1 of 23

राहुल सांकृत्ययान

2 of 23

ल्हासा की ओर

  • राहुल सांकृत्यायन

3 of 23

तिब्बती लोग

4 of 23

जीवनी

  • राहुल सांकृत्ययान का जन्म सन १८९३ जिला आजमगढ़ ( उत्तर प्रदेश ) मे हुआ | उनका मूल नाम केदार पाण्डेय था | उनकी शिक्षा काशी , आगरा और लाहौर मे हुई | सन १९३० मे उन्होने श्रीलंका जाकर बुद्ध धर्म ग्रहण कर लिया | तबसे उनका नाम राहुल सांकृत्ययान हो गया | साहित्य की दुनिया मे इन्हें महापंडित भी कहते है| राहुल जी पालि, प्राकृत, तिब्बती, चीनी , अपभ्रंश ,जापानी ,रुसी सहित अनेक भाषाओ के जानकार थे | १९६३ मे उनका देहांत हो गया

5 of 23

साहित्यिक रचनाएं

  • भागो नही  दुनिया को बदलो ,मेरी जीवन - यात्रा ( छै भाग) दर्शन - दिग्दर्शन , बाईसवी सदी दिमागी गुलामी ,घुमक्कड़ शास्त्र उनकी प्रमुख कृतिया है , वोलगा से गंगा उनकी प्रमुख कृतिया  है| राहुल जी द्वारा रचित पुस्तकों की संख्या १५० है |

6 of 23

साहित्यिक विशेषताएं

  • राहुल  स्वभाव से घुमक्कड़   थे | उन्होंने मंजिल के स्थान पर यात्रा को ही घुमक्कड़  का उददेश्य भी बताया | घुमक्कड़ी से  मनोरंजन ,ज्ञानवर्धन एवं अज्ञात स्थलों  की जानकारी के साथ साथ भाषा एवं संस्कृति का भी आदान प्रदान होता है | राहुल वर्णन की कला मे निपुण थे | रोचकता उनके लेखन का प्रमुख गुण है |

7 of 23

भाषा शैली

  •  राहुल जी की भाषा सरल सहज एवं प्रभावात्मक शब्दों से परिपूर्ण है |

  • उन्होंने  हिंदी के अलावा उर्दू और अंग्रजी के शब्दों का भी प्रयोग किया है |

8 of 23

राहुल सांकृत्यायन की प्रथम यात्रा ल्हासा की ओर

  • राहुल जी ने तिब्बत यात्रा सन १९२९-१९३०में नेपाल के रास्ते से की थी |उस समय भारतीयों को तिब्बत यात्रा की अनुमति नही थी | इसलिये उन्होने यह यात्रा एक भिखमंगे के वेश मे की थी | इससे  तिब्बत की राजधानी ल्हासा की ओर जाने वाले दुर्गम रास्तो का वर्णन उन्हो ने बहुत रोचक शैली मे किया है | इस यात्रा वृतान्त से तिब्बती समाज के बारे में
  • अनेक जानकारी मिलती है।

9 of 23

हिमालय की श्रेणियां

10 of 23

11 of 23

ल्हासा की ओर- -पाठ का सार

  • इस पाठ में राहुल जी ने अपनी पहली तिब्बत यात्रा का वर्णन किया है जो उन्होने सन 1929-30  मे नेपाल के रास्ते की थी। चूँकि उस समय भारतीयो को तिब्बत यात्रा की अनुमति नही थी, इसलिए उन्होने यह यात्रा एक भिखमन्गो के छ्द्म वेश मे की थी।��लेखक की यात्रा बहुत वर्ष पहले जब फरी-कलिङ्पोङ् का रास्ता नहीं बना था, तो नेपाल से तिब्बत जाने का एक ही रास्ता था। इस रास्ते पर नेपाल के लोग के साथ-साथ भारत की लोग भी जाते थे। यह रास्ता व्यापारिक और सैनिक रास्ता भी था, इसीलिए इसे लेखक ने मुख्या रास्ता बताया है। तिब्बत में जाति-पाँति, छुआछूत का सवाल नहीं उठता और वहाँ औरतों परदा नहीं डालती है। चोरी की आशंका के कारण भिखमंगो को कोई घर में घुसने नही देता नही तो अपरिचित होने पर भी आप घर के अंदर जा सकते हैं और जरुरत अनुसार अपनी झोली से चाय  दे सकते हैं, घर की बहु अथवा सास उसे आपके लिए पका देगी।�

