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कबीरदास का परिचय

पवन कुमारी

असिस्टेंट प्रोफेसर

स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग

हंसराज महिला महाविद्यालय

जालंधर

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कबीरदास या कबीर साहब जी 15वीं सदी के भारतीय रहस्यवादी कवि और संत थे।

वे हिन्दी साहित्य के भक्तिकालीन युग में परमेश्वर की भक्ति के लिए एक महान प्रवर्तक के रूप में उभरे। इनकी रचनाओं ने हिन्दी प्रदेश के भक्त आंदोलन को गहरे स्तर तक प्रभावित किया। 

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  • उन्होंने सामाज में फैली कुरीतियों, कर्मकांड, अंधविश्वास की निंदा की और सामाजिक बुराइयों की कड़ी आलोचना भी। उनके जीवनकाल के दौरान हिन्दू और मुसलमान दोनों ने उन्हें बहुत सहयोग किया। कबीर पंथ नामक सम्प्रदाय इनकी शिक्षाओं के अनुयायी हैं। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इन्हें मस्तमौला कहा।

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जीवन परिचय

  • कबीर साहब का (लगभग 14वीं-15वीं शताब्दी) जन्म स्थान काशी, उत्तर है। कबीर साहब का जन्म सन 1398 (संवत 1455), में ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को ब्रह्ममूहर्त के समय हुआ था. उनकी इस लीला को उनके अनुयायी कबीर साहेब प्रकट दिवस के रूप में मनाते हैं।
  •  महात्मा कबीर सामान्यतः "कबीरदास" नाम से प्रसिद्ध हुये तथा उन्होंने बनारस (काशी, उत्तर प्रदेश) में जुलाहे की भूमिका की।

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लहरतारा कबीर का जन्मस्थल

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कृतियां

  • कबीर साहेब जी द्वारा लिखित मुख्य रूप से छह ग्रंथ हैं:
  • कबीर साखी: इस ग्रंथ में कबीर साहेब जी साखियों के माध्यम से सुरता (आत्मा) को आत्म और परमात्म ज्ञान समझाया करते थे।
  • कबीर बीजक: कबीर की वाणी का संग्रह उनके शिष्य धर्मदास ने बीजक नाम से सन् 1464 में किया। इस ग्रंथ में मुख्य रूप से पद्य भाग है। बीजक के तीन भाग किए गए हैं —

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रचना

अर्थ

प्रयुक्त छन्द

भाषा

रमैनी

रामायण

चौपाई और दोहा

ब्रजभाषा और पूर्वी बोली

सबद

शब्द

गेय पद

ब्रजभाषा और पूर्वी बोली

साखी

साक्षी

दोहा

राजस्थानी पंजाबी मिली खड़ी बोली

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  • कबीर शब्दावली: इस ग्रंथ में मुख्य रूप से कबीर साहेब जी ने आत्मा को अपने अनमोल शब्दों के माध्यम से परमात्मा कि जानकारी बताई है।

  • कबीर दोहवाली: इस ग्रंथ में मुख्य तौर पर कबीर साहेब जी के दोहे सम्मलित हैं।

  • कबीर ग्रंथावली: इस ग्रंथ में कबीर साहेब जी के पद व दोहे सम्मलित किये गये हैं।

  • कबीर सागर: यह सूक्ष्म वेद है जिसमें परमात्मा कि विस्तृत जानकारी है।

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कबीर दास की शिक्षा

  • कबीरदास जब धीरे-धीरे बड़े होने लगे तो उन्हें इस बात का आभास हुआ कि वह ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं वह अपनी अवस्था के बालकों से एकदम भिन्न थे। मदरसे भेजने लायक साधन उनके माता—पिता के पास नहीं थे। जिसे हर दिन भोजन के लिए ही चिंता रहती हो, उस पिता के मन में कबीर को पढ़ाने का विचार भी कहा से आए। यही कारण है कि वह किताबी विद्या प्राप्त ना कर सके।

मसि कागद छुवो नहीं, कमल गही नहिं हाथ�  पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।�   ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।

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कबीर दास का वैवाहिक जीवन

  • कबीर दास का विवाह वनखेड़ी बैरागी की पालिता कन्या ‘लोई’ के साथ हुआ। कबीर दास की कमाल और कमाली नामक दो संतानें भी थी जबकि कबीर को कबीर पंथ में बाल ब्रह्मचारी माना जाता है इस पंथ के अनुसार कमाल उसका शिष्य था और कमाली तथा लोई उनकी शिष्या थी।

