प्रस्तावना:
हिंदी के कालजयी साहित्यकार महाकवि जयशंकर प्रसाद की अप्रतिम साहित्य-सर्जना लोक विश्रुत है। प्रसाद जी ने कविता, नाटक, निबंध, इतिहास, दर्शन और संस्कृति प्रभृति क्षेत्रों में अपनी लेखनी से अनेकविध कीर्तिमान अर्जित किए हैं। जनमानस में राष्ट्र गौरव की भावना को जागृत करने और भारतीय संस्कृति को अक्षुण्ण रखने के लिए प्रसाद जी निरंतर कर्मरत रहे।आज केभौतिकतावादी, उपभोगक्तावादी युग में यांत्रिक जीवन शैली से घिरा अवसादग्रस्त मानव जबकि अन्तस से रिक्त होता जा रहा है, ऐसे में प्रसाद जी का समरसतावाद और आनंदवाद का दर्शन ही प्रेरक सूत्र है। शैव एवं बौद्ध दर्शन के माध्यम से आत्मबोध, करुणा, प्रकृति-पुरुष की तात्त्विक समानता का संदेश मानवमात्र को ऊर्जस्वित करता है। प्रसाद जी इच्छा - क्रिया - ज्ञान इस त्रिधा में ऐक्य स्थापित करते हुए समाज में मानवता के विजय की कामना करते हैं -
" शक्ति के विद्युत्कण जो व्यस्त,
विकल बिखरे हैं हो निरुपाय।
समन्वय उनका करें समस्त,
विजयिनी मानवता हो जाए।। "
~: द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी-परिचर्चा :~
संगोष्ठी का उद्देश्य-
हिंदी साहित्य के बहुआयामी सर्जक जयशंकर
प्रसाद के काव्य, नाटक, कथा
और निबंधपरक रचनाओं का समकालीन परिप्रेक्ष्य में पुनर्मूल्यांकन इस संगोष्ठी का
प्रमुख उद्देश्य है। हम जानते हैं कि जयशंकर प्रसाद सचेत सांस्कृतिक दृष्टि संपन्न
साहित्यकार थे। गद्य और पद्य - दोनों में उनकी रचनाएं उनके भारत बोध का प्रमाण
हैं। इस भारत बोध के कारण ही औपनिवेशिक दौर में उन्होंने विभिन्न रचनाओं द्वारा यह
कहने का प्रयास किया था कि ‘अरुण यह मधुमय देश हमारा’। अपनी कविता,
कहानी, नाटक और उपन्यासों द्वारा उन्होंने अपने समय में सांस्कृतिक सूर्योदय की
कामना की। उनके कहने का तरीका बदलता रहा पर एक ध्येय यह कहना भी बना रहा कि ‘अब
जागो जीवन के प्रभात’। बनारस के ही रहने वाले उनके पूर्ववर्ती कालजयी रचनाकार
भारतेंदु हरिश्चंद्र को भी कहना पड़ा था - ‘हा हा भारत दुर्दशा न देखी जाई’।
जयशंकर प्रसाद इस दुर्दशा के आन्तरिक और बाह्य कारणों को ठीक - ठीक पहचानते थे।
उनकी कहानियों और उपन्यासों के यथार्थ बोध, नाटकों
की प्रस्तावना और कविता की सांस्कृतिक यात्रा से तत्कालीन दौर में जागरण का वह
स्वर मुखरित हुआ जिसे उनके ही शब्दों में कहा जा सकता है- ‘बीती विभावरी जाग री’।
प्रसन्नता का विषय है कि जागरण के इस स्वर को आज के हमारे समय के लिए भी प्रासंगिक
समझते हुए विश्वभारती के हिंदी विभाग ने जयशंकर प्रसाद की प्रपौत्री कविता प्रसाद
के माध्यम से महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट, लखनऊ एवं केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा
के साथ मिलकर दो दिवसयीय राष्ट्रीय संगोष्ठी की योजना बनायी है। दो दिवसीय इस
राष्ट्रीय संगोष्ठी में विद्वानों के शोध-पत्र, व्याख्यान,
सांस्कृतिक कार्यक्रमों तथा संवाद-सत्रों के माध्यम से प्रसाद की
सृजनात्मक चेतना और सांस्कृतिक जागरण की अवधारणा पर गहन विचार-विमर्श किया जाएगा।
विषय:
‘बीती विभावरी जाग री।'
उप-विषय: