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BLESSINGS

ॐ ह्रीं अर्हम् नमः

श्रीसद्गुरुभ्यो नमः

ॐ ऐं नमः

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SHREE MATI GYANAY NAMAH

SHREE SHRUT GYANAY NAMAH

SHREE AVADHI GYANAY NAMAH

SHREE MANAH-PARYAV GYANAY NAMAH

SHREE KEVAL GYANAY NAMAH

5 GYAN

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Learn and Turn Jainism – Part 2 Lesson No. 46

14 Rajlok

Inspired by:

Yugpradhan Acharyatulya P.P. Panyas Shree Chandrashekar Vijayji M.S.

P.P. Panyas Shree Yashobhushan Vijayji M.S.

P.P. Panyas Shree Manobhushan Vijayji M.S.

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Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 46

14 Rajlok

लोक - नीचे से ऊपर १४ राजु प्रमाण लंबा, ७ राजु प्रमाण चौड़ा है,

१ राजु याने असंख्य योजन प्रमाण।

तीन लोक - लोक के तीन भाग हैं। हम चित्र द्वारा इसे ठीक प्रकार से समझने का प्रयास करते हैं|�चित्र में सबसे नीचे का एक भाग दिखाया है, वह अधोलोक है। अधोलोक सबसे बड़ा है। नीचे से यह लगभग सात राजु जितना ऊँचा है।

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Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 46

14 Rajlok

वैमानिक देव - ज्योतिष चक्र से असंख्य योजन ऊपर जाने पर १२ कल्प विमान हैं। जिनमें सौधर्म, ईशानकल्प आदि १२ देवलोक हैं।

१-२ तथा ३-४ देवलोक एक दूसरे के सामने अर्ध चन्द्राकार स्थित हैं।

उनके ऊपर पांचवाँ ब्रह्मलोक है, इसके दोनों तरफ के भाग में अरुणवर समुद्र से उठी तमस्काय पुरी होती है। वहाँ आठ कृष्णा राशियाँ हैं, जिनके बीच में नवलौकान्तिक देव रहते हैं।

५,६,७,८ में चार कल्प विमान एक दूसरे के ऊपर हैं।

फिर ९,१०, तथा ११,१२ ये चार कल्प, प्रथम चार कल्पों की तरह अर्ध चंद्राकार हैं।

कल्प विमानों के ऊपर नवग्रैवेयक विमान एक-दूसरे के ऊपर हैं।उनके ऊपर पांच अनुत्तर विमान हैं। बीच में सर्वार्थ सिद्ध विमान है और चारों तरफ चार अनुत्तर विमान हैं।

सिद्धशिला - पांच अनुत्तर विमान से ऊपर दूज के आकार में सिद्धशिला है। उसके ऊपर सिद्ध क्षेत्र है।

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14 Rajlok

तिर्यक लोक - अधोलोक के ऊपर तथा ऊर्ध्वलोक के नीचे बीच में १८०० योजन ऊँचा तथा १ रज्जू लम्बा तिर्यक लोक या मध्यलोक है।

मेरु पर्वत - मध्यलोक के मध्य में एक लाख योजन ऊँचा मेरु पर्वत है। वह १ हजार योजन गहरा भूमि में है। जिसका १०० योजन भाग तो मध्यलोक में है तथा ९०० योजन नीचे का भाग अधोलोक की सीमा में आता है।

असंख्य द्वीप समुद्र - एक द्विप, बादमे एक समुद्र, बादमे फिरसे एक द्विप, बादमे फिरसे एक समुद्र, इसी तरह असंख्य द्विप और समुद्र तिर्चालोक में होते है|

अढ़ाई द्वीप - मेरु पर्वत के बाहर १ लाख योजन का विस्तृत जम्बूद्वीप तथा उसके बाहर धातकी खंड, अर्ध पुष्करवरद्वीप को अढ़ाई द्वीप कहते हैं।

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14 Rajlok

व्यंतर देव - प्रथम नरक भूमि के ऊपर तथा मेरु पर्वत के नीचे १००० योजन का भू-क्षेत्र है।

इसमें १०० योजन ऊपर तथा १०० योजन नीचे छोड़कर बीच का ८०० योजन का क्षेत्र, आठ प्रकार के व्यन्तर देवों के आवास स्थान है। भूत-प्रेत आदि व्यन्तर जाति के देव यहाँ के ८ प्रतरों में निवास करते हैं।

वाण व्यंतर देव - इसके ऊपर १० योजन का स्थान खाली है। फिर ८० योजन के प्रतरों में ८ प्रकार के वाण व्यन्तर देव निवास करते हैं।

इसके ऊपर १० योजन क्षेत्र खाली है,

उसके ऊपर मेरु पर्वत का समभूतला है।

तिर्छालोक ( B )

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अधोलोक में सात नरक भूमियाँ हैं, जिनमें नारकी जीव रहते हैं तथा भवनपति आदि असुर जाति के देव भी रहते हैं।

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सात नरक - सबसे नीचे महातमप्रभा नाम की सातवीं नरक भूमि है। यह क्षेत्र की दृष्टि से सबसे बड़ी है।

उसके ऊपर

छठी तम:प्रभा,

पाँचवीं धूमप्रभा,

चौथी पंकप्रभा,

तीसरी बालुप्रभा,

दूसरी शर्कराप्रभा,

पहली रत्नप्रभा नरक भूमि है।

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