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कबीरदास के विचार

  • कबीरदास ने जो व्यंग्यात्मक प्रहार किए और अपने को सभी ऋषि-मुनियों से आचारवान एवं सच्चरित्र घोषित किया, उसके प्रभाव से समाज का निम्न वर्ग प्रभावित न हो सका एवं आधुनिक विदेशी सभ्यता में दीक्षित एवं भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति में कुछ लोगों को सच्ची मानवता का संदेश सुनने को मिला।
  • रविंद्र नाथ ठाकुर ने ब्रह्म समाज विचारों से मेल खाने के कारण कबीर की वाणी का अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत किया और उससे आजीवन प्रभावित भी रहे। कबीर दास की रचना मुख्यतः साखियों एवं पदों में हुई है।

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  • इसमें उनकी सहानुभूति तीव्र रूप से सामने आई है।�संत परंपरा में हिंदी के पहले संत साहित्य भाष्टा जयदेव हैं। ये गीत गोविंदकार जयदेव से भिन्न है। शेनभाई, रैदास, पीपा, नानकदेव, अमरदास, धर्मदास, दादूदयाल, गरीबदास, सुंदरदास, दरियादास, कबीर की साधना हैं।

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कबीर दास का व्यक्तित्व

  • हिंदी साहित्य के हजार वर्षों के इतिहास में कबीर जैसा व्यक्तित्व लेकर कोई लेखक उत्पन्न नहीं हुआ।ऐसा व्यक्तित्व तुलसीदास का भी था। परंतु तुलसीदास और कबीर में बड़ा अंतर था।

  • यद्यपि दोनों ही भक्त थे, परंतु दोनों स्वभाव, संस्कार दृष्टिकोण में बिल्कुल अलग-अलग थे मस्ती स्वभाव को झाड़-फटकार कर चल देने वाले तेज ने कबीर को हिंदी साहित्य का अद्भुत व्यक्ति बना दिया।

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  • उसी ने कबीर की वाणी में अनन्य असाधारण जीवन रस भर दिया। इसी व्यक्तित्व के कारण कबीर की उक्तियां श्रोता को बलपूर्वक आकर्षित करती हैं। इसी व्यक्तित्व के आकर्षण को सहृदय समालोचक संभाल नहीं पाता और रीझकर कबीर को कवि कहने में संतोष पाता है। ऐसे आकर्षक वक्ता को कवि ना कहा जाए तो और क्या कहा जाए

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कबीर दर्शन

  • यह उनके जीवन के बारे में अपने दर्शन का एक प्रतिबिंब हैं। उनके लेखन मुख्य रूप से पुनर्जन्म और कर्म की अवधारणा पर आधारित थे। कबीर के जीवन के बारे में यह स्पष्ट था कि वह एक बहुत ही साधारण तरीके से जीवन जीने में विश्वास करते थे।

  • उनका परमेश्वर की एकता की अवधारणा में एक मजबूत विश्वास था उनका एक विशेष संदेश था कि चाहे आप हिंदू भगवान या मुसलमान भगवान के नाम का जाप करें, किंतु सत्य यह है कि ऊपर केवल एक ही परमेश्वर है जो इस खूबसूरत दुनिया के निर्माता है।

  • जो लोग इन बातों से ही कबीर दास की महिमा पर विचार करते हैं वे केवल सतह पर ही चक्कर काटते हैं कबीर दास एक बहुत ही महान और जबरदस्त क्रांतिकारी पुरुष थे।

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कबीर दास की मृत्यु�

  • कबीरदास  ने काशी के निकट मगहर में अपने प्राण त्याग दिए। ऐसी मान्यता है कि मृत्यु के बाद उनके शव को लेकर भी विवाद उत्पन्न हो गया था हिंदू कहते हैं कि उनका अंतिम संस्कार हिंदू रीति से होना चाहिए और मुस्लिम कहते थे कि मुस्लिम रीति से।

  • इसी विवाद के चलते जब उनके शव से चादर हट गई तब लोगों ने वहां फूलों का ढेर पड़ा देखा और बाद में वहां से आधे फुल हिंदुओं ने उठाया और आधे फूल मुसलमानों ने।

