तरने की हो शक्ति अनामय
कष्ट – मुसीबत में कोई सहायक न मिलने पर भी मेरी शक्ति कमज़ोर न पड़े। लाभ के बदले हानि उठानी पड़े तो भी मैं हार न मानूँ।मेरी रक्षा करो, यह मेरी प्रार्थना नहीं है। बस इतनी शक्ति हो कि मैं इस दुख रूपी सागर को तैरकर पार कर सकूँ।
मेरा भार अगर लघु करके न दो सांत्वना नहीं सही
केवल इतना रखना अनुनय- वहन कर सकूँ इसको निर्भय
नत शिर होकर सुख के दिन में तव मुख पहचानूँ छिन-छिन में।
जीवन के दुख रूपी भार को अगर कम न कर सको तो न सही, मगर इतनी दया करना कि मैं निर्भय होकर इसे ढो सकूँ।
दुःख-रात्रि में करे वंचना मेरी जिस दिन निखिल मही
उस दिन ऐसा हो करुणामय, तुम पर करुँ नहीं कुछ संशय॥
गृह-कार्य
धन्यवाद!
प्रस्तुति – सीमांचल गौड़
स्नात्तकोत्तर शिक्षक
ज.न.वि. , बाघमारा