प्रस्तुति
बच्चे काम पर जा रहे हैं
- राजेश जोशी
पाठ - प्रवेश
प्रस्तुत कविता में बच्चों से बचपन छीन लिए जाने की पीड़ा व्यक्त हुई है। कवि ने उस सामाजिक – आर्थिक विडंबना की ओर इशारा किया है जिसमें कुछ बच्चे खेल , शिक्षा और जीवन की उमंग से वंचित हैं।
कोहरे से ढँकी सड़क पर बच्चे काम पर जा रहे हैं
सुबह – सुबह
बच्चे काम पर जा रहे हैं
हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है -यह
भयानक है इसे विवरण की तरह लिखा जाना
चहिए इसे सवाल की तरह नही.
काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे ?
क्या अंतरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदे ?
क्या दीमकों ने खा लिया है सारी रंग – बिरंगी किताबों को ?
क्या काले पहाड़ के नीचे दब गए हैं सारे खिलौने ?
क्या किसी भूकंप के नीचे ढह गई हैं सारे मदरसों की इमारतें?
क्या सारे मैदान, सारे बगीचे और घरों के आँगन खत्म हो गए हैं एकाएक ?
तो फिर बचा ही क्या है इस दुनिया में ?
कितना भयानक होता अगर ऐसा होता
भयानक है लेकिन इससे भी ज्यादा यह
कि हैं सारी चीज़ें हस्बमामूल
पर दुनिया की हज़ारों सड़कों से गुज़रते हुए बच्चे , बहुत छोटे-छोटे बच्चे काम पर जा रहे हैं।