कबीर के काव्य का सामाजिक पक्ष
पवन कुमारी
हिन्दी विभाग
हंसराज महिला महाविद्यालय,जालंधर
एसै घटि घटि राम हैं, दुनियाँ देखै नाँहि।। 2
“
माला फेरत जुग गया, गया न मन फेर,
कर का मनका डारि के मन का मनका फेर। ”
घर की चाकी कोउ न पूजै, जा पीसा खाए संसार।। ”
जो नर बकरी खात है, तिनको कौन हवाल। ”
ढाई आखर प्रेम का पढ़़े, सो पंडित होय ” ।
एक दिनाँ छिप जाता है, जो तारा प्रभात। ”
मोल करो तलवार का पड़ा रहने दो म्यान। ”
लोचन अनंत उघाड़िया, अनंत दिखावण हार।। ”
बलिहारी गुरू आपने, गोबिन्द दियो बताय।
कबीर तिन की कौन गति, जो नित नारी के संग।। ”
पूत सपूत तो क्यों धन संचय।
एक दिना छिप जाएगा, ज्यों तारा परभात। ”
धन्यवाद