BLESSINGS
ॐ ह्रीं अर्हम् नमः
श्रीसद्गुरुभ्यो नमः
ॐ ऐं नमः
SHREE MATI GYANAY NAMAH
SHREE SHRUT GYANAY NAMAH
SHREE AVADHI GYANAY NAMAH
SHREE MANAH - PARYAV GYANAY NAMAH
SHREE KEVAL GYANAY NAMAH
5 GYAN
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 27
5th Vrat : Parigrah – ParimanVrat
6th Vrat : Dik Pariman Vrat
Inspired by:
Yugpradhan Acharyatulya P.P. Panyas Shree Chandrashekar Vijayji M.S.
P.P. Panyas Shree Yashobhushan Vijayji M.S.
P.P. Panyas Shree Manobhushan Vijayji M.S.
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 27
पांचवा व्रत - परिग्रह परिमाण व्रत
पांचवा व्रत - परिग्रह परिमाण व्रत
संसार में परिग्रह पाप का मूल माना जाता है।
प्रश्नव्याकरण सूत्र में कहा है- "परिग्रह के लिए मनुष्य हिंसा करता है, झूठ बोलता है, चोरी करता है।
अनेक अनर्थ करता है।
अतः यह संसार में सबसे बड़ा बन्धन और भय का कारण है।"
परिग्रह पापो का कारण होते हुए भी, गृहस्थ जीवन परिग्रह के बिना नहीं चल सकता। संसार में भूमि, सोना, चाँदी आदि वस्तुएँ सीमित हैं।
किन्तु मनुष्य की आशा तृष्णा असीम है।
तृष्णा के वश होकर मनुष्य दुःखी होता है और धन पाकर भी सुख का अनुभव नहीं कर पाता, सुख पाने का साधन है- परिग्रह का परिमाण करना।
धन आदि की मर्यादा रखना। परिग्रह परिमाण व्रत में श्रावक नव प्रकार के बाह्य परिग्रह की मर्यादा रखता है।
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पांचवा व्रत - परिग्रह परिमाण व्रत
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 27
पांचवा व्रत - परिग्रह परिमाण व्रत
धन / धान्य
बाह्य परिग्रह के नौ भेद –
(१) धन - नगद रुपया व बैंक बैलेंस
(२) धान्य - सभी प्रकार के अन्न-धान्य
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पांचवा व्रत - परिग्रह परिमाण व्रत
क्षेत्र / वास्तु
(३) क्षेत्र - खेत, बाग आदि खुली भूमि
(४) वास्तु - मकान, दुकान, कारखाना आदि।
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पांचवा व्रत - परिग्रह परिमाण व्रत
हिरण्य / सुवर्ण
(५) हिरण्य - चाँदी आदि।
(६) सुवर्ण - सोना आदि
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पांचवा व्रत - परिग्रह परिमाण व्रत
कुप्य
(७) कुप्य- सोना, चाँदी आदि के अतिरिक्त अन्य समस्त धातु की वस्तुएँ
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पांचवा व्रत - परिग्रह परिमाण व्रत
द्विपद-चतुष्पद
(८) द्विपद- दो पाँव वाले प्राणी
(९) चतुष्पद- हाथी, घोड़ा आदि पशु
श्रावक इन नौ प्रकार के परिग्रहों की मर्यादा रखता है और मर्यादा उपरांत सभी धन-संपदा को सात धर्म क्षेत्रों में सद्व्यय करके पुण्य का उपार्जन करता है और जीवन में संतोष का परम सुख अनुभव करता है।
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छठा व्रत - दिक् परिमाण व्रत
छठा व्रत - दिक् परिमाण व्रत
श्रावक के पाँच अणुव्रतों को मूल गुण कहा जाता है। उन मूल गुणों की सुरक्षा, उनमें और अधिक दृढ़ता तथा तेजस्विता लाने के लिए तीन गुणव्रतों का विधान भी है। गुणव्रत तीन हैं- (1) दिशा परिमाण व्रत, (2) उपभोग परिभोग परिमाण व्रत, (3) अनर्थ दण्ड विरमण व्रत।
दिशा परिमाण व्रत में ऊँची-नीची तथा पूर्व-पश्चिम आदि तिरछी दिशाओं में जाने की मर्यादा की जाती है।
उक्त मर्यादा (सीमा) से बाहर गमन न करने में पाप-द्वार बन्द हो जाते हैं और श्रावक को अधिक व्रताराधना का लाभ मिलता है।
जैसे पहले अणुव्रत में स्थूल हिंसा आदि की मर्यादा की थी। किन्तु उसकी सभी दिशाएँ खुली थीं। इस व्रत में अमुक निश्चित दिशा में सीमा से बाहर जाकर आरम्भ परिग्रह आदि के सेवन का त्याग किया जाता है। इससे उसके जीवन में हिंसा आदि का क्षेत्र सीमित हो गया। व्रत का क्षेत्र बढ़ जाता है।
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छठा व्रत - दिक् परिमाण व्रत
तीन कारण- दिशा विदिशाओं में यात्रा करने के तीन मुख्य कारण हैं-
(2) आमोद-प्रमोद, मनोरंजन या इन्द्रियों के सुखों के लिए,
(3) किसी आध्यात्मिक प्रयोजन-जैसे तीर्थ यात्रा व गुरु दर्शन आदि के लिए।
प्रथम दो कारणों में अर्थ और काम की प्रधानता रहती है।
अतः श्रावक उनसे बचकर रहे।
दिशा परिमाण व्रत के पाँच अतिचार हैं जिनको जानकर" उनसे बचना चाहिए
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छठा व्रत - दिक् परिमाण व्रत
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छठा व्रत - दिक् परिमाण व्रत
उपर की दिशा
१. उपर की दिशा - पेड़, पहाड़ पर चढ़ने में या विमान में सफर करने की ऊँचाई का विस्तार तय करने के बाद लोभ लालच या अन्य किसी कारण से मर्यादा का उल्लंघन नहीं करना चाहिए।
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छठा व्रत - दिक् परिमाण व्रत
नीचे की दिशा
२. नीचे की दिशा - नीचे भूमिगृह (तलघर) में.... कुँए वगैरह में उतरने का प्रमाण (मर्यादा) निश्चित करके उसकी मर्यादा नहीं तोड़नी चाहिए।
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छठा व्रत - दिक् परिमाण व्रत
तिरछी दिशा
३. तिरछी दिशा - आड़े-तिरछे जाने (गाड़ी, बस या अन्य किसी वाहन से, पैदल चलकर) का प्रमाण तय करने के बाद उसको भंग नहीं करना चाहिए।
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छठा व्रत - दिक् परिमाण व्रत
प्रमाण कम ज्यादा करना
४. प्रमाण कम ज्यादा करना - अलग-अलग दिशाओं का अलग-अलग प्रमाण स्वीकार करने के पश्चात् कम प्रमाणवाली दिशा में विशेष प्रयोजन आ जाने पर, दूसरी दिशा में स्वीकृत प्रमाण में से अमुक हिस्सा कम करके इच्छित दिशा में जोड़ना नहीं चाहिए।
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छठा व्रत - दिक् परिमाण व्रत
विस्मृति
५. विस्मृति - प्रमाद से या मोह से, लिये हुए व्रत का स्वरूप और उसकी मर्यादा विस्मृत न हो जाये इसकी सावधानी रखनी चाहिए। सावधानीपूर्वक अतिचारों के सेवन से बचता हुआ श्रावक अपने नियम का पालनकरे।