कबीरदास का परिचय
पवन कुमारी
असिस्टेंट प्रोफेसर
स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग
हंसराज महिला महाविद्यालय
जालंधर
कबीरदास या कबीर साहब जी 15वीं सदी के भारतीय रहस्यवादी कवि और संत थे।
वे हिन्दी साहित्य के भक्तिकालीन युग में परमेश्वर की भक्ति के लिए एक महान प्रवर्तक के रूप में उभरे। इनकी रचनाओं ने हिन्दी प्रदेश के भक्त आंदोलन को गहरे स्तर तक प्रभावित किया।
जीवन परिचय�
लहरतारा कबीर का जन्मस्थल
कृतियां�
रचना | अर्थ | प्रयुक्त छन्द | भाषा |
रमैनी | रामायण | चौपाई और दोहा | ब्रजभाषा और पूर्वी बोली |
सबद | शब्द | गेय पद | ब्रजभाषा और पूर्वी बोली |
साखी | साक्षी | दोहा | राजस्थानी पंजाबी मिली खड़ी बोली |
कबीर दास की शिक्षा�
मसि कागद छुवो नहीं, कमल गही नहिं हाथ� पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।� ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।
कबीर दास का वैवाहिक जीवन�
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कबीरदास के विचार �
कबीर दास का व्यक्तित्व�
कबीर दर्शन�
कबीर दास की मृत्यु�
कबीर की काव्यगत विशेषताओं�
“मूँड मुडाये हरि मिलें, सब कोई लेइ मुडाय। |�बार-बार के मूँडते, भेड न बैकुंठ जाय॥"
"अरे इन दोउन राह न पाई।�हिन्दू अपनी करे बड़ाई, गगरी छुवन न देई।�वेश्या के पायन तर सोवै, यह देखहु हिन्दुवाई॥�मुसलमान के पीर औलिया मुरगी-मुरगा खाई।�खाला केरी बेटी ब्याहैं घरहि में. करहिं सगाई॥”
“दशरथ सुत तिहुँ बरवाना।�राम नाम का परम है आना॥
उनके निराकार ब्रह्म का कोई मुख माथा रूप कुरूप नहीं है एक अनुपम तत्व है-
“कबीर कूता राम कौ, मुतिया मेरौ नाव।�गले राम की जेबरी, जित खींचे तित जाव।।"�× × × × ×�हरिमोर पिऊ मैं हरि की बहुरिया।
“सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपगार।�लोचन अनंत उधाड़िया, अनंत दिखावण हार॥
गुरु के रूठने पर व्यक्ति की सद्गति असम्भव है –
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठे नहिं ठौर।
“जा घट प्रेम न संचरै, सो घट जान मसान।�जैसे खाल लुहार की, साँस लेत बिनु प्रान॥”
कलापक्षीय-विशेषताएँ– कबीरदास की भाषा शैली�
भाषा– कबीर स्वयं अनपढ़ थे। उन्होंने स्वयं कहा है-
�“मसि कागद छुयौ नहीं, कलम गही नहिं हाथ।”
�अतः उनकी भाषा साहित्यिक तथा परिमार्जित नहीं हो पायी है। विशाल भ्रमण तथा अनेक साथु-सन्तों की संगति के कारण उनकी भाषा में कई भाषाओं के शब्द मिल गये हैं। राजस्थानी, अवधी, व्रजभाषा, बचेली तथा पंजाबी के शब्द मिल कर कबीर की भाषा 'पंचमेल-खिचड़ी' बन गयी है। पं० रामचन्द्र शुक्ल ने कबीर की इस भाषा को 'सधुक्कड़ी' नाम दिया है। कबीर ने जनसाधारण की आम भाषा का प्रयोग किया है और जहाँ कहीं वे गये, अपनी वाणी को वहीं के योग्य बनाने की चेष्टा की है। अनपढ़ होने के कारण उनकी भाषा में गँवारूपन है तथा शब्दों की काफी तोड़-मरोड़ की गयी है।
गुरु कुंभार सिख कुंभ है, गढ़िं-गढ़ि काढ़ै खोट।�भीतर हाथ सहार दे, बाहर बाहै चोट॥“
आत्मा तथा परमात्मा के रहस्य का उद्घाटन करते हुए कबीर ने “उलटवासियाँ' भी कही हैं जिनमें साधारण दृष्टि से तो उल्टा अर्थ प्रतीत होता है किन्तु आध्यात्मिक अर्थ लगाने से अर्थ ठीक बैठ जाता है। एक उदाहरण देखिए-
“पहले जन्म पुत्र का भयऊ, बाप जनमिया पाछे।�बाप पूत की एकै नारी, ई अचरज कोई काछे॥”
धन्यवाद