12 of 23

बर्फीली चोटियाँ

13 of 23

परित्यक्त चीनी किले से जब वह चले तो एक व्यक्ति को दो चिटें राहदारी देकर थोङ्ला के पहले के आखिरी गाँव में पहुँच गए। यहाँ सुमति (मंगोल भिक्ष, राहुल का दोस्त)  पहचान तथा भिखारी होने के कारण रहने को अच्छी जगह मिली। पांच साल बाद वे लोग इसी रास्ते से लौटे थे तब उन्हें रहने की जगह नही मिली थी और गरीब के झपड़ी में ठहरना पड़ा था क्योंकि वे भिखारी नही बल्कि भद्र यात्री के वेश में थे।��अगले दिन राहुल जी एवं सुमति जी को एक विकट डाँडा थोङ्‍ला पार करना था। डाँडे तिब्बत में सबसे खतरे की जगह थी। सोलह-सत्रह हजार फीट उंची होने के कारण दोनों ओर गाँव का नामोनिशान न था। डाकुओं के छिपने की जगह तथा सरकार की नरमी के कारण यहाँ अक्सर खून हो जाते थे। चूँकि वे लोग भिखारी के वेश में थे इसलिए हत्या की उन्हें परवाह नही थी परन्तु उंचाई का डर बना था।�

14 of 23

दूसरे दिन उन्होंने डाँडे की चढ़ाई घोड़े से की जिसमे उन्हें दक्षिण-पूरब ओर बिना बर्फ और हरियाली के नंगे पहाड़ दिखे तथा उत्तर की और पहाड़ों पे कुछ बर्फ दिखी। उतरते समय लेखक का घोडा थोड़ा पीछे चलने लगा और वे बाएं की ओर डेढ़ मील आगे चल दिए। बाद में पूछ कर पता चला लङ्कोर का रास्ता दाहिने के तरफ तथा जिससे लेखक को देर हो गयी तथा उसुमति नाराज हो गए परन्तु जल्द ही गुस्सा ठंडा हो गया और वे लङ्कोर में एक अच्छी जगह पर ठहरे। ��

15 of 23

वे अब तिङ्ऱी के मैदान में थे जो की पहाड़ों से घिरा टापू था सामने एक छोटी सी पहाड़ी दिखाई पड़ती थी जिसका नाम  तिङ्ऱी-समाधि-गिरी था। आसपास के गाँवों में सुमति के बहुत परिचित थे वे उनसे जाकर मिलना चाहते थे परन्तु लेखक ने उन्हें मना कर दिया और ल्हासा पहुंचकर पैसे देने का वादा किया। सुमति मान गए और उन्होंने आगे बढ़ना शुरू किया। उन्होंने सुबह चलना शुरू नही किया था इसीलिए उन्हें कड़ी धूप में आगे बढ़ना पड़ रहा था, वे पीठ पे अपनी चीज़े लादे और हाथ में डंडा लिए चल रहे थे। सुमति एक ओर यजमान से मिलना चाहते थे इसलिए उन्होंने बहाना कर शेकर विहार की ओर चलने को कहा। तिब्बत की जमीन छोटे-बड़े जागीरदारों के हाथों में बँटी है। इन जागीरों का बड़ा हिस्सा मठों के हाथ में है।अपनी-अपनी जागीर में हर जागीरदार कुछ खेती खुद भी करता है जिसके लिए मजदुर उन्हें बेगार में मिल जाते हैं।

16 of 23

बौद्ध मठ

17 of 23

लेखक शेकर की खेती के मुखिया भिक्षु न्मसे से मिले। वहां एक अच्छा मंदिर था जिसमे बुद्ध वचन की हस्तलिखित 103 पोथियाँ रखी थीं जिसे लेखक पढ़ने में लग गए इसी दौरान सुमति ने आसपास अपने यजमानों से मिलकर आने के लिए लेखक से पूछा जिसे लेखक ने मान लिया, दोपहर तक सुमति वापस आ गए। चूँकि तिङ्ऱी वहां से ज्यादा दूर नही था इसीलिए उन्होंने अपना सामान पीठ पर उठाया और न्मसे से विदा लेकर चल दिए।��सुमित का परिचय - वह लेखक को यात्रा के दौरान मिला जो एक मंगोल भिक्षु था। उनका नाम लोब्ज़ङ्शेख था. इसका अर्थ हैं सुमति प्रज्ञ. अतः सुविधा के लिए लेखक ने उसे सुमति नाम से पुकारा हैं।�

18 of 23

  • वर्तमान स्थिति मे आज तिब्बत चीनी गणतंत्र  का एक प्रान्त  है |यहाँ जाने के लिये सर्वप्रथम पासपोर्ट और विजा की आवश्यकता होती है | राहुल जी को पैदल यात्रा करनी पड़ी  थी | आज पैदल भाग बहुत कम है | भारत से तीन प्रमुख सडक  मार्गो से भी जाया जा सकता है - लद्दाख से हिमाचल मे सतलुज की घाटी से उतरांचल  मे लिपु लेख से वायु मार्ग से भी जाया जा सकता है |

19 of 23

तिब्बती चाय

20 of 23

रंग बिरंगी झंडियाँ

21 of 23

चीनी किला

22 of 23

कठिन शब्दों के अर्थ

 

व्यापारिक- व्यापार से संबंधित ।

चौकियां – सुरक्षा के लिए बनाए गए ठिकाने ।

पलटन - सेना ।

बसेरा - रहने का स्थान ।

आबाद - बसा हुआ या जहां लोग रहते हैं।

दुरुस्त - ठीक-ठाक ।

निर्जन - एकांत ।

23 of 23