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  • मुसलमानों ने मुस्लिम रीति से और हिंदुओं ने हिंदू रीती से उन फूलों का अंतिम संस्कार किया। मगहर में कबीर की समाधि है उनके जन्म की तरह ही उनकी मृत्यु तिथि एवं घटना को भी लेकर मतभेद है।

  • किंतु अधिकतर विद्वान उनकी मृत्यु संवत् 1575 विक्रमी (सन 1518 ई०) को मानते हैं, लेकिन बाद में कुछ इतिहासकार उनकी मृत्यु को 1448 को मानते हैं।

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कबीर की काव्यगत विशेषताओं

  • 1. सत्य-भावना– कबीर सत्य के अन्वेषक थे। धर्मान्धता और संकीर्णता से उन्हें घृणा थी। असत्य पर सुनहरी मुलम्मा चढाकर संसार को धोखा देना उन्हें पसन्द न था। ढोंग से उन्हें चिढ़ थी। ढोंग और आडम्बर करने वालों को वे आड़े हाथों लेते थे। वे निर्भय और सत्यवादी थे। सिर मुड़े झूठे संन्यासियों को लक्ष्य करके कही गयी उनकी यह उक्ति कितनी सत्य है–

“मूँड मुडाये हरि मिलें, सब कोई लेइ मुडाय। |�बार-बार के मूँडते, भेड न बैकुंठ जाय॥"

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  • 2. दृढ़-आत्मविश्वास– कबीर अपने सत्य प्रतिपादित मत का दृढ़ आत्मविश्वास के साथ प्रतिपादन करते थे। वे अपने मत को सदा सत्य समझते थे और सब को झूठा। पंडित और मुल्ला भी उनकी दृष्टि में गुण-कर्म हीन थे। आत्मविश्वास के साथ उन्होंने कहा-

"अरे इन दोउन राह न पाई।�हिन्दू अपनी करे बड़ाई, गगरी छुवन न देई।�वेश्या के पायन तर सोवै, यह देखहु हिन्दुवाई॥�मुसलमान के पीर औलिया मुरगी-मुरगा खाई।�खाला केरी बेटी ब्याहैं घरहि में. करहिं सगाई॥”

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  • 3. सरलता तथा सहृदयता– कबीर स्वभाव से सरल-हृदय थे। उनके स्वभाव की सरलता उनकी कविता में स्पष्ट दिखाई पड़ती है। अव्यावहारिक शब्दों तथा विचारों से उन्होंने कविता को उलझाने की चेष्टा नहीं की है। उनके हृदय की सरलता के कारण उनकी रहस्यात्मक उक्तियाँ भी सरल हो गयी हैं। वेदों और शास्त्रों का सहारा न लेकर व्यावहारिक जीवन के उदाहरणों द्वारा उन्होंने आत्मा और परमात्मा के मिलन को स्पष्ट कर दिया है–
  • “जल बिच कुंभ कुंभ बिच जल है, बाहर भीतर पानी।�फूटा कुंभ जल जलहिं समाना, एतथ कहियो ज्ञानी॥

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  • 4. निर्गुण ब्रह्म के उपासक– कबीर निर्गुण ब्रह्म के सच्चे उपासक थे। उन्होने निराकार ब्रह्म को भी राम! नाम से अभिहित किया है, उनका राम निराकार॑ परमब्रह्म है दशरथ पुत्र राम नहीं–

“दशरथ सुत तिहुँ बरवाना।�राम नाम का परम है आना॥

उनके निराकार ब्रह्म का कोई मुख माथा रूप कुरूप नहीं है एक अनुपम तत्व है-

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  • 5. रहस्यवाद–कबीर ने साधनात्मक तथा भावात्मक द्वोनों ही प्रकार के रहस्यवाद को अपनाया है। भावात्मक रहस्यवाद में कबीर ने आत्मा-परमात्मा के प्रेम सम्बन्धों को अनेक लौकिक सम्बन्धों से परिपुष्ट किया।

“कबीर कूता राम कौ, मुतिया मेरौ नाव।�गले राम की जेबरी, जित खींचे तित जाव।।"�×       ×         ×           ×          ×�हरिमोर पिऊ मैं हरि की बहुरिया।

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  • 6. गुरु-महिमा– कबीर ने गुरु की महत्ता प्रतिपादित की है, उन्होंने गुरु को सर्वोपरि माना है, सच्चा गुरु ही ब्रह्म से मिलाता है।

“सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपगार।�लोचन अनंत उधाड़िया, अनंत दिखावण हार॥

