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BLESSINGS

ॐ ह्रीं अर्हम् नमः

श्रीसद्गुरुभ्यो नमः

ॐ ऐं नमः

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SHREE MATI GYANAY NAMAH

SHREE SHRUT GYANAY NAMAH

SHREE AVADHI GYANAY NAMAH

SHREE MANAH-PARYAV GYANAY NAMAH

SHREE KEVAL GYANAY NAMAH

5 GYAN

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Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 45

12 Aara (kaalchakra)

Inspired by:

Yugpradhan Acharyatulya P.P. Panyas Shree Chandrashekar Vijayji M.S.

P.P. Panyas Shree Yashobhushan Vijayji M.S.

P.P. Panyas Shree Manobhushan Vijayji M.S.

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Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 45

१२ आरा का काल चक्र

१२ आरा का काल चक्र

पवन के प्रवाह की तरह जो बिना रूके, विना थमे सतत गतिशील है, उसे कहते है 'समय"। समय को काल भी कहते है। सदा गतिशील होने के कारण ईसे काल चक्र भी कहा जाता है।

गाडी का चक्र (पहिया) कभी ऊपर और कभी नीचे घुमता रहता है। इसी प्रकार कालचक्र भी कभी विकास की तरफ ऊपर उठता है, तो कभी हास की ओर नीचे जाता है। नीचे ऊपर के इस क्रम से काल को दो भागों में बाँटा गया है-

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१२ आरा का काल चक्र

(१) अवसर्पिणी काल और (२) उत्सर्पिणी काल

अवसर्पिणी काल - जिस काल में जीवों की शक्ति, अवगाहना, आयु तथा प्राकृतिक सम्पदा एवं पर्यावरण की सुन्दरता क्रमश घटती जाती है, वह अवसर्पिणी काल कहलाता है और जिस काल में शक्ति, अवगाहना और आयु तथा धरती की सरसता आदि में क्रमश वृद्धि होती जाती है, वह उत्सर्पिणी काल कहलाता है।

अवसर्पिणी काल समाप्त होने पर उत्सर्पिणी काल आता है और उत्सर्पिणी काल समाप्त होने पर अवसर्पिणी काल। अनादिकाल से यह क्रम चला आ रहा है और अनन्तकाल तक यही क्रम चलता रहेगा।

उत्सर्पिणी काल १० कोड़ा-कोड़ी सागरोपम का है, अवसर्पिणी काल भी इतना ही है। दोनो मिलकर २० कोड़ा-कोड़ी सागरोपम का एक काल-चक्र होता है। प्रत्येक काल के छह-छह आरे है। काल-चक्र के कुल बारह आरे ईस प्रकार है।

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१२ आरा का काल चक्र

(१) सुषमा - सुषमा - अवसर्पिणी काल के पहले आरे में मनुष्यो के शरीर की अवगाहना तीन कोस की, आयु तीन पल्योपम की होती है।

मनुष्यो के शरीर में २५६ पसलियाँ होती है।

अत्यंत रूपवान और सरल स्वभाव वाले होते है। एक साथ स्त्री और पुरूष का जोडा उत्पन्न होता है। जिसे युगलिक कहते है।

उनकी ईच्छाएँ दस प्रकार के कल्पवृक्षो से पूर्ण होती है। प्रथम आरे के मनुष्यो को आहार की इच्छा तीन-तीन दिन के अन्तर से होती है।

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१२ आरा का काल चक्र

पहले आरे के स्त्री-पुरूष की आयु जब छह महीना शेष रहती है तो युगलिनी पुत्र-पुत्री का एक जोडा प्रसव करती है।

सिर्फ ४९ दिन तक उनका पालन-पोषण करना पडता है।

इतने दिनों में वे होशियार और स्वावलम्बी होकर सुख का उपभोग करते रहते है।

उनके माता-पिता में से एक को छींक और दुसरे को जँभाई (उबासी) आती है और मृत्यु को प्राप्त हो जाते है।

मृत्यु के बाद वे देवगति प्राप्त करता है।

उस क्षेत्र के अधिष्ठाता देव युगल के मृतक शरीरों को क्षीर समुद्र में ले जाकर प्रक्षेप कर देते है।

पहला आरा ४ कोड़ाकोड़ी सागरोपम का होता है।

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१२ आरा का काल चक्र

(२) सुषमा - प्रथम आरे की समाप्ति होने पर तीन कोड़ाकोड़ी सागरोपम का सुषमा नामक दुसरा आरा आरभ्भ होता है।

दुसरे आरे में, पहले आरे की अपेक्षा वर्ण, रस, गंध और स्पर्श की उत्तमता में अनन्तगुनी हीनता आ जाती है।

