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प्रस्तुति

  • राजेन्द्र सिंह शेखावत
  • प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक (हिंदी)
  • के.वि.भा.नौसेना पोत,वालसुरा जामनगर
  • https://hindivalsura.blogspot.com/

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बच्चे काम पर जा रहे हैं

- राजेश जोशी

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पाठ - प्रवेश

प्रस्तुत कविता में बच्चों से बचपन छीन लिए जाने की पीड़ा व्यक्त हुई है। कवि ने उस सामाजिक – आर्थिक विडंबना की ओर इशारा किया है जिसमें कुछ बच्चे खेल , शिक्षा और जीवन की उमंग से वंचित हैं।

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कोहरे से ढँकी सड़क पर बच्चे काम पर जा रहे हैं

सुबह – सुबह

बच्चे काम पर जा रहे हैं

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हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है -यह

भयानक है इसे विवरण की तरह लिखा जाना

चहिए इसे सवाल की तरह नही.

काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे ?

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क्या अंतरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदे ?

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क्या दीमकों ने खा लिया है सारी रंग – बिरंगी किताबों को ?

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क्या काले पहाड़ के नीचे दब गए हैं सारे खिलौने ?

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क्या किसी भूकंप के नीचे ढह गई हैं सारे मदरसों की इमारतें?

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क्या सारे मैदान, सारे बगीचे और घरों के आँगन खत्म हो गए हैं एकाएक ?

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तो फिर बचा ही क्या है इस दुनिया में ?

कितना भयानक होता अगर ऐसा होता

भयानक है लेकिन इससे भी ज्यादा यह

कि हैं सारी चीज़ें हस्बमामूल

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पर दुनिया की हज़ारों सड़कों से गुज़रते हुए बच्चे , बहुत छोटे-छोटे बच्चे काम पर जा रहे हैं।

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