वाख
कवयित्री परिचय :-
ललद्यद
जन्म – 1320 मृत्यु – 1391
जीवन-परिचय :-
कश्मीरी भाषा की लोकप्रिय संत-कवयित्री ललद्यद का जन्म सन् 1320 के लगभग कश्मीर के पाम्पोर के सिमपुरा गाँव में हुआ था| इनके जीवन के संबंध में कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती| ललद्यद को लल्लेश्वरी, लला, ललारिफा, ललयोगेश्वरी आदि नामों से भी जाना जाता है| माना जाता है कि ललद्यद का वैवाहिक जीवन सुखमय न होने के कारण 26 वर्ष की अवस्था मे ही घर त्यागकर गुरुसिद्ध श्रीकंठ से दीक्षा ली| उनका देहांत सन् 1391 के आसपास माना जाता है| ललद्यद की काव्य-शैली को ‘वाख’ कहा जाता है| जिस तरह हिन्दी में कबीर के दोहे, मीरा के पद, तुलसी की चौपाई और रसखान के सवैये प्रसिद्ध है, उसी तरह ललद्यद के वाख प्रसिद्ध हैं| अपने वाखों के जरिए उन्होंने जाति और धर्म की संकीर्णताओं से ऊपर उठकर भक्ति के ऐसे इसे रास्ते पर जोर दिया जिसका जुड़ाव जीवन से हो|
पाठ परिचय :-
भक्तिकाल की व्यापक जनचेतना और अखिल भारतीय स्वरूप से अवगत कराने के उद्देश्य से ललद्यद के चार वाखों का हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत है| प्रथम वाख मे ईश्वर-प्राप्ति के लिए की जाने वाले अपने प्रयासों की व्यर्थता की चर्चा की गई है| द्वितीय वाख में बाहरी आडंबरों का त्यागकर मायाजाल में कम से कम मायाजाल में लिप्त होने की बात कही गई है| तृतीय वाख में संसार-सागर से पार जाने के लिए सद्कर्मों की आवश्यकता पर बल दिया है तथा चतुर्थ वाख में भेदभाव का त्यागकर ईश्वर की सर्वव्यापकता को सिद्ध किया है|
वाख
(1)
रस्सी कच्चे धागे की,
खींच रही मैं नाव |
जाने कब सुन मेरी पुकार,
करें देव भवसागर पार |
पानी टपके कच्चे सकोरे,
व्यर्थ प्रयास हो रहे मेरे |
जी में उठती रह-रह हूक,
घर जाने की चाह है घेरे ||
वाख
(2)
खा-खाकर कुछ पाएगा नहीं,
न खाकर बनेगा अहंकारी |
सम खा तभी होगा समभावी,
खुलेगी साँकल बंद द्वार की ||
वाख
(3)
आई सीधी राह से, गई न सीधी राह |
सुषुम-सेतु पर खड़ी थी, बीत गया दिन आह !
जेब टटोली कौड़ी न पाई |
माझी को दूँ क्या उतराई ||
वाख
(4)
थल-थल में बसता है शिव ही,
भेद न कर क्या हिंदू-मुसलमां |
ज्ञानी है तो स्वयं को जान,
वही है साहिब से पहचान ||
शब्दार्थ
भवसागर - संसार रूपी सागर
सकोरा - मिट्टी का छिछला पात्र
हूक – तीव्र इच्छा
घर जाने की चाह - ईश्वर से मिलने की चाहत
समभावी - समान भाव वाला
अहंकारी - घमंडी
खुलेगी साँकल बंद द्वार की – मुक्ति का रास्ता मिल जाएगा
राह – रास्ता
जेब टटोली – आत्मलोचन किया
माझी – ईश्वर, गुरुदेव
साहिब - ईश्वर
अतिरिक्त प्रश्न :-
प्रश्न-1. ललद्यद किस भाषा की कवयित्री थीं? उनकी काव्य शैली का नाम
लिखिए|
उत्तर- ललद्यद ‘कश्मीरी’ भाषा की कवयित्री हैं| उनकी काव्य शैली ‘वाख’ है|
प्रश्न-2. ललद्यद की वाखों का हिंदी अनुवाद किसके द्वारा किया गया है?
उत्तर- ललद्यद की वाखों का हिंदी अनुवाद मीराकांत जी के द्वारा किया गया है|
प्रश्न-3. दी गई वाखों में से पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार के उदाहरण छाँटकर लिखिए|
उत्तर- i) जी में उठती रह-रह हूक|
ii) थल-थल में बसता है शिव ही|
प्रश्न-4. कवयित्री के क्या प्रयास व्यर्थ हो रहे हैं?
उत्तर- कवयित्री के ईश्वर प्राप्ति के सभी प्रयास व्यर्थ हो रहे हैं|
प्रश्न-5. कवयित्री क्या खाने की सलाह दे रही हैं तथा क्यों?
उत्तर- कवयित्री सम खाने की सलाह दे रही हैं, क्योंकि जब तक व्यक्ति के द्वारा
माध्यम मार्ग को नहीं अपनाया जाएगा तब तक हृदय में समानता का भाव पैदा
नहीं होगा अर्थात मोक्ष प्राप्ति का मार्ग नहीं खुलेगा|
प्रश्न-6. तीसरे वाख में ‘माझी’ किसके लिए प्रयुक्त हुआ है? कवयित्री का
उतराई देने से क्या तात्पर्य है?
उत्तर- तीसरे वाख में ‘माझी’ ईश्वर,या गुरु के लिए प्रयुक्त हुआ है| उतराई
देने से कवयित्री का तात्पर्य संसार से मुक्ति के लिए आवश्यक
‘पुण्य कर्मों के संग्रह’ से है
प्रश्न-7. अंतिम वाख में ‘साहिब’ से क्या तात्पर्य है?
उत्तर- अंतिम वाख में ‘साहिब’ का तात्पर्य ईश्वर से है|
धन्यवाद