क्रम से घटती-घटती दो कोस की शरीर की अवगाहना; दो पल्योपम की आयु और १२८ पसलियाँ रह जाती हैं।� दो दिन के अन्तर से आहार की इच्छा होती है। मृत्यु से छह माह पहले युगलिनी पुत्र-पुत्री के एक जोडे को जन्म देती है।

इस आरे में ६४ दिन तक उनका पालन-पोषण करना पड़ता है।

तत्पश्चात् वे स्वावलम्बी हो जाते है और सुखोपभोग करते हुए विचरते है।

शेष सभी वर्णन पहले आरे के समान ही समझना चाहिए।

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(३) सुषमा-दुषमा - दो कोड़ाकोड़ी सागरोपम को तीसरा सुषमा दुषमा (बहुत सुख और थोडा दुःख) नामक तीसरा आरा आरम्भ होता है। इस आरे में भी वर्ण, रस, गंध और स्पर्श की उत्तमता में क्रमश अनन्तगुनी हानि हो जाती है। घटते घटते एक कोस का देहमान, एक पल्योपम का आयुष्य और ६४ पसलियाँ रह जाते है। एक दिन के अन्तर पर आहार की ईच्छा होती है। मृत्यु के छह माह पहले युगलिनी पुत्र-पुत्री के जोडे को जन्म देती है। ७९ दिनों तक पालन-पोषण करने के पश्चात् वह जोडा स्वावलम्बी हो जाता है।

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जव तीसरा आरा समाप्त होने में चौरासी लाख पूर्व, ३ वर्ष और ८ मास १५ दिन शेष रह जाते है, तब प्रथम तीर्थंकर का जन्म होता है। काल के प्रभाव से, कल्पवृक्षो से कुछ भी प्राप्ति नहीं होती, तब मनुष्यो क्षुधा से पीडित और व्याकुल होते है। परस्पर विग्रह होने लगता है, तब सब मिलकर अपनी समस्या लेकर उन राजकुमार (भावी तीर्थंकर) के पास आते है। वे उनके प्राणों की रक्षा के लिए खेती करना, अग्नि प्रज्वलित करना तथा शिल्प आदि कलाएँ सिखाते है। सम्पूर्ण सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था हो चुकने के अनन्तर प्रथम तीर्थंकर राज्य-ऋद्धि का परित्याग कर देते है और स्वतः प्रबुद्ध होकर संयम ग्रहण करके, तपश्चर्या करके चार घातिकर्मो का सर्वथा क्षय करके केवलज्ञान प्राप्त करके धर्मतीर्थ की स्थापना करतै है और आयु का अन्त होने पर मोक्ष पधारते है। प्रथम चक्रवर्ती भी इसी आरे में होते है।

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(४) दुषमा - सुषमा- तीसरा आरा समाप्त होते ही ४२,००० वर्ष कम एक कोडी कोडी सागरोपम का चौथा आरा आरम्भहोता है। ईस आरे में पहले की अपेक्षा वर्णादि की, शुभ पुदगलों की अनन्तगुणी हानि हो जाती है। देहमान क्रमश घटते घटते ५०० धनुष का और आयुष्य एक करोड पूर्व का रह जाता है। पसलियाँ सिर्फ ३२ होती है। २३ तीर्थंकर, ११ चक्रवर्ती, ९ बलदेव, ९ वासुदेव, ९ प्रतिवासुदेव भी इसी आरे मे होते है।

चौथा आरा समाप्त होने में जब तीन वर्ष और ८.५ महीने शेष रहते है तब चोवीसवें तीर्थंकर मोक्ष पधार जाते है।

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(५) दुषमा - २१,००० वर्ष का 'दुषमा' नामक पाँचवाँ आरा आरम्भ होता है। चौथे आरे की अपेक्षा वर्ण, रस, गंध, स्पर्श में अर्थात् शुभ पुदगलों में अनन्त गुनी हीनता हो जाती है। आयु क्रम से घटते-घटते उत्कृष्ट १२५ वर्ष की, शरीर की अवगाहना सात हाथ की तथा पसलियाँ १६ रह जाते है। दिन में दो बार आहार करने की इच्छा होती है।

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१२ आरा का काल चक्र

पाँचवें आरे में केवलज्ञान आदि दस बातों का अभाव हो जाता है। पंचम आरे के अन्तिम दिन देवेन्द्र (शक्रेन्द्र) का आसन कम्पायमान होता है। तब इन्द्र आकाशवाणी करते हैं." हे मनुष्यों ! कल छठा आरा लगेगा सावधान हो जाओ। धर्मकृत्य करना है सो कर लो।" इस प्रकार इन्द्र की वाणी सुनकर धर्मात्मा पुरूष ममत्व का त्याग करके धार्मिक हो जाते है। फिर संवर्त्तक वायु चलती है। उस भयानक वायु के कारण वैताढच पर्वत, ऋषभकूट, गंगा नदी और सिन्धु नदी के अतिरिक्त समस्त पर्वत, किले, महल और घर टूट-फूटकर भूमिसात् (जमीदोज) हो जाते है।

