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कबीर के काव्य का सामाजिक पक्ष

पवन कुमारी

हिन्दी विभाग

हंसराज महिला महाविद्यालय,जालंधर

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  • संत   कबीर   निर्गुण   मत   के   अनुयायी   कवि   है।   
  • भक्ति   काल   में   निर्गुण   भक्तों   में   कबीर   को   सर्वोच्च   स्थान   दिया   गया   है।  
  • भारतभूमि   जो   अनेक   रत्नों   की   खान   रही   है   उन्हीं   महान्   रत्नों   में   से   एक   थे 
  •  संत   कबीर कबीर   का   अरबी   भाषा   में   अर्थ   है  -  महान्। 

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  •  वे   भक्त   और   कवि   बाद   में   थे, पहले   समाज   सुधारक   थे।   वे   सिकन्दर   लोदी   के   समकालीन   थे। 
  •  कबीर   की   भाषा  सधुक्कड़ी   थी   तथा   उसी   भाषा   में   कबीर   ने   समाज   में   व्याप्त   अनेक   रूढ़ियों   का   खुलकर   विरोध   किया   है।   
  • हिन्दी   साहित्य   में   कबीर   के   योगदान   को   नकारा   नहीं   जा   सकता।   रामचन्द्र   शुक्ल   ने   भी   उनकी   प्रतिभा   मानते   हुए   लिखा   है   “ प्रतिभा   उनमें   बड़ी   प्रखर   थी। ”

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  • धार्मिक   पाखण्ड   का   विरोध   करते   हुए   कबीर   कहते   हैं   भगवान   को   पाने   के   लिए   हमें   कहीं   जाने   की   जरूरत   नहीं   है।   वह   तो   घट - घट   का   वासी   है।   उसे   पाने   के   लिए   हमारी   आत्मा   शुद्ध   होनी   चाहिए।   भगवान   न   तो   मंदिर   में   है,   न   मस्जिद   में   है।   वह   तो   हर   मनुष्य   में   है।

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  • कस्तुरी   कुण्डली   बसै,   मृग   ढूंढें   बन   माँहि।

एसै   घटि   घटि   राम   हैं,   दुनियाँ   देखै   नाँहि।।  2

 

माला   फेरत   जुग   गया,   गया      मन   फेर,

कर   का   मनका   डारि   के   मन   का   मनका   फेर। 

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  • कबीर   ने   मूर्ति   पूजा   की   भी   कड़े   शब्दों   में   निंदा   की   है।   अगर   पत्थर   पूजने   से   भगवान   मिलता   है   तो   मैं   तो   पूरे   पहाड़   को   ही   पूजने   लग   जाऊंगा।
  •  कबीर   पाथर   पूजे   हरि   मिलै,   तो   मैं   पूजूँ   पहार।

घर   की   चाकी   कोउ      पूजै,   जा   पीसा   खाए   संसार।। 

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  • कबीर   जी   हिंसा   का   विरोध   करते   हैं।   एक   जीव   दूसरे   जीव   को   खाता   है   तो   कबीर   को   बहुत   ही   टीस   होती   है।   वे   उन्हें   समझाते   हुए   कहते   हैं  -
  • बकरी   पाती   खात   है,   ताकी   काठी   खाल,

जो   नर   बकरी   खात   है,   तिनको   कौन   हवाल। 

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  • कबीर   के   अनुसार,   जिसमें   प्रेम,   दया   व   करूणा   भावना   है   वही   सबसे   बड़ा   ज्ञानी   है।   बड़े - बड़े   ज्ञानी   भी   प्रेम   भावना   के   बिना   मूर्ख   के   समान   है।
  •  पोथी   पढ़ी - पढ़ी   जग   मुआ   पंडित   भया      कोय।

ढाई   आखर   प्रेम   का   पढ़़े,   सो   पंडित   होय  

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  • कबीर   जी   मनुष्य   को   समझाते   हुए   कहते   हैं   कि   यह   मनुष्य   जीवन   क्षण - भर   के   लिए   है।   
  •  पानी   केरा   बुदबुदा,   उस   मानस   की   जाति।