गुरु के रूठने पर व्यक्ति की सद्गति असम्भव है –

हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठे नहिं ठौर।

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  • 7. गम्भीर-अनुभूति– कबीर का अनुभव बड़ा विशाल था। उनका साहित्य ऐसा सरल और सजीव हो उठा है कि वे अनपढ़ होते हुए भी एक उच्च कोटि के कवि होने के अधिकारी हो गये हैं। उन्होंने जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया, उसी को उन्होंने सीधी-सादी भाषा में जनता तक पहुँचाने का प्रयास किया है। अनुभूति के बल पर एक साधारण वस्तु से उपमा देते हुए प्रेम का कितना सजीव चित्रण है–

“जा घट प्रेम न संचरै, सो घट जान मसान।�जैसे खाल लुहार की, साँस लेत बिनु प्रान॥”

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कलापक्षीय-विशेषताएँ– कबीरदास की भाषा शैली

भाषा– कबीर स्वयं अनपढ़ थे। उन्होंने स्वयं कहा है-

�“मसि कागद छुयौ नहीं, कलम गही नहिं हाथ।

�अतः उनकी भाषा साहित्यिक तथा परिमार्जित नहीं हो पायी है। विशाल भ्रमण तथा अनेक साथु-सन्‍तों की संगति के कारण उनकी भाषा में कई भाषाओं के शब्द मिल गये हैं। राजस्थानी, अवधी, व्रजभाषा, बचेली तथा पंजाबी के शब्द मिल कर कबीर की भाषा 'पंचमेल-खिचड़ी' बन गयी है। पं० रामचन्द्र शुक्ल ने कबीर की इस भाषा को 'सधुक्कड़ी' नाम दिया है। कबीर ने जनसाधारण की आम भाषा का प्रयोग किया है और जहाँ कहीं वे गये, अपनी वाणी को वहीं के योग्य बनाने की चेष्टा की है। अनपढ़ होने के कारण उनकी भाषा में गँवारूपन है तथा शब्दों की काफी तोड़-मरोड़ की गयी है।

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  • शैली– कबीर ने दोहा, चौपाई तथा पदों में काव्य रचना की है। छन्द-शास्त्र का ज्ञान न होने के कारण - दोहे जैसे छोटे छन्‍द की रचना मे भी उनसे अनेक स्थानों पर चूक हो गयी है। किन्तु इसमे तनिक भी सन्देह नहीं है कि कबीर की शैली अत्यन्त सरल तथा प्रभावशाली है। शब्दों का आडम्बर तथा अलंकारों को जबरदस्ती - ठूसना कबीर को बिल्कुल पसन्द न था। शैली की इस सरलता के कारण ही कबीर की साखियों तथा पदों का जनसाधारण में पर्याप्त प्रचार हुआ और वे आज भी जन-जन की जीभ पर नाचते हैं। गुरु की महिमा का वे कितने सरल ढंग से प्रभावशाली चित्रण करते हैं–

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गुरु कुंभार सिख कुंभ है, गढ़िं-गढ़ि काढ़ै खोट।�भीतर हाथ सहार दे, बाहर बाहै चोट॥“

आत्मा तथा परमात्मा के रहस्य का उद्घाटन करते हुए कबीर ने “उलटवासियाँ' भी कही हैं जिनमें साधारण दृष्टि से तो उल्टा अर्थ प्रतीत होता है किन्तु आध्यात्मिक अर्थ लगाने से अर्थ ठीक बैठ जाता है। एक उदाहरण देखिए-

“पहले जन्म पुत्र का भयऊ, बाप जनमिया पाछे।�बाप पूत की एकै नारी, ई अचरज कोई काछे॥”

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  • कबीर दास ने अपने काव्य के माध्यम से जीवन सत्य का उद्घाटन किया है। कबीर "ज्ञानमार्गी निर्गुण भक्ति धारा" के प्रतिनिधि कवि हैं। उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों के आधार पर काव्य रचना की है। वे युगदृष्टा और युगसृष्टा दोनों ही थे। समाज सुधारक और युग निर्माता कबीर दास हिंदी काव्य जगत के महत्वपूर्ण कवि हैं। कबीर ने समाज के दोषों को दूर करने का सफल प्रयास किया था। सच्चे अर्थों में वे एक आदर्श कवि थे। हिंदी साहित्य के प्रमुख कवियों में कबीर दास का महत्वपूर्ण स्थान है।

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धन्यवाद