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(६) दुषमा-दुषमा - पंचम आरे की पूर्णाहुति होते ही २१,००० वर्ष का छठा आरा आरम्भ होता है। तव भरत क्षेत्र का अधिष्ठाता देव, पंचम आरे के विनष्ट होते हुए मनुष्यों में से बीज रूप कुछ मनुष्यों को उठा ले जाता है।

वैताढय पर्वत के दक्षिण और उत्तर भाग में जो गंगा और सिन्धु नदी है, उनके आठों किनारों (तटों) में से प्रत्येक किनारे पर नौ-नौ बिल (गुफा जैसे घर) है।

सब मिलकर ८ X९ ७२ बिल हैं।

प्रत्येक विल में तीन-तीन मंजिल है।

देव उन मनुष्यों को इन विलों में रख देता है।

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छठे आरे में पहले की अपेक्षा वर्ण, रस, गन्ध, सपर्श में शुभ पुगलों की पर्याय में अनन्त गुनी हानी हो जाती है। आयु क्रम से घटते-घटते २० वर्ष की और शरीर की ऊँचाई सिर्फ एक हाथ की रह जाती है। शरीर में आठ पसलियाँ रह जाती हैं। अपरिमित आहार की इच्छा होती है। रात्रि में शीत और दिन में ताप अत्यन्त प्रबल होता है। ईस कारण वे मनुष्य बिलों से बाहर नहीं निकल सकते। सिर्फ सूर्यादय के समय और सूर्यास्त के समय एक मुहूर्त के लिए बाहर निकल पाते है। गंगा और सिंन्धु नदियों के पानी में कच्छ-मच्छ बहुत होते हैं। वे मनुष्य उन्हें पकड पकड़कर और नदी के रेत में गाड़कर अपने बिलों में भाग जाते है। शीत-ताप आदि के योग से जब वे पक जाते हैं तो दूसरी बार आकर उन्हें निकाल लेते हैं। उस पर सब के सब टूट पड़ते हैं और लूटकर खा जाते हैं। उस काल के मनुष्य आचार-विचार से हीन और माता, भगिनी, पुत्री आदि के साथ संगम करने वाले होते है। छह वर्ष की स्त्री सन्तान का प्रसव करती है। वे अपनी आयु पूर्ण करके नरक या तिर्यंचगति के अतिथि बन जाते है।

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उत्सर्पिणी काल - अवसर्पिणी काल के जिन छह आरों का वर्णन किया गया है वही छह आरे उत्सर्पिणी काल में होते है। अन्तर यह है कि उत्सर्पिणी काल में वे सवी विपरीत क्रम से होते है। उत्सर्पिणी काल दुषमा-दुषमा आरे से आरम्भ होकर सुषमा-सुषमा पर समाप्त होता है। आगे उनका वर्णन किया जाता है।

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(१) दुषमा-दुषमा - उत्सर्पिणी काल का पहला दुषमा-दुषमा आरा २१००० वर्ष का श्रावण वद १ के दिन आरम्भ होता है।

ईसका वर्णन अवसर्पिणी काल के छठे आरे के समान ही समझना चाहिए। विशेषता यह है कि इस काल में आयु और अवगाहना आदि क्रमशः बढ़ती जाती है।

हास के बाद क्रमिक विकास बढता है

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(२) दुषमा - इसके अनन्तर दूसरा दुषमा आरा भी २१ हजार वर्ष का होता है, इस आरे के आरम्भ होते ही पाँच प्रकार की वृष्टि सम्पूर्ण भरत क्षेत्र में होती है यथा (१) आकाश, घन, घटाओं से आच्छादित हो जाता है और विद्युत के साथ सात दिन-रात तक निरन्तर 'पुष्कर संवर्तक' नामक मेघ वृष्टि करते हैं।

इससे धरती की उष्णता दूर हो जाती है।

(२) इसके पश्चात् सात दिन वर्षा बन्द रहती है।

फिर सात दिन तक निरन्तर दुग्ध के समान 'क्षीर' नामक मेघ बरसते है, जिससे सारी दुर्गन्ध दूर हो जाती है।

फिर सात दिन तक वर्षा वन्द रहती है।

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फिर (३) 'घृत' नामक मेघ सात दिन-रात तक निरन्तर बरसते रहते हैं।

इससे पृथ्वी में स्निग्धता आ जाती है।

(४) फिर सात दिन-रात तक निरन्तर अमृत के समान 'अमृत' नामक मेघ बरसते रहते है।

इस वर्षा से २४ प्रकार के धान्यों के तथा अन्यान्य सब वनस्पतियों के अंकुर जमीन में से फूट निकलते हैं।