एक   दिनाँ   छिप   जाता   है,   जो   तारा   प्रभात। 

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  • कबीर   ने   समाज   में   व्याप्त   जाँति - पाँति   व   ऊँच -   वे   मनुष्य   के   ज्ञान   व   कर्म   को   महान   मानते   हुए   कहते   हैं  -
  •  जाँति      पूछो   साधा   की   पूछ   लीजिए   ज्ञान।

मोल   करो   तलवार   का   पड़ा   रहने   दो   म्यान। 

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  • कबीर   ने   गुरू   को   बहुत   महत्व   दिया   है।   उनकी   अहम्   प्रेरणा   का   मूल   स्त्रोत   उनके   गुरू   ही   थे   जिनकी   कृपा   से   उन्होंने   सभी   संकीर्ण   बन्धनों   को   तोड़ा,
  •  सतगुर   की   महिमा   अनंत,   अनंत   किया   उपगार,

लोचन   अनंत   उघाड़िया,   अनंत   दिखावण   हार।। 

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  • कबीर   ने   गुरू   को   परमात्मा   से   भी   बड़ा   दर्जा   दिया   है   तथा   वो   कहते   हैं   कि   गुरू   ही   की   भक्ति   के   द्वारा   हमें   परमात्मा   मिलते   हैं।   वो   कहते   हैं  -
  • गुरू   गोबिन्द   दोउ   खड़े,   काकै   लागू   पाय।

बलिहारी   गुरू   आपने,   गोबिन्द   दियो   बताय।

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  • कबीर   ने   नारी   की   निंदा   की   है।   उन्होंने   नारी   को   भक्ति   के   मार्ग   में   बाधा   माना   है।   नारी   को   माया   स्वरूप   माना   है  -
  •  नारी   कीझांई   परै,   अंधा   होत   भुजंग।

कबीर   तिन   की   कौन   गति,   जो   नित   नारी   के   संग।। 

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  • कबीर   जी   धन   सम्पत्ति   जोड़ना   भी   उचित   नहीं   समझते   थे।   उन्होंने थोड़े   में   ही   संतोष   करने   का   उपदेश   दिया   है।   इसलिए   कबीर   ने कहा   है  -
  • पूत   कपूत   तो   क्यों   धन   संचय

पूत   सपूत   तो   क्यों   धन   संचय।

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  • उन्होंने   जीवन   को   क्षण   भंगुर   बता   कर ,  लोगों   को   भक्ति   और   मानव   सेवा   का   फल   प्राप्त   करने   व   साथ   ही   मनुष्य   को   दुष्कर्म   करने   के   प्रति   भी   सचेत   किया   है।
  •  पानी   केरा   बुदबुदा,   अस   मानुस   की   नात,

एक   दिना   छिप   जाएगा,   ज्यों   तारा   परभात। 

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  • इस   प्रकार   कबीर   का   अपने   समाज   के   प्रति   दृष्टिकोण   वैज्ञानिक   एवं   व्यवस्थित   था,   वो   किसी   प्रकारके   बाह्य   आडंबर   तथा   शोषण   के   खिलाफ   खड़े   थे।   इस   संदर्भ   में   हजारी   प्रसाद   द्विवेदी   ने   लिखा   भी   है   कि   “ कबीरदास   ऐसे   ही   मिलन   बिन्दु   पर   खड़े   थे,   जहाँ   एक   ओर   हिन्दुत्व   निकल   जाता   था,   दूसरी   ओर   मुसलमान,   जहाँ   एक   ओर   ज्ञान   निकल   जाता   है,   दूसरी   ओर   अशिवा,   जहाँ   एक   ओर   ज्ञान   भक्ति   मार्ग   निकल   जाता   है,   दूसी   ओर   योगमार्ग,   जहाँ   एक   ओर   निर्गुण   भावना   निकल   जाती   है,   दूसरी   ओर   सगुण   साधना।   उसी   प्रशस्त   चैराहे   पर   वे   खड़े   थे।   वे   दोनों   को   देख   सकते   थे   और   परस्पर   विरूद्ध   दिशा   में   गये   मार्गों   के   गुण   दोष   उन्हें   स्पष्ट   दिखाई   दे   जाते   थे। ”

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धन्यवाद