(५) फिर सात दिन खुला रहने के बाद ईख के रस के समान 'रस' नामक मेघ सात दिन-रात तक निरन्तर बरसते हैं, जिससे वनस्पति में मधुर, कटुक, तीक्ष्ण, कषैले और अम्ल रस की उत्पत्ति होती है।

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पाँच सप्ताह वर्षा के और दो सप्ताह खुले रहने के, यों सात सप्ताहों के ७४ ७ ४९ दिन, बाद संवत्सरारंभ होने से ५० वें दिन भादरवा सूद ४ संवत्सरी महापर्व किया जाता है, इसलिए यह संवत्सरी पर्व भी अनादि से है, अनन्तकाल तक रहेगा। निसर्ग की यह हरी-भरी निराली लीला देखकर गुफा रूप विलो में रहने वाले वे मनुष्य चकित हो जाते हैं और बाहर निकलते हैं| । मगर वृक्षों और लताओं के पत्ते हिलते देखकर भयभीत हो जाते हैं और फिर अपने बिलों में घुस जाते हैं। किन्तु विलों में भीतर की दुर्गंध से घबराकर फिर बाहर निकलते हैं।

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प्रतिदिन यह देखते रहने से उनका भय दूर होता है और फिर निर्भर होकर वृक्षो के पास पहुँचने लगते है और तब वे माँसाहार का परित्याग कर देते हैं।

माँसाहार से उन्हें इतनी घृणा हो जाती हैं कि वे जातीय नियम बना लेते हैं कि" अब जो माँस का आहार करे, उसकी परछाई में भी खडा नहीं रहना।"

इस प्रकार धीरे-धीरे जाति-विभाग भी हो जाते हैं और पाँचवे आरे के समान (वर्तमानकाल जैसी) सब व्यवस्था स्थापित हो जाती है। वर्णादि की शुभ पर्यायों में अनन्त गुणी वृद्धि होती हैं।

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(३) दुषमा-सुषमा - यह आरा ४२ हजार वर्ष कम एक कोड़ा कोड़ी सागरोपम का होता है।

इसकी सब रचना अवसर्पिणी काल के चौथे आरे के समान ही होती है।

इसके तीन वर्ष और ८.५ महीना व्यतीत होने के बाद प्रथम तीर्थंकर का जन्म होता है।

इस आरे में २३ तीर्थंकर, ११ चक्रवर्ती, ९ बलदेव, ९ वासुदेव, ९ प्रतिवासुदेव आदि होते हैं। वर्ण आदि शुभ पर्यायों में अनन्त गुणी वृद्धि होती है।

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(४) सुषमा-दुषमा - तीसरा आरा समाप्त होने पर चौथा सुषमा-दुषमा आरा दो कोड़ाकोड़ी सागरोपम का आरम्भ होता है।

इसके ८४ लाख पूर्व, ३ वर्ष और ८.५ महीने बाद चौबीसवें तीर्थंकर मोक्ष चले जाते हैं, बारहवें चक्रवर्ती की आयु पूर्ण हो जाती है।

करोड पूर्व का समय व्यतीत होने के बाद कल्पवृक्षो की उत्पत्ति होने लगती हैं।

उन्ही से मनुष्यों और पशुओं की इच्छा पूर्ण हो जाती है।

तब असि, मसि, कृषि आदि के कार्य बन्द हो जाते है।

युगल उत्पन्न होने लगते हैं। बादर अग्निकाय और धर्म का विच्छेद हो जाता है।

इस प्रकार चौथे आरे में सब मनुष्य अकर्मभुमिक बन जाते है।

वर्ण आदि की शुभ पर्यायों में वृद्धि होती है।

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१२ आरा का काल चक्र

(५) सुषमा - तत्पश्चात् सुषमा नामक तीन कोड़ाकोड़ी सागरोपम का पाँचवाँ आरा लगता है। इसका विवरण अवसर्पिणी काल के दुसरे आरे के समान है।

वर्ण आदि की शुभ पर्यायों में क्रमशः वृद्धि होती जाती है।

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१२ आरा का काल चक्र

(६) सुषमा- सुषमा - ४ कोडी कोडी सागरोपम प्रमाण अवसर्पिणी के प्रथम आरे के समान इस प्रकार दस कोड़ाकोड़ी सागरोपम का अवसर्पिणी काल और दस कोड़ा कोड़ी सागरोपम का उत्सर्पिणी काल होता है।

दोनों मिलकर बीस कोड़ाकोड़ी सागरोपम का एक काल-चक्र अनादि काल से धूम रहा है और अनन्तकाल तक घूमता रहेगा

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